Sagar – An Erotic Incest Story – Update 7

Sagar - An Erotic Incest Story
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Update 7.

अगले दिन सुबह जब मैं सो कर उठा तब हल्की हल्की बारिश हो रही थी । मैंने खिड़की से झांक कर देखा तो आसमान में हल्के-हल्के बादल आंख मिचौली खेल रहे थे । अप्रैल का महीना बारिश का नहीं होता है लेकिन हमारे यहां मौसम कब पलट जाए कोई नहीं जानता । शायद इसीलिए भारतीय मानसून को जुए का खेल कहा जाता है । मैं नित्य कर्म से निवृत्त हो कर अपने बिस्तर पर बैठ गया और पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाओं के बारे में सोचने लगा ।

तभी वहां रीतु आईं ।

” नाश्ता नहीं करना है क्या ” रीतु बोली ।

मैंने उसे देखा । नहा धो कर वह किसी ताजा ताजा खिले कली के समान लग रही थी । उसके शरीर से किसी सुगन्धित सेंट की खुशबू आ रही थी । वैसे उसे किसी भी आर्टिफिशियल सेंट की कोई जरूरत नहीं थी। उसने लेगिंग्स और टाप पहना था जिसमें उसके शरीर के उतार चढ़ाव किसी भी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए काफी था । कितनी खूबसूरत है मेरी बहन ।

मैंने एक लम्बी सांस ली और उसके साथ नीचे हाल में आ गया ।

” क्या बात है ! आज बड़ी देर कर दी ।” माॅम ने पूछा ।

” कोई खास बात नहीं है माॅम । चलो जल्दी से नाश्ता लगाओ ।” मैं कुर्सी पर बैठते हुए बोला ।

माॅम ने नाश्ता निकाला । हम दोनों भाई बहन नाश्ता करने लगे । डैड ड्यूटी चले गए थे । थोड़ी देर बाद माॅम भी अपना नाश्ता ले कर हमारे साथ ही बैठ गई ।

” माॅम ! कल मुझे श्वेता दी को लेकर आगरा जाना है ।” मैंने खाने के दौरान कहा ।

” क्यों । ” माॅम ने प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा ।

” उनकी सहेली उर्वशी की शादी की रिसेप्शन है ।”

” तो तुम क्यों जा रहे हो । जीजू नहीं है क्या ।” रीतु ने बीच में टोकते हुए कहा ।

” नहीं । उनकी तबीयत थोड़ी रिवर्स गियर में चल रही है ।” मैंने उसे देखकर मजाक करते हुए कहा ।

” तब कल तो आ नहीं पाओगे ? ” माॅम ने पूछा ।

” पता नहीं । ये तो वहां जाने के बाद मालूम पड़ेगा ।”

अभी हम बातें कर ही रहे थे कि मेरा मोबाइल बजने लगा । मैंने देखा किसी अनजान नंबर से फोन था । मैंने फोन पिक अप किया ।

” हैलो ! सागर जी ? ”

” हां जी । बोलिए ।” मैंने कहा

” मैं अनुष्का ।”

” जी , जी अनुष्का जी कहिए ।”

” यदि आज आप फ्री हो तो क्या हम मिल सकते हैं ।”

” क्यों नहीं । बोलिए कहा और कब आना होगा ।”

” निजामुद्दीन स्टेशन के पास दो बजे तक आ जाइए ।”

” ओके । मैं पहुंच जाऊंगा ।”

फिर ‘ बाय ‘ बोलकर उसने फोन काट दिया । अभी उस वक्त दस ही बजे थे मतलब चार घंटे बाद । नाश्ता भी हमारा हो गया था । फिर मैंने माॅम को कालेज जाने की बोलकर घर से निकल गया ।

कालेज से ही मैं निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा । वहां अगल बगल नजरें दौड़ाई तभी किसी ने मेरा ‌नाम लेकर पुकारा । मैंने देखा अनुष्का कार में बैठे मुझे ईसारे से बुला रही थी । मैं उसके पास गया । उसने मुझे कार में बैठने को कहा । मैं उसके बगल बैठ गया ।कार में उसके सिवा और कोई नहीं था ।

” मुझे शक है कि मेरी निगरानी के लिए मेरे पति ने किसी को मेरे पिछे लगा रखा है । एक आदमी मुझे अपने पिछे लगा हुआ दिखा लेकिन मैं उसे डाज देने में कामयाब हो गई ।” अनुष्का ड्राइव करती हुई बोली ।

” अच्छा ! बहुत होशियार है आप ।”

” वो तो मैं हूं ।” वो मुदित मन से बोली ।

” अब हम कहां जा रहे हैं ।”

” जहां तुम कहो ।”

” जी ! किसी खास जगह चलें ।”

” कैसी खास जगह ।”

” जहां तन्हाई हो । नीम अंधेरा हो । रोमांटिक म्यूजिक हो । जहां जाम छलकते हों । शराब के भी और शवाव के भी ।”

” ऐसी कोई जगह है यहां

” एक नहीं कई है ।”

” कहां है ? ” वह संशय भरे दृष्टि डाली ।

” होटल में ।”

” बीबी झाड़ू लेकर सर गंजी कर देगी ।”

” आप के खादिम के पास झाड़ू तो है लेकिन बीबी नहीं ।”

” क्यों । मायके गई है ।”

” है ही नहीं ।”

” इस बात का अफसोस है या खुशी ।”

” दोनों । कभी अफसोस कभी खुशी ।”

” मतलब ।”

” ” सर्दियों की तन्हा रातों में अफसोस और बाकी खुशी ।”

” काफी रंगीन किस्म के आदमी हो ।”

” ऐसा ही है कुछ ।”

” बातें बढ़िया करते हो ।”

” मैं और भी कई काम बढ़िया करता हूं लेकिन वो फिर कभी । ”

उसके बाद हम निजामुद्दीन में ही कनिष्क नामक बार एंड रेस्टोरेंट में गये । वहां एक कोने की टेबल पर आमने-सामने बैठने की जगह अगल बगल बैठ गये ।

” क्या लोगे ” ” उसने कहा ।

” जो आप कहो ।”

थोड़ी देर बाद हमारे टेबल पर काफी की ग्लास आई ।

” उस दिन मेरे पति के सामने मेरी पोल न खोलने के लिए शुक्रिया ।”

” वो सब छोड़ो , उस दिन मैंने जो सवाल पूछा था उसका जवाब दो ।”

” देखो ! मुझे राजीव ने बता दिया है कि उससे तुम्हारी बात हुई है । तुम सब कुछ तो जान ही चुके हो ।”

” सब कुछ नहीं । दी के आने से बात अधुरी रह गई थी । तुम अपने बारे में कुछ बताओ ।”

” मैं , मैं मेरठ की रहने वाली हूं । मेरे घर में मेरे अलावा सिर्फ एक बहन है जो वहीं रहती है । हमारे मां बाप बहुत पहले गुजर चुके थे ।हमारी जिंदगी काफी ग़रीबी में कटी है , हमने अपने जिन्दगी में इतने अभाव देखें है कि उन दिनों की याद करके आज भी हमारी रूह कांप जाती है ।” वो जैसे बिते दिनों में खो सी गई थी ।

” फिर । फिर क्या हुआ ।”

मेरे टोकने पर वह धरातल पर आई ।

” हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि हम अपर क्लास की शिक्षा पूरी कर पाते । वीणा की तो पढ़ाई में कोई खास रूचि नहीं थी लेकिन मैं पढ़ना चाहती थी । मैं कुछ करना चाहती थी । मैं कुछ बनना चाहती थी । मैंने , मां की कुछ जेवर थी , वो बेच कर दिल्ली आ गयी । यहां आकर कालेज में दाखिला लिया । यहीं राजीव से मुलाकात हुई । ”

मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था । थोड़ी देर बाद वो बोली ।

” वो मुझ से शादी करना चाहता था लेकिन मैंने जो कष्ट , जो जिल्लत , जो अभाव देखा था वो मुझे रह रह कर डरावने ख्वाब की तरह डसता था । राजीव एक अच्छा लड़का था लेकिन वो मेरे सपनों को पूरा करने में सक्षम नहीं था । करीब एक साल के बाद हमने आपसी रजामंदी से अलग अलग रास्ते चुन लिए । ”

” तुम्हारी मुलाकात कुलभूषण खन्ना से कैसे हुई ? ” मैंने पूछा ।

” वो हमारे कालेज के principal का दोस्त था । एक दिन वो कालेज principal से मिलने आया था , तभी उसने मुझे देखा था ।
वो मुझ पर फिदा हो गया और दो चार मुलाकात में ही शादी का प्रस्ताव रख दिया ।… मैंने बहुत सोचा । महिनों सोचा फिर लास्ट में उसे हां कर दी । ”

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा । मैं उसके दुबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

” आप उस दिन राजीव के फ्लेट में क्या कर रही थी ।” मैंने पुराना सवाल फिर दोहराया ।

थोड़ी देर बाद वो बोली ।
” राजीव से दुबारा छः महीने पहले मुलाकात हुई । वो अपने दोस्तों के साथ पैराडाइज क्लब आया था । मैं उस वक्त अपनी सहेलियों के साथ स्वीमिंगपूल में थी । हमारी बातें हुई ।उसने बताया उसकी शादी डेढ़ साल पहले हो चुकी है । मैंने भी अपने बारे में बताया । फिर कुछ और मुलाकातें हुईं और हम दुबारा दोस्त बन गए । …उस दिन हमारी राजीव के फ्लेट पर डेट थी । मैं वहां सुबह के ग्यारह बजे पहुंची थी । राजीव ने अपने फ्लैट की डुप्लीकेट चाबी मुझे पहले ही दे दी थी । जब मैं वहां पहुंची तब दरवाजा खुला था । मैंने सोचा वो फ्लेट में ही होगा लेकिन वो वहां नहीं था । मैंने उसे फ़ोन किया तो उसने बताया कि वह रास्ते में है । मैं थोड़ी देर बिस्तर पर लेट गई । थोड़ी देर बाद मैं हाथ मुंह धोने बाथरूम गई । वहां मैंने एक आदमी को बाथ-टब में पड़े हुए देखा । मैं डर गई फिर मैंने उसके पास जाकर देखा तो वह मरा पड़ा था । उसे गोली लगी थी । मेरे छक्के छूट गये ।मैं काफी भयभीत हो गयी । फिर जल्दी से वहां से भाग कर निकल ही रही थी कि तुम आ गए ।”

वो चुप हो गई ।

मैं कुछ समझ तक चुप रहा फिर मैंने सिगरेट निकाल कर उसे आफर की तो उसने पैकेट में से एक सिगरेट निकाल ली । फिर मैंने भी सिगरेट निकाली और उसकी सिगरेट सुलगाने के बाद अपनी सुलगाई ।

सिगरेट के चार पांच कश लगाने के बाद वो थोड़ी नार्मल हुई ।

” तुम्हारे पति को राजीव के साथ अफेयर की कोई खबर है ? ” मैंने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए कहा ।

” पता नहीं….. मेरा पति बहुत ईष्र्या करने वाला आदमी है ।” उसने कहा ।

” कोई बड़ी बात नहीं । आप जैसी खुबसूरत औरत का पति जो कोई भी होगा , ऐसा ही होगा ।” मैंने मज़ाक कर कहा ।

” हर किसी पे शक करने वाला ? ”

” वो हर किसी पे शक करता है ? ”

” हां ।”

” फिर तो मुझे यूं आपके करीब नहीं बैठा होना चाहिए ।”

” अरे ! वो तुम पर शक नहीं करता ।”

” मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझु या तौहीन ।”

वह हंसी फिर बोली – ” सुनो , मैं तुमसे एक वादा चाहती हूं ।”

” कैसा वादा ।’

” कि तुम मेरे राज को आगे भी राज रखोगे ।”

” लगता है आप अपने पति से बहुत डरती है ।”

” हां । बहुत ज्यादा ।”

” आप की बनती नहीं उनसे ।”

” नहीं ।”

” तो फिर छोड़ क्यों नहीं देती ।”

” मैं ऐसा नहीं कर सकती ।”

” क्योंकी वो अमीर है । क्योंकी दौलत के बिना आप नहीं रह सकती ।”

उसने आहत भाव से मेरी तरफ देखा ।

औरत ही ऐसा कर सकती है कि चित भी उसकी हो और पट भी उसकी । वो दो किशितयो में सवार होकर चाह सकती हैं कि मझधार में न गिरे । औरत के मन में क्या है , कौन माई का लाल बता सकता है । ( मैं मन ही मन सोचा )

” फिलहाल मुझे नहीं मालूम कि अमर की मौत से आपका कोई रिश्ता है या नहीं । और अभी तक आप के बारे में पुलिस को भी कुछ नहीं पता । अगर आप बेगुनाह है तो बेफिक्र होकर रहिए । … लेकिन अगर आप गुनाहगार है तो अभी से पनाह तलाश करनी शुरू कर दीजिए ।” मैंने कहा ।

उसके चेहरे पर सख्त नाराजगी के भाव उभरे ‌। वो जोर से लम्बी लम्बी सांसें लेने लगी ।

” मिस्टर सागर ।’

” यस मैडम ।”

” मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी ।”

” कैसी उम्मीद नहीं थी मैडम ! ”

” कि तुम्हें मेरा जरा भी लिहाज नहीं होगा । मैं इतनी दूर से तुम्हारे पास आईं और तुम….”।

” इज्जत अफजाई का शुक्रिया । ” मैंने हल्के से सिर झुका कर कहा ।

वो खड़ी हुई और अपना पर्स उठाते हुए बोली -” मैं तुम से फिर बात करूंगी ।”

” वैलकम मैडम ।”

फिर दनदनाते हुए रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई । मैं कुछ देर तक वहीं बैठा सोचता रहा फिर मैं वहां से निकल गया ।

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