हाॅल पहुंच कर जिस सिंगल सोफे पर माॅम बैठी हुई थी , उस पर मैं बैठ गया । संजय जी डैड के पहलू में बैठे अपनी बीवी उर्वशी , बहन मधुमिता और रीतु से बातों में मशगूल थे । डैड कोई खबरिया चैनल देखने में व्यस्त थे । मैंने फिर से संजय जी की ओर नजरें फिराई । वो हकीकत में इतना सुन्दर था – वैसा ही सजा धजा था – कि फिल्म स्टार जान पड़ता था ।
मन ही मन मैं सोच रहा था , और कुढ़ भी रहा था , कि कमीना अपने खुबसूरत थोबड़े की वजह से ही कितनी औरतों का मान मर्दन कर चुका होगा । जरूर गिनती करना भी मुहाल होगा । औरतें बलिहार जाती होगी उस पर ।
औरतें उतनी खुश नहीं होती जबकि उन्हें अपनी पसंद का मर्द मिलता है जितनी वो तब खुश होती है जबकि उन्हें हर किसी की पसंद का मर्द मिलता है । और संजय जी के हर किसी की पसंद का भेद होने में क्या कसर थी ।
कभी मर्द का आकर्षण उसकी मर्दानगी में होता था , उसकी मूंछों में होता था , आज उस के जनानापन में होता है , लड़कियों जैसी लम्बे बाल रखने में होता है । पता नहीं आजकल की लड़कियों के पसन्द ऐसे लड़के क्यों होते हैं ?
वजह जरूर वियाग्रा था जो पुराने जमाने में नहीं होती थी और जो किसी को भी मर्द बना देती थी ।
वियाग्रा के अलावा मर्दाना ताकत हासिल करने में जो आधुनिक तरीके मैंने सुने थे , वो थी :
मेंढक की हडि्डयों को सुरमे जैसा बारीक पीस कर फांक जाओ ।
गधी के दूध में चिमदागड़ का खून घोलकर पियो ।
शेर के अंडकोष का ब्रेसलेट बनवा के पहनो ।
इतने तरीके तो मैंने सुनें थे , जो कि शहद में बादाम घोंट के पीने , दुध में केसर उबाल के पीने , घोंघे खाने जैसे पुरानी तरिको पर हावी थे , अभी और भी होंगे जिनकी मुझे खबर नहीं थी ।
उर्वशी गहरी लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी जिसमें वो हमेशा की तरह हाॅट और सेक्सी दिख रही थी ।
रीतु के बारे में कुछ भी कहना अतिश्योक्ति ही होगी । जगमग जगमग , ताजे खिली हुई कली की तरह , नेचुरल ब्यूटी ।
मधुमिता भी निहायत खुबसूरत थी और मेरी पसंद की हर चीज उसमे थोक में थी । जैसे कि लम्बा कद , छरहरा बदन । तनी हुई सुडौल भरपूर छातियां जो पुरी तरह से ढकी होने पर भी नुमायां जान पड़ती थी । करारी कमर , भारी नितम्ब । लम्बे सुडौल गोरे चिट्टे हाथ पांव , खुबसूरत नयन नक्श , लम्बे रेशमी बाल ।
एण्ड वाट नाट !
वो एक वी शेप खुले गले की स्कीवी और खुली छतरी जैसी स्कर्ट पहने थी । स्कर्ट की बेल्ट बहुत नीचे थी और स्कीवी उसके असाधारण रूप से उन्नत वक्ष की वजह से ऊंची उठी हुई थी । और यूं उसका सुडौल , जाफरान मिले मक्खन की रंगत का पेट कम से कम दस इंच नंगा था । स्कीवी का वी इतना गहरा था कि जरा सी कोशिश से गिरहवान में बहुत दूर तक झांका जा सकता था ।
इन लड़कियों को देखना नयन सुख अभिलाषियों के लिए तो लाटरी निकलने जैसा था , कोई भोग भी लगा पाया हो तो उसकी तकदीर मर्दों के लिए काबिलेरश्क थी ।
” कहां खो गए ।”
” सारी ” – मैं हड़बड़ा कर बोला । मैंने देखा संजय जी मेरी ओर चेहरा किए मुस्करा रहे थे ।
” कहीं नहीं । क्या बातें हो रही है ?” – मैंने मुस्करा कर कहा ।
” बातें मैं कहां कर रहा हूं भाई… बातें तो ये औरतें कर रही है , मैं तो सिर्फ इनकी हां में हां और ना में ना मिला रहा हूं ।”- उन्होंने हंसते हुए कहा ।
” हां भाई आप तो सिर्फ पंचायती कर रहे हो… बातें कहां कर रहे हो ।”- मधुमिता ने अपनी आंखें तरेरते हुए कहा ।
तभी माॅम नाश्ता वगैरह ले कर आ गई । माॅम ने नाश्ता लगाते हुए कहा -” आप लोग खाना खा कर ही जाना ।”
” अरे नहीं आन्टी , आपको कष्ट करने की जरूरत नहीं है… इतना हैवी नाश्ता के बाद इतनी जल्दी खाना थोड़ी ही खाया जाएगा.।”- संजय जी ने माॅम को कहा ।
” नहीं नहीं… मैं कुछ नहीं सुनने वाली हूं , आप लोग पहली बार हमारे यहां आए हुए हैं खाना तो खाना ही पड़ेगा ।” माॅम ने जोर देकर कहा ।
” आन्टी अभी टाइम बहुत ज्यादा हो गया है.. मैं प्रोमिस करती हूं अगली बार हम जरूर भोजन करके ही जाएंगेे ।”- उर्वशी ने माॅम को समझाते हुए कहा ।
” अब जैसी तुम्हारी इच्छा बेटा.. लेकिन याद रखना अगली बार बिना खाए नहीं जाने दुंगी ।”
फिर नाश्ता का कार्यक्रम चलने लगा । इसी बीच हमारी हल्की फुल्की बातें भी होती रही । मैं मधुमिता से बातें करना चाहता था लेकिन यहां सम्भव दिख नहीं रहा था ।
थोड़ी देर बाद उर्वशी ने माॅम से कहा -” आन्टी मैं चाहती हूं कि जब यहां आई हुई ही हूं तो क्यों न श्वेता के माॅम डैड से भी मिल लूं.. अगर श्वेता को मालूम हुआ कि हम यहां आकर उसके घर नहीं गये तो उसे बुरा लग सकता है ।”
” हां हां क्यों नहीं… जरूर हो आओ ।”- माॅम ने कहा ।
कुछ समय बाद रीतु उर्वशी और संजय जी और मधुमिता को लेकर चाचा के घर चली गई । माॅम जुठे बर्तन लेकर किचन चली गई । डैड तो अपने ही कार्यक्रम टीबी देखने में व्यस्त थी और मैं उपर छत पर चला गया ।
छत पर क्लासिक का सिगरेट सुलगाया और उन हसीन तरीन औरतों के बारे में सोचने लगा जिनके साथ हमबिस्तर होने का फिर मुझे गाहे-बगाहे हासिल होता रहा था ।
आप सोचते होंगे कि मैं हमेशा औरतों के बारे में ही सोचता रहता हूं । इस इल्जाम के जवाब में आपके खादिम की अर्ज है कि ये एक गलत और बेजा इल्जाम है कि मैं हमेशा औरतों के बारे में सोचता हूं – हमेशा तो मैं सोचता ही नहीं – अलबत्ता इतना तो शर्तिया कबूल करता हूं कि जब सोचता हूं तो औरतों के बारे में सोचता हूं ।
और क्या मैं अकेला सोचता हूं ।
मुझे उर्वशी और श्वेता दी के अलावा सात हसीनाओं का अभिसार सुख प्राप्त हुआ है । जिनमें एक में तो मेरा मरहूम दोस्त अजय भी शामिल था । अजय की और मेरी सोच लगभग लगभग एक समान ही थी । हमने किसी भी औरत के साथ कभी जबरन नहीं किया और ना ही कभी किसी कोठे पर गये । जिन औरतों के साथ भी हमबिस्तर हुआ वो औरतों के राजी खुशी , उनकी इच्छा के अनुसार हुआ । बलात्कार और औरतों के प्रति हिंसा का मैं सख्त विरोधी था । सेक्स के मामले में मेरा यही सोच रहा कि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी ।
मेरी सोच मधुमिता की आवाज सुनकर भंग हुई ।
” हल्लो ।”
” हल्लो ” – मैं मुस्कुराता हुआ बोला -” वैलकम ! प्लीज़ ।”
” थैंक यू “- अपने मोतियों जैसे खुबसूरत दांत चमकाती वो बोली ।
” क्या बात है ! बड़ी जल्दी आ गए ।”
” सभी नहीं सिर्फ मैं आ गई । मुझे वहां बोरियत लग रही थी । यहां आई तो तुम्हारी मम्मी ने कहा छत पर हो , सो चली आई ।”
” बहुत अच्छी की ।”- मैंने चेहरे पर गोल्डन जुबली मुस्कराहट लाते हुए कहा -” मैंने तुम्हें कई बार फोन लगाया था लेकिन हर बार नो रिचेबल बताता रहा… कहीं नम्बर तो नहीं चेंज कर ली ।”
” नहीं तो । सेम नम्बर है… अभी लगा कर देखो ।”
मैंने उसको फोन लगाया फिर से वही सेम नो रिचेबल । वो मेरे करीब आई और अपनी मोबाइल नंबर चेक करने लगी । एक नम्बर गलत था । बीच के नंबरों में एक में सात की जगह आठ टाइप हो गया था । मैंने नम्बर करेक्ट किया ।
उसके इतने करीब आने से उसकी शरीर से आती हुई खुशबू मुझे मदहोश करने लगी । मैंने उसकी तरफ देखा वो मुस्कराते हुए बोली -” तुमने नम्बर ही रोंग लिख लिया था ।”
” हां ।”- मैंने मुस्करा कर कहा -” वैसे बात क्या है ! आज हजार वाट के वाल्व की तरह दमक रही हो ।”
” ठीक पहचाना । आज मैं बहुत खुश हूं ।”
” वो तो दिख रहा है । क्या बात है शादी कर रही हैैं ।”
” नो यार ।”
” तो हनीमून वजह होगा इतनी खुशी का ।”
” हनीमून ! वो तो शादी के बाद होता है । नो ।”
” नो । कभी ऐसा दकियानूसी रिवाज होता था , अब नहीं होता । अब हनीमून शादी का मोहताज नहीं रहा । वो कभी भी हो सकता है । बस हनी को कबूल होना चाहिए ।”
” क्या नानसेंस बोल रहे हो ।”
” इट्स ए मैटर आफ ओपिनियन हनी ।”
” यू आर ए सन ऑफ ए विच ।”
” दि ओरीजनल , हनी । वैरी फर्स्ट आफ दि काइंड । इस जगत प्रसिद्ध विच ने जितने सन पैदा किए , उनमें से अव्वल ।”
” मैंने क्या तुम्हरा तारीफ किया ?”
” नहीं किया तो समझिए बिना किए हो गया । आदमी का बच्चा हो तो अव्वल हो , वरना न हो ।”
वो कुछ क्षण खामोश रही और चेहरे पर उलझन के भाव लिए अपलक मुझे देखती रही । फिर चित्ताकर्षक ढंग से मुस्कुराई । अभी वो कुछ बोलती कि हाॅल से उर्वशी की आवाज आई । हम दोनों नीचे हाल चले आए । वो लोग चाचा के घर से लौट आए थे । जाते जाते संजय जी ने मुझे और मेरी फेमिली को अपने घर आने का निमंत्रण दिया । उन्होंने अपने उस आफिस का भी ठिकाना दिया जहां वो अक्सर पाए जाते हैं ।
उनलोगो के जाने के बाद हमने कुछ समय टीबी देखने में बिताया फिर रात के डीनर के पश्चात अपने अपने कमरे में चले गए । मै अपने कमरे में प्रवेश कर अपने पहने हुए कपड़े चेंज किया और एक ढीला सा पजामा और बनियान पहन कर सिगरेट सुलगाने लगा । तभी मेरी नजर मेरे बिस्तर के बगल में पड़ी हुई कुर्सी पर पड़ी । वहां मैंने जो नाइटी माॅम और श्वेता दी के लिए खरीद कर रखी थी , गायब थी ।

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