UPDATE 92
अमीना बी की वासना जो ना जाने कब से दबी पड़ी थी, एक जवान मर्दाने बदन के एहसास से भड़क उठी,
उसने अपने पैरों को भी चारपाई के उपर रख कर मेरे बगल में ही अढ़लेटी सी पड़ गयी और अपना एक हाथ कंबल के अंदर डाल कर मेरे शरीर को धीरे-2 सहलाने लगी.
जैसे-2 उसका हाथ नीचे की ओर बढ़ रहा था मेरी उत्तेजना भी बढ़ती जा रही थी,
आख़िर में उसका हाथ अपनी मंज़िल पर पहुँच ही गया और जैसे ही उसका हाथ मेरे लंड से लगा, एक ठुमका सा मारकर उसने उसके हाथ पर झटका दिया.
अमीना बी को कुछ शक हुआ तो उसने मेरे चेहरे की ओर देखा, लेकिन अब भी मुझे नींद में देख उसने मेरे लंड को मुट्ठी में ले लिया.
लंड का आकार महसूस कर उसकी चूत पनियाने लगी, और मुँह ही मुँह में बुदबुदाकर उसने मेरे पप्पू की तारीफ की.
अब वो उसे पाजामे के उपर से ही सहला रही थी, ना जाने उसने क्या सोचा, अपनी सारी झिझक छोड़कर उसने मेरे पाजामे की डोरी खोल दी और नंगे लंड को अपनी मुट्ठी में भरके मुठियाने लगी,
मेरा भी अब लंड जबाब दे गया और उसने मुझे आदेश दिया कि अब तू भी खुलके मैदान में आ जा.
मेरा हाथ उसकी भारी भरकम चुचियों पर चला गया और उन्हें ज़ोर से मसल दिया, अमीना बी के मुँह से आहह… निकल गयी और मेरी ओर देखा,
अब मैने भी अपनी आँखें खोल ली थी.
उसने अपना हाथ पाजामे से बाहर खींच लिया और उठने लगी, तो मैने उसकी कमर में हाथ डाल कर अपने से सटाते हुए कहा- अब कैसी शर्म बीबी…
इतना सब कुछ करने बाद अब पीछे हटने का क्या मतलब, अब और थोड़ा वाकी है उसे भी हो ही जाने दो.
मेरी बात सुन कर वो मेरे सीने से चिपक गयी और फिर उसकी दबी कुचली वासना इस कदर बाहर निकली कि सारे बंधन तोड़ कर खूब बही, और ऐसी बही कि उसकी टाँगें चूत और लंड रस से सराबोर हो गयी….!!
वो चुदाई में खो सी गयी…
मुद्दत के बाद उसे लंड मिला था, और वो भी एक जवान का लंड जिसने उसकी मुरझाई हुई चूत की अंदर तक ऐसी सेवा की, कि वो फिर से हरी भरी हो गयी.
पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद वो मेरे गाल चूमकर अपने बिस्तेर पर चली गयी और में फिर से गहरी नीद में चला गया…..!!
दूसरे दिन लेट तक सोने के बाद मे उठा, थोड़ा बहुत घर के कामों में हाथ बँटाया, इन लोगों ने तो मना किया लेकिन मैने उन्हें मजबूर कर दिया मदद लेने के लिए.
दिन में शाकीना जानवरों को चराने ले गयी, मे उसके आस-पास ही रहा, लेकिन कोशिश ये रही कि कोई मुझे नोटीस ना करे…
वैसे तो इनका घर अलग-थलग था, लेकिन फिर भी खंखा की मुशिबत फिलहाल गले पड़े, ये मे नही चाहता था…
शाम को मैने उनको बोला कि मे थोड़ा घूम फिरके आता हूँ, कुछ अपने लिए कपड़े वग़ैरह का इंतज़ाम करता हूँ,
अमीना ने मुझे जगह बताई और पैसे देने लगी, तो मैने कहा कि नही मे इंतेज़ाम कर लूँगा.
रेहाना की साइकल उठाई और चल दिया बस्ती की तरफ,
कबीले के दूसरी ओर एक सुनसान जंगल में एक छोटा सा खंडहर था, शायद कोई पुराने जमाने में किसी का चरागाह रहा होगा…
इसमें कई गुप्त स्थान ऐसे थे जो बारीकी से ढूढ़ने पर ही खोजे जा सकते थे,
आजकल ऐसे ही एक जगह मैने अपना अड्डा बना रखा था. वहाँ मैने अपने सारी ज़रूरत की चीज़ें छिपा रखी थी.
एक हल्के वजन की स्पोर्ट्स बाइक भी ले ली थी यहाँ आकर, वो भी वही छिपा रखी थी.
मेरा खंजर और दारोगा से छीनी हुई गन तो वहाँ ही थी सो और कोई हथियार लेने की तो ज़रूरत ही नही थी, तो 3-4 जोड़ी कपड़े और कुछ पैसे लेकर मे लौट लिया.
वापस घर पहुँचते-2 अंधेरा छा गया था. मैने थोड़ा गरम पानी कराया और आज कई दिनों के बाद ढंग से नहाया और कपड़े चेंज किए.
नहा धोकर, मैने चारपाई बाहर खुली जगह में बिच्छाई और उस पर बैठ कर अपने प्लान के बारे में सोचने लगा.
रेहाना थोड़ी दूर पर ही जानवरों के बाडे में कुछ कर रही थी, कश्मीरी सूट में वो बहुत सुंदर दिख रही थी.
निकाह को एक साल भी नही बीता था कि बेचारी को अपने शौहर से बिछड़ना पड़ा था, डेढ़-दो साल से ना जाने कैसे वो अपनी जवानी को संभाले हुए थी.
वो झुक कर कुछ कर रही थी, शायद सुखी घास जानवरों को डाल रही होगी, अंधेरे में इतनी दूर से कुछ साफ-साफ दिखाई नही दे रहा था.
मे उठ के उसकी तरफ चल दिया, नज़दीक से उसके सुडौल कूल्हे दो बड़े-बड़े बॉल जैसे झुकने की वजह से साफ-2 दिख रहे थे, सूट कुछ ढीला होने की वजह से बीच की दरार हल्की सी दिखाई दे रही थी.
मैने उसके पीछे पहुँच कर उसको आवाज़ दी, तो वो चोंक कर खड़ी हो गयी और मेरी ओर मुड़कर नज़रें झुकाए बोली- जी अशफ़ाक़ साब ! कोई काम था..?
मे – नही मुझे कोई काम नही था, क्या तुम्हें मेरी कोई मदद चाहिए..?
वो – नही ऐसा कोई भारी काम नही है, बस थोड़ी सी घास जानवरों के आगे डाल देती हूँ, रात में खाते रहेंगे, आप चलो मे अभी डाल के आती हूँ.
मे – रेहाना ! ना जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम मेरे यहाँ रहने से खुश नही हो…!
मेरी बात पर वो एकदम चोंक कर बोली – क्यों..? आपको ऐसा क्यों लगा..?
मे – जबसे आया हूँ, ना तो तुमने मुझसे कोई बात की है और ना ही मेरे पास बैठी हो, दूर ही दूर रह रही हो…!
मुझसे डर लग रहा है तुम्हें कि मे कुछ ग़लत ना कर दूं तुम्हारे साथ..?
वो – ये क्या कह रहे हैं आप..? प्लीज़ ऐसा कुछ सोचना भी मत..!
वो बस साइकल पर जो अंजाने में मेरे से हो गया तो उसकी वजह से मुझे आपसे बात करने में हया आ रही है, और कुछ नही…!
मे – तुमसे हो गया मतलब.. क्या हुआ था..? मुझे तो ऐसा कुछ नही लगा कि तुमसे कुछ हुआ था..? अब आगे बैठने से इतना तो हो ही जाता है, इसमें हया आने जैसी तो कोई बात नही हुई..?
अब तक उसका काम ख़तम हो गया था, हम बातें करते हुए वापस घर की तरफ आ गये,
मे आकर चारपाई पर बैठ गया, वो अंदर जाने लगी तो मैने कहा-
देखो अभी भी मेरे साथ नही बैठना चाहती हो, ये नाराज़गी नही तो और क्या है..?
वो – नही ! नही ! प्लीज़ आप ऐसी बातें मत करिए, बस यूँही, शायद अम्मी को मेरी कुछ मदद लगे इसलिए जा रही थी.
मे उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ बिठाते हुए बोला – छोड़ो उसे ! ऐसा क्या ज़्यादा काम होगा, वो दो हैं कर लेंगी, आओ बैठो कुछ बातें करते हैं.
वो मेरे साथ सकुचती सी बैठ गयी.. कुछ देर हम दोनो के बीच चुप्पी छाइ रही,

