Update 91
थोड़ी दूर ही चले कि रेहाना बोली – इस तरह से तो रात बहुत हो जाएगी घर पहुँचते-2, एक काम करते हैं, मे आगे डंडे पर बैठ जाती हूँ फिर आप आसानी से चला सकते हो.
मैने उसकी तरफ नज़र डाली, तो वो अपनी ही धुन में चली जा रही थी, मानो उसके लिए ये नॉर्मल सी बात हो.
मे – तुम बैठ लोगि डंडे पर..? कोई प्राब्लम तो नही होगी बैठने में..?
वो – नही..! मुझे क्या प्राब्लम होगी, उल्टा पकड़ने को हॅड्ल जो मिलेगा और साइकल का बॅलेन्स भी अच्छा रहेगा.
फिर मैने साइकल खड़ी की और वो उचक कर आगे डंडे पर बैठ गयी, मैने साइकल आगे बढ़ा दी.
उसकी बात सही थी, अब साइकल बॅलेन्स के साथ चल रही थी, मैने पैडल पर दम लगाना शुरू किया और अच्छी ख़ासी स्पीड से साइकल भागने लगी.
रेहाना ने अपने शरीर को बॅलेन्स रखने के लिए अपने घुटने थोड़ा बाहर की ओर रखे थे और डंडे पर वो जांघों और चुतड़ों के जोड़ को रख कर बैठी थी,
जिसकी वजह से उसके कूल्हे दब कर और ज़यादा पीछे को निकल रहे थे.
पेडल मारने के लिए मुझे दम लगाना पड़ रहा था जिससे मेरी टाँगें भी अंदर की ओर हो जाती थी, इस कारण से मेरी जंघें एक तरफ से उसकी मंशाल जांघों से रगड़ खा जाती और दूसरी तरफ उसके कूल्हे से रगड़ जाती.
वो अपने दोनों हाथों को आगे करके हॅंडल थामे हुए थी. मेरी दोनो जंघें बारी-2 से उसके मंशाल जांघों और कुल्हों से रगड़ रही थी और उपर मेरे दोनो बाजू भी उसके मांसल बाजुओं से सटे हुए थे.
यौवन से लदी फदि रेहाना के शरीर की गर्मी मेरे शरीर मे उत्तेजना पैदा करने लगी. पप्पू अपना सर उठाने लगा और पाजामे में खड़ा हो गया.
आज ना जाने कितने दिनों के बाद साइकल चलाई थी मैने, सो मेरे हाथ हॅंडल को पकड़े-2 थकने लगे, और मैने अपना सीधा हाथ हॅंडल की मूठ से हटा कर थोड़ा अंदर की तरफ पकड़ लिया जहाँ उसके भी हाथ रखे हुए थे.
मैने जैसे ही अपना हाथ उसके हाथ के पास रखा उसने मेरे हाथ को जगह देने के लिए अपना सीधा हाथ वहाँ से हटा कर हॅंडल के मूठ पर रख लिया.
अब मेरा राइट हॅंड उसके बाजू के नीचे से होकर हॅंडल को थामे था,
रेहाना भी शायद मेरी तरह उत्तेजित हो रही थी, तो उसने अपने शरीर को और पीछे की ओर कर लिया, अब मेरी बाजू उसके राइट बूब से टच होने लगी.
टच क्या होने लगी, लगभग उसके बूब का आधा बाहरी हिस्सा मेरी बाजू पर रखा था…
जैसे ही मुझे उसकी गदराई मोटी चुचि का एहसास अपनी बाजू के उपर हुआ, मेरे पूरे शरीर में करेंट सा दौड़ गया और मेरा पप्पू और ज़यादा अकड़ कर खड़ा हो गया,
रहना के पीछे हटने की वजह से वो उसकी पीठ में बगल से जा भिड़ा.
रात का अंधेरा गहराता जा रहा था, उबड़-खाबड़ ख़स्ता हाल सड़क पर साइकल उछल रही थी, जिसकी वजह से दो जवान शरीरों में घर्षण हो रहा था.
मेरी बाईं टाँग उसकी जाँघ से रगड़ती, राइट जाँघ उसके कूल्हे से रगड़ती, राइट बाजू उसकी चुचि से और पप्पू राम उसकी पीठ में होल किए दे रहे थे.
रेहाना अपनी आँखें बंद करके मज़े ले रही थी, बार-2 के घर्षण से मेरे पप्पू का मुँह गीला होने लगा.
हो सकता है उसकी मुनिया भी खुशी से लार टपका रही हो पर ये कैसे पता लगे.
फिर मैने अपना लेफ्ट हॅंड भी हॅंडल के बीच में कर लिया,
आप अगर साइकलिंग करते हों, तो आपको पता होगा कि अगर साइकल को स्पीड से चलाना हो तो हॅंडल को बीच में पकड़ के स्पीड से भगाना आसान होता है.
ये शायद रेहाना को भी पता होगा, इसलिए उसने मेरे दोनो हाथों को जगह दे दी, और अपने दोनो हाथ मेरी बाजुओं के उपर से हॅंडल के मुठो पर रख लिए.
अब मेरी दोनो बाजू उसकी दोनो चुचियों को साइड से रगड़ रही थी, शायद उसे भी ज़्यादा मज़ा आने लगा था, क्योंकि उसके सीने का भर मेरी बाजुओं के उपर बढ़ता ही जा रहा था.
जैसे-2 साइकल अपने मंज़िल की ओर बढ़ रही थी, हम दोनो की उत्तेजना भी बढ़ती जा रही थी, रेहाना ने अपना लेफ्ट बाजू हॅड्ल से हटा लिया,
अब वो उसे अपनी जांघों के बीच ले आई, शायद अपनी गीली मुनिया को पोन्छ रही होगी…
अब उसकी एल्बो पीछे से मेरे लंड को दबा रही थी.
अब एक तरफ उसकी मंशाल पीठ की बगल, दूसरी तरफ उसकी बाजू का दबाब, उपर से साइकल की उच्छल कूद, मुझे ऐसा लग रहा था मानो कोई मेरी मूठ मार रहा हो.
उत्तेजना में मैने साइकल और तेज कर दी और अपनी बॉडी के मूव्मेंट को आगे-पीछे करने लगा, मेरे मुँह से स्वतः ही उउउहह…उउउहह…हूंन..
जैसी आवाज़ें आने लगी जैसे कि बहुत मेहनत का काम करते समय निकलती हैं.
रेहाना की आँखें बंद हो चुकी थी, मेरा लेफ्ट हॅंड हॅंडल छोड़ कर उसकी जांघों के बीच पहुँच गया, मेरा हाथ लगते ही उसकी जांघे अपने आप खुलती चली गयी.
मैने अपने हाथ को जैसे ही उसकी मुनिया के उपर रखा, मेरा हाथ गीला हो गया, मतलब… वो एक बार झड चुकी थी, और अभी भी लगातार पानी बहा रही थी.
हाथ की रगड़ पाते ही रेहाना के मुँह से एक सिसकी निकल गयी और उसने मेरे हाथ को अपनी जांघों में भींच लिया.
रास्ते का हमें पता ही नही चला कब हम उस जगह पहुँच गये, जहाँ से चले थे, लेकिन तब तक मेरा भी पाजामा गीला हो चुका था…!
घर पहुँच कर जैसे ही साइकल खड़ी हुई, वो उतर कर नज़रें झुकाए घर में घुसने लगी, मैने उसको पुछा- ये साइकल कहाँ रखूं..?
मेरे से बिना नज़रें मिलाए, वो किसी रोबोट की तरह मूडी, मेरे हाथ से साइकल ली और अंदर ले गयी.
घर में एक लालटेन जला कर रोशनी कर रखी थी.
उसका घर एक सामान्य रहने लायक साधारण सा घर था, आगे एक वरामदा जैसा था, उसके बाद एक बड़ा सा कमरा, उसके पीछे एक रसोई जैसी बनी थी.
वरामदा से ही साइड में दूसरा कमरा वो भी काफ़ी बड़ा था, जिसके दो गेट थे, एक वरामदा से था और दूसरा पीछे की ओर किचेन से था.
किचेन को कमरों से होकेर ही जाया जा सकता था.
अमीना बी और शाकीना भी हमें देख कर बाहर आ गयी.
सबसे पहले अमीना बी ने शाकीना को बोल कर मेरे लिए गुनगुना पानी वरामदे के ही साइड में बने एक ओट से में बड़ा सा पत्थर डाल कर रखा था उस पर रखवा दिया.
अमीना बी मेरे कंधे की चोट को देखकर बोली – ओह्ह.. तुम्हें तो चोट लगी है बेटा, जाओ पहले ये कपड़े उतार कर पानी से अपने बदन को साफ कर्लो, फिर मे तुम्हारी दवा दारू कर देती हूँ.
और शाकीना ! बेटी वो देख असलम के कपड़े रखे होंगे उसमें से एक जोड़ी ले आ.
मैने अपनी कमीज़ उतार कर साइड में रख दी और अपने शरीर को गरम पानी से साफ किया,
मेरे पीछे खड़ी दोनो बहनें मेरी चौड़ी पीठ को देख कर ही मेरे शरीर की बनावट का अनुमान लगा रही थी.
पाजामा मैने नही उतारा, क्योंकि वो साला लंड के पानी से गीला हो रहा था.
अमीना बी ने कुछ जड़ी बूटियाँ पत्थर पर पीस कर मेरे जख्म पर रख दी, बड़ी जलन सी हुई, मेरे मुँह से ना चाहते हुए सीत्कार निकल गयी,
वो बोली- बेटा ये शर्तिया दवा है, थोड़ा जलेगा ज़रूर लेकिन देखना सुबह तक ही ये आधा ठीक हो चुका होगा.
फिर एक कपड़े से जख्म को बाँध दिया, और मैने असलम की कमीज़ को पहन लिया जो मुझे टाइट पड़ रही थी, पर जैसे-तैसे आ गयी.
कमीज़ में से मेरा आधा सीना बाहर दिख रहा था, जिसे रेहाना नज़र गढ़ाए देखे जा रही थी गुम सूम सी खड़ी.
यहाँ आने के बाद से ही उसने मुझसे नज़र ही नही मिलाई थी, शायद रास्ते में हुए उत्तेजक एनकाउंटर की वजह से उसे शर्म आ रही थी.
हमारे लौटने तक माँ बेटी ने खाना बना के रखा था, हम सबने खाना खाया, और आपस में कुछ देर बात-चीत करते रहे,
मैने उनसे उनके परिवार के बारे में पुछा जो उन्होने मुझे सब डीटेल में बता दिया.
रात काफ़ी हो चुकी थी, सो अमीना बी ने मेरे सोने के लिए साइड वाले कमरे में बिस्तेर करने को बोला, मैने कहा में वरामदे में ही सो जाउन्गा, आप लोग अंदर अपने हिसाब से सो जाओ.
उन्होने मेरी बात मान ली और एक चारपाई पर मेरा बिस्तेर लगा दिया, और वो लोग अंदर चली गयी सोने,
अमीना और शाकीना दोनो माँ-बेटी सामने वाले कमरे में सोती थी और रेहाना अकेली साइड वाले कमरे में.
मे बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में डूब गया, क्योंकि पूरे दिन की थकान से बदन टूटा पड़ा था, उपर से 4 किमी डबल सवारी साइकल खींची थी, जो ना जाने कितनी मुद्दतो के बाद चलाई थी, मेरी जांघें एक दम टाइट हो रखी थी साइकल चलाने से.
वैसे तो मार्च एप्रिल का महीना था, लेकिन वो इलाक़ा एक तो पहाड़ी था, उपर से उत्तरी छोर पर, तो आधी रात से ही मौसम ठंडा सा हो जाता था,
नींद की वजह से में कुछ ओढ़ भी नही पाया था, तो ठंड से में उकड़ूं लेटा पड़ा था, मेरे दोनो घुटने पेट से लगे पड़े थे.
पता नही रात का कौन सा प्रहार हुआ होगा, कि मुझे अपने बालों में किसी की उंगलियों का स्पर्श महसूस हुआ, शरीर पर भी एक कंबल पड़े होने का एहसास हुआ, मेरी नींद टूट गयी और मैने धीरे से अपनी पलकें खोली..
अमीना बी मेरे सर के पास चारपाई पर बैठी मेरे सर को सहला रही थी, और मेरे सोते हुए मासूम से चेहरे को देखे जा रही थी.
मैने जान बूझकर करवट बदली और उसकी तरफ मुँह करके अपना हाथ उसकी जांघों पर रख दिया, अमीना बी का शरीर हल्के से काँपा जो मुझे महसूस हुआ,
फिर उसने मेरे चेहरे पर नज़र डाली, जब मुझे सोते हुए पाया तो झुक कर मेरे माथे पर एक चुंबन लिया जिससे उनकी भारी अधेड़ चुचियाँ मेरे सर से दब गयी.
कितनी ही देर वो इसी पोज़िशन में झुकी रही मेरे उपर और मेरे सर और गालों को सहलाती रही,
मेरा हाथ जो शुरू में सीधा था जो उसकी दूसरी जाँघ तक चला गया था, मैने खींच कर उसके जांघों के बीच में कर लिया, अब मेरे हाथ और उसकी चूत के बीच कुछ ही इंच का फासला बचा था.
उसने अपने गान्ड को थोड़ा खिसका कर नीचे को किया और मेरे हाथ को पकड़ कर अपनी चूत के उपर दवा दिया, अब मेरा मुँह भी उसकी कुरती के उपर से ही उसके पेट के बगल में घुसा हुआ था और वो मेरे उपर झुकी हुई थी.
मेरा पप्पू ये सब कहाँ झेलने वाला था, औरत के अंगों का स्पर्श पाते ही औकात में आ गया.

