Update 88
दूसरे दिन प्रताप अपनी पत्नी और बेटे के साथ बैठा हॉल में नाश्ता कर रहा था, कि एक नौकर बाहर से आया और उसको बोला, साब बाहर आपसे कोई मिलने को आया है.
प्रताप – क्या नाम बताया उसने अपना..?
नौकर – साब कुछ कुट्टी—कुट्टी बता रहा था..!
प्रताप फ़ौरन समझ गया और उसने नौकर को बोला- उसे पीछे के गेट से हमारे मीटिंग हॉल में लेकर आओ,
फिर खुद ने भी जल्दी से नाश्ता ख़तम किया और मीटिंग हॉल की तरफ बढ़ गया जो कि उसके बंगले की पीछे की साइड में था.
रॉकी के दिमाग़ में नीरा का छोड़ा हुआ कीड़ा उसके बाप के जाते ही कुलबुलाने लगा, वो सोचने लगा कि उसके पापा ने इस आदमी को पीछे के गेट से आने को क्यों कहा ?
अब वो उनकी मीटिंग की बातों को सुनने के बारे में सोचने लगा, उसने भी अपना नाश्ता ख़तम किया और अपने कमरे की ओर बढ़ गया.
अब वो किसी तरह अपने बाप की बातों को सुनना चाहता था,
रॉकी अपनी माँ की नज़रों से बचते बचाते हुए, किसी तरह बंगले के पीछे पहुँचा और मीटिंग हाल की एक खिड़की से कान लगा कर उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगा.
उसके सर के धक्के से वो खिड़की हल्की सी खुल गयी, अब वो उन दोनो को सुन ही नही देख भी सकता था,
उसने अपने पिता के साथ एक जंगली काले भैंसे जैसे आदमी को बैठे देखा, जिसकी नाक से लेकर उसके बाँये गाल तक एक बड़ा सा कट का निशान थी,
बड़ी-2 घनी मुन्छे और छोटी घनी दाढ़ी, मानो हफ्ते-10 दिन से शेव ना हुई हो, वो शक्ल सूरत से ही कोई ख़तरनाक अपराधी दिख रहा था.
जब उसने उन दोनो की बातें सुनी तो वो सुन्न रह गया, नीरा द्वारा कहे गये शब्द उसे शत-प्रतिशत सही लगे… उसका बाप सही में एक देशद्रोही है.
पहले तो रॉकी ने सोचा कि जाकर अपने बाप से सीधे-सीधे बात करे, लेकिन फिर उसने अपनी सोच को अपने दिमाग़ से झटक दिया क्योंकि जो आदमी ता उम्र जिस काम को करता आ रहा है, वो उसको अब्बल तो मानेगा ही नही,
और अगर मान भी गया तो वो अपने बेटे को भी अपनी महत्वाकांक्षाओं के आड़े नही आने देगा.
अब वो इसकी तह तक जाना चाहता था, लेकिन कैसे..?
अकेला वो कुछ भी नही कर सकता था, उसे फ़ौरन नीरा का ध्यान आया जो अब ना जाने कहाँ चली गयी थी.
आज उसे नीरा की अच्छाइयाँ याद आ रहीं थीं, उसकी बातें याद करके उसकी पलकें भीग गयी…
क्या ग़लत कहा था उसने ? वो तो मुझ जैसे एक बिगड़े हुए आदमी को सही रास्ते पर लाना चाहती थी.
मैने एक ही झटके में एक सच्ची और मन की पवित्र लड़की को खो दिया.
लेकिन “अब पछ्ताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत”
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उधर मे अपने लॅपटॉप पर प्रताप और कुट्टी की मीटिंग को देख सुन रहा था, नीरा मेरे बाजू में बैठी थी,
ये उसी की चपलता और सूझ भुज का नतीज़ा था कि में उसे देख पा रहा था, क्योंकि उसने उसके मीटिंग हाल में एक बहुत ही छोटा लेकिन पॉवेरफ़ुल्ल ट्रांसमीटर कॅमरा फिट कर दिया था.
उनकी मीटिंग ख़तम होते ही मैने नीरा को धन्यवाद किया कि उसकी वजह से हम ये सब देख सुन पा रहे थे.
नीरा अपने चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान लाते हुए बोली- भैया जी रूखा-2 ही धन्यवाद से काम नही चलेगा, कुछ तो गीला-2 होना चाहिए,
उसकी मंशा समझ कर मैने उसके पतले रसीले होठों पर एक गरम-2 चुंबन जड़ दिया तो वो खुश हो गयी.
नीरा ने कल आते ही मुझे उसके और रॉकी के बीच हुई घटना बता दी थी, और वो वहाँ से हमेशा के लिए छोड़ कर चली आई थी,
लेकिन मे नही चाहता था कि नीरा अभी उसका घर छोड़े सो मैने उसे फिर से उसके यहाँ जाने के लिए कहा.
जब उसने अपना डर बताया कि कहीं रॉकी ने अपने घरवालों को बता दिया हो, और वो लोग कहीं उसका कत्ल ही ना करवा दें तो…
मैने उसे समझाते हुए कहा – अब्बल तो वो ऐसा करेगा नही, क्योंकि अपनी कमज़ोरी वो दूसरों को नही बता सकता.
आख़िर उसने एक लड़की से मार खाई है, किसी गुंडे या मवाली से नही.
और अगर बता भी देता है, तो जिस तरह से तुमने उसे बदला है, उसकी माँ का भरोसा तुम पर जम चुका है,
अब वो रॉकी की बातों को ही ग़लत मानेगी, और तुम्हारा बचाव करेगी, और वैसे भी मेरी नज़र हर समय उस घर पर ही रहेगी.
तो तुम इस बात की बिल्कुल फिकर मत करो कि मे तुम्हें कुछ भी होने दूँगा.
मे चाहता हूँ तुम कुछ दिन और वहाँ रहो.
नीरा अब मेरे साथ थोड़ा खुल चुकी थी, सो अपनी मुस्कुराती हुई नज़रों को मेरे चेहरे पर गढ़ा कर बोली – एक शर्त पर जाउन्गी..! जाने से पहले एक बार मे…आप..के…सा..थ..
मे – ओह क्यों नही ! अभी लो.. और फिर मैने उसकी पूरी तन मन से अच्छे से सेवा की जब वो पूरी तरह संतुष्ट हो गयी तो अपने मिसन पर वापस चली गयी..!
मैने विक्रम को पहले ही कुट्टी के पीछे लगा दिया था,
वो जबसे प्रताप के पास से गया था तभी से वो उसके पीछे था.
वैसे भी वो पहले से ही अंगद बिसला के रोल में था, सो उसको जंगल के बारे में अब बहुत कुछ मालूम था.
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आज रॉकी कॉलेज नही गया था, जैसे ही नीरा वहाँ पहुँची, रॉकी की खुशी का ठिकाना नही रहा.
उसने तो कभी ख्वाब में भी नही सोचा था कि वो अब वापस भी आ सकती है.
नीरा सीधी उसकी माँ से मिली और अपने काम में लग गयी. उसने रॉकी की तरफ कोई ध्यान ही नही दिया, जैसे कल उन्दोनो के बीच कुछ हुआ ही ना हो.
पर अब रॉकी उससे बात करने को उतावला हो रहा था, वो अपने बाप की करतूत उसके साथ शेयर करके कोई समाधान निकालने की सोच रहा था.
भले ही उसका बाप कैसा भी हो और वो अपने माँ-बाप के लाड प्यार और छूट की वजह से बिगड़ गया था,
लेकिन उसकी माँ एक अच्छी औरत थी, शायद उसीके संस्कारों की बदौलत वो अपने बाप के इन कुकृत्यों को उचित नही ठहरा पा रहा था.
उसने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि उसका बाप पैसे के लालच में देशद्रोह जैसा संगीन जुर्म भी कर सकता है, वो तो उसे एक सीधा-साधा राजनेता ही समझता था.
मौका निकाल कर उसने नीरा से बात करने की कोशिश की, पहले तो नीरा ने उसको कोई तबज्जो नही दी, लेकिन जब वो उसके सामने हाथ बाँधे खड़ा हो गया और बोला- नीरा प्लीज़ सिर्फ़ एक बार मेरी बात सुन लो.
नीरा – अब बात करने को रह ही क्या गया है रॉकी बाबू, मुझ दो टके की नौकरानी से क्या बात करेंगे आप..?
रॉकी – अब मुझे रीयलाइज़ हुआ है कि मे कितना ग़लत था ? मुझे तुम जैसी नेक लड़की के साथ ऐसा व्यवहार नही करना चाहिए था. प्लीज़ एक बार मुझे माफ़ करदो..!
तुमने जो उस दिन मेरे पिता जी के बारे में कहा था, वो बिल्कुल सही निकला..! सच में वो देशद्रोह में लिप्त हैं.
नीरा – क्या ? आपको कैसे और कब पता लगा अपने पिता के बारे में..?
फिर रॉकी उसे पूरी बात बताता चला गया, जो उसको पहले से ही पता थी, लेकिन उसने उसको ये जाहिर नही होने दिया कि उसे ये सब पता है.
नीरा – तो अब क्या सोचा है आपने..?
रॉकी – उसी के बारे में मे तुम्हारी राय जानना चाहता था, कि मे उन्हें ये सब ना करने के लिए कैसे रोकू.
मे जानता हूँ, तुम बहुत सुलझी हुई लड़की हो, ज़रूर कोई ना कोई रास्ता निकल लोगि.
नीरा – मे भला इसमें क्या कर सकती हूँ..? आप चाहो तो अपने पिता से बात करो इस बारे में.
रॉकी – इस विषय पर भी मे सोच चुका हूँ, पर शायद ये संभव नही होगा, क्योंकि वो इस दलदल में बहुत अंदर तक जा चुके हैं,
शायद अब वापस आना उनके लिए भी मुश्किल है. हो सकता है वो मेरे खिलाफ भी हो जाएँ.
नीरा – तो पोलीस को बता दो…!
रॉकी- पोलीस कुच्छ साबित नही कर पाएगी.. ! उल्टा इतने बड़े नेता के खिलाफ बोलने से वो हमें ही ग़लत ना ठहरा दे…
और फिर मेरे पास अभी उनके खिलाफ कोई सबूत भी तो नही है.
नीरा – तो अब हम सिर्फ़ समय का इंतजार ही कर सकते हैं, और उनपर नज़र रख कर सबूत इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं….!
रॉकी – हां शायद अब तो यही एक रास्ता है….!
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मैने चारों ओर से सारी इन्फर्मेशन कलेक्ट करके पूरी रिपोर्ट होम मिनिस्ट्री को भेज दी, प्रताप आंड कंपनी कुट्टी के द्वारा बहुत बड़े नर संहार को अंजाम देने की तैयारी में थे.
दुसरे के दिन रायगढ़ के मैदान में होने वाले उत्सव में वो कोई बड़ा हमला करने वाले हैं, जिसमें सैकड़ों जानें जाने की पूरी संभावना थी.
मेरी रिपोर्ट के आधार पर होम मिनिस्ट्री से कर्प्फ़ के एरिया कमॅंडर को विशेष सूचना मिली कि वो हमारे ग्रूप से मिलकर कोई ठोस योजना बना कर इस ख़तरे से निपटने का प्रयास करें.
सूचना बहुत ही गोपनिया रखी जाए.
कमॅंडर का कॉल आने के बाद हमने मीटिंग का समय और जगह निर्धारित कर ली, और समय पर एक गोपनीय स्थान पर हम लोग मिले.
हम दो ही जाने थे, रणवीर तो अपनी ड्राइवर की ड्यूटी पर तैनात था और चौधरी के पल-2 के मूव्मेंट की जानकारी दे रहा था.
हमारी खबर के मुताविक कम-से-कम 100 से ज़्यादा नक्सली ऑटोमॅटिक हथियारों से लेश उत्सव में आई भीड़ पर हमला करने वाले हैं,
ये भी संभव था, कि वो लोग बॉम्ब वग़ैरह का भी स्तेमाल कर सकते हैं.
अगर ये हमला हुआ तो भारी जान माल के नुकसान से कोई नही बचा सकता.
हमें किसी भी सूरत में हमले से पहले ही उन नकशालियों को घेर कर ख़तम करना होगा.
उनका संभावित ठिकाना भी हमने खोज लिया था, जहाँ वो हमले से पहले इकट्ठा होने वाले थे,
फिर तय हुआ कि कम से कम 200 के करीब हमारे जवान रात के अंधेरे में उस इलाक़े को शांति पूर्वक घेर लेंगे और उचित समय पर एक साथ अटॅक करके उन्हें ख़तम कर देंगे.
चूँकि विक्रम को वो जगह पता थी, और उसके आस-पास किस तरह से घेरा बनाना था, वो भी हमने खाका तैयार कर लिया था.
तय हुआ कि हम दोनो जवानों की टुकड़ी के साथ जाएँगे.
मीटिंग ख़तम करके कमॅंडर अपने कॅंप को लौट गये और अपनी गुप्त तरीक़ा से तैयारियों में जुट गये…!
कल दशहरा है, हिंदू मान्यता के हिसाब से कल के दिन हिंदुओं के ईष्ट मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने बुराई के प्रतीक रावण पर विजय प्राप्त की थी.
आज भी बहुत सारे रावण हमारे समाज में मौजूद हैं और अपनी झूठी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जन साधारण को भेड़ बकरियों से ज़्यादा महत्व नही देते हैं,
लोगों की जान से खेलना तो जैसे इन्होने अपना पेशा और शौक बना लिया है.
आज की राजनीति भी इससे अछुति नही है, नेताओं के दबाब में आकर प्रशासन भी असमर्थ हो जाता है, जब कुछ नही कर पता तो वो भी स्वार्थवस उनके साथ मिल जाते हैं.
ऐसे ही कुछ रावण, कल के उत्सव में होने वाली बर्बरता के सूत्रधार हैं, जिन्हें उनके अंजाम तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी कुछ देशभक्तों के कंधों पर थी, जिसे वो अपनी जान की परवाह ना करते हुए भी निभाने में जुटे हुए थे.
हमारे दिशा निर्देशन में सीआरपीएफ के 200 शसस्त्र जवान इस धुंधली चाँदनी रात में घने जंगलों के बीच दम साधे, इशारों के मध्यम से बढ़े चले जा रहे थे.
विक्रम द्वारा बताए गये अनुमानित जगह से हम अभी भी 2 किमी दूर थे.
हमने सबको रुकने का इशारा किया, फिर दो-2 के हिसाब चारों दिशाओं का निरीक्षण करने के लिए एक दम चुस्त, चालाक और दुर्दांत जवानों को चुना.
दो-दो को चारों दिशाओं मे जाने का सिग्नल देकर 4-4 लोगों को उनके पीछे बॅक-अप के लिए भेजा, जो शीघ्र लौट कर अपनी-2 दिशाओं की वास्तु-स्थिति से भी अवगत करते.
इस काम में हमें दो घंटे गुजर गये, रास्ते में एक दो जगह नक्सली भी फैले हुए थे, जिन्हें बड़ी सावधानी से बिना आवाज़ किए ठिकाने लगा दिया गया.
करीब 120-125 नक्सली, घने जंगलों के बीच स्थित एक मैदान में जमा थे, जो सुबह होते ही वहाँ से निकलते और दोपहर बाद तक वो अपने टारगेट तक पहुँच जाने थे.
चूँकि मैदान के चारों ओर घना जंगल होने से वो अपने आप को सुरक्षित मान रहे थे, और सावधानी के लिए उन्होने अपने आदमी भी फैला रखे थे, जो हमने उनके सोचने समझने से पहले ही ठिकाने लगा दिए.
आगे वाले दो-2 जवान अभी भी अपनी पोज़िशन पर सतर्क थे, इधर हमने फिर जल्दी से आगे बढ़ना शुरू किया और जल्दी ही चार टुकड़ियों बाँट कर चारों ओर से मैदान को घेर लिया और घने जंगलों के बीच पोज़िशन ले ली.
हमने उस मैदान को एक तरह लॉक कर दिया था, अब अगर कोई नक्सली बच कर निकलना भी चाहे तो वो निकल नही सकता था.
रात का अंतिम पहर था, ज़्यादातर नक्सली गहरी नींद में डूबे हुए थे,
कुछ ही थे जो जगह-2 पहरे पर तैनात थे, लेकिन आख़िरी पहर होने के कारण वो भी उन्घ रहे थे.
मे, विक्रम और कमॅंडर तीनो एक जगह मजूद थे, वो सब हमारे निर्देश के इंतजार में थे, मुझे सिचुयेशन कुछ आसान सी दिखी, बेमतलब की ज़्यादा गोलीबारी से बचा जा सकता था.
मैने कमॅंडर को कहा- क्यों ना हम किसी तरह इनके चारों ओर बॉम्ब फिट कर दें, और एक साथ धमाका करदेने से ये लोग यूँही ख़तम हो जाएँगे. हमें ज़्यादा गोलीबारी नही करनी पड़ेगी.
एक ही बार में ये आधे से ज़्यादा मारे जा चुके होंगे, जो बचेंगे उन्हें आसानी से काबू कर लिया जा सकेगा.
मेरी बात उनको जमी, और तय हुआ कि अब हम धमाका ही करेंगे.
गस्त पर तैनात नक्सली ज़्यादा तर ऊंघ ही रहे थे, सो हमारे कुछ जवान चारों टुकड़ियों से रेंगते हुए उनके बीच तक पहुँच गये, और बड़ी आसानी से उन्होने बॉम्ब प्लांट कर लौट लिए.
चाँद आसमान में अपनी चाँदनी समेट कर विदा ले चुका था, पूरव में आसमान का रंग कुच्छ लालिमा लिए हुए सूरज के स्वागत की मानो तैयारिया शुरू कर रहा था.
हमने अपने जवानों को थोड़ा और पीछे जंगल में सेफ दूरी पर रहकर पोज़िशन पर लगाया और एक साथ चारों बॉम्ब को रिमोट से उड़ा दिया.
धमाके इतने तेज हुए कि 600-700 मीटर दूर होने के बावजूद भी हमारे पास तक की ज़मीन भूकंप की तरह काँप उठी.
नक्सलियों के कॅंप में चीखो-पुकार मच गयी, मानव अंग हवा में उड़ने लगे,
धमाके से आधे से ज़यादा नक्सली मारे गये, बचे-खुचे घायल थे, कुछ 10-5 ने भाग निकलने की कोशिश तो उन्हें गोली से भून दिया गया.
मिसन शत-प्रतिशत कामयाब रहा था, हम दोनो दोस्त कमॅंडर को फाइनल एक्सेक्यूशन का बोल कर अपने ठिकाने की ओर लौट लिए,
क्योंकि अब जो असली रावण बचे थे उनको भी अंजाम तक पहुँचना वाकी था.
हमने अपनी कामयाबी की खबर रणवीर तक पहुँचा दी थी. सुबह 10 बजे तक हम अपने ठिकाने पर लौट आए….
रणवीर ने उन लोगों के प्लान के बारे में सब पता लगा लिया था…
उसकी खबर के मुतविक चौधरी आंड कंपनी प्रताप के घर पर ही मेले का प्रशारण टीवी पर देखते हुए जश्न मनाने की तैयारी में थे…
वो इस सबसे दूर बैठ कर तमाशा देखना चाहते थे, उन्हें सपने में भी ये गुमान नही था, कि कोई तो हैं जो उनके इस प्लान की धाज़ियाँ उड़ा चुके हैं,
और अब वो यमदूत बनकर उनके सरों पर पहुँचने वाले हैं… थे…..!
आज दशहरा है, रायगढ़ का विशाल मैदान लोगों के हुज़ूम से भरा हुआ है, जहाँ तक नज़र जाती है, लोगों के सर ही सर नज़र आते हैं,
चारों ओर चहल-पहल दिखाई दे रही थी, लोग आज का सारा दिन मेले का आनंद उठाने पहुँचे हैं.
मैदान के एक सिरे पर एक विशाल स्टेज सजाया गया था, जहाँ रामलीला के दृश्य दिखाए जाने थे और शाम ढलते-2 रावण, मेघनाथ, कुम्भकरण आदि के पुतलों को जलाया जाना था.
उधर दिन के 12 बजते-बजते प्रताप के घर पर सुंदर चौधरी, एंपी और उनका चौथा पार्ट्नर राइचंद भी आ चुके थे.
चौधरी के साथ उसका विश्वसनीय ड्राइवर सज्जाक उसके साथ था, जो फिलहाल बाहर गेट पर ही रह गया था.

