Update 86
सुंदर चौधरी, रायगढ़ शहर का जाना माना नाम बहुत सारे सामाजिक संस्थाओं का संचालक, ट्राइबल एरिया में लोग उसे अपना मशिहा मानते हैं. कितने ही मंदिर, मस्जिद और चर्च इसके दान से चलते हैं.
42 वर्षीय मध्यम लेकिन मजबूत कद काठी का चौधरी शहर की जानी मानी हस्तियों में शुमार किया जाता है, जिसके बड़े-2 राजनीतिक- गैर राजनीतिक, ओद्योगिक घरानों से घनिष्ठता है.
दुनिया की नज़रों में चौधरी एक प्रॉपर्टी डीलर है, एक कन्स्ट्रक्षन कंपनी का मालिक है. शहर की ज़्यादातर अच्छी-2 बिल्डिंग उसी की कंपनी ने खड़ी की हैं.
शाम कोई 8 बजे सुंदर चौधरी अपनी एक कन्स्ट्रक्षन साइट जो शहर के बाहरी इलाक़े में चल रही थी, अपनी एक शानदार कार से लौट रहा था,
साइट से अभी उसकी कार एक फरलॉंग ही पहुँची होगी की रास्ते के दोनो तरफ खड़ी झाड़ियों से गोलियों की बाद ने उसकी गाड़ी को रुकने पर मजबूर कर दिया.
एक गोली विंड्स्क्रीन को तोड़ती हुई उसके ड्राइवर के दाएँ कंधे को चीरती हुई निकल गयी. जिसकी वजह से गाड़ी झाड़ियों में घुसती चली गयी और रोकते-2 भी एक पेड़ जा टकराई.
टक्कर तो ज़्यादा घातक नही थी, लेकिन घायल ड्राइवर अपनी चेतना खो चुका था.
चौधरी के हाथ पाँव फूल गये, अभी वो कुछ सोचने समझने की स्थिति में आता कि दो नकाब पोश उसके दोनो साइड के दरवाजे पर खड़े थे.
उन्होने उसको बाहर आने का इशारा किया, मरता क्या ना करता, उसे बाहर आना ही पड़ा.
अभी उसने अपने बाएँ तरफ का गेट खोल कर अपना पैर बाहर निकाला ही था कि एक जिस्म हवा में तैरता हुआ आया और दूसरी तरफ खड़े नकाब पोश की पीठ पर उसके दोनो पैरों की जबरदस्त ठोकर पड़ी.
वो नकाब पोश पहले धडाम से गाड़ी से टकराया और फिर पीछे को उलट गया, उसकी गन उसके हाथ से छिटक गयी.
अभी वो चौधरी के साइड वाला नकाब पोश कुछ स्थिति को समझ पाता कि वो शख्स फिर से उच्छल कर उठा और कार की छत पर हाथ टिका कर दोनो पैरों की किक उस दूसरे नकाब पोश के कंधे पर पड़ी.
किक बहुत ज़ोर से लगी, परिणाम स्वरूप वो नकाब पोश भी धूल चाट रहा था, लेकिन उसने अपनी गन नही च्छुटने दी.
वो नकाब पोश उठकर खड़ा हुआ, और अपनी गन उसने कार की ओर घमाई ही थी कि उस शख्स ने उसकी गन वाली कलाई थाम ली और उसे उपर की ओर कर दिया, तभी एक धमाका हुआ और गोली हवा में जाके बेकार हो गयी.
ये दोनो एक दूसरे से गुत्थम गुत्था थे, कि तभी दूसरा नकाब पोश भी उधर आ गया, और उसने उस शख्स को पीछे से पकड़ लिया.
तभी चौधरी हिम्मत करके बाहर आया और उसने पास पड़ी एक मोटी सी लकड़ी को पीछे से उस नकाब पोश के सर पर दे मारी जो उस शख्स को पीछे से पकड़े हुए था.
वो नकाब पोश अपना सर थाम कर बैठता चला गया, लेकिन तब तक उस गन वाले नकाब पोश को छूटने का मौका मिल गया और उसने उस शख्स पर फाइयर कर दिया.
हड़बड़ी में चलाई गयी गोली उसके कंधे को रगड़ती हुई निकल गयी.
दर्द से कराहते हुए वो शख्स अपने कंधे को थाम कर लड़खड़ा गया और ज़मीन पर बैठ गया, फिर चौधरी उस नकाब पोश की ओर लपका लेकिन वो झाड़ियों की ओर भाग लिया.
मौका पाकर वो दोनो नकाब पोश वहाँ से भाग खड़े हुए.
चौधरी ने उस शख्स को अपनी गाड़ी की पिच्छली सीट पर बिठाया, और अपने बेहोश ड्राइवर को साइड वाली सीट पर डालकर खुद गाड़ी ड्राइव करके शहर की ओर दौड़ा दी.
सुंदर चौधरी गाड़ी को आँधी-तूफान की तरह भगाता हुआ एक बड़े से प्राइवेट हॉस्पिटल में दाखिल होता है,
उसकी गाड़ी देखते ही वहाँ उसको स्पेशल अटेन्षन मिलनी शुरू हो जाती है,
उसके ड्राइवर और उस शख्स को आनन फानन में भरती करके विशेष सुविधाओं के तहत ट्रीटमेंट शुरू हो जाता है.
वो शख्स तो ज़्यादा सीरीयस नही था, तो उसको स्पेशल वॉर्ड में ले जाकर कुछ पेन किल्लर देकर उसकी ड्रेसिंग कर दी जाती है, लेकिन उसके ड्राइवर को आइसीयू में भरती कर दिया जाता है.
जब उस शक्श की ड्रेसिंग और ज़रूरी इल्लाज़ हो जाता है तो वो चौधरी से जाने की इज़ाज़त लेता है..
शख्स – अच्छा सर अब में चलता हूँ, आपका बहुत-2 शुक्रिया जो आपने मेरा इस बेहतरीन हॉस्पिटल में इलाज़ कराया.
चौधरी- अरे भाई शुक्रिया तो हमें तुम्हारा करना चाहिए, जो एन मौके पर आकर तुमने हमारी जान बचाई..!
सख्स – सर ! वो तो मैने इंशानियत के नाते किया था, जब आपको मुशिबत में पाया तो जो मुझे उचित लगा वो मैने किया.
चौधरी – नही ! ये साधारण बात नही है भाई, आज के जमाने में कॉन किसी के लिए अपनी जान जोखिम में डालता है,
तुमने किसी फरिस्ते की तरह आकर हमारी मदद की.
वैसे अपना परिचय तो दो… कॉन हो? क्या नाम है ? क्या करते हो..?
सख्स – मेरा नाम सज्जाक है सर, पास के ही गाँव में रहता हूँ, बेरोज़गार हूँ, ऐसे ही कभी किसी की ड्राइविंग वग़ैरह कर लेता हूँ,
आजकल कोई काम नही है, तो ऐसे ही किसी काम की तलाश में भटक रहा था कि आपके साथ वो घटना होते दिखी.
चौधरी – तो समझो आज से तुम्हारी तलाश ख़तम हुई, आज से तुम मेरे पर्सनल ड्राइवर हो,
अच्छी पगार दूँगा, रहना, खाना, कपड़े सब का इंतेज़ाम हमारी ओर से रहेगा. बोलो करोगे मेरे लिए काम..?
सज्जाक – मुझे तो सर काम चाहिए, आपके यहाँ भी कर लूँगा.
चौधरी – तो फिर ठीक है, जल्दी से ठीक होकर मेरे ऑफीस आ जाना, ये कहकर उसने अपना विज़िटिंग कार्ड उसे पकड़ा दिया और अपने घर की ओर चला गया.
सुंदर चौधरी सज्जाक को अपना ड्राइवर रखकर संतुष्ट था, अब उसको जैसा दिलेर आदमी चाहिए था वो मिल गया था, जो वक़्त आने पर उसकी हिफ़ाज़त भी कर सकता था और साए की तरह उसके साथ रहने वाला था.
वैसे तो वो भी कोई सॉफ सुथरा आदमी नही था और आउट ऑफ बिज़्नेस बॉक्स और ना जाने किन-किन लोगों के साथ कैसे-2 धंधे करता था, तो जाहिर सी बात है आदमी भी वैसे ही रखे होंगे.
उस घटना के ठीक चार दिन बाद सुंदर चौधरी अपनी गाड़ी में बैठ कर शहर से बाहर कहीं जा रहा था.
सज्जाक उसकी गाड़ी को चला रहा था और वो अपने फोन पर किसी से बात कर रहा था, चूँकि वो ड्राइवर नया था, सो बीच-2 में वो उसको दिशा निर्देश भी देता जा रहा था.
शहर से कोई 25-30 किमी निकल कर, अब उसकी कार रोड से उतार कर घने जंगलों के बीच बने एक कच्चे पथरीले रास्ते पर दौड़ने लगी,
कोई 1 किमी अंदर जाकर घने पेड़ों के बीच बने एक फार्म हाउस के सामने खड़ी हो जाती है.
9-10 फीट उँची चारदीवारी से घिरे उस फार्म हाउस के गेट पर एक चौकीदार खड़ा हुआ था, उसने गेट खोला और गाड़ी अंदर चली गयी.
गेट से करीब 100-150 मीटर और अंदर जा कर एक अच्छी ख़ासी बिल्डिंग थी, जो सामने से किसी बंगले जैसी दिखती थी.
उस बंगले के गेट पर जैसे ही गाड़ी खड़ी हुई, एक और दरबान जैसा आदमी दौड़ कर कार की ओर आया, उसने लपक कर कार का गेट खोला और अदब से सर झुका कर खड़ा हो गया.
चौधरी गाड़ी से उतार कर अंदर चला गया, उस दरबान ने ड्राइवर को इशारा किया और गाड़ी बंगले के साइड में बने पार्किंग की ओर चली गयी.
यहाँ 3-4 गाड़ियाँ पहले से खड़ी हुई थी, इसका मतलब यहाँ और भी लोग थे.
सज्जाक ने गाड़ी खड़ी की और बाहर आकर बंगले का निरीक्षण करने लगा.
दो मंज़िला बंगला काफ़ी बड़ा था, अब अंदर का क्या जियोग्रॅफिया था, वो तो अंदर जा कर ही पता चलेगा, लेकिन पहले बाहर से देख लेना चाहिए.
ऐसा सोचता हुआ सज्जाक पार्किंग से ही बंगले के पिछले हिस्से की ओर चल दिया, बंगले के पीछे एक बहुत बड़ा स्विम्मिंग पूल भी था, जिसके लिए बंगले के पिछले गेट से भी आया जा सकता था.
सज्जाक स्विम्मिंग पूल से होता हुआ, दूसरी साइड से चक्कर लगा कर बंगले के गेट पर पहुँच गया, वो अंदर जाना चाहता था लेकिन उस पहलवान जैसे दरवान ने उसे रोक दिया, तो वो उससे बात-चीत करने में लग गया.
सज्जाक- ये फार्म हाउस चौधरी साब का हैं..?
दरबान – हां ! तुम्हें क्या लगा कि वो किसी दूसरे के फार्म हाउस पर आए हैं..?
सज्जाक – नही ऐसी बात नही है, लेकिन वो और भी गाड़ियाँ खड़ी दिखी इसलिए पुछा, मे अभी नया ही आया हूँ तो पता नही है ना..!
दरबान – वो कुछ लोग उनसे मिलने आए हैं यहाँ और वो सब कल सुबह तक यहीं रहेंगे.
सज्जाक – तो कल सुबह तक मे कहाँ रहूँगा..?
सज्जाक के पुच्छने पर उसने पार्किंग साइड से बने एक लाइन में कुछ क्वॉर्टर्स की ओर इशारा किया,
और उससे बोला – वहाँ जाकर आराम से बैठो, समय पर सब कुछ पहुँच जाएगा तुम्हारे पास.
सज्जाक उन क्वॉर्टर्स की तरफ बढ़ गया, जिनमें से कुछ में पहले से ही कुछ लोग मौजूद थे जो शायद दूसरों के ड्राइवर वग़ैरह होंगे.
वो भी उन लोगों के पास पहुँचा और अपना परिचय दिया, अब वो सब लोग आपस में बात-चीत करने लगे.
बातों-2 में पता चला कि एक नेता बस्तर से आया है जिसका नाम प्रताप खांडेकर है, दो रायगढ़ के ही हैं, उनमें से एक नेता और दूसरा प्रशासनिक अधिकारी है,
चौथी एक महिला विकास मंडल की प्रमुख अपनी दो सहायकाओ के साथ आई हुई है.
अब अंदर क्या चल रहा था, ये इनमें से कोई नही जानता था.
करीब 9:30 एक आदमी अंदर से ही इन लोगों को खाना दे गया, जो सबने मिलकर खाया, और अपने-2 क्वॅटरो में सोने चले गये.
सज्जाक ने भी एक कोने का क्वॉर्टर पकड़ा और उसमें पड़ी एक चारपाई के बिस्तेर पर लेट गया.
कोई 11 बजे के आस-पास बंगले के अंदर की लाइट ऑफ हो गयी, दो-चार कमरों को छोड़ कर, बाहर की बौंड्री वॉल पर कुच्छ बल्ब लगे थे जो टीम-टीमा कर अपनी पीली सी रोशनी फार्म हाउस में डाल रहे थे.
अंदर की लाइट ऑफ हुए कोई आधा –पोना घंटा ही गुज़रा होगा कि एक साया बंगले के पीछे प्रगट हुआ, जो अंधेरे का लाभ उठाते हुए एक पाइप के सहारे उपर की ओर चढ़ने लगा और फर्स्ट फ्लोर की छत पर पहुँच गया.
छत से वो सीडीयों के ज़रिए दबे पाव नीचे की ओर आया और सभी कमरों को चेक करता हुआ एक बड़े से हॉल जैसे कमरे के पास पहुँचा जिसकी सारी खिड़कियों पर पर्दे पड़े हुए थे.
वो अभी इधर उधर की आहट लेने की कोशिश कर रहा था, कि उसके कानों में हॉल से आती हुई कुछ सम्मिलित आवाज़ें सुनाई दी.
उसने दरवाजे के कीहोल से अंदर देखने की कोशिश की, लेकिन उस पर भी अंदर से परदा होने के कारण कुछ दिखाई नही दिया.
फिर उसने अपनी जेब से कुछ स्क्रू-ड्राइवर जैसा निकाला और एक विंडो के लॉक को खोलने लगा, जैसे ही लॉक के स्क्रू लूस हुए उसने लॉक को 90 डिग्री टर्न किया और विंडो अनलॉक हो गयी.
एक काँच के पारटिशन को बिना आवाज़ उसने सरकाया और बड़ी सावधानी से खिड़की के पर्दे को हल्का सा एक साइड में कर दिया.
अब वो हॉल में होने वाली सभी तरह की गति विधियों को साफ-2 देख सकता था,
जैसे ही उसने हॉल में हो रहे कार्य क्रम को देखा…! उसका मुँह खुला का खुला रह गया………..!!!!
हॉल में इस समय चौधरी समेत 4 पुरुष और 3 महिलाएँ मजूद थी,
पुरुषों के बदन पर मात्र अंडरवेर थे और वो एक बड़े से सोफे पर बैठे थे जो एक एल शेप में हॉल के बीचो-बीच पड़ा था.
तीनों महिलाएँ मात्र ब्रा और पेंटी में उनकी गोद में बैठी हुई थी, सबके हाथ में महगी शराब के जाम थे.
उन तीन औरतों में एक औरत अधेड़ उम्र की जो थोड़ा सा भारी भी थी, 38 साइज़ की चुचिया और 42 की गान्ड, कमर भी 36 की होती. लेकिन वाकी दो युवतियाँ 25-26 की एज की और फिट शरीर वाली थी.
अधेड़ औरत प्रताप खांडेकर और एक दूसरे आदमी जो की तकरीबन 55-56 साल का तो होगा उन दोनो के बीच में बैठी थी.
वो उन औरतों के अंगों से खेलते हुए शराब की चुस्कियाँ ले रहे थे और साथ-2 में बातें भी करते जा रहे थे.
चौधरी अपनी गोद में बैठी युवती के निपल को सहलाते हुए बोला- खांडेकर साब, आपके किए हुए वादे का क्या हुआ..?
एक महीना हो गया अभी तक चंदन और जानवरों की खाल हमारे पास तक नही पहुँचे हैं.
प्रताप – मुझे याद है, लेकिन वो साला नाबूदिया गोमेस ना तो मिलने आता है, और फोन करो तो उल्टा जबाब देता है.
वैसे उसका कहना भी सही है, हमने अभी तक उसके हथियार जो उसने माँगे थे वो भी सप्लाइ नही किए हैं.
वो बोल रहा था, कि मेरे बहुत से आदमियों के पास हथियार ही नही है. उधर जंगल में सीआरपीएफ की गस्त बढ़ती जा रही हैं.
फिर चौधरी उस प्रशासनिक अधिकारी से मुखातिब हुआ जिसका नाम राइचंद था बोला- क्यों राइचंद जी, भाई क्या हुआ हथियार क्यों नही पहुँचे अब तक, जबकि हम उस डीलर को 25% अड्वान्स भी दे चुके हैं.
राइचंद – वो अगले हफ्ते तक पहुँचाने की बात कर रहा है, लेकिन उन्हें लाने में एंपी साब की मदद चाहिए.
चौधरी – हां तो इसमें क्या है, मदद मिल जाएगी.. क्यों एंपी साब..?
एंपी – हां..हां.. ! बिल्कुल, जब कहो में ट्रूक की एंट्री करवा दूँगा.
चौधरी – देखिए भाई लोगो, हम इसमें काफ़ी पैसा लगा चुके हैं, अब जितना समय बर्बाद होगा हम लोगों का नुकसान भी उतना ही होगा. इसलिए जैसे ही हथियार मिलते हैं, उन्हें गोमेस को सौंप कर उससे माल ले लो.
फिर वो सब लोग उन औरतों के साथ खेलने में जुट गये, और एक सामूहिक चुदाई का खेल रात भर चलता रहा,
इस बात से बेख़बर की एक जोड़ी आँखें उनकी इस करतूत को देख ही नही रही थी अपितु ये सब एक कमरे में क़ैद भी हो चुका था.
और सुबह के 4 बजते-2 वो सब एक-एक करके वहीं फार्स पर पड़ी कालीन पर लुढ़कते चले गये.
दूसरे दिन शाम को मैं अपने लॅपटॉप पर रिपोर्ट टाइप कर रहा था, कि मेरे ट्रांसमीटर पर कुछ सिग्नल आने लगे.
मैने हेड फोन कान से लगाए और उस तरफ की बातें सुनने लगा.
प्रताप खांडेकर अपने फोन पर किसी नाबूदिया गोमेस नाम के आदमी से बात कर रहा था.
प्रताप – गोमेस ये क्या कर रहे हो तुम ? अभी तक हमारा माल क्यों नही पहुँचा..? मेरे पार्ट्नर्स मेरी जान खाए जा रहे हैं भाई.
गोमेस – अपुन का असलाह भी तो नही मिला हमको, तुम तुम्हारा ही माल का बात करता रहता है, हमारा आदमी कैसे-2 करके माल निकालता है तुमको क्या पता,
अब साला गवर्नमेंट का सेक्यूरिटी फोर्सस इतना बढ़ गया है जंगल में. खबर भी है तुमको कुछ..?
प्रताप – हां ! मे समझता हूँ, फिर भी एक खेप तो अरेंज करो इस हफ्ते, तुम्हारे हथियार अगले हफ्ते मिल जाएँगे.
गोमेस – तो तभिच बात करने का, अभी हमारे पास कुछ नही है. इधर तुम हमको हथियार और पैसा देगा उधर तुम्हारा माल तुमको मिल जाएगा.
प्रताप – अरे यार इतना क्यों भाव ख़ाता है, बोला ना तुम्हारा माल मिल जाएगा जल्दी ही, तब तक कुछ तो करदो…
गोमेस – एक बार बोल दिया बात फिनिश, एक हाथ ले और दूसरे हाथ दे..
प्रताप – ठीक है अगले हफ्ते ही मिलते हैं फिर, बस्तर नाके के पास.
गोमेस – ओके.. अब मे फोन रखता है.. चलो..!
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