Update 84
32 के उसके कसे हुए सुडौल बूब, जिनका चौड़े गले के उपर में से क्लीवेज दिख रहा था, एकदम पतली कमर 20-22 की, 30 के कूल्हे, जो एक दम टाइट कसे हुए, थोड़ी सी पीछे को गोलाई लिए.
मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, ग़ज़ब ! नीरा तुम तो बहुत सुंदर लग रही हो इन कपड़ों में.
वो – सच बाबूजी..!
मे – हां ! मैने उसका हाथ पकड़ के ड्रेसिंग टेबल के सामने ला कर खड़ा कर दिया. वो आदमकद शीशे में अपना ही अक्श देख कर शरमा गयी, और नज़ारें झुका के खड़ी हो गयी.
अपने आप को देखो नीरा इसमें, तुम्हें खुद अपनी सुंदरता दिखाई देगी. किसी और से पुच्छने की ज़रूरत ही नही है.
वो – मुझे शर्म आरहि है बाबूजी.
मे – अपने से क्या शरमाना पगली.. और उसकी थोड़ी को उंगली के सहारे से उपर किया, देख और जी भरके जी अपनी जिंदगी ये सोचके कि तुम किसी से कम नही हो.
आज के बाद मुझे वो गाँव की डरी सहमी सी नीरा नही दिखनी चाहिए इस घर में.
अब एक नये रूप में आना है तुम्हें वो नीरा बन कर जो इस भेड़ियों से भरे समाज में एक शेरनी की तरह निकले.
मेरी बातों को वो टक-टॅकी लगा कर सुनती रही, मे उसका आत्म विश्वास बढ़ाना चाहता था, जिससे वो भविष्य में किसी की मोहताज़ बन कर ना रहे.
ना चाहते हुए भी वो मेरी चौड़ी छाती में समा गयी और सूबकते हुए बोली- सभी आप जैसे क्यों नही होते बाबूजी ?
मैने उसके सर पर हाथ फेरा और उसको चुप करा कर कहा- सब तेरे जैसे भी तो नही हैं..? कितनी मासूम, भोली, किसी परी जैसी.
अब चल खाना तैयार करते हैं, भूख लगी है.
फिर वो कपड़े चेंज करने चली गयी, और उसके बाद खाने के इंतेज़ाम में लग गयी, तब तक में कुछ नये एलेक्ट्रॉनिक आइटम्स जैसे माइक्रो कॅमरा, माइक्रो-फोन लाया था उन्हें लॅपटॉप से कनेक्ट करके कॅलिब्रेट करने लगा.
जब खाना तैयार हो गया तो हम दोनो ने खाना खाया और थोड़ा बहुत बाहर टहलने निकल गये, और फिर आकर सो गये.
सुबह मैने नीरा को 4: 30 बजे ही जगा दिया, आज से उसको योगा-प्राणायाम, फिर और एक्सर्साइज़ सिखानी थी.
जब तक वो अपने नित्य कामों से फारिग हुई तब तक मैने ध्यान मुद्रा लगाई और फिर 5 बजे से 7 बजे तक हम दोनो ने मिलकर खूब पसीना बहाया.
वो थक कर चूर हो गयी, आधे घंटे बाद जब उसको एक बड़ा ग्लास जूस पिलाया तो उसमें फिर से जान आ गई और घर के काम निपटाने चली गयी.
दिन में पार्ट्नर भी आ गये, और वो भी नीरा का काया कल्प देख कर हैरान रह गये. इसी दिनचर्या में 1 महीना बीत गया,
अब नीरा वो नीरा नही रही थी, जिसे कोई भी भेड़ बकरी की तरह हाथ पकड़े और जहाँ चाहे ले जाए.
आज की नीरा वो नीरा बन चुकी थी, जो हम जैसे ट्रेंड कमॅंडोस से भी दो-दो हाथ करने से नही हिचकिचाती थी.
साथ ही साथ हमने उसको बात-चीत करने का ढंग और रहन-सहन का तरीक़ा भी सिखा दिया था,
अब कोई उसको गाँव की अनपढ़ गँवार लड़की नही कह सकता था.
हमें लगने लगा था कि अब हमारे मिसन का असली मोहरा अब तैयार हो चुका है, और अब उसे चलाने का समय आ गया है.
इसी बीच एक दिन ट्रिशा का फोन आया, उसने बताया कि वो माँ बनने वाली है, साथ ही निशा ने भी खुशख़बरी उसे बता दी थी.
एक साथ दोनो बहनों के माँ बनने की खबर सुनकर मेरी खुशी का तो जैसे ठिकाना ही नही था,
बस्तर सिटी का नामी गिरामी होटेल जिसका डाइनिंग हॉल इस समय नीली-पीली रंग बिरंगी मद्धिम रोशनी में नहाया हुआ था.
कस्टमर अपनी अपनी टेबल पर बैठे या तो लज़ीज़ खाने का मज़ा ले रहे थे, या अपने खाने के आने का इंतजार कर रहे थे,
ऑर्केस्ट्रा की मद्धिम लेकिन मधुर धुन हॉल के कोने-2 से उठ रही थी.
तभी, वहाँ रोकी , राकेश खांडेकर अपने 5-6 दोस्तों के साथ प्रेवेश करता है, वो सब शराब के नशे में धुत्त इधर-उधर को हिलते डुलते हुए दिखाई दे रहे थे, मतलब नशा उन पर पूरी तरह हावी था.
रोकी का बाप शहर का एक मशहूर लीडर जो कि एक पॉल्टिकल पार्टी का नेता था नाम था प्रताप खांडेकर,
उसकी पार्टी देश में कभी सत्ता में तो नही आई थी लेकिन मौजूदा कोलिशन सरकार में भागेदारी अवश्य थी, कुछ राज्यों में भी उनकी सरकार थी.
रॉकी और उसके दोस्तों ने पूरे डाइनिंग हॉल में हंगामा मचा रखा था, जिसकी वजह से वहाँ मौजूद लोगों को असुविधा होने लगी.
होटेल मॅनेजर की इतनी हिम्मत नही थी कि वो उनको रोक सके.
आख़िर में जब पानी सर गुजरने लगा, तो एक टेबल के इर्द-गिर्द बैठे तीन व्यक्तियों में से एक उठा और उन लफंगों को समझाने लगा.
वो शराब और ताक़त के नशे में चूर कहाँ समझने वाले थे, उल्टा उस आदमी के साथ ही हाथापाई करने लगे,
जब उसके साथियों ने देखा कि वो लोग उसके साथ कुछ ग़लत ना करदें तो वो दोनो भी उठ कर आ गये और उनमें से एक ने एक गुंडे के कान के नीचे बजा दिया.
अब तो मामला ज़्यादा तूल पकड़ने वाला ही था कि होटेल का मॅनेजर वहाँ आ गया और उन तीनो से माफी माँगते हुए मिन्नतें करने लगा, कि आप लोग समझदार हो इनके मुँह मत लगो और यहाँ चले जाओ जिससे मामला शांत हो जाए, वरना
मेरे होटेल का माहौल खराब होगा, हो सकता है कुछ टूट-फुट भी हो जाए.
वो तीनों वहाँ से निकलने लगे, अभी वो डाइनिंग हॉल के मेन गेट से निकल कर सामने बने पोर्च तक ही पहुँचे थे कि उन नशेडियों में से एक ने उन तीनो में से एक का पीछे से कॉलर पकड़ लिया,
उस बंदे ने उसका हाथ पकड़के ज़ोर दबाया तो उसका कॉलर छूट गया, उस बंदे ने पीछे मूड के उस नशेड़ी को एक ज़ोर का धक्का दिया जिससे वो धडाम से पीछे को गिर गया.
देखते-2 वहाँ घमासान छिड़ गया, उन तीन बन्दो ने 10 मिनट तक उन गुण्डों की जम के धुलाई की अब वो सभी अर्ध बेहोसी की हालत में ज़मीन पड़े-2 कराह रहे थे.
रोकी हक्का वाक्का खड़ा उन्हें देख रहा था, उसकी टाँगें काँप रही थी, ठीक से खड़ा भी नही हुआ जा रहा था उससे.
फिर भी उसने अपने डर को काबू में करके किसी तरह वो उनसे भिड़ा रहा, लेकिन जल्दी ही पस्त हो गया, उन बन्दो में से एक ने उसको फाइनल एक घूँसा उसकी कनपटी पर मारा, प्रहार इतना पवरफुल था कि रोकी के फारिस्ते कून्च कर गये.
लाख कोशिशों के बाद भी वो अपनी टाँगों पर खड़ा नही रह पाया और वो भी गिरने ही वाला था कि दो हाथों ने उसे थाम लिया.
रोकी ने अपनी बंद होती आँखों से उस थामने वाले की ओर देखा और बस अपने घर का पता ही बोल पाया और उसकी बाहों में बेहोश हो गया.
उसका बेहोस शरीर एक लड़की की बाहों में झूल गया, जिसे उसने किसी तरह से एक रिक्शे में डाला और उसके बताए पते की ओर ले चली.
ये एक हवेली नुमा बहुत ही बड़ा सा मकान था जो शहर के सबसे रहिषी इलाक़े में था. उसने रिक्शे वाले को उस हवेली नुमा मकान के सामने रोकने को कहा, और खुद बाहर आकर दरबान से गेट खोलने को कहा.
दरवान ने रोकी को पहचान कर गेट खोला और उस रिक्शे वाले की मदद से उसे अंदर तक ले गयी.
एक बड़े से हॉल में एक अधेड़ महिला जो ना ज़्यादा सुंदर थी, तो बदसूरत भी नही कह सकते, थोड़ी भारी शरीर की हल्का साँवली रंगत की एक बड़े से सोफे पर बैठ कर टीवी देख रही थी.
रात के 10 बजे अपने घर में एक अजनबी लड़की को अपने बेटे के बेजान से शरीर को सहारा दिए लाते देख कर वो चोंक गयी और सोफे से उठकर फ़ौरन उनके पास पहुँची.
महिला – क्या हुआ मेरे बेटे को, किसने की इसकी ये हालत, रोकी के पापा ! जल्दी यहाँ आओ, देखो तो इसको क्या हुआ..?
रॉकी का बाप प्रताप खांडेकर भी एक रूम से बाहर आया और वो भी अपने नालयक बेटे को देखकर हड़बड़ाया, लेकिन अपने गुस्से को काबू में रख कर अपने भावनाओ को कंट्रोल में रख कर पहले उसने नौकरों को बोल कर अपने बेटे को उसके बेडरूम तक भिजवाया, और फिर उस लड़की को बैठने का इशारा करके खुद भी बैठ गया.
प्रताप – ये कैसे ? कहाँ और किसने किया..?
लड़की – जी मुझे ज़यादा तो नही पता कि होटेल के अंदर क्या हुआ ? लेकिन बाहर जो मैने देखा वो कुछ इस तरह से था और उसने सारी घटना प्रताप के सामने बयान कर दी.
प्रताप – मे जानता हूँ की मेरा बेटा ग़लत लोगों की संगत में बिगड़ गया है, फिर भी हम तुम्हारे शुक्रगुज़ार हैं बेटी जो तुम उस नालयक को यहाँ तक सहारा देकर लाई हो.
लड़की – इसमें शुक्रिया कहने की आवश्यकता नही है सर, ये तो मैने अपना फ़र्ज़ समझा कि इस हालत में इनको इनके घर पहुँचाना चाहिए सो ले आई.
प्रताप – ये तुमने हमारे उपर अहसान किया है, खैर अपने बारे में कुछ बताओ, क्या नाम है ? माता-पिता क्या करते है..?
लड़की – जी ! मेरा नाम नीरा है, माँ-बाप नही है मेरे, मे अकेली ही हूँ इस दुनिया में.
प्रताप – ओह ! दुख हुआ जान कर ! वैसे क्या काम करती हो..?
नीरा – जी ! ज़्यादा कुछ नही, बस ऐसे ही इधर-उधर घरों में काम करके अपना गुज़ारा कर लेती हूँ.
अभी वो बात कर ही रहे थे कि तब तक रॉकी की माँ राम दुलारी देवी भी रॉकी को उसके कमरे तक छुड़वा कर आ गयी.
प्रताप – रोकी की माँ, देखो ये बच्ची कितनी अच्छी है, बिना जान पहचान के रॉकी को इस हालत में घर तक छोड़ने आई है.
रोकी की माँ – सही कह रहे हो ! आज के जमाने में कॉन किसके काम आता है, फिर जब उसे वो बातें पता चली जो उसने प्रताप को बताई थी तो उसने उससे पुछा-
हमारे घर काम करना चाहोगी बेटी. हम तुम्हारी सारी ज़रूरतों का ख्याल रखेंगे, तुम्हें भी इधर-उधर भटकना नही पड़ेगा, और हमें भी तुम्हारे जैसी अच्छी नेक काम करने वाली मिल जाएगी.
नीरा कुछ देर चुप रही, फिर कुछ देर बाद बोली – ठीक है माजी अगर आप कहती हैं तो में आपके यहाँ काम करने को तैयार हूँ.
रोकी की माँ – ठीक है तो फिर कल से काम पर आ जाना, फिर कुछ सोच कर बोली – अभी कहाँ जाओगी..?
ऐसा करो यहीं रुक जाओ, सुबह जाकर अपना समान ले आना क्यों ठीक है ना जी.
प्रताप – हां सही कह रही हो, बेचारी अकेली लड़की इतनी रात गये कहाँ जाएगी, यहीं नौकरों के कमरों में से एक बता दो सो जाएगी, कुछ कपड़े वग़ैरह दे दो सोने के लिए इसे.
नीरा – नही मालिक मे चली जाउन्गि कोई डर वाली बात नही है, सुबह जल्दी ही आ जाउन्गि.
प्रताप – जैसी तुम्हारी मर्ज़ी…! और इतना कह कर वो अपने कमरे में चले गये और नीरा अपने घर लौट आई..
नीरा के घर लौटते ही मैने उसे पुछा – कुछ बात बनी नीरा..? उसके घर में घुसने का रास्ता मिला कि नही.
नीरा – आप कोई योजना बनाओ और वो फैल हो जाए..? ऐसा कभी हो सकता है भला.
मे – तो मतलब तुम्हें वहाँ काम मिल गया…!
नीरा – अरे वो तो मुझे अभी भी नही आने दे रहे थे, कहने लगे ! रात बहुत हो गयी है, कहाँ जाओगी, सुबह जाकर अपना समान ले आना.
जैसे-तैसे बहाना करके आई हूँ.
मे – गुड ! अब तुम अपना समान पॅक कर लो, और ये चीज़ें संभाल कर रखना, फिर उसे एक-एक चीज़ को समझाते हुए मैने कहा.
ये देखो ये ट्रांसमीटर है इसको ऐसे दवा के किसी सतह पर छोड़ दोगि तो ये उसी चिपक जाएगा, ऐसे !
इसको तुम प्रताप के टेलिफोन के नीचे चिपका देना, ध्यान रहे उस फोन पर जिस पर उस के ज़्यादातर पर्सनल फोन आते हों.
और ये है एक मिनी कॅमरा इसको ऐसी जगह छिपा के रखना जहाँ वो बाहर के लोगों से मिलता हो.
ध्यान रहे, ये काम करते हुए तुम्हें कोई देख ना ले, वरना तुम मुशिबत में पड़ सकती हो.
हां एक और बात ! उसके हरामी लौन्डे से दूर ही रहना.. कहीं तुम्हारे साथ कुछ ग़लत ना कर्दे… समझ गयी.
उसने हां में गर्दन हिला कर हामी भर दी, और फिर रुक कर बोली- वो आपने अभी रॉकी से दूर रहने को क्यों कहा..? एक घर में रह कर उसका काम भी तो करना पड़ सकता है.
मे – उसका कोई काम ना करने के लिए नही बोल रहा हूँ, वो रहीस बाप की बिगड़ी औलाद है, तुम्हारी जैसी सुंदर लड़कियाँ उसकी कमज़ोरी हैं.
वो – बाबूजी ! तो क्या मे इतनी सुंदर हूँ कि किसी की कमज़ोरी बन जाउ..?
मे – नीरा ! पहले तो ये बाबूजी कहना बंद करो !
वो – तो क्या कहके बुलाऊ आपको..?
मे – नाम ले सकती हो, भैया कह सकती हो..!
वो – आपका नाम तो नही लेना चाहूँगी मे, भैया जी कैसा रहेगा,,?
मे – जो तुम्हें ठीक लगे, और रही बात तुम्हारी सुंदरता की तो उस दिन तुम्हे शीशे के सामने खड़ा करके क्या दिखाया था मैने ?
वो – तो अभी तक आपकी कमज़ोरी क्यों नही बन पाई मे..? कह कर वो शरमा गयी और अपनी नज़रें नीची करके अपने निचले होठ को काटने लगी.
मैने उसका मतलब समझते हुए कहा – हर आदमी का अलग-2 स्वाभाव होता है, मेरी नज़र में किसी की मजबूरी का फ़ायदा उठाना ग़लत है, गुनाह है, जिसे में कतई पसंद नही करता.
वो – और कोई सामने से आपको पसंद करती हो तो..? नज़रें झुकाए हुए ही कहा उसने,
मे उसकी बात सुनकर उसकी ओर देखता ही रह गया, और उसके शब्दों का मतलब समझने की कोशिश करते हुए बोला.
फिर भी मे उसकी इक्षा के बिना छुना भी पाप समझता हूँ.
वो- और अगर कोई अपनी इक्षा से ही आपके पास आना चाहे तो..?
मे – तुम कहना क्या चाहती हो नीरा..?
वो – देखिए भैया जी ! आप मुझे ग़लत मत समझना पर जबसे उन ज़ालिमों ने मेरे साथ वो ग़लत काम किया था, उसके बाद से मेरे शरीर के जख्म तो भर गये,
लेकिन अब मेरे इस कम्बख़्त शरीर में कुछ ऐसी हलचल होने लगती है कि मे…., कहते-2 वो रुक गयी, और अपने होठ काटने लगी…!
मे – तुम्हारी परेशानी समझ सकता हूँ मे नीरा ! लेकिन मे इसमें तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ..?
वो – इस जालिम समाज से मुझे घृणा सी हो गयी है, हर इंसान में भेड़िए का रूप नज़र आता है मुझे, इसलिए मे किसी और के साथ संबंध बनाना नही चाहती… इसलिए मेरा मन आपकी ओर झुकने लगा है.
मे – नीरा ! तुम एक बहुत अच्छी लड़की हो, लेकिन मे एक शादी-सुदा हूँ.. तो मे कैसे तुम्हारी ये इक्षा पूरी कर सकता हूँ ? और वैसे भी घर में और दो मर्द भी तो हैं…
वो – मैने आपसे शादी करने के लिए तो नही कहा..? बस एक विश्वास के नाते आपसे गुज़ारिश की है..!
और रही बात उन दोनो की, तो उनके लिए कभी ऐसे विचार मेरे मन में आए ही नही.

