Update 82
अब देखना होगा कि नये एनएसए महोदय कैसे मॅनेज करते हैं या डॅमेज करते हैं.
कुछ दिन बाद ही एक मैल आ गया कि एनएसएसआइ को ख़तम करके रॉ में मर्ज किया जा रहा है, जो अब सीधे होम मिनिस्ट्री को डाइरेक्ट रिपोर्ट करेगी.
रॉ डाइरेक्टर ने सभी एजेंट्स को लेकर एक मीटिंग बुलाई और सभी के ग्रूप बना कर उन्हें मिसन दे दिए गये.
गनीमत थी कि रॉ में कोई चेंज नही किया गया था, तो कम-से-कम एक अनुभवी आदमी के अंडर काम करने का मौका मिला.
हमारे ग्रूप में 15 लोग थे जिनको देश के अंदर पनप रहे नक्सल बाद पर नज़र रख कर उनके मंसूबों को विफल करने का हर संभव प्रयास करना था.
इस नये मिसन की वजह से मे निशा की शादी भी अटेंड नही कर पाया था, जिसका ट्रिशा के घरवालों को जबाब देना भारी पड़ गया.
हमें बोलना पड़ा कि कंपनी के काम से मुझे आउट ऑफ कंट्री जाना पड़ा है.
मेरे पुराने मिसन की सफलता के आधार पर मुझे इस टीम का लीडर बना दिया गया, सौभाग्य से विक्रम और रणवीर जो ज़फ़्फरुल्लाह वाले केस में मेरी स्पेशल डिमॅंड पर मेरा साथ देने आए थे वो भी हमारे ग्रूप में ही थे.
सबसे पहले हमने कंट्री के मॅप में उन हिस्सों को हाइ लाइट किया जहाँ नकशलिस्म पनप चुका था जिनमें एंपी का कुछ हिस्सा (जो आज छत्तीसगढ़ में है), बिहार का हिस्सा (जो आज झारखंड में है), वरषा, वेस्ट बंगाल, आंध्रा प्रदेश और तमिलनाडु प्रमुख राज्य थे.
हमने 3-3 लोगों के 5 सब ग्रूप बनाए और हर ग्रूप को एक निर्धारित एरिया सौंपा गया.
सब ग्रूप (एस) को नंबर से डिफाइन किया जैसे एस1, एस2..लाइक तट..
एस1 को वेस्ट बंगाल का हिस्सा, स2 ओरिसा, स3 बिहार, स4 आंध्र+तमिल नाडु आंड स5 एंपी+ (एंपी+ सम पार्ट ऑफ गुजरात+सम पार्ट ऑफ यूपी).
मेरा ग्रूप स5 था, जिसमें मेरे साथ विक्रम और रणवीर हम तीनों दोस्त थे. ये ग्रूप के डिविषन सर्व सम्मति से ही बनाए गये थे.
हर एक ग्रूप को एक ट्रांसमीटर दिया गया, जो कोडेड था, जिसका मतलब होता कि अगर उस पर कोई कनेक्ट होना था, इसका मतलब कोई अर्जेन्सी है और फ़ौरन कॉंटॅक्ट करना है, साथ ही वो एक दूसरे की दिशा निर्देशन भी करेगा.
वीक वाइज़ हर ग्रूप को प्रोग्रेस रिपोर्ट देनी थी, जो कंबाइन करके रॉ ऑफीस को भेजनी होती.
ये सब डिसाइड करके हम सब एक दूसरे से अलग हुए. और यथोचित रिज़ल्ट की उम्मीद में मिसन पर लग गये…
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बस्तेर से दंतेवाड़ा के बीच का घना जंगली इलाक़ा, अचानक किसी औरत की दर्दनाक चीखों से दहल उठा,
चीखें इतनी दर्दनाक थी, कि पत्थर दिल इंसान का दिल भी तड़प उठे, लेकिन वो चार लोग जो उसके साथ कुकृत्य कर रहे थे, उनमें शायद दिल नाम का कोई ऑर्गन्स ही मौजूद नही था.
वो चारों एक विशेष तरह के डार्क ग्रीन मोटे से कपड़े की एक जैसी उनफ़ॉर्म में थे जो शायद महीनों से सॉफ ही ना की हो,
जिनके सर से बँधा हुआ कपड़ा मुँह को भी ढकने में काम आता था,
लेकिन इस समय उनके मुँह ढके हुए नही थे पक्के रंग की चमड़ी वाले ये दानव सरिके लोग, जिनके चेहरों पर बढ़ी हुई दाढ़ी, जो शायद महीनों से शेव नही की हो.
अक-47 जैसी राइफल से लेश, जो इस समय पास ही एक पेड़ की जड़ में रखी हुई थी एक युवती को चारों ओर से घेरे हुए.
मध्यम कद की वो युवती पेड़ों के सूखे पत्तों पर पड़ी बिलख-2 कर उनसे छोड़ देने की विनती कर रही थी जिसका उन शैतानों पर कोई असर नही पड़ रहा था.
वो ज़मीन पर पड़ी नग्न अवस्था मैं निरीह घायल हिरनी की तरह उनसे दया की भीख माँग रही थी.
उनमें से एक शैतान उसके साथ अपनी काम पिपासा शांत करने में जुटा हुआ था और वाकी के तीनों अपने-2 लंड पेंट से बाहर निकाले मसल्ते हुए अपनी बारी का इंतजार कर रहे और साथ-2 युवती के नाज़ुक अंगों को नोचते जा रहे थे.
वो बेचारी अबला नारी सिवाय चीखने और बिल्खने के अलावा और कुछ भी करने की स्थिति में नही थी.
जैसे ही पहला वाला शख्स अपनी काम पिपासा शांत करके हटा ही था कि दूसरा लग गया और पूरी ताक़त के साथ उसने अपना मूसल जैसा लंड उसकी छत-विच्छत पहले वाले के वीर्य से सनी योनि में पेल दिया.
आयययययीीईईईईईईईईईईई….. एक दिल दहला देने वाली चीख उस नवयौवना के मुँह से फिर एक बार उबल पड़ी और वो बुरी तरह छटपटाने लगी.
इस तरह से वो तीन लोग उसके साथ पाशविक तरीक़े से अपनी वासना की आग शांत कर चुके थे.
अब चौथा व्यक्ति उसके उपर आया जिसका लंड शायद उन तीनों से भी लंबा और तगड़ा लग रहा था, वो युवती उसके लंड को देख कर ही अपनी चेतना खो बैठी,
अभी वो अपने मूसल को उस बेहोश हो चुकी युवती की घायल यौनी में डालने ही वाला था कि एक गोली की आवाज़ हुई और वो चौथा व्यक्ति पीछे की ओर गिरता चला गया.
अपने साथी को इस तरह गिरता देख वो तीनों हक्के-बक्के से अभी खड़े ही हुए थे कि धाय-धाय-ढायं…, और वो तीनों की भी प्राण लीला समाप्त हो गयी.
तभी वहाँ 3 नकाब पोश प्रकट हुए और उस लड़की के पास पहुँचे.
वो पूरी तरह नग्न अवस्था में थी जिसके सभी नाज़ुक अंगों पर नोच खरोंच के निशान बने हुए थे, जिनमें से खून भी रिसने लगा था.
उन नकाब पोषों ने उस बेहोश युवती को उसके फतेहाल कपड़ों से जैसे-तैसे करके उसको ढका,
एक ने उसे अपने कंधे पर लादा, और दूर खड़ी अपनी जीप में डालकर बस्तेर की ओर निकल गये…..
ये एक छोटा सा दो कमरों का घर हमने बस्तर शहर के बाहरी इलाक़े में किराए पर ले रखा था,
जिससे हम आस-पास के जंगलों और इलाक़े की खाक-छान कर जब लौटें तो एक आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान हो.
इसी में हमने उस लड़की के बेहोश शरीर को लाकर रखा, और उसका गुप्त रूप से उपचार करने लगे.
हमें यहाँ रहते हुए 3 महीने बीत चुके थे, और वहाँ के नक्सलियों से संबंध रखती हुई आस-पास की बहुत सी जानकारिया भी हम निकाल चुके थे,
इसी छान-बीन के चलते ये लड़की वाला हादसा हमारी आँखों के सामने हुआ जिसे हमने उन दरिंदों से बचा तो लिया…
लेकिन उसके साथ हुए हादसे को नही टाल पाए, क्योंकि जब हम सफ़ारी करते हुए सर्च कर रहे थे, तब हमें उसकी चीखें सुनाई पड़ी..
जिन्हें सुनकर हम वहाँ तक पहुँचे थे, लेकिन हमारे पहुँचने तक वो तीन लोग इसके साथ बलात्कार कर चुके थे…
पूरे 24 घंटे बेहोश रहने के बाद उस युवती को होश आया तो उसने अपने आप को एक आरामदायक बिस्तेर पर पाया, अभी भी उसकी आँखें बंद ही थी,
जिन्हें वो उसके मन मस्तिष्क पर छाये भय के कारण खोलने से भी डर रही थी.
उसकी चेतना अब वापस लौट आई थी लेकिन आँखें अभी भी बंद किए हुए थी, वो अपनी वास्तुस्थिति से परिचित होना चाहती थी.
उसे अपने पूरे शरीर में दर्द की लहरें सी उठती महसूस हो रही थी, ख़ासकर उसकी जांघों के जोड़े पर अत्यंत पीड़ा हो रही थी, जिस कारण से उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव सॉफ दिखाई दे रहे थे.
आख़िरकार उसने अपनी आखें खोलकर देखा कि वो इस समय कहाँ और किन लोगों के बीच, किन हालातों में है…
जैसे ही उसने अपनी आँखें खोली, तीन शख्स उसके बिस्तर के पास खड़े दिखाई दिए, वो अपनी पूर्व-बात स्थिति समझ कर फिर से चीखने वाली थी कि उनमें से एक शख्स (मे) ने उसका मुँह बंद कर दिया और उसे समझाने लगा.
देखो ! डरो नही, हम वो नही हैं जो तुम्हारे साथ रेप कर रहे थे, हम तुम्हें बचाकर यहाँ लाए हैं. अब तुम्हें घबराने की ज़रूरत नही है.
व.व.वू.. फिर से लेजाएँगे मुझे, रोते हुए बोली वो..
मे – नही अब वो तुम्हें नही ले जा सकते, वो सब मर चुके हैं..
वो – क्या..? कैसे..? वो तो बड़े ख़तरनाक लोग थे..! उन्हें किसने मारा..?
मे – हमने उन चारों को मार दिया है, और तुम्हें वहाँ से ले आए हैं, अब तुम्हें कोई हानि नही पहुँचाएगा.
वो – लेकिन आप लोग कॉन हैं..?
मे – हमें तुम अपना दोस्त ही समझो, और सारी बात बताओ कि क्या हुआ था तुम्हारे साथ..!
उसने उठने की कोशिश की लेकिन शरीर के दर्द ने उसे उठाने नही दिया, तो मैने उसे सहारा देकर बिठाया और उसकी पीठ के पीछे तकिये का सहारा लगा कर बेड से टेक लगा कर बिठा दिया.
उसने अपने शरीर पर नज़र डाली, जो जगह-2 से नोच-खरोंच से भरा हुआ था, जहाँ अब मलम लगी हुई थी.
अपनी आँखों में पानी लाकर उस युवती ने बोलना शुरू किया-
मेरा नाम नीरा है, अपने माँ-बापू के साथ गाँव में रहती हूँ.
गाँव शहर से ज़्यादा दूर होने के कारण पढ़ लिख भी नही पाते हैं बच्चे, सो में भी नही पढ़ पाई, बस 5वी तक की शिक्षा ही ले पाई.
मेरा एक छोटा भाई भी था, मे अपने गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी.
ये लोग जंगलों में रहकर वहाँ से लकड़ी और जंगली जानवरों को मार कर उनका व्यापार करते हैं, कभी-2 घूम फिर कर हमारे गाँव भी आ जाते थे.
हमारे घर वाले, जब ये लोग आते थे तो अपने-2 बच्चों को छिपा देते थे जिससे इन लोगों की नज़र ना पड़े और ये कुछ नुकसान ना पहुँचा सकें.
कल ये लोग आकस्मात हमारे गाँव में आ गये, इससे पहले कि मे और मेरा भाई कहीं छिप्ते, इन्होने हमें देख लिया और पकड़ लिया.
हम दोनो को ज़बरदस्ती जंगल की ओर ले जाने लगे जब मेरे माँ-बापू ने हमें छुड़ाने की कोशिश की तो उन लोगों ने उन दोनो को गोली मार दी, और फिर मेरे भाई को भी मार दिया, और मुझे उठा ले गये..
इतना कहते-2 वो फुट-2 कर रोने लगी.
मे – देखो नीरा ! तुम रोओ नही, हमें पता है तुम एक बहादुर लड़की हो. वैसे तुम्हारी उम्र क्या है अभी.
वो- 19 साल…!
मे- तुम्हें उनके दूसरे साथियों का पता है कि वो कहाँ रहते हैं..?
वो- ऐसे लोगों का कोई एक ठिकाना तो होता नही है बाबूजी, यहाँ तो जंगल का समंदर सा फैला हुआ है, कही भी आते- जाते हैं ये लोग.
मे – वैसे तुमने ज़्यादा से ज़्यादा कितने लोगों को देखा है ऐसे..!
वो – कभी-2 तो ये 20-25 तक भी आते थे.
मे – अब तुम कहाँ जाना चाहोगी..? आगे क्या करना है..?
वो – अब मेरा कॉन बचा है जिसके पास जाउन्गी, वैसे भी ये मेरी जिंदगी तो अब नरक बन चुकी है, जीने में रखा ही क्या है ? अब तो मेरे मर जाने में ही भलाई है.
मैने उसे समझाते हुए कहा – देखो नीरा ! मरने से आज तक किसी का भला नही हुआ है, भगवान ने ये जीवन दिया है जीने के लिए, इसे ऐसे ही ख़तम नही करना चाहिए.
तुम एक बहादुर लड़की हो, हम चाहते हैं, कि तुम इस जीवन का मुक़ाबला पूरी बहादुरी से लड़ते हुए करो.
वो सुबक्ते हुए बोली – अब मे अकेली क्या मुक़ाबला करूँगी जिंदगी का ? कहाँ जाउन्गि..? मेरे पास बचा ही क्या है जीने के लिए..?
मे – क्या तुम ये नही चाहोगी कि तुम्हारी तरह कोई और नीरा अनाथ ना हो..?
वो – मेरे चाहने ना चाहने से क्या होता है बाबू साब..!
मे – अगर होता हो तो….! देखो ! अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ हो सकता है, हम तुम्हें इस काबिल बनाएँगे कि तुम जमाने की मुश्किलों का सामना डटकर कर सको.
और अपने परिवार की मौत का बदला भी ले सको, ताकि फिर कोई मज़लूम इस तरह से असहाय और बेबस ना हो.
वो – लेकिन ये होगा कैसे..?
मे – वो सब तुम हम पर छोड़ दो, तुम बस ये बताओ, कि तुम इनके खिलाफ लड़ना चाहती हो या नही, इसमें हम तुम्हारा पूरा साथ देंगे.
वैसे भी तो तुम मरना ही चाहती हो, अगर वो मौत किसी के काम आ सके, किसी का भला करते हुए आए तो जीवन सफल हो जाता है, है ना !
वो – हमम्म… ! ठीक है, आज से आप लोग जैसा कहेंगे मे वैसा ही करूँगी…, वैसे भी ये जिंदगी तो आप ही की लौटाई हुई है.
मे – शाबास ! ये हुई ना कुछ बात…!
फिर मैने उसे उसकी सारी दबाईयाँ देते हुए समझाया – लो ये सब तुम्हारी दबाइयाँ हैं, इनको समय से खाना है, और ये ट्यूब अपने ज़ख़्मों पर लगाना है दिन में दो बार, उस जगह पर भी. समझ गयी.
मेरी बात का मतलब समझते हुए, थोड़ा शरमाते हुए उसने सर हिलाकर हामी भरी..!
मैने आगे कहा – घर में खाने पीने की सभी चीज़ मौजूद हैं, तो खुद पकाना और समय से खाना, हम लोग कुछ दिनो के लिए बाहर जा रहे हैं तब तक तुम अच्छी तरह से अपनी देखभाल करना,
जब हम लोग लौट के आयें तो हमें हमारी शेरनी पूरी तरह स्वस्थ मिलनी चाहिए..! ठीक है..!
और हां ! बिना काम के ज़्यादा देर घर से बाहर मत जाना, किसी से मेल-जोल बनाने की भी ज़रूरत नही है, और ना ही फालतू इधर-उधर जाना है, समझ गयी.
उसने मुस्करा कर हामी भरी, अब उसके चेहरे पर कुछ ध्रड निश्चय के भाव नज़र आरहे थे…
फिर हम तीनों दोस्त उसे अकेला छोड़कर बाहर निकल गये..!
हम नीरा को वहाँ छोड़ कर और उसका सारा कुछ रहने खाने का उसके लिए 4-6 जोड़ी कपड़ों का भी इंतज़ाम करके हम तीनों अपने-2 घरों को निकल लिए.
ओवर नाइट की जर्नी करके मे कोई सुबह के 4 बजे अपने घर पहुँचा…
काफ़ी देर के बाद तो साले बंगले पर तैनात संतरी ने मेन गाते खोला….
अब इसमें बेचारे संतरी की भी क्या ग़लती थी… रात भर की ड्यूटी के बाद, ये समय ऐसा होता ही है, कि झपकी लग ही जाती है, और वो भी ऐसी लगती है, कि कान पर नगाड़े बजते रहें आदमी की नीद नही खुलती…
खैर वो अलसाया हुआ आया, मेरी गाड़ी में झाँक कर चेक किया और फिर सल्यूट देकर गेट खोलते हुए बोला…
सॉरी सर, तोड़ा आँख लग गयी, प्लीज़ आप मेडम को मत बोलना, वरना मेरी क्लास ले लेंगी…
मैने कहा – कोई बात नही मे समझ सकता हूँ, इस समय की नीद कैसी होती है, वो भी रात भर जागने के बाद…
खैर एक किला फ़तह कर लिया था, लेकिन असली अभी वाकी था, तो बंगले के पोर्च में गाड़ी खड़ी करने के बाद मे गाड़ी से नीचे आया और डोर बेल बजाई..
एक बार, दो बार… लगातार 10 मिनट बेल बजाने के बाद तब कहीं जाकर अंदर से एसीपी साहिबा की अलसाई हुई आवाज़ सुनाई दी… कॉन है…?
मैने आवाज़ बदल कर कहा – में साब दूधवाला…
ट्रिशा स्लीपर चटकाते हुए बड़बड़ाती हुई गेट की तरफ बढ़ी… दूधवाला..? आज क्या हुआ जो इतने सबेरे – सबेरे दूध लेकर आ गया… लगता है, रात को भांग ज़्यादा चढ़ा ली इसने, जो समय का पता ही नही चला…
आती हूँ रामू.. ये कहती हुई वो डोर तक आई, और जैसे ही गेट खोला ….
सामने मुझे खड़ा देख कर उसकी सारी नींद की खुमारी भाग खड़ी हुई..
मेरे सीने पर घूँसे बरसाते हुए बोली – आप बहुत सताते हो मुझे… सीधे – 2 बोल नही सकते थे…, इतना कहकर मेरे सीने से लिपट गयी…
आप इतने सुबह-2 कैसे आए, फिर पोर्च में गाड़ी पर नज़र पड़ते ही बोली – हे भगवान, सारी रात ड्राइविंग करके आए हो…
मैने चुटकी लेते हुए कहा – नही तो ! तुम्हें पता नही ये गाड़ी हवा में उड़ भी सकती है… अब चलो अंदर या यहीं से धक्के देकर भगाने का इरादा है…
वो – ओह सॉरी ! और मेरी कमर में बाहें लपेट कर हम अंदर आ गये..
मैने कहा – गेट खोलने में इतना समय क्यों लगा तुम्हें, तुम तो सुबह जल्दी उठने की आदि हो…
वो बोली – अरे कल गाँधीनगर जाना पड़ा, आते आते रात का 1 बज गया.. 2 बजे जाकर सोना हुआ इसलिए…
मे – ओह ! सॉरी डार्लिंग, मैने तुम्हें डिस्टर्ब कर दिया…
वो – ओह ! जानू इसमें सॉरी की क्या बात है, इट्स ओके, आज मुझे कहीं नही जाना, आज बस अपने साजन की बाहों में ही सारा दिन गुज़ारना है…
फिर ट्रिशा ने हम दोनो के लिए चाय बनाई, और फिर फ्रेश होकर हम एक दूसरे की बाहों में लिपटे पलंग पर लेट कर बातें करते रहे…
ना जाने कब हमें नींद ने आ दबोचा… मेरी नींद 12 बजे जाकर खुली…
तबतक उसने नहा धोकर नाश्ते का इंतेज़ां करा लिया, मैड आकर सारा काम निपटा कर जा चुकी थी…
मैने उठकर सीधा नाश्ते पर धाबा बोल दिया… और एक बार फिर हम अपने बेडरूम में आ गये…
बेडरूम में आते ही ट्रिशा मेरे बदन से लिपट गयी… मैने उसके होठों को चूमकर पुछा – क्या बात है मेरी जान बड़ी उतावली हो रही हो…
वो मेरी बालों से भरी छाती को अपनी हथेली से सहलाते हुए – मुझे अब एक नन्हा अरुण चाहिए जिसके साथ में खेल सकूँ…
आप तो इतने-2 दिनों के लिए चले जाते हो, मुझे भी तो कोई चाहिए अपने साथ जो अपना हो…
बात उसकी जायज़ थी, सो मैने उसके अनारों को सहलाते हुए पुछा – ये समय सही है..?
वो मेरे लंड को सहलाते हुए बोली – एकदम परफेक्ट, कल ही पीरियड बंद हुए हैं..
इतना सुनते ही, मैने उसके गाउन की डोरी खींच दी, और उसे अपनी गोद में उठाकर बेड की तरफ ले जाते हुए बोला – नेकी और पुछ-पुछ, हम अभी एक बेबी का इंतज़ाम करे देते हैं अपनी बेगम साहिबा के लिए…

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