Update 78
कितनी ही देर तक में उसे अपने से चिपकाए पड़ा रहा, वो भी मेरे सीने से चिपकी पड़ी रही, शायद नींद में ही चली गयी थी, मैने भी उसे ऐसे पड़े रहने दिया,
बेचारी थक गयी थी, इतनी देर कमर चलाते-2.
कुछ देर बाद वो खुद ही कुन्मुनाई और मेरे उपर से उठ गयी.
जैसे ही वो उठी, एक पुच.. की आवाज़ के साथ मेरा लंड उसकी परी से बाहर आया, जो शायद उसकी गर्मी पाकर फिर से अकड़ने लगा था.
उसकी नव-विक्षित योनि से खून के साथ-2 हम्दोनो का मिश्रित वीर्य भी बाहर निकला और बेड शीट को गीला करने लगा.
वो मेरे सीने पर हाथ रख कर मेरी बगल में पड़ी थी, मैने उसको पुछा – ट्रिशा अब दर्द तो नही है..?
वो – नही ज़्यादा नही, थोड़ा सा फील हो रहा है, वैसे मज़ा बहुत आया, सच में मुझे नही पता था कि इसमें इतना मज़ा है, वरना मे अभी तक आपको नही छोड़ती.
मे – अच्छा अब इतनी डेरिंग आ गयी मेरी थानेदारनी में..?
वो थोडा चिढ़कर बोली – आप मुझे क्यों छेड़ते रहते हैं, ये थानेदारनी -2 बोल-2 कर, मे सिर्फ़ आपकी पत्नी हूँ बस.
मैने उसके होठों को चूमते हुए कहा – अरे मे तो बस ऐसे ही मज़ाक में बोल देता हूँ, अगर तुम्हें अच्छा नही लगता है तो अब आगे से नही कहूँगा..
सॉरी..!!
वो बोली – अरे..! प्लीज़ सॉरी नही, बस बार -2 सुनना अच्छा नही लगा सो बोल दिया, प्लीज़ आप माइंड मत करना..!
मुझे भी लगा की ज़्यादा मज़ाक हर किसी को असह्नीय हो सकता है, तो आज के बाद बंद…!
ऐसी ही बातें करते-2 हम एक दूसरे की बाहों में समाए हुए सो गये.
यूपी पूर्वांचल का एक छोटा सा शहर प्रीतम नगर, जहाँ के एक बाहुबली ठाकुर साब का एक तरह से इस शहर में एक छत्र राज था,
नाम था भानु प्रताप सिंग उर्फ भैया जी.
यहाँ की जनता आज़ादी के 45 साल के बाद भी इनको अपना राजा ही मानती थी, और जो नही मानता था, उससे इनके गुंडे मार-2 कर मनवा लेते थे.
आज़ाद हिन्दुस्तान की यहाँ पर कोई छाप अभी तक दिखाई नही पड़ती थी, वजह थी, हमेशा ही भैया जी विधायक का चुनाव जीत जाते थे,
अब्बल तो कोई इनके सामने खड़ा ही नही होता था, और अगर ग़लती से हो भी जाए तो किसी की हिम्मत नही कि इनके खिलाफ वोट दे सके.
इतने चालू भैया जी कि चुनाव तो निर्दलीय का ही लड़ते थे, लेकिन सरकार किसी भी पार्टी की हो, उसमें इनकी भागीदारी ज़रूर रहती थी.
8-10 एमएलए हमेशा इनकी जेब में रहते थे, तो जाहिर सी बात है कि, सरकार में इनका दबदबा भी रहता होगा.
यहाँ की शहर कोतवाली में नयी-2 भरती हुई लेडी एसपी ट्रिशा शुक्ला जो अब शादी के बाद ट्रिशा शर्मा हो चुकी थी.
अभी एसपी साहिबा को यहाँ आए हुए 2-3 महीने ही हुए थे, आइपीएस की ट्रैनिंग के बाद यहाँ इनकी पहली पोस्टिंग थी एसपी के तौर पर.
अभी उनका इंट्रोडक्षन भी ठीक से नही हो पाया था पूरे स्टाफ के साथ,
कोतवाली से शहर और उसके आस-पास के कई थाने लगते थे.
इस समय वो ऐसे ही एक थाने का विज़िट करने पहुँची थी,
एसपी साहिबा के आने से कुछ ही समय पहले ही उस थाने के एक सब इंस्पेक्टरर निर्मल कुमार जो 6 महीने पूर्व ही भरती हुआ था, और उसके साथ दो कॉन्स्टेबल एक गुंडे को पकड़ कर थाने लाए थे.
ये महोदय अपने दो मुस्टांडों के साथ बाज़ार में हफ़्ता बसूली कर रहे.
सब इंस्पेक्टरर के मना करने पर ऐंठ दिखाने लगे सो उठा लाए थाने.
जैसे ही इनके सरपरस्तो को खबर मिली, तो चले आए थाने दनदनाते हुए.
उससे ठीक दो मिनट पहले ही एसपी साहिबा विज़िट में पहुँची थी उसी थाने में, जो इस समय स्टाफ के साथ इंट्रोडक्षन कर रही थी.
ओये..! किस मादरचोद पोलीस वाले ने मेरे आदमी को पकड़ने की जुर्रत की है ? बुलाओ उसको मेरे सामने..!
जानता नही सूरज प्रताप सिंग के आदमी को हाथ लगाने का अंजाम क्या होता है..?
सब इंस्पेक्टरर निर्मल कुमार सामने आकर बोला- मैने पकड़ा है इसको, ये मार्केट में लोगों को धमका कर उनसे पैसे ले रहा था, एक-दो के साथ इसने मार-पीट भी की है.
आव ना देखा ताव की तडाक..! एक झन्नाटेदार चान्टा रसीद कर दिया उस सब इंस्पेक्टरर के गाल पर उसने, और बोला-
मैने कहा था उसको हफ़्ता बसूलने के लिए, तू कॉन होता है उसे रोकने वा..लाअ..?
सत्तकक.. ! अभी सूरज अपना वाक्य पूरा भी नही कर पाया था कि एक पोलीस की रोड उसके कूल्हे पर रसीद हो गयी,
मार इतनी पवारफ़ुल्ल थी कि सूरज महाराज खड़े नही रह पाए और बिल-बिला कर अपनी चोट वाली जगह पर हाथ रखते हुए बैठते चले गये.
तभी उसको लेडी एसपी की गुर्राहट सुनाई दी – यहाँ सरकार का राज चलता है, तेरे बाप का नही,
सरकार हमें क़ानून व्यवस्था ठीक रखने के पैसे देती है, तुम्हारे जैसे गुण्डों से मार खाने के लिए.
अपने दर्द पर काबू करके गुराते हुए बोला सूरज – ओ एसपी साहिबा, नयी -2 आई हो, पता नही तुम किससे पंगा ले बैठी हो, सूरज प्रताप नाम है मेरा, भैया जी का भतीजा हूँ मे.
एसपी – तो.. ! वैसे है कॉन ये भैया जी जो इतने गिरी हुए काम करता है.
कान खोल कर सुन्ले, तू भले ही कोई भी हो, पोलीस के काम में हस्तक्षेप कतयि बर्दास्त नही होगा समझे, अपनी खैर चाहता है तो निकल ले यहाँ से वरना ये डंडा देख रहा है.
इतने लगाउन्गी पिछवाड़े पर कि ठीक से बैठ भी नही सकेगा.
सूरज वहाँ से एसपी साहिबा को धमकाकर निकल गया, फिर एसपी ने सब इंस्पेक्टरर को शाबासी दी और उस गुंडे को किसी भी हालत में ना छोड़ने की हिदायत की.
तभी थाने का इंचार्ज यादव आगे आया और उसने उसे भैया जी के बारे में बताया, जिसे सुन कर वो कुछ देर सोच में पड़ गयी, लेकिन फिर कुछ निश्चय करके बोली-
देखो अगर भैया जी सरकार के नुमाइंदे हैं तो उनको भी समझना पड़ेगा कि पोलीस का काम क़ानून व्यवस्था सुधारना होता है,
अब अगर गुंडे उनके नाम की आड़ में ये सब करेंगे तो पोलीस का तो कोई काम ही नही रहेगा इलाक़े में.
तुम लोग चिंता मत करो और अपना काम क़ानून के मुताबिक करते रहो.
इंस्पेक्टरर यादव एसपी की बात से कुछ नाखुश दिख रहा था, लेकिन इस समय वो अपने सीनियर ऑफीसर से ज़्यादा कुछ आर्ग्युमेंट नही कर सकता था सो चुप हो गया.
उधर सूरज प्रताप भनभनाता हुआ थाने से निकला और अपने चाचा भानु को फोन कर दिया..! एक-दो बार तो बेल बजती रही लेकिन फोन नही उठाया गया,
इस समय भानु अपने सरपरस्त ** मिनिस्टर के पास बैठा एक 7स्टार होटेल में शराब की चुस्कियाँ ले रहा था.
फिर वो टाय्लेट का इशारा करके वहाँ से उठा और बाहर लॉबी में आकर उसने सूरज को कॉल बॅक किया.
जब सूरज ने नमक मिर्च मसाला लगा कर उसे सारी घटना बताई तो उसका घमंड फट पड़ा और उसने हुकुम दनदना दिया कि उठा ले साली को लेकिन मेरे आने तक कुछ करना मत उसके साथ.
उधर एसपी आवास पर इस समय ट्रिशा के मम्मी-पापा और उसकी छोटी बहन निशा भी आए हुए थे,
निशा इस समय लखनऊ से एमसीए का कोर्स कर रही थी, और अपने पेरेंट्स के साथ बड़ी बहन से मिलने के लिए आई हुई थी.
उनका छोटा बेटा सोनू, इस समय अपने बड़े भाई ऋषभ शुक्ला के पास रहकर इंजीनियरिंग कर रहा था, उसका ये फाइनल एअर था.
एसपी ट्रिशा अपनी ड्यूटी ऑफ करके घर पहुँचती है, आज की घटना और फिर भानु के रतवे का डर उसकी नयी-2 नौकरी पर हावी हो गया था, तो उसका असर उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था.
अनुभवी पिता आरके शुक्ला ने बेटी के चेहरे के तनाव को भाँप लिया.
सब लोगों ने मिल बैठ कर खाना खाया और थोड़ी बहुत देर इधर-उधर की बातें की और सब अपने-2 रूम में सोने चले गये.
कुछ देर के बाद आरके शुक्ला जी अपनी पत्नी को बोलकर बेटी के रूम में गये, जो इस समय हाथों में कोई फाइल लिए पलंग के बॅक से टेक लिए बैठी थी.
वो उसके पास जाकर बैठ गये और उसके सर पर हाथ फेर कर बोले- ट्रिशा बेटी लगता है आज तुम कुछ टेन्षन मे हो..!
ट्रिशा बोली – नही पापा ऐसी कोई बात नही है, आप सो जाओ मे ठीक हूँ.
पापा – देख बेटी में तेरा पिता हूँ.. भली भाँति समझ सकता हूँ अपने बच्चों की परेशानी को, बता बेटा क्या बात है, हो सकता है बात चीत से उसका कोई हल निकल आए.
फिर ट्रिशा ने आज के पूरे घटना क्रम को उन्हें बता दिया,
पहले तो वो सुन कर थोड़ा चिंतित हुए, फिर कुछ सोच कर बोले- बेटी तुम कल ही भैया जी से मीटिंग फिक्स करके उनको समझाओ कि पोलीस के साथ ऐसा व्यवहार उनकी छवि को ही धूमिल कर रहा है, हो सकता है कि वो समझ जाए.
इसी तरह की मंत्रणा बाप-बेटी के बीच कुछ देर होती रही,
अभी वो वहाँ से अपने रूम में जाने के लिए उठे ही थे कि, मेन गेट को तोड़ कर 15-20 गुंडे जैसे लोग धडधडा कर घर के अंदर घुस आए.
आते ही उन गुण्डों ने सबके साथ मार पीट शुरू करदी, माँ-बाप को घर में ही बंद करके, वो लोग उनकी दोनो बेटियों को उठा ले गये….!
……………………….
मे सुबह 4 बजे अपने नित्य कार्यों से निवृत होकर ध्यान क्रिया के लिए बैठा था,
मेरे पैर का प्लास्टर कट चुका था, बस थोड़ी मालिश करनी होती थी, वो भी अब ज़रूरत नही लग रही थी.
बार-2 कोशिश करने के बाद भी मेरा मन विचलित सा हो रहा था, ध्यान लगाने की काफ़ी कोशिश के बाद भी नही लग पा रहा था, मन मैं आजीव सी वैचैनि होने लगती.
आप लोगों ने अनुभव किया होगा, जब आपके दिल के कोई ज़यादा करीब होता है, और उसके साथ कोई प्रिय-अप्रिय घटना घटित हो, तो उसका प्रभाव जाने-अंजाने आपके मन मस्तिस्क पर अवश्य होता है.
साधारणतया, हम उस पर ज़्यादा मनन नही करते, लेकिन जब उसके बारे में ग्यात होता है, तब ज़रूर सोचते हैं, कि इसलिए उस समय हमें ऐसा भान हुआ था….
लेकिन अषधारण मनुश्य, उसकी गहराई को भाँप लेते हैं…
कुछ देर की कोशिश के बाद में ध्यान मुद्रा में चला गया, ध्यान की गहराई में पहुँचते ही, मेरी अन्तरआत्मा में हलचल शुरू हो गयी,
जिसे एक साधक अपने साक्षी भाव से देख-सुन सकता है.
मैने अपने साक्षी भाव को एकाग्र किया तो देखा, कि मेरी अंतरआत्मा भौतिक शरीर को छोड़कर वायुमंडल में विलुप्त होती जा रही है,
मेरा साक्षी भाव भी उसके साथ ही साथ है,
मेरे अंतरात्मा को क्षण मात्र में ही पता चल गया, कि ट्रिशा किसी मुसीबत में है, और वो उसकी खोज में उसके आवास पर पहुँच जाती है, लेकिन वो उसे वहाँ कहीं नज़र नही आती.
वो फिर से उसकी सूंघ लेते हुए, उसकी तलाश में भटकती हुई उस जगह पहुँचती है, जहाँ एक बड़े से हवेली नुमा मकान में एक अंधेरे कमरे में वो अपनी छोटी बेहन के साथ बँधी पड़ी थी.
मेरी अंतरात्मा विचलित हो उठती है, बिना भौतिक शरीर के वो कुछ भी नही कर सकती थी, सो अविलंब वो अपने भौतिक शरीर की तरफ लौटी.
जैसे ही वो अपने शरीर में वापस प्रवेश करती है, मेरा शरीर मारे उत्तेजना के काँपने लगता है और एक अनचाहे भय से मेरी आँखें खुल जाती हैं.
मेरा शरीर मारे उत्तेजना के इस समय थर-2 काँप रहा था, आवेश और उत्तेजना मेरे उपर बुरी तरह हाबी थी.
जैसे ही मेरे साक्षी भाव ने मेरी भौतिक चेतना को परिस्थिति से अवगत कराया, क्रोध के मारे मेरे मुँह से हुंकार सी निकल पड़ी और मे अविलंब अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ,
झट पट मैने अपना ज़रूरत का सामान पॅक किया और लखनऊ जाने वाली पहली ही फ्लाइट पकड़ ली जो एक चेंज ओवर थी विया देल्ही.
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भौ प्रताप पूरी रात *** मिनिस्टर के साथ अयाशी करने के बाद सुबह-2 अपनी गाड़ी से अपने घर को निकल पड़ा,
3-4 घंटे लगातार चलने के बाद वो जब घर पहुँचा तो सूरज ने उसे सारी बातें बता दी.
दो कमसिन जवानियों को अपने महल में होने के एहसास से ही उसके अंदर फिर से वासना के कीड़े कुलबुलाने लगे.
उसने चाइ नाश्ता किया और फिर अपने खास आदमियों को लेकर उस तरफ चल दिया जहाँ वो दोनो बहनें बँधी पड़ी थी,
सूरज को उसने बाहर ही रोक दिया जहाँ और लोग भी थे जो उस हॉल नुमा कमरे के बाहर खड़े पहरा दे रहे थे.
भानु की नज़र जैसे ही ट्रिशा और निशा पर पड़ी, उसकी आँखें चौड़ी हो गयी और उसके मुँह से लार टपकने लगी.
उसने अपने आदमियों को बोलकर उन दोनो को खड़ा करवाया और ट्रिशा को एक खंबे से बँधवा दिया,
निशा को वैसे ही खड़ा कर रखा था, दोनो बहनों के मुँह पर टेप चिपका रखा था.
भानु ट्रिशा के सामने आकर खड़ा हो गया, और उसकी आँखों में झाँकते हुए उसने उसके मुँह से टेप हटा दिया और बोला-
कहिए एसपी साहिबा, आपको कोई बोला नही का.., कि हियाँ हमार राज चलत है, पोलीस का नाही.
ट्रिशा बस उसको खा जाने वाली नज़रों से देखती रही…!
फिर वो निशा के पास गया और उसके गाल पर हाथ फेरते हुए बोला- वाह ! क्या गदर माल है ये छुकरिया, बहुत मज़ा देगी ये तो..!
निशा बस कश मसा कर रह गयी, उसकी आँखों से आँसू निकल रहे थे.
लेकिन ट्रिशा से नही रहा गया और वो गुर्रा कर बोली- भानु प्रताप अपने गंदे हाथों से मेरी बहन को मत छूना, वरना ये तेरे लिए ठीक नही होगा.
भानु – वाह मेरी चिरैया ! इस हालत में भी फडफडा रही है..! अब तू देखती जा, तेरी आँखों के सामने मे तेरी इस मस्त जवान बहन की इज़्ज़त की कैसे धज्जियाँ उड़ाता हूँ ?
ट्रिशा भभक्ते हुए स्वर में बोली – उसको हाथ भी मत लगाना हरामज़ादे, वरना में तेरा खून पी जाउन्गि.
भानु – अच्छा ! तू मेरा खून पी जाएगी, बताना ज़रा कैसे पिएगी, ले मैने हाथ तो लगा दिया इसको, और इतना बोलके उसने निशा का नाइट गाउन उसके सीने के उपर से फाड़ दिया,
अब उसके 34डी साइज़ के गोरे-2 बूब्स उसकी आँखों के सामने नुमाया हो गये जिन्हें देख कर उस शैतान की हवस उसकी आँखों में और बढ़ गयी..
उसके बदन की झलक देख कर ही उसकी लार टपकने लगी, और उसने उसके गालों को सहलाते हुए उसके हाथ नीचे की तरफ बढ़ने लगे…
इससे पहले कि वो उसके नग्न वक्षों तक पहुँचते, वातावरण गोलियों की आवाज़ से गड़गड़ा उठा,
धाय…धाय.. धाय…लगातार 6 गोलियाँ चली और उसके आस-पास खड़े उसके 6 गुंडे ज़मीन पर पड़े तड़प्ते नज़र आने लगे.
भानु भोचक्का सा खड़ा, ज़मीन पर पड़े अपने तड़पते हुए गुण्डों को देख रहा था,
अभी वो इस असमजस की स्थिति से उबर भी नही पाया था, कि उसके आदमियों को किसने उड़ा दिया ?
कि एक हथोडे जैसा घूँसा उसकी कनपटी पर पड़ा और वो चीख मारता हुआ 10-12 फुट दूर जाकर गिरा.
ट्रिशा मन ही मन बुदबुदाई.. आ गया हमारा रखवाला..!

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