Update 77
रिपोर्ट – हवा में कोई 10-12 फीट तक उपर उछल्ने के बाद अरुण का शरीर फिर से सागर के पानी में डूबता चला गया, हमारी बोट भी भीषण धमाके की वजह से समुद्र के पानी में आए भूचाल से बुरी तरह हिलने लगी,
एक बार को तो लगा कि उलट ही जाएगी, ढेर सारा पानी बोट में भर गया था.
हमारे 3-4 साथी भी बोट में इधर-उधर गिरने की वजह से चोटिल हो गये थे.
किसी तरह हमने बोट को संभाला, कुछ लोग उसका पानी निकालने में जुट गये.
हम बराबर अरुण को तलाशने के लिए जहाँ उसकी बॉडी पानी में गिरी थी उसके आस-पास बिनकलर से सर्च कर रहे थे,
कुछ देर तक वो हमें नज़र ही नही आया, किंतु कुछ देर के बाद वो हमें दिखाई दिया.
स्टीमर से उठी आग अरुण की तरफ से होती हुई हमारी ओर बढ़ रही थी, जल्द से जल्द हम अपनी बोट को उसके पास तक ले जाना चाहते थे,
वो भी हमें पानी के उपर तैरने की कोशिश करता दिखाई दिया तो हमें कुछ राहत मिली.
लेकिन वो हमारी रहट ज़्यादा देर नही रह पाई और हमने अरुण का बेहोश शरीर पानी में डूबता नज़र आया,
लाइट्स के फोकस उसी के उपर रख कर, हम उसके बेहद करीब पहुँच चुके थे, सो दो जनों ने पानी में छलान्ग लगा कर बेहोश अरुण को बाहर निकाला.
उधर आग लगभग हम तक पहुँच ही चुकी थी.
हमने झट-पट उसके शरीर को बोट में डाला, और दोनो साथियों को भी चढ़ा ही पाए थे कि आग हमारी बोट तक पहुँच गयी.
फ़ौरन बोट को वापस घुमाया और दौड़ा दिया.
आग को पीछे और पीछे छोड़ते हुए हम वहाँ से बच निकले.
लेकिन किनारे पहुँचने तक भी, अरुण के शरीर में कोई हरकत हमें नज़र नही आई.
मैने फोन करके एर आंब्युलेन्स के लिए रिक्वेस्ट की जो मिल गयी, हमारे किनारे पहुँचने से पहले ही वो हमारा वेट कर रहे थे.
इस तरह से हम चन्द मिनट में ही भुज के मिलिटरी हॉस्पिटल में थे, जहाँ अरुण को आइसीयू में रख दिया और उसका ट्रीटमेंट शुरू हो गया.
हमारे घायल साथियों को भी मेडिकल ट्रीटमेंट दे दिया गया, चूँकि वो ज़्यादा सीरीयस नही थे सो दो दिन में ही ठीक हो गये.
सुबह डॉक्टर ने रिपोर्ट दी कि अरुण के सारे लिगमेंट डॅमेज हो चुके हैं, एक टाँग फ्रॅक्चर्ड है,
पूरे शरीर को प्लास्टर कर दिया है, लेकिन वाकी और कोई सीरीयसनेस नही है, तो हम उसको अंडर मिलिटरी ट्रीटमेंट में छोड़ कर चले आए.
बत्रा की रिपोर्ट पढ़कर मे अभी उसके बाद की रिपोर्ट टाइप करके भेजने ही वाला था कि डोर बेल बजने लगी….
नर्स दूसरे रूम में थी तो उसने डोर खोला, सामने एक लेडी पोलीस ऑफीसर को देख कर वो चोंक गयी,
इधर नर्स को वहाँ देख कर वो लेडी ऑफीसर जो कोई और नही अरुण की पत्नी ट्रिशा शर्मा थी, बुरी तरह से चोन्कि, उसके मन में अंजानी आशंका पैदा होने लगी.
उसे लगा, कि कहीं में ज़्यादा क्रिटिकल कंडीशन में तो नही हूँ, ये सोच कर वो तेज़ी से अंदर को बढ़ी,
वो नर्स उसे रोकती ही रह गयी, लेकिन वो धड़ धड़ाती हुई अरुण के रूम में घुस गयी.
मे लॅपटॉप पर मैल कर रहा था, अभी सेंड का बटन क्लिक किया ही था कि भड़ाक से गेट ओपन हुआ और जैसे ही मेरी नज़र गेट पर पड़ी,
सामने ट्रिशा एसपी की ड्रेस में कमर पर हाथ रखे मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूर रही थी, गुस्सा उसके चेहरे पर सॉफ झलक रहा था.
मैने उसे देखते ही कहा – आइए एसपी साहिबा.. वेलकम होम…!
ट्रिशा गुस्से में बिफर्ति हुई बोली – आप अपने आपको समझते क्या हो हान्ं..?
15 दिन से ना कोई मेसेज, ना फोन कॉल, सोच-सोच के बुरा हाल हो रहा था मेरा. फोन भी स्विच ऑफ, करूँ तो क्या करूँ..?
मन में ना जाने कैसे-2 ख्याल आ रहे थे. मे आपकी पत्नी हूँ, मुझे तो बताना चाहिए था कि आख़िर जनाब जा कहाँ रहे हैं..?
मे – अरे मेरी अम्मा..! थोड़ा शांत हो जा..! आओ मे सब बताता हूँ.
ट्रिशा – अब क्या बताता हूँ..? और आप तो बोलके गये थे कि ऑफीस में कोई प्राब्लम है, उसे सॉल्व करना है, फिर ये दूसरे शहर में कैसे पहुँच गये ?
और वो आक्सिडेंट..?
मे – अब ये अपनी थानेदारी छोड़ कर मेरे पास आओगी या वहीं से सवाल जबाब करती रहोगी..?
पहले एक काम करो ये यूनिफॉर्म उतार कर फ्रेश होकर दूसरे कपड़े चेंज कर्लो फिर बात करते हैं ओके.
मे सच में आपसे बहुत नाराज़ हूँ, ये कहकर ट्रिशा पैर पटकती और भुन्भुनाति हुई बाथरूम में चली गयी, 10 मिनट बाद एक सारी पहन कर वो मेरे पास पलंग पर आकर बैठ गयी.
गुस्सा अभी भी उसके मुखमंडल पर ज्यों का त्यों विराजमान था, और उसी लहजे में वो बोली – हां अब बोलो क्या एक्सक्यूस हैं आपके..?
मैने लॅपटॉप में वो रिपोर्ट ओपन करके उसके सामने कर दी- लो ये पढ़ो तुम्हारे हर सवाल के जबाब इसमें मिल जाएँगे.
ट्रिशा ने रिपोर्ट पढ़ना शुरू किया, जैसे -2 वो रिपोर्ट पढ़ती जा रही थी, उसके चेहरे का तनाव कम होता जा रहा था,
लेकिन उसकी जगह घोर आश्चर्य के भाव दिखाई देने लगे, रिपोर्ट का लास्ट पार्ट पढ़ते-2 उसकी आँखों से आँसुओं की लड़ी बहने लगी,
रिपोर्ट ख़तम होते ही वो पागल लड़की मेरे सीने में लग कर फुट-2 कर रोने लगी.
दरवाजे पर खड़ी नर्स हमें देख कर कुछ समझी-कुछ ना समझी अवस्था में थी,
जैसे ही मेरी नज़र उस पर गयी तो मैने इशारे से उससे जाने को कहा, वो वहाँ से चली गयी.
ट्रिशा सुबक्ते हुए बोली – आख़िर कॉन हो आप, अरुण प्लीज़ अब तो सच बता दो, एक इंजिनियर को क्या पड़ी कि वो वहाँ जाके ऐसे काम करे..?
क्या मे इस लायक भी नही कि आपकी सच्चाई जान सकूँ..?
मे – तुम्हें याद है, जब तुमने मुझसे कमॅंडोस की ट्रैनिंग के बाद पुछा था, कि आपको इस जॉब के लिए ये ट्रैनिंग करने की क्या ज़रूरत है..!
ट्रिशा – हां पुछा था, और आपने बोला था कि समय आने पर सब बता दूँगा. तो क्या वो समय अभी भी नही आया है..?
मे – आ गया है मेरी जान..!
ट्रिशा – तो बताओ अपने बारे में.. सब कुछ..!
मे – बस ज़्यादा कुछ नही, मेरा एक ही सच है जो तुम्हें नही पता और वो ये कि मे एनएसएसआइ का अंडर कवर एजेंट 928 हूँ.
ट्रिशा मेरी सच्चाई सुनकर बुरी तरह उछल पड़ी – क्या..? क्या सच में..?
मे – हां ! ये बिल्कुल सच है, और चूँकि तुम भी एक आइपीएस ऑफीसर हो तो तुम पर इतना ट्रस्ट तो कर ही सकता हूँ कि ये सच्चाई अब सिर्फ़ हम दोनो तक ही सीमित रहेगी.
भूल से भी किसी और को पता नही होना चाहिए कि मे कॉन हूँ.. यहाँ तक कि हमारे होने वाले बच्चों को भी.
बच्चों का नाम सुन कर वो शरमा गयी और मुझे और जोरे से कस्ति हुई बोली – ओह्ह अरुण… मेरे स्वामी…. आप सचमुच महान हो..!
मे वादा करती हूँ, मेरी ज़ुबान कट भले ही जाए लेकिन किसी के सामने खुलेगी नही. आप तो मेरे पति हैं, ऐसे राज़ तो दूसरों के भी नही बताए जाते.
मेरे घरवाले यहाँ तक कि ऋषभ भैया भी मुझे क्या-2 बोलकर चिढ़ाते थे कि कैसी पागल है ये लड़की,
एक आइपीएस होकर इंजिनियर के प्यार में पड़ गयी. लेकिन उन्हें क्या पता की मेरा पति मेरा ही नही इस पूरे देश का रखवाला है,
ये कहकर उसने मेरे पूरे चेहरे को चुंबनों से भर दिया.
मैने आगे कहा – जानती हो ! ये मेरा तीसरा मिसन था.
वो एकदम चोन्क्ते हुए बोली – क्या..? दो और कोन्से थे..? फिर मैने उसको अलीगढ़ के और ज़फ़रुल्ला वाले मिसन के बारे में भी बताया.
वो – आप एक सच्चे देश भक्त हो, हमारी पोलीस तो किसी काम की नही होती, बस नेताओं के तलवे चाटते रहो और अपनी नौकरी करते रहो, पैसा कमाते रहो बस.
फिर कुछ देर वो यौंही मेरे कंधे से लगी बात करती रही, कभी-2 मेरे सीने को चूम लेती.
मेरे हाथ उसकी पीठ को सहला रहे थे, जो धीरे-2 नीचे की ओर चले गये और फिर उसके गोल-गोल कसे हुए कुल्हों को सहलाने लगे,
मुझे कुछ शरारत करने की सूझी और मैने अपनी एक उंगली उसकी गान्ड की दरार में डाल दी.
वो चिंहूक कर मेरे सीने से अलग हो गयी और गहरी नज़रों से देखती हुई बोली – उउन्न्हुउ..! ये अभी नही.. पहले आप एकदम से ठीक हो जाओ फिर..!
मे – अरे यार ! वो प्लास्टर तो घुटने से नीचे ही तो है, वाकी सब समान तो फिट है ना..!
ट्रिशा – नही..बिल्कुल नही..! अभी ऐसा कुछ भी करने की पेर्मिशन नही है आपको.
मे – क्या मुशिबत है यार ! ये साली थानेदारनी ही लिखी थी मेरे भाग्य में.
शादी को 17-18 दिन हो गये, और अभी तक साला ना तो हनी का पता हैं और ना मून का.
ट्रिशा मेरी बात सुन कर खिल-खिला कर फिर से गले से लिपट गयी, मैने अपनी उंगली उसके लिप्स पर घुमाते हुए कहा- ड्राइ सेक्स तो कर सकते हैं ना..! कि उसकी भी परमिशन लेनी पड़ेगी.
वो कुछ सोच कर बोली – ठीक रात को, अभी नही ओके, अब में घर को थोड़ा ठीक करके, खाने-वाने का देखती हूँ.
जब वो बाहर चली गयी तो नर्स मेरे कमरे में आई और बोली- सर ! ये पोलीस ऑफीसर कॉन हैं..?
मे – अरे सिस्टर ये मेरी पत्नी है.. ट्रिशा शर्मा, आइपीएस. वो ओह्ह्ह.. करके चली गयी.
ट्रिशा घर को व्यवस्थित करने में लग गयी, 3 डिन्नर किसी अच्छे से होटेल से ऑर्डर करके मॅंगा लिए जो हम तीनो ने एक साथ बैठ कर खाए.
इस बीच नर्स ने पुछा कि मेडम अब अगर आप यहाँ हैं तो में थोड़ा अपने घर जाउ,
मैने उसे मना कर दिया कि नही, मेडम दो दिन बाद चली जाएँगी अपनी ड्यूटी पर, तब तक के लिए अगर जाना चाहो तो जा सकती हो.
खाना खाकर नर्स अपने घर चली गयी, उसने रिक्वेस्ट की थी कि उसके घर जाने की बात हम उसके ऑफीस में ना बताएँ, जो हमने आक्सेप्ट कर ली.
खाना खा कर हम दोनो पति-पत्नी अपने बिस्तर पर आ गये और एक दूसरे की भूली-बिसरी बातों में लग गये.
बातों-2 में मैने उसके साथ छेड़ छाड शुरू कर दी, तो वो भी गरम होने लगी, और देखते-2 हम दोनो अपने अंतर वस्त्रों में आ गये…!
मेरी हरकतों से ट्रिशा इतनी ज़्यादा गरम हो चुकी थी कि, वो ये भी भूल गयी कि उसने दो घंटे पहले क्या प्रॉमिस लिया था मुझसे.
अब वो किसी भी तरह से अपनी वर्जिनिटी खोना ही चाहती थी आज की रात, आज एक पूर्ण औरत होने की जैसे ठान ली थी उसने…..!!
ट्रिशा ने मेरे आख़िरी वस्त्र को भी निकाल फेंका, और खुद भी मात्र पेंटी में आ गयी, वो अपने हाथों से मेरे मूसल महाराज को बड़े प्यार से सहला रही थी, बीच-बीच में वो उसे चूम भी लेती थी.
मेरी आँखें आनंदतिरेक में बंद हो चुकी थी, मेरा लंड फटने तक की कगार पर पहुँच चुका था.
नीली – 2 नसें 1 सेमी तक की मोटाई में उभर आईं थी, वो इतना सख़्त हो चुका था, कि ट्रिशा अपने हाथ से उसे दबा भी नही पा रही थी…
मैने ट्रिशा की गान्ड को पकड़ कर अपने मुँह की तरफ घुमाया और उसकी पेंटी निकाल कर अपने मुँह के उपर बिठा लिया, अब हम दोनो 69 की पोज़िशन में थे,
उसकी जीभ मेरे लंड के गोल-2 लाल सुपाडे से खेल रही थी और में उसकी परी को अपनी जीभ से चाट रहा था.
मुझसे अब सब्र करना मुश्किल होता जा रहा था, और शायद वो भी अब अपने को रोक नही पा रही थी.
मैने कहा – डार्लिंग..! एक बार तुम कोशिश करो तो मेरे उपर बैठ कर..! शायद मैने उसके मन की बात कह दी थी..
वो तुरंत पलट गयी और अपनी परी को मेरे मूसल पर रख कर रगड़ने लगी, दोनो के ही पार्ट चिकने होकर स्लिपैरी हो गये थे.
मैने उसकी जांघों के उपर से अपने दोनो हाथ लेजा कर उसकी परी के होंठों को खोल कर बोला-
जान तुम मेरा लंड पकड़ के सेट तो करो अपने छेद पर,
उसने वैसा ही किया और जब डाइरेक्षन मॅच हो गया तो उसको धीरे से बैठने को कहा.
जैसे ही उसने अपनी गान्ड को नीचे की तरफ मूव किया, उसके हलक से एक चीख नियकल पड़ी..और वो हाँफती सी बोली- नही अरुण ये मुझसे नही होगा, ऐसा लगा जैसे मेरी जान ही निकल गयी हो.
प्लीज़ मे नही कर पाउन्गि ये.
मेरे हाथ उसके दोनो कुल्हों पर ही जमे थे मुझे पता था कि जैसे ही उसे दर्द होगा वो उठ जाएगी, सो मैने उसे उसी पोज़िशन में दबाए रखा.
इस समय मेरा सुपाडा पूरी तरह पोज़िशन में था और उसकी परी की सील की झिल्ली पर टिका हुआ था.
मैने उसको समझाया, देखो डार्लिंग ! ये सब तो हर लड़की को झेलना पड़ता है फर्स्ट टाइम, अब ऐसे तो तुम जिंदगी भर नही रहोगी ना, तो फिर आज ही क्यों नही.
उसको कुछ मेरी बात जमी, और वो मेरे साथ स्मूच करने लगी, मे उसकी गान्ड को सहलाता रहा,
जब उसको कुछ राहत महसूस हुई, तो मैने उसे फिर एक बार और कोशिश करने का इशारा किया, उसने थोड़ा सा पुश किया, साथ ही मैने उसके कुल्हों को थोड़ा ज़्यादा दबा दिया.
नतीजा मेरा आधे से ज़्यादा लंड उसकी सील को तोड़ता हुआ उसकी लाल परी के अंदर समा गया.
वो बुरी तरह छ्ट-पाटने लगी, उसकी आँखों से पानी निकलने लगा, और वो मेरे हाथों को अपने कुल्हों से हटाने की भरपूर कोशिश में लग गयी.
मैने उसे एनकरेज करते हुए कहा – बस मेरी जान, मैं दरवाजा तो टूट चुका है, सिपाही को अंदर जाने का रास्ता मिल चुका है,
और थोड़ी सी कोशिश करनी है बस, फिर फ़तह ही फ़तह..अब थोड़ा सा और.. प्लीज़…
वो कराहते हुए बोली – आह…जानू ! दर्द के मारे जैसे मेरी कमर फटी ही जा रही है, प्लीज़ थोड़ा सा निकालने दो ना..… फिर से कर लेंगे..!
मैने थोड़ा डाँटते हुए कहा – पागल मत बनो ट्रिशा, जो अभी तक मेहनत की है तुमने, वो सब बेकार हो जाएगी.. प्लीज़ मुझे स्मूच करो और अपना ध्यान सेक्स में लगाओ..
वो फिर से मुझे चूमने चाटने लगी में भी उसको उत्तेजित करने की कोशिश कर रहा था,
मे अपनी एक उंगली से उसकी गान्ड के छेद को कुरेदने लगा, जिससे उसकी परी की अन्द्रुनि दीवारों में सुरसूराहट होने लगी और धीरे-2 उसकी कमर हिलने लगी.
अब कुछ कम हुआ दर्द.. मैने उसे पुछा तो वो हमम्म.. करके बोली,
तो अब धीरे–2 इससे अंदर बाहर करो… आप लोग सोच रहे होंगे कि पहली बार शायद किसी लड़की ने खुद उपर चढ़ कर अपनी वर्जिनिटी खोई हो ये संभव नही,
पर यहाँ ट्रिशा की मजबूरी थी. वो अब रुक भी नही सकती थी सो धीरे-2 अपनी कमर को उपर नीचे करने लगी.
अब उसे इसमें थोड़ा – 2 मज़ा आने लगा था, मे भी अब उसकी गान्ड से हाथ हटा कर उसकी चुचियों को मसल्ने लगा उसके निप्प्लो को सहलाने लगा, जिससे उसका मज़ा और बढ़ गया.
अब उसके मुँह से आनंद की किल्कारी फुट रही थी, मुझे लगा कि अब वो झड़ने वाली है, तभी मैने उसके कुल्हों पर हाथ रख कर सहलाया और उसको उत्तेजित करने के लिए बोला-
यस डार्लिंग.. ऐसे ही मेरी रानी.. शाबास और ज़ोर से…यस, और साथ ही उसकी गान्ड को अपने हाथों में कसकर, पूरी ताक़त से नीचे को दबा दिया.
मज़े की वजह से ट्रिशा इस झटके को नज़र अंदाज कर गयी और एक हल्की सी दर्द भरी चीख के साथ वो झड़ने लगी,
लेकिन तब तक मेरा खूँटा पूरी तरह उसकी सन्करि सी गुफा में फिट हो चुका था.
वो कुछ देर यौही पड़ी हफ्ती रही और मेरे सीने से लग कर सुस्ताने लगी.
मेरा मूसल उसकी परी के अंदर फूल-पिचक रहा था, बड़ी बैचैनि मे था आज वो बेचारा,
क्योंकि आज की कमॅंड उसके मालिक के हाथ में नही थी तो मजबूरी थी.
मैने कहा – डार्लिंग मेरा बाबू परेशान है अंदर उसको थोड़ा खुराक तो दो, तो वो मेरी ओर देख कर एक दर्द भरी मुस्कान के साथ बोली- अब क्या करूँ..?
मे – अब फिर से धीरे-2 कमर चलो, तो उसने बहुत ही धीरे से अपनी कमर को उपर किया, उसे फिर से दर्द का आभास हुआ और उसके मुँह से एक कराह निकल गयी,
लेकिन अब उसे अपने साथी को भी तो खुस करना था, सो बेचारी फिर से उसको दबाने लगी.
उसकी कोशिश रंग लाई और कुछ ही प्रयासों में उसका दर्द कम होता गया और वो आनंद में परिवर्तित होने लगा.
अब उसके धक्कों में थोड़ी गति आती जा रही थी, लेकिन इतनी नही जैसी मूसल महाराज को चाहिए थी,
सो अब उसकी कमान मैने अपने हाथ में लेने का निर्णय लिया, मैने अपनी प्लास्टर वाली टाँग को सीधा रखते हुए, ट्रिशा को अपने नीचे ले लिया,
उस टूटी टाँग को ट्रिशा की जाँघ के उपर सीधा किया, और उसकी दूसरी टाँग को उपर उठाकर उसकी फ्रेश सील टूटी मुनिया में अपना लंड पेल दिया…
एक बार वो फिर बुरी तरह कराह उठी, लेकिन अब समय नही था, उसके उपर ध्यान देने का…
सो उसके होठ चूस्ते हुए, मैने अपनी कमर चलाना शुरू कर दिया…
एक हाथ से उसकी चुचियों को मसल्ते हुए मेरे धक्कों की रफ़्तार में निरंतर तेज़ी आती जा रही थी…
मेरी तूफ़ानी चुदाई से ट्रिशा का मुँह खुला का खुला रह गया… लेकिन कुछ पलों बाद ही, वो भी पूरी तरह से सहयोग करने लगी.
इतनी स्पीड के धक्कों को ट्रिशा की लाल परी नही झेल पाई और वो फिर से आँसू बहाने लगी,
उसके झड़ने से लंड और मस्ती से अंदर बाहर होने लगा, और कुच्छ ही पलों बाद मैने भी अपना फब्बरा उसकी नयी-2 फटी चूत में छोड़ दिया,
पहली बार उसकी परी मर्दाने वीर्य का रसास्वादन करने से आनंदतिरेक में फिर से पानी छोड़ने लगी और पूरी तरह शांत हो गयी.
मैने फिर से नीचे लेट कर उसे अपने उपर लिटा कर चिपका लिया,

