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Update 143

रहीम चाचा से बात करने के बाद अब वो कुछ आश्वस्त दिखाई देने लगी और मेरे हाथों को चूम कर शुक्रिया कहा.

मैने उसकी थोड़ी के नीचे अपना हाथ रखकर पुछा – तुम्हें मेरे साथ आकर कोई अफ़सोस तो नही हो रहा शाकीना..?

उसने ना में अपनी गर्दन हिलाई और मेरे बदन से लिपट गयी.., मेरे सीने के बालों को सहलाते हुए बोली-

मैने तो बहुत पहले अपनी किस्मत आपके नाम लिख दी है, तो अब अफ़सोस कैसा..आप जो करेंगे मुझे मजूर होगा…

उसके ये लफ़्ज सुनकर मैने उसे अपने सीने में भींच लिया और उसके लज़्ज़त भरे लवो को चूमकर बोला-

ओह्ह..शाकीना..मेरी जान, तुम सच में कितनी मासूम हो, आँख बंद करके मुझ पर भरोसा करती रही, और मे कितना मजबूर था, कि तुम्हें अपनी हक़ीकत से रूबरू ना करा सका…

हो सके तो मुझे मुआफ़ कर देना मेरी जान…

उसने भी मेरे इर्द गिर्द अपनी बाहों का घेरा कस दिया और मेरे सीने में मुँह छिपाकर बोली –

मैने आपसे सच्ची मुहब्बत की है मेरे सरताज, आपकी सच्चाई क्या है, इससे मुझे कोई सरोकार नही…

अभी हम कुछ और आगे बोलते कि तभी किसी के आने की आहट सुन कर वो मुझसे अलग हो गयी.

बीएसएफ का एक जवान हमारे लिए ब्रेकफास्ट लेकर आया था, उससे ब्रेकफास्ट लेकर मैने उसके चीफ के बारे में पुछा तो उसने बताया कि वो अपने ऑफीस में ही हैं,

आप लोग नाश्ता करके वहीं आ जाओ, वो आपका ही इंतजार कर रहे हैं.

हम दोनो ने मिलकर नाश्ता किया, अब शरीर में गर्माहट आ चुकी थी,

शाकीना भी अब नॉर्मल दिखाई दे रही थी, ड्रग्स का असर काफ़ी हद तक कम हो गया था.

नाश्ता ख़तम करके मैने उसे वहीं थोड़ा रेस्ट लेने को बोला और मे कमॅंडेंट से मिलने उसके ऑफीस की तरफ बढ़ गया.

करीब एक घंटे बाद हम बीएसएफ की जीप में श्रीनगर एर पोर्ट की तरफ जा रहे थे.

शहर पहुँचकर मैने एटीएम से कुछ पैसे निकाले,

एक शॉपिंग सेंटर के बाहर गाड़ी रोक कर दोनो के लिए कुछ कपड़े खरीदे और वहीं ट्राइयल रूम में जा कर चेंज किए.

श्रीनगर से देल्ही की फ्लाइट ली और उड़ चले अपने देश की राजधानी को…

देल्ही पहुँचकर एरपोर्ट के पास ही एक होटेल में शाकीना को छोड़ा, कुछ मेडिसिन्स ली जो उसके ज़ख़्मों पर लगानी थी और कुछ एंटी-ड्रग्स उसको दिए.

एक बार शाकीना के कपड़े निकाल कर पूरे शरीर पर बने खरोंचों पर लेप लगाया, इस दौरान हम दोनो ही एक्शिटेड हो गये,

ड्रग का असर अभी कुछ वाकी था, जिसके असर से वो सेक्स के लिए उतावली सी दिखने लगी, और मेरे शरीर से लिपट गयी…

लेकिन मैने अपने आप पर कंट्रोल रखते हुए कहा – शाकीना मेरी जान अभी तुम आराम करो, ये समय इस काम के लिए सही नही है,

वो तड़प्ते हुए बोली – क्यों अभी समय क्यों सही नही है, अशफ़ाक़ प्लीज़ मुझे अपने आगोश में समेट लो,

मैने उसके होठों को चूमते हुए कहा – अभी तुम तक़लीफ़ में हो, पहले अपने बदन के घावों को सही कर्लो, ठीक है…

मेरी बात सुनकर वो एकदम मायूस हो गयी, उसने मुझे अपने बंधन से आज़ाद कर दिया… और उसकी आँखें छल-छला गयी..

फिर रुँधे स्वर में बोली – मे समझ सकती हूँ अशफ़ाक़, अब मे आपके काबिल नही रही, मेरे बदन को उस नामुराद ने गंदा जो कर दिया है…

उसकी बात सुनकर मे तड़प उठा, मैने उसके बदन की खरोंचों की परवाह ना करते हुए उसे अपने आगोश में कस लिया और उसकी दबदबाई हुई आँखों में झाँकते हुए कहा….

ये तुम क्या कह रही हो मेरी जान, क्या तुम ये समझ रही हो कि उस हरामी ने धोके और फरेब से तुम्हें मजबूर कर दिया तो तुम मेरे लिए नापाक हो गयी..?

भले ही मैने तुम्हें अपने साथ निकाह करने से रोका हो, लेकिन सच्चे दिल से मुहब्बत की है मैने तुम्हें…!

तुम मेरे दिल का वो हिस्सा हो शाकीना, जिसमें हर किसी को जगह नही दी जाती..

मैने तुम्हें दिल से चाहा है मेरी जान, शरीर से नही…

आइन्दा ऐसे शब्द अपने मुँह से निकाले भी ना, तो तुम मेरा मरा हुआ मुँह देखो…गी….

मेरे शब्दों को पूरा भी नही करने दिया उसने, अपने लरजते लव मेरे होठों पर रख दिए, और फिर दीवानवार वो मुझे चूमती चली गयी…

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