Update 117
मैने उन लड़कियों को अपने पास आने का इशारा किया तो वो सब बेखौफ़ हमारे पास चली आईं, क्योंकि उन्हें यकीन हो गया था, कि हम उनको बचाने वाले मसीहा हैं और हमसे उन्हें कोई ख़तरा नही होने वाला.
जैसे ही वो पाँचों मादरजात नंगे हुए मैने अपना खजर निकाल कर एक लड़की की तरफ बढ़ाया और उसको उनमें से एक का लिंग काटने को कहा.
वो लड़की डर कर पीछे हट गयी,
शाकीना ने आगे बढ़ कर अपना खंजर निकाला और एक आदमी का लिंग हाथ से पकड़ कर उड़ा दिया.
वो बुरी तरह चीख मार कर ज़मीन पर तड़पने लगा.
मे – क्यों हरामज़ादे, पता चला दर्द किसे कहते हैं..? दूसरों को दर्द बाँटते-2 ये भूल गये कि यही दर्द तुम्हें भी झेलना पड़ सकता है.
फिर शाकीना घायल शेरनी की तरह बिफर कर उन लड़कियों पर गुर्राई.
अपने डर को कब तक अपने अंदर पनाह देती रहोगी तुम लोग..?
सोच लो कि तुम भी किसी से कम नही हो, निकाल फेंको अपने अंदर के डर को, ये लो खंजर और उड़ा दो इन हरामज़ादों के अंगों को जो तुम्हें खराब करने का मंसूबा पाले बैठे थे.
शाकीना की बात का उनपर तुरंत असर हुआ और उनमें से दो लड़कियाँ आगे आई, और उन्होने मेरा और शाकीना का खंजर ले लिया.
जिस तरह से शाकीना ने उसका लिंग काटा था, ठीक उसी तरह उन्होने भी उनमें से दो के लिंग काट डाले.
वो भी चीखते हुए तड़पने लगे.
फिर तो उन सभी लड़कियों में हिम्मत आ गयी और उनमें लिंग काटने की जैसे होड़ सी लग गयी.
उन तीनो के ही नही, जो मर चुके थे उनके भी लिंग उन लड़कियों ने काट डाले.
ये एक मेसेज था उन दरिंदों और उनको पनाह देने वाले नामर्दों के लिए, की औरतों पर अत्याचार का जबाब ऐसे भी दिया जाएगा.
फिर बचे-खुचे आतंकियों को भी शूट करके हमने उन लड़कियों को उनके घर भेज दिया, ज़्यादा दूर नही लाए थे वो लोग सो वो सब पैदल ही निकल पड़ी.
उनके चले जाने के बाद हमने उनके सारे हथियार जीप में डाले और उसकी नंबर प्लेट खरोंच कर ऐसी कर दी जो सीधे तौर पर नंबर पढ़े ना जा सकें.
तीनों बाइक भी हमने जीप में डाली और उसको ले कर चल दिए अपने घर की तरफ….!
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एसीपी ट्रिशा शर्मा : उनके पति को गये हुए 1 साल से भी ज़्यादा वक़्त हो चुका था, तबसे वो ऑफीस और घर दोनो को अच्छे से संभाल रही थी.
नीरा ने इसमें उनका भरपूर साथ दिया था, वो भी अब एक बेटे की माँ बन चुकी थी.
दोनो बच्चे अब बड़े हो रहे थे, और स्कूल जाने लगे थे, पढ़ने में दोनो ही एक से बढ़ कर एक निकले.
जिस बच्चे को भ्रूण में ही ख़तम करने की सलाह दी जा रही थी, वो तो अपनी क्लास में हर बार टॉप पर आता था जो अब तक केजी और 1स्ट स्ट्ड. को पार कर चुका था, बड़ा 3र्ड में आ गया था.
भाग्यवश राज्य की बागडोर एक ऐसे जुझारू और कर्मठ लीडर के हाथों में थी जिसने कुछ ही समय में अपने राज्य को देश के सरबोच्च स्थान पर ला खड़ा किया था.
उनके राज्य का नाम देश में ही नही वरण विश्व में उँचा हुआ था.
ज़्यादातर विदेशी कंपनियाँ उनके राज्य में निवेश करने को तत्पर दिखाई देती.
लॉ & ऑर्डर की व्यवस्था अन्य राज्यों की तुलना में देश भर में टॉप पर थी, इनफ्रस्ट्रक्चर के मामले में ये राज्य सबको पीछे छोड़ चुका था,
यही वजह थी कि सभी देसी वीदेसी कोम्पनियाँ यहाँ निवेश करना चाहती थी.
ऐसा नही था कि आतंकवादियों के निशाने पर ये राज्य नही था, बड़ी-2 आतंकी वारदातें हो चुकी थी, बावजूद इसके अब उनके पैर इस राज्य में जम नही पा रहे थे.
कारण था पोलीस और प्रशासन का चौन्कन्ना रहना.
दुश्मन मुल्क की ज़्यादातर समुद्रि सीमा इसी राज्य से लगी थी, फिर भी वो कई बार की नाकाम कोशिशों के बाद भी घुस नही सके, कई को तो अंजाम तक पहुँचा दिया था.
समय तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, कभी-2 अरुण की तरफ से ही फोन आता था जिससे पति-पत्नी अपने दिलों को तसल्ली दे लेते थे, बच्चों को तो पता भी नही था, कि उनके प्यारे पापा हैं भी या नही.
जब दूसरे बच्चों के मम्मी-दादी को एक साथ देखते थे, तो पुछ लेते अपने पापा के बारे में,
ट्रिशा कोई ना कोई बहाना बना कर उन्हें चुप करा देती, लेकिन अपने खुद के अंतर्मन को चुप करना उसे कभी-2 असहनीय हो जाता था.
लेकिन वो भी तो एक सुपर कॉप थी देश की, जो अपनी मजबूरियों को भली भाँति समझती थी.
कोई और आम महिला होती तो शायद अब तक टूट कर बिखर चुकी होती या फिर कुछ ऐसा कर बैठती जो एक सभी महिला को नही करना चाहिए.
ऐसा नही था कि लोगों की गंदी नज़र से वो अछुति थी, गाहे बगाहे उसके आस-पास के लोग कॉमेंट पास करते रहते,
लेकिन वो उन्हें अनदेखा कर जाती. पद का रुतवा उसको इन सबमें काफ़ी मददगार साबित होता था.
उधर मे (अरुण) ने दुश्मन मुल्क में पीओके के अंदर आतंकवादियों और फ़ौजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ रखी थी,
कितने ही आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुँचा चुका था, कितने ही फ़ौजी हलाक हो चुके थे उसके और उसके साथियों द्वारा.
धीरे-धीरे अब मैने अपनी एक पूरी 25 लोगों की टीम खड़ी कर दी थी, जो मेरे एक इशारे पर मर खपने को तैयार थे,
कुछ छोटी टेंपो टाइप गाड़ियाँ और हथियार जो हमने फ़ौजियों और आतंकवादियों को मार कर लूटे थे.
ये सब वही लोग थे जो फ़ौजी हुकूमत और दहशतगर्दों के सताए हुए थे.
पाकिस्तान की फ़ौजी हुकूमत पूरा ज़ोर लगाने पर भी इनका कोई सुराग नही निकाल पाई थी,
गोरिल्ला नीति के तहत ये दुश्मन पर टूट पड़ते और उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचा कर ही दम लेते.
चूँकि हमारे हमले अपने ठिकाने से कोसों दूर ही होते थे, जिस कारण से किसी को गुमान ही नही होता कि वारदातों के पीछे हम लोग भी हो सकते हैं,
और वैसे भी हमारे आस-पास के इलाक़े के लोग आँख बंद करके हमारा साथ देते थे.
बॅक-अप के तौर पर अब हमने अपना एक ठिकाना इस्लामाबाद में भी खड़ा कर लिया था, जिसमें भारत के राजदूत की मदद ली गयी थी जगह और इनफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में.
ज़रूरत पड़ने पर हम रातों रात वहाँ शिफ्ट हो सकते थे. जिसकी भनक मेरे अलावा और किसी को नही थी.
लेकिन ये भी सही है कि हर घर में एक विभीषण ज़रूर होता है…!

