मैने रेहाना की ओर मुस्कराते हुए देखा, वो उस लड़की से बोली, क्यों तुम्हारे चार हाथ पैर नही हैं क्या..?
दूसरी लड़की – क्या सच में हम भी लड़ना सीख सकते हैं..?
रेहाना – बिल्कुल ! चाहो तो एक नमूना देख लो, और फिर वो उन दोनो लड़कों से बोली- आ जाओ तुम दोनो एक साथ मुझ पर हमला करो..!
वो दोनो आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगे..! वो फिर बोली- आ जाओ डरो मत और हां अपनी पूरी ताक़त से हमला करना…!
फिर उन तीनों में एक रिहर्सल जैसा हुआ, वो दोनो लड़के अपने पूरे दम खाँ से रेहाना पर टूट पड़े,
वो दोनो जितने हाथ-पैर चला सकते थे चलाने लगे,
लेकिन उस चालाक लोमड़ी ने उन दोनो को 5 मिनट में ही धूल चटा दी, वो दोनो लड़कियाँ अपने दाँतों में उंगली दबा कर हैरानी से उसे देखती रह गयी.
फिर मैने उन चारों का नाम पुछा – पहले लड़के का नाम अकरम था और दूसरे का परवेज़, लड़की एक आईशा थी और दूसरी जाहिरा.
मैने उनसे कहा – कल से आ जाना तुम लोगों को भी लड़ना सिखा देंगे. लेकिन ये बात और किसी को मत बताना, ये भी नही कि तुम लोग बचके कैसे आ गये.
अकरम बोला- अगर लोग पुछेन्गे तो हम उन्हें क्या जबाब देंगे..?
मे – उनको बोल देना कि जंगल में दो नकाबपोश आ गये और उन्होने हमें बचा लिया.
जब वो चारों चले गये, उसके बाद मैने रहमत को जीप लेकर अपने साथ चलने को कहा और खुद बाइक लेकर किसी उँची सी पहाड़ी की तरफ निकल पड़े.
उस जीप को एक उँची सी पहाड़ी से हज़ारों फीट गहरी खाई में धक्का दे दिया और बाइक से वापस घर आ गये.
लेकिन ये दूसरा केस था जो कि जीप खाई से नीचे कुदाइ थी, पहली वाली में तो उसके साथ डेड बॉडी भी थी, लेकिन ये मामला एक तो फ़ौजियों का था, दूसरा जीप खाली खाई में गिरी थी.
फौज इस मामले में चुप तो नही बैठेगी, खैर अभी तक कोई सुराग तो नही छोड़ा था मैने, बस एक ही पॉइंट ऐसा था जिससे फौज की जाँच इस इलाक़े तक भी आ सकती थी,
अगर उन्हें ऐसी कोई वारदात यहाँ के बाज़ार में हुई थी ये पता चल गया तो.
मे बस इन्ही बातों को सोच रहा था कि रहमत मेरे पास आकर बैठ गया और मुझे सोच में डूबा हुआ देख कर बोला – क्या बात है भाई जान.. किस सोच में डूबे हो..?
मे – कुछ नही, बस ये सोच रहा था कि ख़तरा किस ओर से हमारी तरफ आ सकता है, हालाँकि अभी तक कोई ऐसा सुराग तो हमने छोड़ा नही है जिससे फौज की जाँच हम तक पहुँच सके.
रहमत – हां ! जब तक फौज को ये पता ना चले कि यहाँ कोई वारदात हुई है या नही, अगर ये पता चल गया, तो वो लोगों को डरा धमका कर ये पता ज़रूर लगा लेंगे कि यहाँ क्या हुआ था.
मे – और फिर उन्हें ये पता लगाने में भी देर नही लगेगी कि उन्होने किन-किन लोगों को उठाया था.
हमने जो बहाना लोगों को बहकाने के लिए उन चारों को बताया है उस पर फौज कभी यकीन नही करेगी.
रहमत – और अगर उन्होने उन्हें टॉर्छेर किया तो लड़के शायद झेल भी जायें, लेकिन लड़कियाँ टूट सकती हैं और फिर हम सब लोगों के लिए बचना मुश्किल होगा.
मे – तो अब क्या किया जाए..? और कोई रास्ता है बचने का..?
रहमत – यहाँ रहते हुए तो नही लगता….
मे – चलो देखते हैं, जो होगा सो अल्लाह मालिक, फिलहाल इतना जल्दी तो कोई आने वाला नही है इधर.
रहमत – वो फ़ौजियों की लाशें रास्ता बता देंगी इधर का..
मे – वो वहाँ होंगी तब ना बता देंगी..!
रहमत – क्या मतलब..? कहाँ चली जाएँगी वो लाशें वहाँ से..?
मे – कब की चली गयी वो तो .. कल तक तो वहाँ उनकी राख भी नही मिलेगी.
रहमत – क्या किया उनका आपने..?
मे – पेट्रोल डालकर जला दिया..! अब राख तो पता नही दे सकती कि ये किसकी है..
इस बात से रहमत को थोड़ी राहत पहुचि, फिर हमने रेहाना, शाकीना और उनकी अम्मी को भी बोल दिया, कि वो बस्ती में लोगों को डरने की कोशिश करें ये कहकर की,
अगर फौज को यहाँ क्या हुआ था ये पता लगा तो वो पूरी बस्ती को ही ख़तम कर देंगे.
इसलिए कोई अगर पुछने आए भी तो बताएँ नही कि यहाँ कुछ भी हुआ था.
इस काम में वो चार नये साथी भी हमारा हाथ बटा सकते थे.
इन सब बातों की चर्चा के बीच हम सबने खाना खाया, और कुछ देर और बैठे बातें करते रहे, फिर सोने चले गये अपने-2 बिस्तर पर.
दूसरे दिन वो चारों भी सुबह-2 जल्दी आ गये, जब उन्होने बताया कि हमें सही सलामत देख कर उनके घरवाले खुश हुए लेकिन फिर पुछा कि कैसे छोड़ दिया तो जो आपने बताया था हमने वैसे ही बता दिया.
मे – वो तो ठीक है, लेकिन अब तुम सब लोग बस्ती में ये बात चलाओ, कि अगर यहाँ कोई उस बाबत तहकीकात करता है, तो कोई कुछ भी ना बताए.
यहाँ तक कि ऐसा कुछ हुआ भी था या नही, अगर फौज को पता लगा कि ऐसा कुछ यहाँ हुआ है, तो वो लोग पूरी बस्ती को ही ख़तम कर देंगे.
ऐसा डर दिखा कर लोगों को कुछ भी ना बताने के लिए कहो.
उसके बाद हमने उन सब को एक्सर्साइज़ शुरू कराई, रेहाना और शाकीना उन लड़कियों को ट्रेन करने लगी और मे उन तीनो को, वैसे रहमत तो था ही ट्रेंड फ़ौजी,
पर फिर भी इतने दिन जैल की कमर तोड़ यातनाओं के बाद उसको भी रेफ्रेश करना ज़रूरी था.
और वैसे भी मेरी ट्रेनिंग ज़रा आम फोर्सस से हटके थी, लेकिन उतनी ही देनी थी जिससे वो अपनी आत्म रक्षा कर सकें.
मे कभी-2 अपने काम से बाहर भी चला जाता था, लेकिन वो लोग ट्रैनिंग बदस्तूर जारी रखते, ऐसे ही बिना किसी विशेष बात हुए 1 महीना निकल गया.
अब वो 5 लोग और एक ट्रेंड सिपाही की तरह हमारे ग्रूप में शामिल हो गये थे.
अब हम 8 लोग ऐसे थे जो किसी भी असाधारण परिस्थिति का सामना कर सकते थे, सिवाय एक वॉर सिचुयेशन के.
चारों लड़कियाँ भी आम लड़कियाँ नही रही थी. उन सभी की ट्रैनिंग के बारे में उनके घरवालों को भी ज़्यादा कुछ नही बताया गया था.
लेकिन अब हम यहाँ ठहर कर किसी आने वाली मुशिवात का इंतजार नही कर सकते थे,
क्योंकि यहाँ पर होने वाली अब कोई एक भी वारदात शक़ पैदा कर सकती थी, इसलिए अब हमें आगे बढ़ कर मूषिबतों को दावत देनी ही पड़ेगी.
वो भी अपने इलाक़े से बहुत दूर, और दुश्मन की एकदम नाक के नीचे, जिससे वो हड़बड़ा जाए.
लेकिन ये काम इस तरह से होना चाहिए, जो लगे कि ये अवाम में हुकूमत और दहशतगर्दी के खिलाफ पैदा हुई बग़ावत का नतीजा है…
यही चाणक्य नीति कहती है : “इससे पहले की दुश्मन आपके बारे में कुछ सोचे आप उसके बारे में सब कुछ सोच और समझ लो”.
इसी प्लॅनिंग को मद्दे नज़र रखते हुए मैने अपने सभी साथियों को लेकर एक मीटिंग रखी…….!!

Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.