Update 109
जानवरों की हमें कोई फिकर ही नही थी. नंगे ही बैठ कर हम दोनो ने कुछ खाया जो घर से लेकर आए थे, फिर मैने अपना गीला ही अंडरवेर पहना और जानवरों को एक बार इकट्ठा किया.
उसके बाद मैने दो बार शाकीना को और जमके चोदा, जब वो पूरी तरह संतुष्ट हो गयी, तब तक शाम भी घिरने लगी थी तो हम घर की ओर लौट लिए.
जानवरों के पीछे-2 हम एकदुसरे से सटके चल रहे थे, रास्ते में छेड़-छाड़ करते हुए हम घर की ओर आ रहे थे.
सूरज पश्चिम की ओर बढ़ते हुए धरती से विदा हो रहा था.
अभी हम घर पहुँचे ही थे, कि रेहाना भागती हुई बस्ती की तरफ से आई, उसकी साँसें चढ़ि हुई थी.
दौड़ते हुए वो मेरी ओर आई और मेरे सीने से लग कर सुबकने लगी.
मैने जब कारण पुछा तो वो बोली- व्व..वो..फ़ौजी रहमत को उठा ले गये…!
मैने चोन्कते हुए कहा- क्या…? क्या कहा तुमने..?
वो- हां ! और साथ में कई और लड़के, लड़कियाँ भी हैं..!
मे – लेकिन ये हुआ कैसे..?
वो – हम बाज़ार में समान खरीद रहे थे, कि तभी वहाँ गोलियों की आवाज़ गूँज उठी, हमने मूड के देखा तो वो 5-6 फ़ौजी एक जीप में थे,
उन्होने पहले हवा में गोलियाँ चलाई, फिर 4 लोग नीचे उतरे, और लोगों के साथ मार-पीट करने लगे, औरतों के साथ छेड़-छाड़ करने लगे.
कुछ लोगों ने विरोध करना चाहा तो उन्हें खूब मारा और जीप में डाल कर ले गये.
मे – कितने लोगों को ले गये हैं…?
वो – रहमत समेत 3 आदमी हैं और 2 लड़कियाँ हैं.
मे – तुम्हें पता है वो किधर को गये हैं.. और कितनी दूर पहुँचे होंगे..?
वो – हाँ ! अभी वो 2-3 किमी ही पहुँच पाए होंगे.
मे – चलो फटाफट, मेरे साथ..!
शाकीना – मे भी चलती हूँ आप लोगों के साथ…!
मे – नही ! तुम यहीं अपनी अम्मी को सम्भालो..!
मैने बाइक उठाई और रेहाना को पीछे बिठाया और दौड़ा दी उधर को जिधर जीप गयी थी.
रास्ता खराब था तो जीप ज़्यादा तेज नही भाग सकती थी, लेकिन मेरी बाइक भाग सकती थी.
अभी हम कोई 8-9 किमी ही आए थे कि हमें जीप से उड़ने वाली धूल उड़ती दिखाई दी.
हम दोनो ने अपने-2 चेहरे कपड़ों से ढक लिए थे. करीब आधे मिनट के बाद ही हम जीप के पीछे थे.
मैने बाइक की स्पीड कम कर दी जैसे ही जीप मेरी गन की जड़ में आई, मैने स्पीड को जीप के बराबर कर दिया और रेहाना को हॅंडल पकड़ने को कहा.
वो भी साइकल तो चला ही लेती थी, इस समय स्पीड भी कम ही थी सो उसको बाइक का हॅंडल कंट्रोल करने में कोई विशेष दिक्कत नही हुई.
4 फ़ौजी पीछे की साइड में हाथों में राइफल्स लिए खड़े थे, जिनका मुँह आसमान की ओर था, और वो आगे की ओर ही देख रहे थे.
पाँचों क़ैदी नीचे पड़े हुए थे शायद उनके हाथ पैर बाँध रखे होंगे..?
मैने दोनो हाथों से निशाना साधा और एक साथ 4 फाइयर किए, जिनका चूकने का तो सवाल ही पैदा नही होना था.
वो चारों फ़ौजी गोली लगते ही गिर पड़े, जिसमें से दो जो किनारे की तरफ थे वो ज़मीन पर गिर गये, और दो जीप के अंदर ही.
जैसे ही ड्राइवर और उसके बगल में बैठे फ़ौजी को गोली चलने की आवाज़ सुनाई दी, उस बाजू वाले ने पीछे मूड कर देखा, तो उसके होश उड़ गये और उसने ड्राइवर को जीप रोकने को कहा.
ड्राइवर अभी जीप खड़ी भी नही कर पाया था कि उस 5वे फ़ौजी ने अपनी राइफल उठाई और खड़ा होकर एक लड़की को पकड़ कर उसको अपनी ढाल बनाने ही वाला था कि मेरी एक गोली उसकी खोपड़ी में सुराख बना चुकी थी.
ड्राइवर ने जब अपने आख़िरी साथी को भी जहन्नुम जाते देखा तो जीप रोकते-2 उसने उसे और स्पीड दे दी.
मैने बाइक अब अपने कंट्रोल में ले ली और स्पीड देकर जीप के पास तक ले आया और सीट पर दोनो पैर रख कर बैठ गया.
रेहाना को हॅंडल थमा कर मैने जीप के अंदर छलान्ग लगा दी, और अपने आपको को बॅलेन्स करते हुए, ड्राइवर की गर्दन को पीछे से अपने बाजू में कस लिया.
जैसे ही ड्राइवर का दम घुटने लगा, ऑटोमॅटिकली उसका पैर ब्रेक पर दब गया और गियर में पड़ी जीप झटका खाकर रुक गयी.
उधर मैने जैसे ही बाइक से छलान्ग लगाई बाइक डिसबॅलेन्स हो गयी, रेहाना उसको संभाल नही पाई, और वो रोड साइड खड़ी झाड़ियों में जा घुसी.
उसके मुँह से एक चीख निकल गयी, लेकिन इसका मेरे पास कोई इलाज नही था.
जीप के रुकते ही मैने उस ड्राइवर को जीप से नीचे धक्का दे दिया और उसके उपर छलान्ग लगा दी, उसकी छाती पर चढ़ उसके गले को दबाने लगा.
थोड़ी ही देर में उसकी जीभ बाहर निकल आई, और आँखें फटी रह गयी, उसका भी खेल ख़तम हो चुका था.
फिर मैने उन पाँचों को खोला और झाड़ियों की तरफ दौड़ लगा दी.
झाड़ियों में एक ओर बाइक उलझी पड़ी थी जो अभी भी उसका एंजिन चालू ही था और पिच्छला व्हील घूम रहा था. दूसरी ओर रहना पड़ी कराह रही थी.
मैने पहले बाइक बंद की और उसे झाड़ियों से बाहर लाकर खड़ा किया, फिर रेहाना को उठाकर लाया, उसके शरीर में काँटों की वजह से कई जगह खरोंच आ गयी थी,
उसके कपड़े भी कई जगह से फट गये थे, जिनसे उसका गोरा मादक बदन झलक रहा था.
मैने जैसे ही अपने हाथ से उसके शरीर को सहलाया, तो वो सिहर गयी और उसके मुँह से एक मादक सिसक निकल गयी.
मे – तुम ठीक तो हो ना..!
वो – हां ! मे ठीक हूँ ! आप उन लोगों को सम्भालो..
मे उसको वहीं बाइक के पास खड़ा करके जीप के पास आया और रहमत अली से पुछा- आप लोगों में से किसी को जीप चलानी आती है..?
रहमत अली ने हामी भर दी, मैने उन फ़ौजियों के सारे हथियार लेकर जीप में डाले और उसको जीप लेकर घर लौट जाने का बोला.
जब वो वहाँ से लौट गये तो मैने उन सभी की लाशों को झाड़ियों के पीछे इकट्ठा किया और बाइक से पेट्रोल निकाल कर उनके उपर डाल दिया.
दो पत्थरों को आपस में रगड़ कर चिंगारी पैदा करके उन पाँचों के शवों को आग के हवाले कर दिया.
घर हम दोनो भी लगभग जीप के साथ ही पहुँच गये, वो चारों लोग भी रहमत के साथ हमारे घर ही आ गये थे.
जब मैने उसको पुछा क़ि इनको यहाँ क्यों ले आए, तो वो लोग काँपते हुए बोले- हमें डर लग रहा है, पता नही अब फौज हमारे साथ क्या करेगी.
मे – कब तक इस तरह डर डर कर मरते रहोगे..? मरना ही है तो लड़ कर मरो ना..! मौत तो एक दिन सबको आनी ही है फिर उससे क्या डरना.
उनमें से एक बोला – भाई हम आपके जैसे जुंगजू नही है जो किसी हथियार बंद फ़ौजी का मुकाबला कर सकें.
मे – तुमसे किसने कहा कि मे कोई जुंगजू हूँ..?
वो – क्या आपने हमें नही बचाया..?
मे – तो इससे क्या मे जुंगजू हो गया..? बस जुर्म के खिलाफ लड़ना सीख लिया है मैने. अगर तुम लोग भी लड़ना चाहोगे तो तुम्हें भी आजाएगा.
वो – क्या आप हमें सिखाएँगे जुर्म के खिलाफ लड़ना..?
मे – एक बार पक्का इरादा कर लोगे तो मे मदद ज़रूर कर सकता हूँ तुम्हारी, वाकी लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा..!
दूसरा लड़का बोला- ऐसे डर-2 के मरने से तो लड़ कर मरना लाख गुना अच्छा है, वैसे भी आज तो हम एक तरह से मर ही गये थे,
अगर आप हमें नही बचाते तो पता नही वो लोग हमें कहाँ ले जाते, और ना जाने क्या करते हमारे साथ ?
जीवित रखते भी या नही, इसलिए आज से हम वही करेंगे जो आप कहोगे.
उनमें से एक लड़की बोली – लेकिन हमारा क्या होगा..?

