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अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो वह अपने साथ एक नई ताज़गी और गहरा सुकून लेकर आई थी। आर्यन की नींद खुली तो उसने देखा कि अंजलि पहले ही उठ चुकी थी और रसोई से चाय की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। रात का वह भारीपन, वह डर और वह सिसकियाँ—सब जैसे एक बीते हुए कल की बात हो गई थीं।

नाश्ते की टेबल पर आज फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई थी। आर्यन अब अपनी माँ से नज़रें मिला पा रहा था। सच बोलने के बाद उसके मन का कोना-कोना साफ़ हो चुका था।

“आज परांठे थोड़े ज़्यादा कुरकुरे बने हैं माँ,” आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।

अंजलि ने चाय का घूँट भरते हुए उसे प्यार से देखा। “अच्छी बात है, कम से कम आज तेरा ध्यान खाने पर तो है, वरना कल तो तू बस थाली को घूर रहा था।” दोनों इस बात पर खिलखिलाकर हँस पड़े। कल रात की उस स्वीकारोक्ति ने उनके बीच की दीवार को गिराकर एक ऐसा पुल बना दिया था, जहाँ अब कोई भी बात ‘निषिद्ध’ नहीं थी।

इन तीन-चार दिनों में आर्यन का आत्मविश्वास लौट आया था। उसे अब अपनी शारीरिक प्रतिक्रियाओं पर शर्मिंदगी महसूस नहीं होती थी, क्योंकि उसे पता था कि उसकी माँ उसे समझती है।

हर रात वे साथ सोते, दिन भर की बातें करते और मज़ाक-मस्ती करते हुए सो जाते। अंजलि की वह ‘पुरानी लत’ अब पूरी तरह एक धुंधली याद बन चुकी थी। अब उसे किसी बनावटी सुकून की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि बेटे का साथ ही उसका सबसे बड़ा ‘हीलर’ बन गया था।

एक शाम, जब वे वॉक से लौट रहे थे, आर्यन ने महसूस किया कि अब उनके बीच कोई हिचकिचाहट नहीं बची है। वे एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालकर चलते, जैसे दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त हों। आर्यन ने अपनी माँ को उस अंधेरे से खींच निकाला था, और बदले में अंजलि ने उसे ‘वयस्कता’ (Adulthood) की उन उलझनों से आज़ादी दिला दी थी जो हर लड़के को भीतर ही भीतर खाती हैं।

घर अब सच में एक स्वर्ग जैसा लगने लगा था, जहाँ सच बोलने की आज़ादी थी और हर गलती के लिए माफ़ कर देने वाली ममता।

रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां फिर से 2:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे में वही हल्की नीली रोशनी थी और बाहर हवाओं की हल्की सरसराहट। आर्यन की नींद अचानक खुली, और उसे तुरंत वही पुराना अहसास हुआ जिसने कुछ दिन पहले उसे हिलाकर रख दिया था।

आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि गहरी नींद में करवट लेकर फिर से उसके बिल्कुल करीब आ गई थीं। उनका कोमल हाथ आर्यन के सीने पर रखा था, और उनकी टांगें अनजाने में आर्यन के लंड को स्पर्श कर रही थीं। उनके शरीर की वो परिचित गर्माहट और त्वचा की नरमी सीधे आर्यन के पौरुष को जगा रही थी।

लेकिन आज रात, आर्यन के मन में वह पुराना ‘ट्रॉमा’ या डर नहीं था। उसे याद आया कि कैसे उसकी माँ ने उसकी सच्चाई को हँसकर स्वीकार किया था और उसे अपराधी बनने से बचा लिया था।

जैसे ही अंजलि की जांघ का दबाव उसके लंड पर बढ़ा, उसमें कुदरती तौर पर सख्ती आने लगी। वह पजामे के अंदर धीरे-धीरे अकड़ने लगा। स्पर्श इतना सीधा और गहरा था कि आर्यन की साँसें भारी होने लगीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि नींद में थोड़ी और करीब खिसकीं, जिससे उनके शरीर की रगड़ ने आर्यन के अंदर एक तेज़ सनसनी पैदा कर दी।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत को देख रहा था। उसका दिल धड़क रहा था, लेकिन इस बार वह खुद को ‘गंदा’ महसूस नहीं कर रहा था। वह जानता था कि यह सिर्फ एक शारीरिक सच्चाई है।

अंजलि नींद में बहुत ही सुकून से थीं। उनका चेहरा आर्यन के कंधे के पास था और उनकी साँसों की गर्माहट आर्यन की गर्दन पर महसूस हो रही थी। आर्यन ने सोचा कि क्या वह फिर से उन्हें दूर हटाए? या फिर माँ की उस बात को याद करे कि ‘यह सब नॉर्मल है’।

उसने बहुत ही धीरे से, कांपते हुए हाथ से अपनी माँ की टांग को छुआ। इस बार वह डरा हुआ नहीं था, बल्कि उस स्पर्श को समझने की कोशिश कर रहा था। अंजलि की त्वचा रेशम जैसी मुलायम थी। आर्यन का लंड अब पूरी तरह पत्थर की तरह सख्त हो चुका था और वह चादर के नीचे एक साफ उभार बना रहा था।

उसे लगा कि शायद माँ को पता चल जाएगा, लेकिन अंजलि की गहरी साँसें बता रही थीं कि वे पूरी तरह बेखबर हैं। आर्यन ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस अनचाहे लेकिन सुखद अहसास को महसूस करने लगा, जो उसके और उसकी माँ के बीच के इस नए, पारदर्शी (Transparent) रिश्ते का एक हिस्सा बन चुका था।

कमरे में पसरा सन्नाटा अब एक ऐसी भारी और गरम खामोशी में बदल गया था, जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। आर्यन की साँसें तेज़ थीं और उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ अंजलि की जांघ के नीचे दबा हुआ था। जब उसे बर्दाश्त करना मुश्किल लगा, तो उसने बहुत ही धीमी, कांपती हुई आवाज़ में अपनी माँ को पुकारा।

“माँ… माँ…”

अंजलि की नींद टूटी। उसने अपनी पलकें झपकाईं और उसे तुरंत वस्तु स्थिति (Reality) का अंदाज़ा हो गया। उसे महसूस हुआ कि उसकी जांघ आर्यन के उस सख्त हिस्से पर टिकी हुई है जो पिछले कुछ दिनों से उनके बीच चर्चा और तनाव का विषय बना हुआ था।

अंजलि ने कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई। उसने न तो अपना पैर हटाया और न ही कोई हैरानी जताई। वह बस कुछ पलों तक आर्यन की आँखों में देखती रही। उन आँखों में डर था, उत्तेजना थी और एक अनजाना सवाल था।

अंजलि ने एक गहरी और समझदारी भरी साँस ली। उसने तय कर लिया था कि वह अपने बेटे को अब और किसी ‘गिल्ट’ या ‘ट्रॉमा’ में नहीं रहने देगी। उसने बहुत ही सहजता से अपनी स्थिति बदली—लेकिन दूर जाने के लिए नहीं, बल्कि और करीब आने के लिए।

वह धीरे से बिस्तर पर थोड़ा ऊपर की ओर सरकी।

उसने अपनी जांघ को पूरी तरह से आर्यन के लंड के ऊपर जमा दिया। उस सीधे दबाव और जांघ की मखमली रगड़ से आर्यन के शरीर में बिजली जैसी एक लहर दौड़ गई। उसका लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ चुका था। अंजलि ने वहीं रुककर आर्यन का हाथ पकड़ा। उसका हाथ पसीने से गीला और कांप रहा था।

अंजलि ने बिना कुछ बोले, आर्यन के उस हाथ को उठाया और धीरे से अपने Boob के ऊपर रख दिया।

आर्यन के होश उड़ गए। उसने महसूस किया कि उसकी हथेली माँ के उस नरम और गरम उभार पर है, जिसे उसने कुछ रात पहले अनजाने में छुआ था। लेकिन इस बार यह ‘अनजाना’ नहीं था—यह माँ की अपनी मर्जी और स्वीकृति थी।

कमरे की उस नीली रोशनी में दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। अंजलि की आँखों में एक अजीब सी शांति और ‘सुरक्षा’ का भाव था। उसने जैसे मौन रहकर यह संदेश दे दिया था कि ‘अगर तुझे इस स्पर्श से सुकून मिलता है और तेरी उत्तेजना शांत होती है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है।’

आर्यन का हाथ उस गोलाई को महसूस कर रहा था, और उसका लंड माँ की जांघों के बीच उस गर्मी का आनंद ले रहा था जिसे वह अब तक सिर्फ सपनों में या डर में महसूस करता था। उस रात, माँ और बेटे के बीच का वह ‘पर्दा’ पूरी तरह से हट गया था। कोई शब्द नहीं बोला गया, लेकिन उस स्पर्श ने सब कुछ कह दिया था।

उस रात कमरे की नीली रोशनी में एक अनजानी शांति छा गई थी। आर्यन का हाथ अंजलि के Boob की गर्माहट को महसूस कर रहा था और अंजलि की जांघ का दबाव सीधे उसके लंड पर था। धीरे-धीरे वह उत्तेजना एक गहरे सुकून में बदल गई और दोनों इसी अवस्था में एक-दूसरे के करीब गहरी नींद में सो गए।

अगली सुबह जब सूरज की किरणें कमरे में आईं, तो माहौल में कोई घबराहट नहीं थी। अंजलि ने तय कर लिया था कि वह इस मामले को पूरी तरह से सुलझा देगी ताकि आर्यन के मन में ‘पाप’ या ‘ग्लानि’ का एक कतरा भी न बचे।

नाश्ते के बाद, जब घर में सब शांत था, अंजलि ने आर्यन को अपने पास बुलाया और उसे सोफे पर अपने बगल में बिठाया। उसने आर्यन का हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत ही शांत और गंभीर स्वर में बात शुरू की।

“आर्यन, कल रात जो हुआ, उस बारे में मैं तुझसे कुछ कहना चाहती हूँ,” अंजलि ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।

आर्यन ने नज़रें थोड़ी झुकाईं, लेकिन इस बार वह कांप नहीं रहा था।

अंजलि ने बहुत ही सुलझे हुए लहजे में कहा, “देख बेटा, कल रात जो हुआ वह पूरी तरह से नॉर्मल (Normal) है। एक डॉक्टर के तौर पर और तेरी माँ के तौर पर मैं जानती हूँ कि मानव शरीर कैसे काम करता है। हम दोनों पिछले कुछ समय से जिस मानसिक तनाव और अकेलेपन से गुज़र रहे थे, उसमें एक-दूसरे का शारीरिक सानिध्य (Physical Proximity) हमें सुकून दे रहा है।”

उसने आर्यन के हाथ को सहलाते हुए आगे कहा, “इसमें गिल्ट (Guilt) महसूस करने का कोई मतलब नहीं है।”

आर्यन ने धीरे से पूछा, “लेकिन माँ… क्या यह गलत नहीं है? लोग क्या कहेंगे?”

अंजलि ने दृढ़ता से जवाब दिया, “गलत और सही की परिभाषा समाज तय करता है, लेकिन हमारी स्थिति अलग है। हमने कुछ भी गलत नहीं किया है। हम एक-दूसरे की ढाल बने हुए हैं। अगर मेरा स्पर्श तुझे शांत करता है और तेरी मौजूदगी मुझे उस पुरानी ‘लत’ से दूर रखती है, तो यह हमारे लिए एक दवा (Medicine) की तरह है। हमारे बीच जो विश्वास है, वही सबसे बड़ी सच्चाई है।”

उसने आर्यन को समझाते हुए कहा कि शरीर की ज़रूरतें और हॉर्मोन्स का असर प्राकृतिक है। अगर वे इसे एक-दूसरे के साथ सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, तो यह किसी अपराध के दायरे में नहीं आता।

“मैं चाहती हूँ कि तू खुद को कोसना बंद करे। हम दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत हैं और इस ‘साथ’ में कोई गंदगी नहीं है, सिर्फ एक अटूट भरोसा है।”

आर्यन को अपनी माँ की इन बातों से एक अद्भुत मानसिक शक्ति मिली। उसे अहसास हुआ कि उसकी माँ कितनी आधुनिक और समझदार सोच रखती हैं। उन्होंने एक झटके में उसके मन के सारे अंधेरे को साफ कर दिया था। अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं था, सिर्फ एक गहरी समझ और बिना किसी शर्त का साथ था।

रात का वक्त था और पूरे घर में एक ऐसी खामोशी थी जो उदासी वाली नहीं, बल्कि सुकून भरी थी। किचन से बर्तनों की खनक और मसालों की खुशबू आ रही थी। आर्यन और अंजलि अब उस दौर से बाहर निकल आए थे जहाँ वे एक-दूसरे से नजरें चुराते थे। अब उनके बीच एक ऐसी पारदर्शिता आ गई थी जिसने उनके रिश्ते को और भी गहरा और दोस्ताना बना दिया था।

डिनर की टेबल पर अंजलि ने गरमा-गरम कढ़ी-चावल परोसे। आर्यन ने पहला निवाला लिया और अपना चेहरा बिगाड़ लिया।

“माँ, आज नमक थोड़ा कम नहीं लग रहा? या फिर मेरा टेस्ट खराब हो गया है?” आर्यन ने शरारत से अंजलि की तरफ देखते हुए कहा।

अंजलि ने तुरंत अपनी प्लेट से एक चम्मच चखा और फिर आर्यन को घूर कर देखा। “बिल्कुल ठीक है! तुझे बस बहाना चाहिए मेरी कुकिंग में मीन-मेख निकालने का। अगली बार से खुद बना लेना, फिर पता चलेगा।”

आर्यन हँस पड़ा। “अरे माँ, मैं तो बस चेक कर रहा था कि आप कितनी जल्दी चिढ़ती हैं। वैसे कढ़ी लाजवाब बनी है, बस पकोड़े थोड़े और सॉफ्ट हो सकते थे।”

“अच्छा? और कल जो तूने जली हुई ऑमलेट खिलाई थी, उसका क्या?” अंजलि ने चिढ़ाते हुए कहा और आर्यन के गाल पर हल्की सी चपत लगा दी।

पूरे डिनर के दौरान दोनों इसी तरह एक-दूसरे की टांग खींचते रहे। यह नोकझोंक उनके बीच के उस भारीपन को पूरी तरह खत्म कर चुकी थी जो पिछले दिनों के वाकये से पैदा हुआ था। आर्यन को महसूस हो रहा था कि उसकी माँ अब सिर्फ एक गार्जियन नहीं, बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त बन चुकी हैं जिनसे वह दुनिया की कोई भी बात कर सकता है।

खाना खाने के बाद आर्यन ने ज़िद की कि आज बर्तन वह धोएगा।

“तू रहने दे आर्यन, सुबह कॉलेज भी जाना है,” अंजलि ने कहा।

“नहीं माँ, आज ‘डॉक्टर साहिबा’ को आराम मिलना चाहिए। आखिर पूरे दिन पेशेंट्स को जो झेला है आपने,” आर्यन ने मुस्कुराते हुए उन्हें सोफे की तरफ धकेल दिया।

अंजलि सोफे पर बैठकर अपने बेटे को काम करते देख रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो लड़का कुछ दिन पहले तक अपनी पहचान और जवानी की उलझनों में खोया हुआ था, वह आज इतना ज़िम्मेदार और खुशमिजाज हो गया है। उसे अहसास हुआ कि उसने आर्यन को ‘माफ’ करके और उस रात की बात को ‘नॉर्मल’ बताकर न सिर्फ उसे बचाया, बल्कि अपने अकेलेपन का सबसे खूबसूरत इलाज भी ढूँढ लिया।

रात के 11 बज रहे थे। घर की लाइटें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।

“आर्यन, जल्दी आ जा… मुझे नींद आ रही है,” अंजलि ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई।

आर्यन ने किचन की लाइट बंद की और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर नहीं, बल्कि माँ के कमरे की ओर बढ़ गया। अब उसे पता था कि उसे कहाँ होना चाहिए और अंजलि को भी पता था कि उसका सुकून कहाँ है।

रात के 12 बज चुके थे। कमरे में सन्नाटा था, लेकिन वह सन्नाटा खामोश नहीं था; उसमें एक अजीब सी गर्माहट और भारीपन था। आर्यन और अंजलि दोनों लेटे हुए थे, लेकिन नींद किसी की आँखों में नहीं थी। पंखे की हल्की आवाज़ और एक-दूसरे की सांसों की लय साफ़ सुनाई दे रही थी।

अंजलि की पीठ आर्यन की तरफ थी, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि आर्यन जागा हुआ है और बेचैन है। उधर आर्यन के मन में एक तूफान उठा हुआ था। माँ की कही हुई बातें—”यह सब नॉर्मल है,” “इसमें कोई गिल्ट नहीं है”—उसके कानों में गूँज रही थीं। उसकी जवानी का जोश और उस स्पर्श की याद उसे सोने नहीं दे रही थी।

आखिरकार, अपनी धड़कनों पर काबू पाते हुए, आर्यन की रुँधी हुई आवाज़ अंधेरे को चीरते हुए निकली।

“माँ…” उसने बहुत ही धीमी और कांपती हुई आवाज़ में पुकारा।

अंजलि धीरे से मुड़ी और उसकी आँखों में झाँका। नीली रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं। “जाग रहा है? क्या हुआ बेटा?”

आर्यन ने एक लंबी साँस ली, जैसे वह अपनी सारी हिम्मत बटोर रहा हो। “माँ… मुझे नींद नहीं आ रही। कल रात जो हुआ… और जो आपने सुबह कहा… उसके बाद से मेरा मन बस एक ही जगह अटका है।”

उसने थोड़ा रुककर, अंजलि की आँखों में सीधे देखते हुए वह बात कह दी जिसे कहने की हिम्मत शायद ही कोई बेटा कर पाता।

“माँ… क्या मैं… क्या मैं आपके वो छू सकता हूँ? फिर से… इस बार होश में?”

कमरे का तापमान जैसे एक डिग्री और बढ़ गया। अंजलि ने अपनी पलकें नहीं झपकाईं। वह बस उसे देखती रही। उसे आर्यन की आवाज़ में कोई हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी मासूमियत, जिज्ञासा और उस ‘स्वीकृति’ की तलाश दिखी जो उसने सुबह उसे दी थी।

अंजलि ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह जानती थी कि अगर उसने आज मना किया या झिड़का, तो जो ‘पारदर्शिता’ उन्होंने बनाई है, वह फिर से ढह जाएगी। उसने महसूस किया कि आर्यन उससे कुछ ‘छुपकर’ नहीं कर रहा, बल्कि अपनी माँ से ‘इजाज़त’ मांग रहा है।

अंजलि ने धीरे से मुस्कुराते हुए अपनी चादर थोड़ी नीचे की और आर्यन का हाथ पकड़कर उसे अपने Boob के ऊपर रख दिया।

“अगर इससे तुझे सुकून मिलता है और तेरा डर खत्म होता है… तो तू छू सकता है आर्यन। मैंने कहा था न, हमारे बीच अब कुछ भी गलत नहीं है,” अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी स्थिरता और ममता थी।

जैसे ही आर्यन की हथेलियों ने उस कोमल और भारी उभार को छुआ, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। इस बार वह ‘चोरी’ नहीं कर रहा था, बल्कि उसकी माँ ने खुद उसे यह अधिकार दिया था। उसके लंड ने पजामे के अंदर अपनी पूरी ताकत से सिर उठाया, लेकिन उसका ध्यान अब उस रेशमी स्पर्श पर था।

आर्यन ने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ चलानी शुरू कीं। उसे अंजलि के दिल की धड़कन अपनी हथेली के नीचे महसूस हो रही थी। वह पल उनके रिश्ते की पुरानी सारी परिभाषाओं को जलाकर राख कर रहा था और एक ऐसी नई दुनिया बना रहा था जहाँ सिर्फ वे दोनों थे—बिना किसी पर्दे के, बिना किसी शर्म के।

कमरे की उस मद्धम रोशनी में आर्यन का हाथ अंजलि के Boob की कोमलता को महसूस कर रहा था। उसके लिए यह अहसास बिल्कुल नया और जादुई था। एक जवान लड़के के मन में उठी जिज्ञासा और शरीर की उत्तेजना ने उसे और भी बेबाक बना दिया था।

उसने बहुत ही धीरे से अपनी उंगलियां उस गोलाई पर फिराईं और अपनी माँ की आँखों में देखते हुए एक मासूम सा सवाल कर दिया।

“माँ… यह इतने सॉफ्ट क्यों हैं? मैंने अपनी लाइफ में कभी ऐसी चीज़ नहीं देखी… मेरा मतलब है, कभी छुई नहीं। यह अहसास इतना अलग और सुकून देने वाला क्यों है?” आर्यन की आवाज़ में एक अजीब सी हैरानी थी।

अंजलि ने उसकी इस मासूमियत पर एक हल्की सी मुस्कान दी। उसने आर्यन का हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसे वहीं थामे रखा ताकि वह सहज महसूस करे।

“पगले, यह कुदरत की बनावट है,” अंजलि ने एक डॉक्टर के लहजे में समझाना शुरू किया। “बायोलॉजिकल तौर पर, महिलाओं के सीने में मुख्य रूप से फैटी टिश्यू और ग्रंथियां होती हैं। यह कोमलता इसलिए होती है ताकि वे एक बच्चे के लिए पोषण का ज़रिया बन सकें। यह शरीर का सबसे संवेदनशील और ममता भरा हिस्सा होता है।”

आर्यन मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ अंजलि की जांघ से सटा हुआ था, लेकिन उसका दिमाग इस वक्त माँ की बातों में खोया था।

अंजलि ने थोड़ा हँसते हुए आगे कहा, “और तुझे आज यह इतना ‘नया’ लग रहा है? तुझे याद भी नहीं होगा कि बचपन में तूने मुझे इस चीज़ के लिए कितना परेशान किया है। जब तू छोटा था, तो बिना इसे पकड़े या मुँह में लिए सोता ही नहीं था। घंटों तक तू यहीं चिपका रहता था, और अगर मैं ज़रा भी दूर होती, तो तू पूरा घर सिर पर उठा लेता था।”

यह सुनकर आर्यन का चेहरा शर्म से लाल हो गया। “सच में माँ? मैं इतना जिद्दी था?”

“जिद्दी? तू तो आफत था!” अंजलि ने मज़ाक में उसकी नाक खींची। “आज तू इसे एक ‘मर्द’ की नज़र से देख रहा है और तुझे यह उत्तेजित कर रहा है, लेकिन मेरे लिए तू आज भी वही छोटा आर्यन है जिसे इसी सीने से लगकर सुकून मिलता था। इसीलिए मैंने कहा कि इसमें कुछ भी ‘गंदा’ नहीं है। यह सिर्फ एक चक्र है जो घूमकर वापस वहीं आ गया है।”

आर्यन ने अब और भी विश्वास के साथ उस उभार को अपनी हथेली में भर लिया। उसे महसूस हुआ कि माँ की इस बेबाकी ने उसके अंदर के सारे ‘पाप’ को धो दिया है। उसे अपनी माँ के शरीर से अब डर नहीं लग रहा था, बल्कि एक गहरा लगाव महसूस हो रहा था।

“तो क्या मैं… मैं इसे थोड़ा और महसूस कर सकता हूँ? जैसे बचपन में करता था?” आर्यन ने धीरे से फुसफुसाते हुए पूछा।

कमरे की नीली रोशनी में आर्यन का हाथ अब पूरी तरह से अंजलि के Boob की गोलाई पर जम चुका था। जैसे-जैसे वह उसे सहला रहा था, उसके मन में एक और जिज्ञासा उठी। उसने महसूस किया कि जब वह छूता है, तो अंजलि की सांसें भी थोड़ी भारी हो रही हैं।

उसने अपनी माँ की आँखों में झाँकते हुए बहुत ही धीमे से पूछा, “माँ… जैसा कि आपने कहा कि यह बहुत संवेदनशील हिस्सा है… तो क्या जब मैं इसे इस तरह छू रहा हूँ, तो आपको भी वैसी ही संवेदना महसूस होती है जैसी मुझे हो रही है? क्या आपको भी अच्छा लग रहा है?”

अंजलि ने एक लंबी और गहरी सांस ली। उसने महसूस किया कि आर्यन अब सिर्फ एक जिज्ञासु बच्चा नहीं रहा, बल्कि वह एक पुरुष की सहज संवेदनाओं को समझने की कोशिश कर रहा है। उसने सच्चाई को छुपाने की कोशिश नहीं की।

“हाँ आर्यन,” अंजलि ने बहुत ही शांत और मधुर आवाज़ में कहा। “जैसा कि मैंने तुझे बताया, यह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है। यहाँ की नसें सीधे दिमाग और भावनाओं से जुड़ी होती हैं। जब तू इसे इस तरह कोमलता से छूता है, तो मुझे भी वैसी ही झनझनाहट और सुखद अहसास होता है।”

उसने आर्यन के हाथ के ऊपर अपना हाथ रखा और उसे थोड़ा और ज़ोर से दबाया।

“देख बेटा, शरीर की बनावट ऐसी है कि स्पर्श चाहे ममता भरा हो या आकर्षण भरा, शरीर अपनी प्रतिक्रिया देता ही है। एक औरत के तौर पर, मुझे भी यह महसूस होता है। और सच तो यह है कि पिछले कई सालों से मैं जिस अकेलेपन और ‘लत’ से लड़ रही थी, उसमें यह स्पर्श मुझे एक अजीब सा सुकून और ‘जीवित’ होने का अहसास दे रहा है।”

अंजलि ने उसकी आँखों में देखते हुए आगे समझाया, “संवेदना होना गलत नहीं है, आर्यन। यह जीवन का हिस्सा है। अगर मेरे शरीर को तेरे स्पर्श से अच्छा लग रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं ‘बुरी माँ’ हूँ। इसका मतलब सिर्फ यह है कि हम दोनों इंसान हैं और हमें एक-दूसरे की गर्माहट की ज़रूरत है।”

आर्यन के लिए यह सुनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उसे अब तक लग रहा था कि शायद वह अकेले ही इस तूफान में जल रहा है, लेकिन माँ की इस बेबाकी ने उसे यह अहसास दिलाया कि वे दोनों एक ही नाव में सवार हैं।

आर्यन का लंड अब पजामे की सीमाएं तोड़ देने को बेताब था। अंजलि की जांघों के बीच उसकी रगड़ और सीने पर उसका हाथ—इन दोनों संवेदनाओं ने उसे एक ऐसी दुनिया में पहुँचा दिया था जहाँ सिर्फ वे दोनों थे।

“तो माँ… क्या हम इसी तरह… रोज़… एक-दूसरे को महसूस कर सकते हैं?” आर्यन ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।

अंजलि ने उसे अपनी बाहों में और कस लिया। “जब तक तुझे इसकी ज़रूरत है और मुझे इससे सुकून मिलता है… हम ऐसे ही रहेंगे। अब सो जा, मेरा बच्चा।”

उस रात, आर्यन अपनी माँ के सीने पर हाथ रखे और उनके शरीर की महक लेते हुए एक ऐसी गहरी नींद में सोया, जैसी उसने बचपन के बाद कभी नहीं ली थी।

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