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पंद्रह मिनट बीत चुके थे, लेकिन कमरे का सन्नाटा आर्यन के लिए किसी शोर से कम नहीं था। वह आँखें मूँदकर सोने की नाकाम कोशिश कर रहा था, पर उसका शरीर उसके काबू में नहीं था। चादर के नीचे उसका लंड अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और उसमें एक तेज़ टीस उठ रही थी। माँ की जांघ की वो रगड़ और उनके शरीर की वो भीनी-भीनी खुशबू उसके दिमाग पर इस कदर हावी हो गई थी कि नींद कोसों दूर भाग चुकी थी।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत को घूर रहा था। उसका लंड पजामे के अंदर इतनी सख्ती से तना हुआ था कि उसे कपड़े की रगड़ भी अब और ज़्यादा उत्तेजित कर रही थी। एक जवान लड़के के लिए इस तरह की शारीरिक प्रतिक्रिया कुदरती थी, लेकिन जिस परिस्थिति में वह था, वहाँ उसे घोर असहजता महसूस हो रही थी।

उसके मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था: “मैं यहाँ माँ की मदद करने आया हूँ, उन्हें इस लत से बाहर निकालने आया हूँ… और मेरा शरीर इस तरह रिएक्ट कर रहा है? क्या मैं गलत कर रहा हूँ?”

वह अपनी साँसों पर काबू पाने की कोशिश कर रहा था, पर जैसे-जैसे वह खुद को शांत करने की कोशिश करता, उसका ध्यान बार-बार अपने लंड की उस कठोरता पर ही चला जाता। उसे महसूस हो रहा था कि अगर उसने जल्द ही कुछ नहीं किया, तो यह तनाव उसे पागल कर देगा। उसे डर था कि कहीं नींद में करवट लेते समय उसका उत्तेजित अंग फिर से माँ को टच न कर जाए, जो उनके रिश्ते की गरिमा के लिए बहुत बुरा होता।

वह बिस्तर पर बिल्कुल जम गया था। उसका हाथ अनजाने में चादर के ऊपर ही मुट्ठी में भिंच गया था। उसे लग रहा था कि शायद बाथरूम जाकर ठंडे पानी से मुँह धोना या खुद को थोड़ा शांत करना ही एकमात्र रास्ता है। लेकिन उसे यह भी डर था कि कहीं उसके उठने की आहट से माँ की कच्ची नींद न टूट जाए और वे उससे कोई सवाल न कर बैठें।

अंजलि अभी भी बगल में बहुत ही सुकून भरी और गहरी साँसें ले रही थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा इस वक्त अपनी मर्दानगी और अपनी नैतिकता के बीच कितनी बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। आर्यन के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, और उसका लंड अभी भी अपनी पूरी सख्ती के साथ इंसाफ मांग रहा था।

नीली नाइट लैंप की उस मद्धम और मायावी रोशनी में आर्यन की नज़रें अनजाने में अपनी माँ के चेहरे पर ठहर गईं। कमरे का सन्नाटा अब उसके दिल की धड़कन के साथ ताल मिला रहा था। उसने देखा कि अंजलि के चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत और शांति थी जो पिछले कई सालों से गायब थी।

अंजलि का चेहरा तकिये पर थोड़ा तिरछा था, जिससे उनके गले की सुराहीदार बनावट साफ़ दिखाई दे रही थी। उनके खुले हुए बाल बिस्तर पर बिखरे थे, जो रोशनी में रेशम की तरह चमक रहे थे। आर्यन ने गौर किया कि आज उनकी त्वचा कितनी कोमल और तरोताजा लग रही थी—शायद एक हफ्ते की सुकून भरी नींद और उस ‘लत’ से दूरी का ही यह असर था।

उनकी सांसें बहुत ही धीमी और लयबद्ध थीं, जिससे उनके सीने पर रखी चादर बहुत ही धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उस हल्की रोशनी में उनकी बंद पलकें और गुलाबी होंठों की बनावट आर्यन को एक अलग ही खूबसूरती का अहसास करा रही थी।

आर्यन के मन में एक अजीब सा टकराव शुरू हो गया। वह जानता था कि यह उसकी माँ हैं, उसकी दुनिया की सबसे पवित्र हस्ती। लेकिन एक पुरुष के तौर पर, उसकी आँखें उस सौंदर्य को अनदेखा नहीं कर पा रही थीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि सिर्फ एक ‘माँ’ ही नहीं, बल्कि एक बेहद आकर्षक स्त्री भी थीं, जिसे उसने शायद अब तक सिर्फ अपनी ज़रूरतों के चश्मे से देखा था।

उनकी इस खूबसूरती और पास से आती उनके शरीर की कुदरती महक ने आर्यन के लंड के तनाव को और ज़्यादा बढ़ा दिया। वह पजामे के अंदर अब पत्थर की तरह सख्त हो चुका था और उसमें एक मीठी सी खुजली और बेचैनी हो रही थी।

आर्यन को खुद पर गुस्सा भी आ रहा था और वह खुद को रोक भी नहीं पा रहा था। “मैं क्या सोच रहा हूँ? मुझे यहाँ से उठ जाना चाहिए,” उसने मन ही मन खुद को झिड़का। लेकिन उनकी उस मोहक सूरत ने उसे जैसे वहीं जकड़ लिया था। वह पसीने से भीगा हुआ था और उसकी धड़कनें उसके कान के पास शोर मचा रही थीं।

उसे डर था कि अगर उसने अपनी नज़रे नहीं हटाईं, तो शायद वह कोई ऐसी भूल कर बैठेगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।

कमरे की उस मद्धम नीली रोशनी और रात के सन्नाटे ने जैसे आर्यन के सोचने-समझने की शक्ति को सुन्न कर दिया था। वह जवानी की उस दहलीज़ पर था जहाँ शरीर के हॉर्मोन्स (hormones) और प्राकृतिक आवेग अक्सर दिमाग की नैतिकता पर हावी हो जाते हैं। 18-19 साल की उस कच्ची उम्र में, इस तरह की उत्तेजना और शारीरिक निकटता का अनुभव उसके लिए बिल्कुल नया और भ्रमित करने वाला था।

आर्यन का दिल किसी नगाड़े की तरह बज रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो वह महसूस कर रहा है, वह सही है या गलत; उसे बस उस पल की गर्माहट और आकर्षण ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। उसका लंड पजामे के अंदर अपनी पूरी कठोरता के साथ तना हुआ था, जिससे उसे एक अजीब सी बेचैनी और दबाव महसूस हो रहा था।

पता नहीं उस पल उसके मन में क्या आया, या शायद उसके शरीर के अनियंत्रित आवेग ने उसे मजबूर कर दिया—उसने बहुत ही कांपते हुए हाथों से अपना एक हाथ धीरे से अंजलि के Boobs के ऊपर रख दिया।

जैसे ही उसकी हथेलियों ने उस कोमलता और उभार को छुआ, आर्यन के पूरे शरीर में बिजली जैसी एक लहर दौड़ गई। चादर के पतले कपड़े के ऊपर से भी उसे माँ के शरीर की वह मखमली गर्माहट और उनके दिल की धड़कन साफ़ महसूस हो रही थी। अंजलि अभी भी गहरी और बेखबर नींद में थीं, उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा, जिसे वह अपना रक्षक मान रही थीं, इस वक्त किस मानसिक और शारीरिक द्वंद्व से गुज़र रहा है।

आर्यन की सांसें अब तेज़ और भारी हो गई थीं। उसका हाथ वहीं जम गया था। उसे एक तरफ तो उस स्पर्श से एक अद्भुत सुख मिल रहा था, लेकिन दूसरी तरफ उसे अपनी ही इस हरकत पर अंदर ही अंदर बहुत डर भी लग रहा था। उसे महसूस हुआ कि यह स्पर्श उस ‘पवित्रता’ की सीमा को लांघ रहा था जिसे वह अब तक संजोए हुए था।

उसका लंड अब और भी ज़्यादा अकड़ गया था, और उसे लग रहा था कि अगर माँ इस वक्त जाग गईं, तो वह कभी भी उनसे नज़रे नहीं मिला पाएगा। फिर भी, उस जवानी के जोश और पहली बार महसूस हो रहे इस शारीरिक आकर्षण ने उसे अपनी जगह से हिलने नहीं दिया।

कमरे के उस भारी सन्नाटे में आर्यन का दिल किसी नगाड़े की तरह धड़क रहा था। उसका हाथ माँ के Boobs के उभार पर थमा हुआ था और उसकी साँसें तेज़ थीं। उसे हर पल यह डर सता रहा था कि शायद अंजलि अभी अपनी आँखें खोल देंगी और यह सब एक भयानक मोड़ ले लेगा।

मिनट दर मिनट बीतते गए। घड़ी की टिक-टिक के अलावा कमरे में और कोई आवाज़ नहीं थी। अंजलि की गहरी और लयबद्ध साँसों में कोई बदलाव नहीं आया। वे उसी मासूमियत और सुकून के साथ सोती रहीं, जैसे उन्हें दुनिया की किसी बात की खबर न हो।

जब काफी देर तक कुछ भी नहीं हुआ और अंजलि की नींद में कोई खलल नहीं पड़ा, तो धीरे-धीरे आर्यन के शरीर का तनाव कम होने लगा। जो डर उसे अंदर ही अंदर खा रहा था, वह अब एक अजीब सी राहत में बदल गया। उसे महसूस हुआ कि शायद इस स्पर्श ने माँ की नींद में कोई बाधा नहीं डाली, बल्कि उनके शरीर की कुदरती गर्मी और सानिध्य ने आर्यन के मन की उथल-पुथल को भी धीरे-धीरे शांत कर दिया।

जवानी के उस पहले शारीरिक आवेग और उत्तेजना के बाद, अब उसके शरीर में एक सुस्ती और थकान छाने लगी थी। उसका लंड, जो अब तक पत्थर की तरह सख्त था, धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा। वह पसीने से तर-बतर था, लेकिन अब उसके मन में वो पहले वाली घबराहट नहीं थी।

उसी अवस्था में, अपनी माँ के शरीर की गर्माहट को महसूस करते हुए, आर्यन की पलकें भारी होने लगीं। उसे अहसास भी नहीं हुआ कि कब उसकी सोच और उसका डर धुंधलाने लगा। पंद्रह-बीस मिनट के उस तनावपूर्ण संघर्ष के बाद, वह उसी स्थिति में—अपना हाथ वहीं रखे हुए—गहरी और बेखबर नींद की आगोश में समा गया।

रात का वह रहस्यमयी और विचलित करने वाला पल अब एक शांत और खामोश नींद में बदल चुका था।

सूरज की रोशनी रसोई की खिड़की से छनकर डाइनिंग टेबल पर पड़ रही थी, लेकिन आज उस रोशनी में कल जैसी गर्माहट और बेफिक्री नहीं थी। आर्यन के लिए यह सुबह किसी भारी बोझ जैसी थी। रात की वो धुंधली यादें और अपनी माँ के Boobs पर अनजाने में रखा हुआ उसका हाथ—यह सब उसके दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रहा था।

नाश्ते की मेज पर सन्नाटा पसरा था। अंजलि ने हमेशा की तरह गरमागर्म परांठे और चाय टेबल पर रखी।

“आर्यन, आज तू बहुत चुप है? रात को नींद ठीक से नहीं आई क्या?” अंजलि ने प्यार से पूछते हुए उसकी प्लेट में परांठा रखा।

आर्यन ने अपनी नजरें अपनी प्लेट से ऊपर नहीं उठाईं। वह बस दही और परांठे के साथ ज़बरदस्ती उलझा हुआ था। “नहीं माँ… बस थोड़ा सा सिर भारी है, शायद पढ़ाई का स्ट्रेस होगा,” उसने हकलाते हुए जवाब दिया।

अंजलि को उसका यह व्यवहार बहुत अजीब लगा। कल तक जो बेटा चहक-चहक कर बातें कर रहा था, मज़ाक कर रहा था, वह आज आँखें मिलाने से भी कतरा रहा था। उसने गौर किया कि आर्यन का चेहरा थोड़ा लाल था और वह बार-बार अपनी उंगलियों को मरोड़ रहा था। उसे लगा शायद रात को सोते समय कोई बुरा सपना देखा होगा या तबीयत ढीली होगी, इसलिए उसने ज़्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा।

“ठीक है, कॉलेज से आकर थोड़ा आराम कर लेना। मैंने टिफिन में तेरी पसंद की सब्जी रख दी है,” अंजलि ने उसका माथा चूमने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन आर्यन अनजाने में ही थोड़ा पीछे हट गया।

यह देख अंजलि के हाथ ठिठक गए। उनके मन में एक पल के लिए उलझन आई, पर उन्होंने इसे सुबह की जल्दबाज़ी समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।

आर्यन ने जल्दी-जल्दी अपना टिफिन बैग में डाला। उसे उस कमरे और उस माहौल से बाहर निकलने की जल्दी थी। उसे लग रहा था जैसे उसके चेहरे पर उसकी ‘गलती’ साफ़ लिखी हुई है और माँ कभी भी उसे पढ़ लेंगी।

“मैं चलता हूँ माँ, लेट हो रहा हूँ,” उसने बस इतना कहा और बिना पीछे मुड़े तेज़ी से घर से बाहर निकल गया।

सीढ़ियाँ उतरते समय उसके दिल की धड़कन अभी भी तेज़ थी। उसके हाथ में अभी भी उस मखमली अहसास की सिहरन बाकी थी, जिसने उसे रात भर बेचैन रखा था। वह कॉलेज तो जा रहा था, लेकिन उसका मन उसी बिस्तर और उसी नीली रोशनी वाले कमरे में अटका हुआ था।

डिनर की मेज पर आज वह खनक और ठहाके गायब थे जो पिछले एक हफ्ते से घर की रौनक बने हुए थे। आर्यन ने बमुश्किल दो निवाले खाए और अपनी नजरें थाली में ही गड़ाए रखीं। अंजलि उसे बार-बार देख रही थी; उसकी ममता भरी नजरें भांप चुकी थीं कि कुछ तो बहुत गहरा और बेचैन करने वाला आर्यन के मन में चल रहा है।

उसे लगा कि शायद क्लिनिक वाली बात या उसकी ‘लत’ को लेकर आर्यन अब भी किसी Trauma में है, या शायद कल रात कुछ ऐसा हुआ जिसे वह कह नहीं पा रहा।

डिनर के बाद, रोज की तरह आर्यन ने दूध गरम किया। रसोई की पीली रोशनी में उसका चेहरा उतरा हुआ और थका हुआ लग रहा था। अंजलि दबे पाँव पीछे से आई और काउंटर का सहारा लेकर खड़ी हो गई।

“आर्यन…” उसने बहुत ही कोमल स्वर में पुकारा।

आर्यन के हाथ से चम्मच लगभग छूटते-छूटते बचा। “जी माँ?” उसने बिना मुड़े जवाब दिया।

“दूध गरम हो गया है, यहाँ बैठ मेरे पास,” अंजलि ने पास की स्टूल की ओर इशारा किया। आर्यन हिचकिचाते हुए बैठा, उसके हाथ कांप रहे थे और वह अभी भी अपनी माँ की आँखों में झाँकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

अंजलि ने अपना हाथ उसके ठंडे पड़ चुके हाथ पर रखा। आर्यन को तुरंत कल रात के उस स्पर्श की याद आई और उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।

“बेटा, सुबह से देख रही हूँ, तू खुद में नहीं है। क्या बात है? क्या तू अब भी मेरी उस बात (एडिक्शन) को लेकर परेशान है? या मुझसे कोई गलती हुई है?” अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी फिक्र और दर्द था।

आर्यन ने घूँट भरा, गला सूख रहा था। “नहीं माँ… ऐसा कुछ नहीं है। बस… मन थोड़ा भारी है।”

“मुझसे मत छुपा आर्यन। मैं तेरी माँ हूँ, तेरी धड़कनें पहचानती हूँ। तू किसी गहरे सदमे में लग रहा है, जैसे कोई बात तुझे अंदर ही अंदर खा रही है। अगर तू मुझसे नहीं कहेगा, तो किससे कहेगा? क्या तुझे मेरे साथ सोने में असहजता (Awkwardness) हो रही है? अगर ऐसा है, तो तू अपने कमरे में सो सकता है, मैं ठीक हूँ अब,” अंजलि ने उसे परखते हुए कहा।

आर्यन का लंड पजामे के अंदर एक बार फिर उस पुरानी याद और माँ की आवाज़ की मिठास से हरकत करने लगा। उसे अपनी इस शारीरिक प्रतिक्रिया पर इतनी घृणा हो रही थी कि उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह बस इतना चाहता था कि वह सब उगल दे, पर शब्द होंठों तक आकर जम रहे थे।

दूध के गिलास से उठती भाप आर्यन की धुंधली आँखों के सामने एक कोहरे जैसी छा गई थी। अंजलि की ममता भरी आवाज़ और उसकी आँखों में छिपी फिक्र ने आर्यन के संयम का आखिरी बांध भी तोड़ दिया। उसे लग रहा था जैसे वह कोई बहुत बड़ा अपराधी है, जिसने अपनी ही माँ के विश्वास और पवित्रता के साथ छल किया है।

जैसे ही अंजलि ने उसके कंधे पर हाथ रखा, आर्यन के शरीर में एक सिहरन दौड़ी। वह और नहीं रुक सका। उसका गला रुंध गया और अगले ही पल, रसोई की उस शांत हवा में आर्यन की सिसकियों की आवाज़ गूँज उठी।

वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छिपा लिया और उसके कंधे बुरी तरह कांपने लगे। यह सिर्फ रोना नहीं था, यह उस अंतर्द्वंद्व का विस्फोट था जो कल रात से उसके सीने में दबा हुआ था।

अंजलि पूरी तरह चिंता और दहशत में आ गई। उसने ऐसा मंजर कभी नहीं देखा था। उसका बहादुर और समझदार बेटा, जो उसे संभाल रहा था, आज इस कदर टूट जाएगा, इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।

“आर्यन! बेटा… क्या हुआ? मुझे बता, कोई बात है क्या? किसी ने कुछ कहा? तेरी तबीयत ठीक नहीं है?” अंजलि बदहवास होकर उसके पास घुटनों के बल बैठ गई और उसके हाथों को चेहरे से हटाने की कोशिश करने लगी।

आर्यन की हिचकियाँ बंध गई थीं। वह बस इतना कह पा रहा था, “माँ… मैं… मैं बहुत बुरा हूँ। मैं आपकी मदद करने चला था, पर मैं खुद गिर गया। मुझे माफ़ कर दो माँ… मुझे माफ़ कर दो।”

अंजलि का दिल बैठ गया। उसे लगा शायद आर्यन अपनी माँ की उस ‘लत’ को देख कर अंदर से इतना आहत हो गया है कि वह खुद को संभाल नहीं पा रहा। उसे लगा कि उसके बेटे पर इस पूरी स्थिति का बहुत गहरा ट्रॉमा हुआ है।

“चुप हो जा मेरा बच्चा… तू क्यों बुरा है? तूने तो मुझे नई ज़िंदगी दी है। तू रो मत, तू मुझे डरा रहा है,” अंजलि ने उसे अपने गले से लगा लिया।

आर्यन का सिर अब अंजलि के उसी सीने के पास था जिसे उसने कल रात छुआ था। उस स्पर्श की याद और अभी की इस ममता भरी आगोश के बीच का अंतर उसे और भी ज़्यादा कचोट रहा था। वह उनके सीने से लगकर और भी ज़ोर से रोने लगा, जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी गलती पर अपनी माँ के आंचल में छिपकर माफ़ी मांग रहा हो।

अंजलि उसे सहलाती रही, लेकिन उसके मन में हज़ारों सवाल उठ रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर कल रात से ऐसा क्या बदल गया कि उसका बेटा आज इतना असहाय महसूस कर रहा है। वह बस उसे अपने सीने से चिपकाए रही, जबकि आर्यन के आंसुओं से उसकी साड़ी भीगती जा रही थी।

रसोई की उस धुंधली रोशनी में आर्यन की सिसकियाँ अब भारी सासों में बदल चुकी थीं। अंजलि उसे अपने सीने से लगाए हुए उसके सिर को सहला रही थी

आर्यन ने धीरे से अपना चेहरा अंजलि के आंचल से हटाया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ। उसने एक लंबी और कांपती हुई सांस ली, जैसे वह अपनी पूरी हिम्मत बटोर रहा हो।

“माँ… मुझे माफ़ कर देना। मैं… मैं आपकी मदद करने आया था, लेकिन कल रात…” आर्यन की आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

अंजलि ने उसके हाथों को थाम लिया, उसकी धड़कनें तेज़ हो रही थीं। “क्या हुआ कल रात आर्यन? साफ़-साफ़ बोल बेटा।”

आर्यन ने नज़रें झुका लीं, वह अपनी माँ की आँखों में नहीं देख पा रहा था। “कल रात जब मेरी नींद खुली, तो आप मेरे बहुत करीब सो रही थीं। आपकी टांग मेरे ऊपर थी और… और मुझे बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। मैं एक जवान लड़का हूँ माँ, मेरा शरीर मेरे काबू में नहीं रहा। मुझे पसीना आ रहा था, मेरा प्राइवेट पार्ट को कुछ हो गया था और मैं… मैं खुद को रोक नहीं पाया।”

अंजलि के चेहरे का रंग उड़ गया, वह बुत बनकर उसे सुनती रही।

आर्यन ने रोते हुए आगे कहा, “पता नहीं मुझे क्या हुआ, मैंने… मैंने अपना हाथ आपके सीने पर रख दिया था। मैं बस उसे महसूस करना चाहता था। मुझे पता था कि आप मेरी माँ हैं, लेकिन उस वक्त मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। मैं काफी देर तक हाथ वहीं रखकर लेटा रहा और फिर… फिर मुझे नींद आ गई।”

आर्यन ने अपना सिर झुका लिया और फूट-फूट कर दोबारा रोने लगा। “मुझे अपनी नज़र में गिर जाने का अहसास हो रहा है माँ। मैं गंदा हूँ। मैं आपकी पवित्रता का सम्मान नहीं कर पाया। इसी ग्लानि ने मुझे सुबह से मार डाला है। मैं आपसे नज़रें नहीं मिला पा रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैंने आपके विश्वास का खून किया है।”

रसोई में एक ऐसी खामोशी छा गई जिसे काटा जा सकता था। अंजलि के हाथ, जो आर्यन को सहला रहे थे, हवा में ही ठिठक गए। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बेटे को वह अपनी ढाल मान रही थी, वह अपनी ही माँ के प्रति ऐसी शारीरिक भावनाएं और हरकत कर बैठा।

अंजलि के दिमाग में एक तरफ माँ की ममता थी और दूसरी तरफ एक औरत की गरिमा। वह अवाक (Shocked) रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह गुस्सा करे, रोए या अपने बेटे को संभाले। आर्यन की इस सच्चाई ने उनके बीच के उस महीन पर्दे को हटा दिया था जिसे समाज कभी स्वीकार नहीं करता।

रसोई की उस भारी खामोशी में आर्यन अपनी गर्दन झुकाए, सिसकियाँ भर रहा था। उसे लग रहा था कि अब शायद आसमान फट जाएगा या उसकी माँ उसे धक्के मारकर घर से निकाल देंगी। अंजलि के चेहरे पर पहले तो हैरानी और सदमे के बादल छाए, लेकिन जैसे ही उसने अपने बेटे की उस मासूमियत और बेतहाशा डर को देखा, उसका ममता भरा दिल पसीज गया।

उसने देखा कि आर्यन अपनी ही नज़रों में कितना गिर चुका है। एक डॉक्टर होने के नाते वह जानती थी कि अगर इस वक्त उसने आर्यन को डांटा या उससे नफरत की, तो यह उसके दिमाग पर एक ऐसा गहरा ट्रॉमा (Trauma) छोड़ देगा जिसे वह पूरी ज़िंदगी नहीं मिटा पाएगा। जवानी की दहलीज पर खड़ा एक लड़का अपने प्राकृतिक आवेगों (Natural impulses) से लड़ रहा था और अपनी गलती मान रहा था—यह अपने आप में उसकी सच्चाई का सबूत था।

अंजलि ने एक गहरी साँस ली और अचानक… वह धीरे से मुस्कुरा दी। फिर वह मुस्कुराहट एक हल्की सी हँसी में बदल गई।

आर्यन ने चौंककर अपनी गीली आँखों से माँ की तरफ देखा। उसे समझ नहीं आया कि वह रो रहा है और माँ हँस क्यों रही हैं? क्या वह पागल हो गई हैं या उसे और भी सज़ा देने वाली हैं?

अंजलि ने हँसते हुए अपने हाथ से आर्यन के आँसू पोंछे और उसके गाल को हल्के से सहलाया।

“बस इतनी सी बात?” अंजलि ने बहुत ही प्यार और शरारत भरे अंदाज़ में कहा।

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। “माँ… आप… आप हँस रही हैं? मैंने इतनी बड़ी बात कही और आप कह रही हैं कि बस इतनी सी बात?”

अंजलि ने उसे सहारा देकर खड़ा किया और उसे गले से लगाते हुए बोली, “पागल लड़के! तूने इसे अपनी जान पर बना लिया था? देख आर्यन, तू अब बच्चा नहीं रहा। तू एक जवान मर्द बन रहा है। इस उम्र में शरीर में हॉर्मोन्स का उतार-चढ़ाव होना, किसी स्पर्श से उत्तेजित हो जाना या कुछ नया महसूस करना… यह सब बायोलॉजिकल (Biological) है। इसमें तेरी कोई गलती नहीं है।”

उसने आर्यन की आँखों में झाँकते हुए बहुत ही साफ़ लहजे में कहा, “तूने जो किया, वह एक पल का भटकाव था। तूने जानबूझकर मुझे चोट पहुँचाने के लिए ऐसा नहीं किया। अगर तू बुरा होता, तो आज मेरे सामने खड़ा होकर रो नहीं रहा होता। तूने अपनी सच्चाई बता दी, यही साबित करता है कि तेरा चरित्र कितना साफ़ है।”

आर्यन को जैसे हज़ारों किलो के बोझ से आज़ादी मिल गई। उसकी सिसकियाँ रुक गईं, हालाँकि हिचकियाँ अभी भी आ रही थीं।

“लेकिन माँ… मैंने आपको छुआ… वह गलत था,” आर्यन ने धीमी आवाज़ में कहा।

अंजलि ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “गलत तब होता जब तू उसे अपना अधिकार समझता। तू डरा हुआ है क्योंकि तू मुझसे प्यार करता है। अब रोना बंद कर। एक डॉक्टर की माँ होने के नाते मैं जानती हूँ कि जवानी में ये सब चीज़ें कितनी आम होती हैं। तुझे खुद को ‘अपराधी’ समझने की ज़रूरत नहीं है। तू अभी भी मेरा वही प्यारा और रक्षक बेटा है।”

रसोई का माहौल जो अभी तक मातम जैसा था, वह अब एक अजीब सी शांति और अपनापन में बदल गया था। आर्यन को लगा जैसे उसकी माँ ने उसे एक नई ज़िंदगी दे दी हो।

आर्यन को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके सीने से कई मनों का बोझ एक पल में उतर गया हो। उसकी माँ की उस समझदारी भरी हँसी और माफी ने उसे एक नया जीवनदान दे दिया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस बात को वह अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा गुनाह मान रहा था, उसकी माँ ने उसे एक डॉक्टर और एक अभिभावक के नज़रिए से इतनी सहजता से स्वीकार कर लिया।

रसोई की हवा अब हल्की हो चुकी थी। आर्यन ने अपनी शर्ट की आस्तीन से आँखों के बचे-खुचे आँसू पोंछे और एक गहरी, राहत भरी साँस ली। अंजलि उसे बड़े प्यार से देख रही थी, जैसे कह रही हो कि ‘पगले, तू अभी भी मेरा छोटा बच्चा ही है।’

आर्यन ने थोड़ा संभलते हुए कहा, “माँ, आप वाकई महान हैं। मुझे लगा था कि आज सब खत्म हो जाएगा। लेकिन…” वह थोड़ा रुका और अपनी नज़रे झुकाते हुए बोला, “माँ, मुझे लगता है कि कल रात जो हुआ, वह दोबारा न हो और मैं अपनी इस गलती को सुधार सकूँ, इसलिए आज से मैं अपने कमरे में ही सोऊंगा। मुझे डर है कि कहीं मेरा शरीर फिर से बेकाबू न हो जाए और मैं आपकी गरिमा को ठेस पहुँचा दूँ।”

अंजलि ने आर्यन की बात बड़े ध्यान से सुनी। उसने देखा कि आर्यन अब भी थोड़ा डरा हुआ है और खुद पर भरोसा नहीं कर पा रहा है।

अंजलि ने आगे बढ़कर आर्यन का हाथ थामा और उसे अपनी ओर खींचते हुए बहुत ही शांत और सुदृढ़ लहजे में कहा, “नहीं आर्यन, तू कहीं नहीं जाएगा। तू मेरे ही साथ सोएगा।”

आर्यन चौंक गया। “लेकिन माँ… अगर फिर से वैसा कुछ हुआ तो?”

अंजलि ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा, “देख बेटा, पिछले एक हफ्ते से तेरे साथ सोने की वजह से मुझे जो सुकून मिला है, उसकी मुझे अब आदत हो गई है। सच तो यह है कि अब मुझे अकेले सोने में डर लगता है। वो अकेलापन और वो पुरानी ‘लत’ मुझे फिर से घेर लेगी अगर तू मेरे पास नहीं रहा। रही बात कल रात की, तो वह सिर्फ एक शारीरिक प्रतिक्रिया थी, कोई पाप नहीं। हम इसे मिलकर संभालेंगे।”

उसने आर्यन की आँखों में आँखें डालकर कहा, “अगर हम आज डर कर अलग कमरों में सो गए, तो हमारे बीच हमेशा के लिए एक पर्दा गिर जाएगा। मैं चाहती हूँ कि तू इस सहजता को स्वीकार करे। तू मेरा बेटा है, और मेरा रक्षक भी। आज से हम साथ ही सोएंगे, और बिना किसी झिझक के बातें करेंगे। मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है कि तू अपनी सीमाओं को जानता है।”

आर्यन को अपनी माँ की बातों में एक ऐसी शक्ति महसूस हुई जिसने उसकी सारी शंकाओं को खत्म कर दिया। उसे लगा कि माँ सही कह रही हैं—भागना समाधान नहीं है, बल्कि साथ रहकर उस कमजोरी को जीतना ही असली बहादुरी है।

“ठीक है माँ… जैसा आप कहें। मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगा,” आर्यन ने अब आत्मविश्वास के साथ कहा।

उस रात जब वे वापस कमरे में गए, तो माहौल में कोई तनाव नहीं था। आर्यन ने अपना तकिया लगाया और अंजलि उसके बगल में लेट गई। आज की रात पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शी और सुकून भरी थी। दोनों ने लाइट बंद की और अंधेरे में फिर से पुरानी कहानियों का सिलसिला शुरू हो गया, जैसे उस ‘सच’ ने उनके बीच के डर को हमेशा के लिए दफन कर दिया हो।

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