अगली सुबह जब खिड़की से सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो उसने एक बहुत ही शांत और पवित्र दृश्य देखा। सालों बाद अंजलि की नींद बिना किसी मानसिक बोझ या थकान के खुली थी। उसके चेहरे पर वह भारीपन नहीं था जो पिछले पंद्रह दिनों से घर कर गया था।
नाश्ते की मेज पर आज का नज़ारा कुछ अलग ही था। अंजलि ने आज सादे परांठे नहीं, बल्कि आर्यन की पसंद का खास पोहा और अदरक वाली चाय बनाई थी। उसकी चाल में एक नई ऊर्जा थी और आँखों में वो चमक वापस लौट आई थी, जो कहीं खो गई थी।
“आज तो नींद बहुत गहरी आई,” अंजलि ने चाय का कप आर्यन की ओर बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा। उसकी आवाज़ में वो खनक थी जो आर्यन ने बहुत समय से नहीं सुनी थी।
आर्यन ने पोहे का लुत्फ लेते हुए कहा, “सच में माँ! और मुझे तो पता ही नहीं चला कि कब बातें करते-करते हम सो गए। आपकी वो मेडिकल कॉलेज वाली कहानी सुनते-सुनते मुझे कब नींद आई, याद ही नहीं।”
अंजलि ने कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठते हुए कहा, “पता है आर्यन, मुझे अहसास ही नहीं हुआ था कि बस किसी का साथ होना कितना बड़ा फर्क पैदा कर सकता है। रात भर मुझे एक बार भी वो बेचैनी नहीं हुई। मुझे लग रहा है जैसे मेरा मन बहुत हल्का हो गया है।”
आर्यन ने माँ का हाथ थामकर संजीदगी से कहा, “मैंने कहा था न माँ, अकेलापन ही हर मुश्किल की जड़ होता है। अब जब हम साथ हैं, तो वो ‘एडिक्शन’ आपको छू भी नहीं पाएगा। आज आपका चेहरा बहुत फ्रेश लग रहा है, क्लिनिक में मरीज़ भी कहेंगे कि आज डॉक्टर साहिबा बहुत खुश हैं।”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। नाश्ते के दौरान वे अब उस पुरानी समस्या पर नहीं, बल्कि आने वाले कल की योजनाओं पर बातें कर रहे थे। वे छुट्टियों में कहीं बाहर घूमने जाने की प्लानिंग करने लगे और उन किताबों के बारे में चर्चा की जो वे साथ मिलकर पढ़ सकते थे।
अंजलि को महसूस हुआ कि उसके बेटे ने न केवल उसे एक बुरी लत से बचाया है, बल्कि उनके रिश्ते को एक ऐसे पायदान पर ले आया है जहाँ सम्मान और विश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं।
चाय खत्म करके जब आर्यन अपना बैग उठाकर कॉलेज के लिए निकलने लगा, तो अंजलि ने उसे दरवाज़े तक छोड़ा। “शाम को जल्दी आना, मैं तेरी पसंद की खीर बनाऊँगी,” उसने प्यार से कहा।
“बिल्कुल माँ! और शाम को फिर से ढेर सारी बातें करेंगे,” आर्यन ने हाथ हिलाते हुए विदा ली।
आज हवा में एक अलग ही मिठास थी। घर अब सिर्फ चार दीवारों का ढांचा नहीं था, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित किला बन गया था जहाँ ममता और समझदारी ने मिलकर हर बुराई को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
रात की खामोशी एक बार फिर घर पर दस्तक दे रही थी, लेकिन आज इस खामोशी में कोई बोझ नहीं था। डिनर के बाद आर्यन और अंजलि अपने कमरे में आ गए। कमरे की हल्की नीली नाइट लैंप की रोशनी में माहौल बहुत ही शांत और सुरक्षित महसूस हो रहा था।
बिस्तर पर लेटे हुए आर्यन ने तकिया ठीक किया और बोला, “माँ, आज क्लिनिक में वो खन्ना जी आए थे क्या? जो हमेशा अपनी बीमारी से ज्यादा अपनी पड़ोसन के झगड़ों की बात करते हैं?”
अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी। “हाँ! आज तो हद ही हो गई। उन्हें जुकाम था, पर वो मुझे ये समझा रहे थे कि उनके घर के सामने वाली आंटी ने कैसे उनके गमले थोड़े बाईं तरफ खिसका दिए। आधा घंटा तो उन्होंने सिर्फ गमलों की पॉलिटिक्स पर निकाल दिया!”
आर्यन ने हाथ से इशारा करते हुए खन्ना जी की मिमिक्री की, “डॉक्टर साहिबा, आप दवा तो दे रही हैं, पर क्या आपके पास उन गमलों का कोई इलाज है?”
दोनों कमरे में ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। हँसी के ये गुब्बारे उस कमरे की सारी पुरानी यादों और भारीपन को उड़ा ले जा रहे थे। हँसते-हँसते अंजलि की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसे याद भी नहीं था कि वह पिछली बार इस तरह कब बेफिक्र होकर हँसी थी।
“तू ना… बिल्कुल अपने पापा पर गया है, वैसी ही फालतू की बातें करके हँसाना जानता है,” अंजलि ने अपना कंबल ओढ़ते हुए कहा।
“अरे माँ, हँसना सबसे बड़ी थेरेपी है,” आर्यन ने थोड़ा गंभीर होते हुए लेकिन प्यार से कहा। “अब देखिये, रात के सवा ग्यारह बज रहे हैं और हमें नींद आने लगी है। कोई तनाव नहीं, कोई बेचैनी नहीं। बस अच्छे जोक्स और आपकी ये प्यारी सी हँसी।”
अंजलि ने आर्यन की तरफ करवट ली और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “थैंक यू आर्यन। मुझे वापस ‘मैं’ बनाने के लिए शुक्रिया।”
“गुड नाइट माँ, अब आँखें बंद कीजिये।” आर्यन ने लाइट बंद करते हुए कहा।
“गुड नाइट बेटा,” अंजलि ने सुकून से अपनी आँखें मूंद लीं।
अंधेरे कमरे में अब सिर्फ दो इंसानों की शांत और गहरी साँसों की आवाज़ थी। कोई पुरानी लत, कोई अकेलापन अब उस कमरे की चौखट पार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। कुछ ही मिनटों में दोनों गहरी और मीठी नींद की आगोश में समा गए।
देखते-देखते एक सप्ताह बीत गया। यह सात दिन उस घर के लिए किसी बड़े बदलाव से कम नहीं थे। जो घर कभी भारी खामोशी और अनकहे तनावों से भरा रहता था, अब वहाँ सुबह की चाय के साथ हँसी की गूँज सुनाई देती थी और रात के सन्नाटे की जगह सुकून भरी नींद ने ले ली थी।
इन सात दिनों में आर्यन और अंजलि का रिश्ता एक नए धरातल पर पहुँच गया था। अब यह सिर्फ माँ-बेटे का रिश्ता नहीं था, बल्कि दो ऐसे दोस्तों का साथ था जो एक-दूसरे की परवाह बिना कहे करना जानते थे।
हर रात आर्यन अपना तकिया और पढ़ाई का सामान लेकर माँ के कमरे में पहुँच जाता। वे कभी किसी किताब पर चर्चा करते, कभी आर्यन उसे अपने कॉलेज के ‘गॉसिप्स’ सुनाता, तो कभी अंजलि उसे पुराने किस्से सुनाती।
जो एडिक्शन (लत) अंजलि के लिए एक बेबसी बन चुका था, वह अब पूरी तरह गायब हो चुका था। उसका मन अब रात के उस ‘अंधेरे कोने’ में नहीं भागता था, क्योंकि वह कोना अब आर्यन की बातों और ठहाकों से भर गया था।
एक हफ्ते के भीतर ही अंजलि की काया पलट गई थी। उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे गायब हो गए थे, चेहरे पर एक कुदरती चमक (Natural Glow) लौट आई थी और क्लिनिक में उसकी ऊर्जा (Energy) पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी।
एक सप्ताह पूरा होने पर, शनिवार की शाम को दोनों ने साथ में डिनर बनाया। किचन में संगीत बज रहा था और दोनों साथ में सब्जियाँ काट रहे थे।
“माँ, आपने गौर किया?” आर्यन ने टमाटर काटते हुए पूछा। “आज पूरे सात दिन हो गए हैं और आपने एक बार भी सिरदर्द या थकान की शिकायत नहीं की।”
अंजलि रुक गई और उसने खिड़की के बाहर ढलते सूरज को देखा। उसने महसूस किया कि उसकी वाइटालिटी (Vitality) और काम करने की शक्ति अब चरम पर थी। “तू सही कह रहा है आर्यन। मुझे अब याद भी नहीं आता कि वो बेचैनी कैसी होती थी। मुझे लगता है कि मैंने उस लत को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अब मुझे उसकी ज़रूरत ही महसूस नहीं होती।”
आर्यन ने मुस्कुराकर माँ को देखा। उसे गर्व था कि उसने अपनी माँ को उस दलदल से बाहर निकाल लिया था।
उस रात भी, जब वे सोने के लिए लेटे, तो कोई डर नहीं था। अंजलि को अहसास हुआ कि जीवन में ‘विकल्प’ हमेशा होते हैं, बस हमें सही हाथ थामने की ज़रूरत होती है। आर्यन के खर्राटों की हल्की आवाज़ अंजलि के लिए किसी लोरी से कम नहीं थी। उसने सुकून से अपनी आँखें बंद कीं और एक ऐसी दुनिया में खो गई जहाँ सिर्फ शांति थी।
रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां 2:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे में हल्की नीली रोशनी बिखरी हुई थी। अचानक आर्यन की नींद खुली। शायद उसे थोड़ी गर्मी महसूस हो रही थी या शायद नींद का झोंका टूट गया था।
जैसे ही उसकी चेतना वापस आई, उसे अपने शरीर पर एक भारीपन का अहसास हुआ।
आर्यन ने महसूस किया कि उसकी माँ, जो गहरी नींद में थीं, सोते-सोते अनजाने में उसकी ओर खिसक आई थीं। अंजलि का एक हाथ आर्यन के सीने पर रखा हुआ था, और उनकी टांगें आर्यन की टांगों के ऊपर चढ़ी हुई थीं। बचपन में यह एक बहुत ही सामान्य बात थी—जब वह छोटा था, तो इसी तरह माँ से चिपककर सोता था।
लेकिन आज, 15 दिनों की इस मशक्कत और ‘एडिक्शन’ वाली बातचीत के बाद, आर्यन को यह स्पर्श थोड़ा अजीब लगा।
उसके मन में एक अजीब सी कशमकश शुरू हो गई। एक तरफ तो यह वही ममता भरा स्पर्श था जिसे वह बचपन से जानता था, लेकिन दूसरी तरफ, अब वह एक वयस्क (Adult) था। उसे याद आया कि कैसे पिछले कुछ दिनों से वे इस ‘अकेलेपन’ और ‘लत’ से लड़ रहे थे।
उसने अंधेरे में अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा। अंजलि बहुत ही मासूमियत और सुकून से सो रही थीं। उनके चेहरे पर वह बेचैनी बिल्कुल नहीं थी जो ‘उस’ लत के दौरान हुआ करती थी। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें सालों बाद कोई सुरक्षित ठिकाना मिला हो।
आर्यन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
क्या वह धीरे से माँ का हाथ हटा दे?
या फिर इसे एक सामान्य ‘स्लीपिंग पोस्चर’ (Sleeping posture) समझकर सो जाए?
उसे थोड़ा संकोच (Awkwardness) महसूस हो रहा था। उसे लगा कि कहीं माँ की नींद न खुल जाए और वे असहज महसूस न करने लगें। उसने बहुत ही सावधानी से, बिना कोई आहट किए, अपनी साँसों को नियंत्रित किया। उसे अहसास हुआ कि माँ शायद अनजाने में उस सुरक्षा (Security) को ढूँढ रही थीं जो उन्हें इस लत से दूर रख रही थी।
उसने अपनी नज़रें छत की ओर कर लीं। वह अजीब सा अहसास अभी भी बना हुआ था, लेकिन उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ एक माँ का अपने बेटे पर अटूट भरोसा है। वह करीब आधे घंटे तक वैसे ही बुत बना लेटा रहा, जब तक कि उसकी आँखों में दोबारा नींद का बोझ नहीं आ गया।
रात के सन्नाटे में घड़ी की सुइयां अब 3:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। कमरे की हल्की नीली रोशनी में सब कुछ धुंधला सा था। आर्यन की नींद एक बार फिर खुली, लेकिन इस बार झटके से। उसे अपने शरीर के निचले हिस्से में एक अजीब सी गर्मी और भारीपन का अहसास हुआ।
नींद और होश के बीच झूलते हुए आर्यन ने महसूस किया कि अंजलि सोते-सोते और भी करीब खिसक आई थीं। उनकी टांग अब आर्यन के शरीर पर काफी ऊपर की ओर थी और अनजाने में वह आर्यन के निजी अंगों (Private area) को स्पर्श कर रही थी।
अंजलि गहरी और बेफिक्र नींद में थीं, उनकी सांसें बिल्कुल स्थिर थीं। लेकिन उनके शरीर की कुदरती गर्मी और उस अनचाहे स्पर्श ने आर्यन के शरीर में एक अजीब सी सनसनी पैदा कर दी थी। वह एक जवान लड़का था और शारीरिक रूप से इस तरह के स्पर्श के प्रति संवेदनशील था। उस स्पर्श से उसे एक हल्की सी सिहरन महसूस होने लगी, जो उसे अंदर तक झकझोर रही थी।
उसका दिल अब ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था। उसके मन में विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ:
“क्या माँ को पता है? नहीं, वह तो गहरी नींद में हैं।”
“क्या मुझे उन्हें जगाना चाहिए? नहीं, इससे वे बहुत शर्मिंदा हो जाएंगी।”
“क्या मुझे बस धीरे से हट जाना चाहिए?”
उसे बहुत ही अजीब और असहज (Awkward) महसूस हो रहा था। एक तरफ उनकी माँ की वो पवित्र ममता थी जिसने उसे बचपन से पाला था, और दूसरी तरफ यह एक अनजाना शारीरिक दबाव था जिसने उसके शरीर में प्राकृतिक प्रतिक्रिया (Natural response) पैदा कर दी थी। वह अपनी जगह पर बिल्कुल जम गया था, हिलने-डुलने से भी डर रहा था कि कहीं कोई गलत हरकत न हो जाए या माँ जाग न जाएं।
उसे अहसास हुआ कि माँ शायद अपनी उस ‘लत’ (Addiction) को छोड़ने के संघर्ष में अनजाने में एक ‘सहारे’ या ‘सुरक्षा’ की तलाश कर रही थीं, लेकिन यह स्थिति अब आर्यन की सहनशक्ति और उसकी नैतिकता की परीक्षा ले रही थी। वह पसीने से तर-बतर हो रहा था, जबकि बाहर का मौसम ठंडा था।
रात के उस सन्नाटे में कमरे की हवा जैसे भारी हो गई थी। आर्यन का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। अंजलि की टांग का दबाव और उनके शरीर की कुदरती गर्मी अब सीधे उसके लंड पर महसूस हो रही थी। अंजलि गहरी नींद में थीं, लेकिन उनके शरीर का वह अनजाना स्पर्श आर्यन के पौरुष को जगाने के लिए काफी था।
आर्यन ने महसूस किया कि उसका लंडधीरे-धीरे कड़ा होने लगा था और उसमें एक तेज़ सनसनी दौड़ रही थी। उसे अपनी इस शारीरिक प्रतिक्रिया पर बहुत ही असहज (Awkward) और अंदर ही अंदर ग्लानि महसूस हो रही थी। “यह मेरी माँ हैं,” वह बार-बार अपने मन को समझा रहा था, लेकिन शरीर की प्राकृतिक उत्तेजना उसके काबू से बाहर हो रही थी।
अंजलि की जांघ का घेरा अब उसके लंड के बिल्कुल ऊपर था, और उनके हिलने-डुलने से जो रगड़ पैदा हो रही थी, वह आर्यन की बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी। उसे डर था कि अगर यह उत्तेजना और बढ़ी, तो शायद उसकी माँ की नींद खुल जाए और वे इस स्थिति को देखकर शर्म से पानी-पानी हो जाएं।
उसने तय किया कि वह इस तरह बुत बनकर नहीं लेटा रह सकता। उसे अपनी माँ को धीरे से सही स्थिति में लाना ही होगा ताकि यह असहज स्पर्श खत्म हो सके।
उसने अपनी सांसें रोकीं और बहुत ही सावधानी से अपना हाथ चादर के नीचे ले गया। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। उसने बहुत ही कोमलता से अंजलि की टांग के पास अपना हाथ रखा। वह नहीं चाहता था कि माँ अचानक जाग जाएं।
उसने अपनी उंगलियों से धीरे-धीरे माँ की टांग को ऊपर की ओर से पकड़कर थोड़ा सरकाने की कोशिश की। जैसे ही उसने स्पर्श किया, उसे अंजलि की त्वचा की मखमली नरमी और उस ‘लत’ के कारण आने वाली शरीर की तपिश महसूस हुई। उसका हाथ हल्का सा कांप रहा था।
उसने इंच-दर-इंच बहुत ही धीरज के साथ माँ की टांग को अपने लंड के ऊपर से हटाकर थोड़ा बगल की ओर खिसकाना शुरू किया। हर सेकंड उसे लग रहा था कि माँ अभी आँखें खोल देंगी। वह पसीने से तर-बतर था, लेकिन उसका पूरा ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि वह इस ‘असहज’ स्थिति से बाहर निकल सके और अपनी माँ की गरिमा को भी ठेस न लगने दे।
आखिरकार, उसने उनकी टांग को सुरक्षित दूरी पर कर दिया। लेकिन उस स्पर्श और उस गर्माहट ने आर्यन के मन और शरीर में एक ऐसी हलचल मचा दी थी, जिसे शांत करना अब उसके लिए नामुमकिन लग रहा था।