रात का सन्नाटा एक बार फिर गहरा चुका था। घड़ी की सुइयां 1:00 बजे का वक्त दिखा रही थीं। ऊपर अपने कमरे में आर्यन गहरी नींद में था, लेकिन अचानक उसकी आँखें खुल गईं। पता नहीं कोई सपना था या मन की कोई गहरी बेचैनी, पर उसकी नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी।
वह बिस्तर पर लेटा रहा, लेकिन उसके दिमाग में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था। क्या कल रात जो हुआ, वह सिर्फ एक इत्तेफाक था? क्या माँ आज वाकई ठीक हैं?
बिना किसी शोर के, आर्यन बिस्तर से उठा। आज उसने फोन की टॉर्च नहीं जलाई। वह अंधेरे का आदी हो चुका था। वह दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरा। दिल की धड़कन आज भी तेज़ थी, पर उसमें कल जैसी घबराहट नहीं, बल्कि एक अजीब सी जिज्ञासा थी।
वह माँ के कमरे के दरवाज़े के पास पहुँचा। गलियारे में वही सन्नाटा था। उसने अपनी साँसें रोकीं और धीरे से अपना कान दरवाज़े की लकड़ी से सटा दिया।
वही आवाज़ें…
आज भी कमरे के अंदर से वही हल्की-हल्की सिसकारियों की गूँज सुनाई दे रही थी। वह टूटी हुई साँसें और चादरों की सरसराहट बिल्कुल कल रात जैसी ही थी। आर्यन को अब थर्मामीटर की ज़रूरत नहीं थी, न ही उसे यह जानने की ज़रूरत थी कि माँ को बुखार है या नहीं।
उसे अब समझ आ गया था कि यह माँ की दिनभर की थकान, तनाव और उनके अपने अकेलेपन को दूर करने का उनका निजी तरीका था। वह आवाज़ें जिसे वह कल तक ‘तकलीफ’ समझ रहा था, वह दरअसल उनकी अपनी एक दुनिया थी जहाँ वह कुछ पलों के लिए सिर्फ ‘अंजलि’ थीं, न कि किसी की माँ या कोई डॉक्टर।
आर्यन कुछ पलों तक वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर अब कोई हैरानी नहीं थी, न ही कोई बेचैनी। उसने शांति से अपना सिर दरवाज़े से हटाया। उसने महसूस किया कि हर इंसान के पास एक ऐसा कमरा होता है जहाँ वह अपनी भावनाओं को आज़ाद छोड़ देता है।
वह बिना कोई आहट किए चुपचाप ऊपर अपने कमरे में वापस आ गया। बिस्तर पर लेटकर वह छत की ओर देखने लगा। उसके मन में अब कोई कड़वाहट या शर्म नहीं थी। उसने सोचा कि माँ दिन भर सबके लिए कितनी मज़बूत बनी रहती हैं, शायद रात के इन चंद पलों में ही वह खुद को ढूँढती होंगी।
एक गहरी और सुकून भरी साँस लेकर उसने आँखें मूँद लीं। वह समझ चुका था कि ‘निजता’ (Privacy) का सम्मान करना ही सबसे बड़ी परिपक्वता है। इसी सोच के साथ, कुछ ही देर में वह गहरी और शांत नींद की आगोश में चला गया।
अगली सुबह की शुरुआत बिल्कुल वैसी ही हुई जैसी हर रोज़ होती थी। खिड़की से आती ताज़ी हवा और रसोई से आती बर्तनों की खनक ने आर्यन की नींद खोली। रात की उस खोज के बाद आर्यन के मन में अब एक अजीब सी शांति थी। वह अब अपनी माँ को सिर्फ एक ‘अभिभावक’ के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘इंसान’ के तौर पर देख पा रहा था।
नाश्ते की मेज पर सब कुछ सामान्य था। अंजलि ने ताज़े पराँठे और दही परोसा। दोनों ने हँसी-मजाक किया, कॉलेज के प्रोजेक्ट्स पर बात की और अंजलि ने उसे ढेर सारी हिदायतें दीं। रात के उस सन्नाटे और उन आवाज़ों का कोई ज़िक्र नहीं था, पर आर्यन के व्यवहार में आज एक नई तरह की गंभीरता और सम्मान था।
“माँ, आज शाम को आप क्लिनिक में अकेली होंगी क्या?” आर्यन ने चाय का आखिरी घूँट लेते हुए पूछा।
अंजलि ने टिफिन पैक करते हुए कहा, “हाँ बेटा, आज नर्स लता छुट्टी पर है और शाम को मरीज़ों का काफी रश रहता है। थोड़ा हेक्टिक (hectic) होने वाला है आज, क्यों?”
आर्यन मुस्कुराया और अपना बैग उठाते हुए बोला, “बस ऐसे ही पूछ रहा था। आप अपना ध्यान रखना।”
शाम के ठीक पांच बजे, जब अंजलि अपने केबिन में एक मरीज़ की फाइल देख रही थी, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने सिर उठाकर देखा तो हैरान रह गई। आर्यन दरवाजे पर खड़ा था, उसकी शर्ट की आस्तीनें मुड़ी हुई थीं और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।
“तुम यहाँ? इस वक्त?” अंजलि ने चश्मा उतारते हुए पूछा।
“मैंने सोचा आज नर्स नहीं है, तो आपकी हेल्प कर दूँ। आखिर मैं भी तो डॉक्टर का बेटा हूँ, पर्चियाँ बनाना और मरीज़ों को नंबर से बुलाना तो मैं भी कर सकता हूँ,” आर्यन ने अंदर आते हुए कहा।
अंजलि की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसे समझ आ गया कि आर्यन यह सब क्यों कर रहा है। वह उसकी थकान और उसके काम के बोझ को कम करना चाहता था।
पूरी शाम आर्यन ने एक सहायक की तरह क्लिनिक का सारा बाहरी काम संभाला। वह मरीज़ों से शांति से बात कर रहा था, फाइलें मैनेज कर रहा था और बीच-बीच में माँ के लिए पानी और चाय का भी इंतज़ाम कर रहा था। अंजलि ने केबिन के अंदर से उसे काम करते देखा, तो उसे अहसास हुआ कि उसका बेटा वाकई बहुत बड़ा और ज़िम्मेदार हो गया है।
काम के बीच में जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, एक मूक संवाद होता—एक ऐसा रिश्ता जहाँ अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। आर्यन अपनी माँ के संघर्ष और उनकी मेहनत को करीब से देख रहा था, और अंजलि अपने बेटे की उस निस्वार्थ सेवा को महसूस कर रही थी।
क्लिनिक का व्यस्त समय खत्म होने के बाद, घर की रसोई से आती खुशबू और डाइनिंग टेबल पर सजी थालियाँ दिन भर की थकान को कम करने के लिए काफी थीं। रात के करीब 9 बज रहे थे। अंजलि और आर्यन आज साथ में खाना खाने बैठे थे। माहौल में एक बहुत ही सुकून भरी और घरेलू शांति थी।
अंजलि ने आर्यन की थाली में गर्मागर्म दाल परोसी और खुद भी सामने बैठ गई। “आज सच में तूने बहुत बड़ी मदद कर दी आर्यन। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि तू इतनी कुशलता से क्लिनिक का रश संभाल लेगा। सच कहूँ तो, आज मुझे थकान बहुत कम महसूस हो रही है।”
आर्यन ने निवाला तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा, “अरे माँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है? बल्कि आज मुझे अहसास हुआ कि आप अकेले इतना सब कैसे मैनेज करती हैं। इतने तरह के लोग, उनकी परेशानियाँ… और आप सबके साथ कितनी शांति से पेश आती हैं। सच में, आप बहुत ‘सुपरवुमन’ टाइप की डॉक्टर हैं।”
अंजलि धीरे से हँसी। “सुपरवुमन नहीं रे, बस ज़िम्मेदारी है। जब मरीज़ ठीक होकर जाता है, तो सब थकान मिट जाती है। पर हाँ, आज तेरा वहाँ होना मेरे लिए एक बड़े सपोर्ट जैसा था।”
दोनों के बीच बातें बहुत ही सरल और गहरी थीं। आर्यन ने कॉलेज के कुछ किस्से सुनाए और अंजलि ने अपने मेडिकल कॉलेज के दिनों की कुछ पुरानी यादें साझा कीं। बातचीत का सिलसिला ऐसा था कि पता ही नहीं चला कि कब डिनर खत्म हो गया।
खाने के बाद, आर्यन ने अपनी प्लेट उठाई और बहुत ही सहजता से बोला, “माँ, आप जाकर आराम कीजिये। आज क्लिनिक में आपने बहुत काम किया है। किचन मैं संभाल लूँगा।”
अंजलि उसे गौर से देखती रही। उसे महसूस हुआ कि आर्यन के मन में जो कल रात और आज सुबह की उलझन थी, वह अब पूरी तरह एक सम्मान और सेवा भाव में बदल चुकी थी। अब उनके बीच कोई पर्दा या असहजता नहीं बची थी।
“ठीक है भाई, आज तू ही ‘घर का डॉक्टर’ बन जा,” अंजलि ने प्यार से उसके गाल थपथपाए और कमरे की ओर बढ़ने लगी।
आर्यन ने रसोई की लाइट जलाई और बर्तन समेटने लगा। आज रात घर का कोना-कोना एक अलग ही पवित्रता और मिठास से भरा हुआ था। दोनों ने एक-दूसरे के व्यक्तित्व के उन कोनों को स्वीकार कर लिया था जो अक्सर शब्दों में नहीं कहे जाते।
रसोई की दीवारों पर पीली रोशनी की चमक थी और बाहर रात का गहरा सन्नाटा। आर्यन ने दूध का पतीला चूल्हे पर रखा और गैस जला दी। वह धीमे-धीमे चम्मच से दूध को हिला रहा था, तभी पीछे से हल्की खनक सुनाई दी। अंजलि अपनी नाइट गाउन पर शॉल ओढ़े रसोई में दाखिल हुई।
“अभी तक सोया नहीं?” अंजलि ने काउंटर का सहारा लेकर खड़े होते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक सुकून भरी थकावट थी।
“बस माँ, दूध गरम हो जाए फिर जाऊंगा,” आर्यन ने अपनी नज़रें पतीले पर ही टिकाए रखीं। दूध में उबाल आने ही वाला था। उसने गैस धीमी की और एक लंबी सांस ली।
कल रात से जो बातें उसके सीने में दबी थीं, और आज शाम क्लिनिक में जो उसने महसूस किया था, वह सब अब जुबान पर आने के लिए बेताब था। उसके चेहरे पर एक हल्की हिचकिचाहट थी, वह शब्दों को चुन रहा था ताकि कोई बात गलत न लग जाए।
“माँ…” उसने बहुत धीरे से शुरुआत की।
“हूँ?” अंजलि ने उसे गौर से देखा।
आर्यन ने दूध को दो गिलासों में पलटा और एक गिलास माँ की ओर बढ़ाते हुए बोला, “आज क्लिनिक में मैंने आपको देखा… आप दूसरों के दर्द को इतनी आसानी से सुन लेती हैं, उनका इलाज करती हैं। पर मुझे आज अहसास हुआ कि आप अपनी थकान, अपना अकेलापन और अपनी ज़रूरतें किसी से नहीं कहतीं।”
वह थोड़ा रुका, फिर नज़रे झुकाकर बोला, “उस रात मैं जो कुछ भी समझ रहा था या जो मैंने देखा… मुझे पहले लगा कि मैं शर्मिंदा हूँ। पर आज दिन भर आपके साथ रहने के बाद मुझे समझ आया कि आप भी तो एक इंसान हैं। आपकी अपनी भी एक लाइफ है जिसे शायद मैं अब तक सिर्फ ‘माँ’ के चश्मे से देख रहा था।”
उसकी आवाज़ में थोड़ी शर्म थी लेकिन बहुत सारा सम्मान। “मैं बस ये कहना चाहता था कि… आप जैसी भी हैं, आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हैं। और अब मैं आपकी प्राइवेसी का उतना ही सम्मान करूँगा जितना आपकी ममता का करता हूँ।”
रसोई में एक पल के लिए खामोशी छा गई। दूध की भाप उनके बीच के उस आखिरी धुंधलके को भी साफ कर रही थी। अंजलि ने गिलास थामा और आर्यन की आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी, पर होठों पर एक ऐसी मुस्कान जो कह रही थी कि आज उसका बेटा वाकई में ‘बड़ा’ हो गया है।
“शुक्रिया आर्यन,” अंजलि ने बस इतना ही कहा, पर उन दो शब्दों में पूरी कायनात का सुकून था।
आर्यन ने दूध का गिलास हाथ में पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी नजरें अभी भी नीचे फर्श पर थीं। वह अपनी बात कहने के लिए पूरी हिम्मत जुटा रहा था। उसे पता था कि विषय संवेदनशील है, लेकिन उसकी फिक्र उसकी झिझक से कहीं ज्यादा बड़ी थी।
आर्यन ने एक गहरी सांस ली और माँ की ओर देखते हुए बहुत ही संजीदगी से बोलना शुरू किया।
“माँ… उस रात जो हुआ, उसके बाद मेरी उत्सुकता (curiosity) बढ़ गई थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो सब क्या था, इसलिए मैंने इसके बारे में थोड़ा पढ़ा और रिसर्च की कि आखिर यह सब क्या होता है और शरीर पर इसका क्या असर पड़ता है।”
अंजलि खामोश रही, वह बस आर्यन की बातों को गहराई से सुन रही थी।
आर्यन ने आगे कहा, “जहाँ तक मैंने पढ़ा और समझा है… मैं जानता हूँ कि यह तनाव कम करने का एक तरीका है, लेकिन माँ, इसे रोज-रोज करना शायद सही नहीं है। लेखों (articles) में लिखा था कि इसकी अति करने से आपकी सेहत, स्टैमिना (Stamina) और वाइटालिटी पावर (Vitality Power) में कमी आ सकती है। आप दिन भर क्लिनिक में इतनी मेहनत करती हैं, इतनी भागदौड़ करती हैं… मैं नहीं चाहता कि किसी भी वजह से आपकी ऊर्जा कम हो या आपको कमजोरी महसूस हो।”
उसके चेहरे पर कोई निर्णय (judgment) नहीं था, सिर्फ एक डॉक्टर के बेटे की वैज्ञानिक फिक्र और एक बच्चे की अपनी माँ के प्रति चिंता थी।
उसने धीमी आवाज में बात खत्म की, “मैं बस आपकी सेहत को लेकर फिक्रमंद हूँ माँ। आप हम सबके लिए बहुत ज़रूरी हैं, और आपकी वाइटालिटी ही इस घर की जान है। इसलिए… बस अपना ख्याल रखियेगा।”
रसोई में एक गरिमापूर्ण सन्नाटा पसर गया। अंजलि ने देखा कि आर्यन ने इस विषय को कितनी परिपक्वता (maturity) के साथ एक स्वास्थ्य संबंधी चिंता (health concern) से जोड़ दिया था। उसकी बातों में कोई अश्लीलता नहीं थी, बल्कि एक शुद्ध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण था।
अंजलि ने एक लंबी सांस ली और आर्यन के कंधे को थपथपाते हुए कहा, “तू वाकई अब बड़ा हो गया है आर्यन। तूने न सिर्फ मेरी स्थिति को समझा, बल्कि एक डॉक्टर की तरह मेरी सेहत की भी फिक्र की। मैं तेरी बात का ध्यान रखूँगी। अब तू फिक्र छोड़ और शांति से जाकर सो जा।”
अगले पंद्रह दिन आर्यन के लिए किसी कशमकश से कम नहीं थे। घर का माहौल ऊपरी तौर पर तो बिल्कुल सामान्य था—वही सुबह की चाय, वही क्लिनिक की बातें और वही शाम का साथ। लेकिन आर्यन के मन के किसी कोने में एक बेचैनी घर कर गई थी।
उस रात की बातचीत के बाद आर्यन को लगा था कि शायद चीजें बदलेंगी। उसे उम्मीद थी कि उसकी वैज्ञानिक सलाह और उसकी फिक्र का माँ पर असर होगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। पिछले दो हफ्तों से, जब भी रात के सन्नाटे में घर की लाइटें बुझतीं और आर्यन अपने कमरे में सोने की कोशिश करता, उसे नीचे के कमरे से वही चिर-परिचित आहटें सुनाई देतीं।
वह रोज़ रात को जागता, छत को घूरता और दीवार घड़ी की टिक-टिक के साथ उन सिसकारियों को सुनता। उसे अब उन आवाजों से कोई ‘शॉक’ नहीं लगता था, बल्कि एक गहरी चिंता होने लगी थी।
उसने गौर किया था कि पिछले कुछ दिनों में अंजलि के चेहरे पर थकान की लकीरें थोड़ी गहरी हो गई थीं। सुबह जब वह नाश्ते की मेज पर आती, तो उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे साफ़ दिखते थे। हालाँकि वह मुस्कुराकर अपनी थकान छिपा लेती थी, लेकिन आर्यन की पारखी नज़रें देख पा रही थीं कि उसकी वाइटालिटी और स्टैमिना वाकई प्रभावित हो रहे थे।
“माँ खुद एक डॉक्टर हैं, फिर भी वह अपनी सेहत के साथ यह खिलवाड़ क्यों कर रही हैं?” आर्यन अक्सर खुद से यह सवाल पूछता।
उसके मन में कई विचार आते—क्या यह तनाव का कोई बहुत गहरा रूप है? या फिर माँ को मेरी बातों का बुरा लगा और उन्होंने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया? उसे अपनी मर्यादा का भी ख्याल था, लेकिन माँ की गिरती सेहत उससे देखी नहीं जा रही थी। उसने महसूस किया कि सिर्फ एक बार कह देना काफी नहीं था।
आज शाम जब वह कॉलेज से घर लौट रहा था, तो उसने मन ही मन एक कड़ा निर्णय लिया। उसने सोचा कि चुप्पी साध लेने से समस्या हल नहीं होगी। एक बेटा होने के नाते, अगर वह आज अपनी माँ को सही रास्ता नहीं दिखा पाया, तो शायद वह खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाएगा।
“आज मुझे फिर से बात करनी होगी। चाहे कितनी भी हिचकिचाहट क्यों न हो, चाहे माहौल कितना भी असहज क्यों न हो जाए, पर मुझे उन्हें समझाना होगा कि यह ‘रूटीन’ उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।”
घर पहुँचते ही उसने देखा कि अंजलि रसोई में शाम की चाय बना रही थी। वह थकी हुई लग रही थी, उसने अपनी गर्दन को हल्के से झटका दिया जैसे कि वह दर्द में हो। आर्यन ने अपना बैग सोफे पर रखा और गहरी साँस ली। उसने खुद को मानसिक रूप से तैयार किया कि आज का संवाद कल के दूध वाले संवाद से कहीं ज्यादा गंभीर और सीधा होगा।
सूरज ढल रहा था, और आर्यन खिड़की के पास खड़ा होकर बस उस सही पल का इंतज़ार करने लगा जब वह एक बार फिर मर्यादा और ममता के बीच का वह पुल पार कर अपनी माँ से बात कर सके।
डिनर के बाद का समय था। आज रात घर का सन्नाटा कल की तुलना में कुछ ज़्यादा भारी लग रहा था। अंजलि मेज साफ कर रही थी, लेकिन उसकी हरकतों में वो फुर्ती नहीं थी जो अमूमन होती थी। आर्यन वहीं बैठा रहा, उसने अपना हाथ अपनी माँ के हाथ पर रखा और उन्हें रुकने का इशारा किया।
“माँ, बैठिए। मुझे आपसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है,” आर्यन की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जिसे अंजलि टाल नहीं सकी। वह धीरे से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
आर्यन ने कुछ पल खामोशी से उनकी थकी हुई आँखों में देखा। “पिछले 15 दिनों से मैं देख रहा हूँ माँ। मैंने आपसे कहा था कि आपकी सेहत गिर रही है, लेकिन कुछ भी नहीं बदला। आपकी आँखें, आपकी ये थकान… सब कुछ बता रही हैं कि आप अभी भी उसी रूटीन में फंसी हुई हैं। क्यों माँ? आप तो खुद डॉक्टर हैं, आप इसके परिणामों को मुझसे बेहतर जानती हैं।”
अंजलि ने पहले तो नज़रे चुराने की कोशिश की, लेकिन जब उसने आर्यन की आँखों में छिपी बेपनाह फिक्र देखी, तो उसका बांध टूट गया। उसने एक लंबी और बोझिल साँस ली और अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया।
“आर्यन…” उसकी आवाज़ थकी हुई और कंपकपाती हुई थी। “मुझे लगा था कि मैं इसे कंट्रोल कर लूंगी। मुझे लगा था कि तेरी बात सुनने के बाद मैं रुक जाऊँगी। लेकिन सच तो ये है कि…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में फंस रहे हों।
उसने आर्यन की ओर देखते हुए बहुत ही बेबसी से कहा, “बेटा, ये अब मेरी इच्छा (choice) नहीं रही, ये मेरा एक एडिक्शन (Addiction) बन चुका है।”
आर्यन स्तब्ध रह गया। उसने इस शब्द की उम्मीद नहीं की थी।
अंजलि ने आगे कहा, “दिन भर का तनाव, वो अकेलापन और फिर रात का वो सन्नाटा… शुरुआत में ये सिर्फ सुकून पाने का एक ज़रिया था। लेकिन अब, मुझे खुद नहीं पता कि कब ये मेरी मजबूरी बन गया। मैं रात को लेटी होती हूँ, मेरा दिमाग कहता है कि ‘नहीं अंजलि, ये गलत है, तेरी सेहत गिर रही है’, लेकिन मेरा शरीर मेरी बात नहीं सुनता। मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाती आर्यन। मुझे खुद से चिढ़ होने लगती है, पर मैं इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रही हूँ।”
अंजलि की आँखों में आँसू थे—एक ऐसी माँ के आँसू जो अपने ही मन के सामने हार चुकी थी। वह एक सफल डॉक्टर थी, एक आदर्श माँ थी, लेकिन इस एक निजी कमज़ोरी ने उसे भीतर से झकझोर दिया था।
आर्यन को अब गुस्सा नहीं, बल्कि अपनी माँ के लिए गहरी सहानुभूति महसूस हुई। उसने देखा कि उसकी माँ किसी ‘बुराई’ में नहीं, बल्कि एक ‘बीमारी’ की गिरफ्त में थी।
“माँ, आपने इसे स्वीकार किया, यही सबसे बड़ी बात है,” आर्यन ने उनका हाथ मजबूती से थामते हुए कहा। “अगर ये एडिक्शन है, तो हम इससे लड़ेंगे। आप अकेली नहीं हैं। अब इसे रोकना मेरी भी ज़िम्मेदारी है।”
आर्यन ने अपनी माँ की आँखों में झाँका। वहाँ ग्लानि और बेबसी की एक गहरी परत थी। उसने महसूस किया कि सलाह और उपदेशों का समय अब निकल चुका है; अब समय था साथ खड़े होने का। एक डॉक्टर जब खुद मरीज़ बन जाए, तो उसे दवा से ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है।
आर्यन ने एक पल के लिए भी झिझक नहीं दिखाई। उसने अंजलि के हाथों को अपने हाथों में थोड़ा और कस लिया।
“माँ, अकेलेपन से लड़ना आसान नहीं होता, और जब कोई चीज़ लत बन जाए, तो इच्छाशक्ति भी जवाब दे देती है,” आर्यन ने बहुत ही शांत और सुलझे हुए लहजे में कहा। “आप खुद को रोक नहीं पा रही हैं क्योंकि रात का वो सन्नाटा आपको मजबूर कर देता है। इसलिए, मैंने एक फैसला किया है।”
अंजलि ने सवालिया नज़रों से उसे देखा।
आर्यन ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आज से मैं आपके साथ आपके ही कमरे में सोऊंगा। बिल्कुल वैसे ही, जैसे मैं बचपन में सोया करता था।”
अंजलि के चेहरे पर हैरानी के भाव थे। “लेकिन आर्यन… तू अब बड़ा हो गया है, तेरा अपना स्पेस है… और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तेरी नींद खराब हो।”
“मेरी नींद आपकी सेहत से बढ़कर नहीं है माँ,” आर्यन ने दृढ़ता से कहा। “जब मैं छोटा था और मुझे डर लगता था, तब आप मुझे अपने पास सुलाती थीं। आज आपको मेरी ज़रूरत है। जब मैं आपके पास रहूँगा, तो आप अकेला महसूस नहीं करेंगी। हम बातें करेंगे, पुरानी यादें ताज़ा करेंगे और जब तक आपको गहरी नींद नहीं आ जाएगी, मैं वहीं रहूँगा। आपकी ये लत सिर्फ तभी टूटेगी जब वो ‘अकेलापन’ खत्म होगा।”
अंजलि की आँखों से एक आँसू टपक कर आर्यन के हाथ पर गिरा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका बेटा इतना बड़ा और समझदार हो गया है कि वह उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना उसे इस दलदल से निकालने के लिए खुद को समर्पित कर रहा है।
“तुझे सच में लगता है कि इससे फर्क पड़ेगा?” अंजलि ने धीमी आवाज़ में पूछा।
“पक्का पड़ेगा माँ,” आर्यन ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थामकर उसे खड़ा किया। “चलिए, आज से हमारा ये नया रूटीन शुरू होता है। आप चलिए, मैं दूध लेकर आता हूँ।”
उस रात, सालों बाद आर्यन अपना तकिया लेकर अपनी माँ के कमरे में गया। उसने कमरे की वो भारी और तनावपूर्ण खामोशी को खत्म करने के लिए हल्की-फुल्की बातें शुरू कीं। वह बिस्तर के एक तरफ लेट गया, और अंजलि दूसरी तरफ।
अंजलि को बहुत समय बाद एक ऐसी सुरक्षा और सुकून का अहसास हुआ जिसकी उसे कमी थी। उसे लगा कि उसके पास अब एक ऐसा प्रहरी (Guardian) है जो उसे खुद उसकी कमज़ोरियों से बचा लेगा। उस रात, कमरे में कोई सिसकारी नहीं थी, कोई छटपटाहट नहीं थी; बस माँ-बेटे की धीमी गुफ्तगू थी जो धीरे-धीरे सुकून भरी नींद में तब्दील हो गई।