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बिस्तर की चादर को झटक कर आर्यन खड़ा हुआ। उसने दूध के गिलास की ओर देखा जो मेज पर ज्यों का त्यों रखा था, पर उसकी प्यास अब चिंता में बदल चुकी थी। उसने बिना कोई आवाज़ किए अपने कमरे का दरवाज़ा खोला और फिर से उन्हीं अंधेरी सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

उसके दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी। वह धीरे-धीरे, एक-एक कदम फूंक-फूंक कर नीचे उतरा। हॉल में पसरा सन्नाटा अब और भी गहरा लग रहा था। वह सीधा माँ के बंद दरवाज़े के पास पहुँचा।

इस बार उसने संकोच छोड़ दिया और अपना सिर दरवाज़े की लकड़ी से बिल्कुल सटा दिया। वह अपनी साँसें रोककर अंदर की हलचल को पकड़ने की कोशिश कर रहा था।

“माँ…?” उसने बहुत धीरे से, लगभग फुसफुसाते हुए मन में कहा।

अंदर से अभी भी वही हल्की, टूटी-टूटी सिसकारियाँ आ रही थीं। आवाज़ इतनी मद्धम थी कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई तकिए में मुँह छिपाकर रो रहा हो या फिर अपनी तकलीफ को बाहर आने से रोक रहा हो। बीच-बीच में चादर के सरकने और बेड के हल्के से हिलने की आवाज़ भी आ रही थी।

आर्यन की पेशानी पर पसीना आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या उसे दरवाज़ा खटखटाकर पूछना चाहिए? अगर वह सो रही हैं और यह सिर्फ नींद में है, तो उन्हें जगाना ठीक नहीं होगा। लेकिन अगर वह दर्द में हैं?

वह वहीं अंधेरे गलियारे में मूर्ति की तरह खड़ा रहा। दरवाज़े के उस पार से आती उन रहस्यमयी सिसकारियों ने उसे एक ऐसी उलझन में डाल दिया था जिससे निकलना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। वह बस वहीं खड़ा रहकर यह समझने की कोशिश करता रहा कि आखिर उस बंद कमरे के अंदर माँ किस हाल में हैं।

आर्यन ने एक गहरी सांस ली, अपने पसीने से तर हाथों को पोंछा और अपनी उंगलियों को मोड़कर दरवाजे की लकड़ी पर टिका दिया।

खट… खट… खट…

दस्तक की आवाज़ उस सन्नाटे भरे घर में किसी धमाके जैसी लगी। आर्यन का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। “माँ…?” उसने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में पुकारा। “माँ, आप ठीक तो हैं?”

अंदर से आ रही वो सिसकारियाँ अचानक रुक गईं। एक एकदम से छा जाने वाला सन्नाटा पसर गया। आर्यन वहीं खड़ा इंतज़ार करने लगा। 10 सेकंड बीते… 20 सेकंड… कोई जवाब नहीं। उसका डर अब और बढ़ने लगा था। “माँ, दरवाज़ा खोलिए… मुझे आपकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। क्या तबीयत ठीक नहीं है?”

करीब 30 से 40 सेकंड तक कोई हलचल नहीं हुई। आर्यन बस दरवाज़े के हैंडल की ओर देख रहा था। तभी, अंदर से कुछ सरसराहट हुई—जैसे कोई हड़बड़ी में चादर ठीक कर रहा हो या बिस्तर से उठ रहा हो। फिर नंगे पैरों के ज़मीन पर चलने की हल्की आवाज़ आई।

अंततः, कुंडी खुलने की आवाज़ हुई—कड़क।

दरवाज़ा धीरे से खुला। कमरे के अंदर की मद्धम ‘नाइट लैंप’ की रोशनी बाहर गलियारे में फैली। अंजलि सामने खड़ी थी। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे और चेहरा थोड़ा लाल था, जैसे उसे बहुत तेज़ गर्मी लग रही हो या वह अभी-अभी किसी गहरी नींद से जागी हो। उसकी साँसें अभी भी थोड़ी भारी थीं।

उसने अपनी शॉल को थोड़ा और कस कर लपेटा और आधी खुली आँखों से आर्यन को देखा। “आर्यन? इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो बेटा? तुम सोए नहीं?” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी थकावट और भारीपन था, लेकिन वह दिखने में ठीक लग रही थी।

आर्यन ने राहत की सांस ली, पर उसकी नज़रें माँ के चेहरे पर टिकी थीं। “माँ, मैं… मैं दूध लेने नीचे आया था, तो आपके कमरे से कुछ आवाज़ें आ रही थीं। मुझे लगा शायद आपको बुखार है या कोई तकलीफ हो रही है। आप ठीक तो हैं न?”

अंजलि ने एक फीकी मुस्कान दी और अपने माथे से पसीना पोंछा। “अरे नहीं बेटा, कुछ नहीं। बस… बस थोड़ा बुरा सपना देख लिया था और शायद उमस (Humidity) की वजह से बेचैनी हो रही थी। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। तू बेकार में घबरा गया।”

गलियारे की मद्धम रोशनी में आर्यन ने एक कदम आगे बढ़ाया। अंजलि दरवाजे के फ्रेम का सहारा लेकर खड़ी थी, उसकी साँसें अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थीं।

“माँ, आप कह रही हैं कि आप ठीक हैं, लेकिन आपकी आँखें कुछ और ही कह रही हैं,” आर्यन ने धीमी और संजीदा आवाज़ में कहा।

बिना किसी हिचकिचाहट के, आर्यन ने अपना दाहिना हाथ धीरे से उठाया और अपनी हथेलियों के पीछे का हिस्सा अंजलि के गाल और माथे पर रख दिया। जैसे ही उसकी खाल माँ की त्वचा से छुई, वह ठिठक गया।

अंजलि का चेहरा दहकते हुए अंगारे जैसा गर्म था। वह तपिश इतनी तेज़ थी कि आर्यन को महसूस हुआ जैसे उसे वाकई बहुत तेज़ बुखार चढ़ आया हो।

“ओह गॉड! माँ, आप तो आग की तरह तप रही हैं!” आर्यन ने चौंकते हुए अपना हाथ हटाया, लेकिन उसकी उंगलियों पर अब भी वह गर्मी महसूस हो रही थी। “आपको बहुत तेज़ बुखार है। और आप कह रही हैं कि आप ठीक हैं? आप खुद एक डॉक्टर होकर अपनी सेहत के साथ इतनी लापरवाही कैसे कर सकती हैं?”

अंजलि ने घबराकर अपनी पलकें झुका लीं और थोड़ा पीछे हटने की कोशिश की। “नहीं आर्यन… वह… वह बस शायद कमरे में घुटन हो रही थी इसलिए। बुखार नहीं है मुझे, बस थोड़ा ‘फ्लश’ (flush) महसूस हो रहा है। तू परेशान मत हो बेटा, तू जा सो जा।”

आर्यन ने उसकी बात अनसुनी कर दी और कमरे के अंदर कदम रख दिया। “बिल्कुल नहीं माँ। इस हालत में मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकता। आपका पूरा शरीर गरम है। चलिए, पहले बेड पर लेटिये, मैं थर्मामीटर लेकर आता हूँ। अगर बुखार ज्यादा हुआ तो हमें अभी दवाई लेनी होगी।”

अंजलि ने अपने बेटे के चेहरे पर वह कड़कपन और फिक्र देखी, जो अक्सर एक पिता या बड़े भाई में होती है। वह कुछ बोल नहीं पाई, बस खामोशी से अपने बिस्तर की ओर बढ़ गई। आर्यन वहीं खड़ा रहा, उसकी नज़रें अपनी माँ की उस बेचैनी को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं, जो बुखार से कहीं ज्यादा गहरी लग रही थी।

“आप बस यहीं लेटिये माँ, मैं अभी आया,” आर्यन ने लगभग आदेश देते हुए कहा और फुर्ती से गलियारे की ओर लपका। वह नीचे की मंज़िल पर बने उस छोटे से मेडिकल कैबिनेट के पास पहुँचा जहाँ अंजलि अपनी ज़रूरी दवाइयाँ और उपकरण रखती थी। उसने कांपते हाथों से डिजिटल थर्मामीटर निकाला और वापस कमरे की ओर दौड़ा।

जब वह कमरे में पहुँचा, अंजलि बिस्तर के किनारे बैठी थी, उसकी आँखें आधी झुकी हुई थीं और वह गहरी साँसें ले रही थी। कमरे की मद्धम पीली रोशनी उसके चेहरे की लालिमा को और गहरा दिखा रही थी।

“लीजिए माँ, इसे मुँह में रखिये,” आर्यन ने थर्मामीटर आगे बढ़ाते हुए कहा।

अंजलि ने धीरे से थर्मामीटर लिया और अपनी जीभ के नीचे दबा लिया। पूरा कमरा एक भारी सन्नाटे में डूब गया, जिसमें सिर्फ दीवार घड़ी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। आर्यन वहीं घुटनों के बल बिस्तर के पास बैठ गया, उसकी नज़रें थर्मामीटर की छोटी सी स्क्रीन पर जमी थीं। उसे एक-एक सेकंड एक घंटे जैसा लग रहा था।

टीप… टीप… टीप…

थर्मामीटर ने बीप की आवाज़ की। आर्यन ने झपटकर उसे लिया और रोशनी की तरफ करके रीडिंग देखी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

“103.2 डिग्री!” आर्यन के मुँह से लगभग एक चीख निकली। “माँ! आपको इतना तेज़ बुखार है और आप कह रही थीं कि आप ठीक हैं? इतना टेम्परेचर तो डेंजरस हो सकता है!”

अंजलि ने अपनी आँखें मूँद लीं और धीरे से अपना सिर पीछे तकिये पर टिका दिया। “आर्यन… वो… मुझे लगा शायद बस थकान है। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इतना ज़्यादा होगा।”

आर्यन का चेहरा पीला पड़ गया था। “थकान से इतना बुखार नहीं आता माँ। आपकी साँसें भी तेज़ चल रही हैं और चेहरा बिल्कुल दहक रहा है। मैं अभी ठंडे पानी की पट्टी और पैरासिटामोल लेकर आता हूँ। मैं आपको इस हालत में सोता हुआ नहीं छोड़ सकता।”

अंजलि ने कमज़ोरी से अपना हाथ उठाकर उसे रोकने की कोशिश की, “बेटा, तू परेशान मत हो, मैं खुद डॉक्टर हूँ, मैं देख लूँगी…”

“आज आप डॉक्टर नहीं, सिर्फ मेरी माँ हैं,” आर्यन ने उसकी बात काटते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मजबूती थी जो अंजलि को खामोश कर गई। “आप बस लेटी रहिये, मैं सब संभालता हूँ।”

“माँ, ये लीजिये। पहले ये दवाई खाइए, फिर मैं पट्टी करूँगा,” आर्यन ने बिस्तर के पास बैठकर दवाई की गोली हाथ में लेते हुए कहा।

अंजलि ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उसने दवाई की ओर देखा और फिर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया। “नहीं आर्यन… इसकी ज़रूरत नहीं है। मैं… मैं बस थोड़ा सो जाऊँगी तो सुबह तक ठीक हो जाऊँगी। दवाइयों से मुझे वैसे ही सारा दिन उलझन रहती है।”

आर्यन हैरान रह गया। “क्या कह रही हैं आप? आप खुद मरीज़ों को डांटती हैं जब वो दवाई नहीं लेते, और अब खुद बहाने बना रही हैं? माँ, टेम्परेचर बहुत ज़्यादा है।”

“अरे बेटा, वो… वो बस थकावट की वजह से ‘हीट’ (heat) बढ़ गई है शरीर की,” अंजलि ने तकिये में अपना सिर थोड़ा और धंसाते हुए कहा। “अभी दवाई लूँगी तो रात भर पसीना आएगा और नींद खराब होगी। तू बस जा और सो जा, मैं सुबह देख लूँगी।”

आर्यन ने गिलास मेज पर रखा और थोड़ा सख्त लहजे में बोला, “सुबह तक का इंतज़ार नहीं कर सकते। आप बच्चों की तरह बहाने बना रही हैं। क्या आपको कड़वी लगती है? या फिर आप बस मुझे परेशान करना चाहती हैं?”

अंजलि ने एक कमज़ोर सी मुस्कान दी, उसकी साँसें अभी भी भारी थीं। “नहीं रे… बस मन नहीं कर रहा। तू समझता क्यों नहीं? मुझे पता है मेरे शरीर को क्या चाहिए। बस थोड़ी देर शांति से लेटने दे।”

आर्यन ने देखा कि माँ की ज़िद उनकी कमज़ोरी पर भारी पड़ रही थी। उसने दवाई वाली हथेली उनके और करीब की। “माँ, प्लीज़। मेरे लिए। अगर आप ये दवाई नहीं खाएंगी, तो मैं भी यहीं बैठा रहूँगा, पूरी रात। मैं ऊपर नहीं जाने वाला।”

अंजलि ने आर्यन की आँखों में देखा—वहां सिर्फ फिक्र और ज़िद थी। उसने महसूस किया कि उसका छोटा सा बेटा आज एक अभिभावक (guardian) की तरह व्यवहार कर रहा है।

“तू बहुत ज़िद्दी हो गया है,” अंजलि ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा। उसने हार मान ली और धीरे से उठकर बैठने की कोशिश की, लेकिन बुखार की वजह से उसका सिर चकरा गया। आर्यन ने तुरंत आगे बढ़कर उसके कंधे को सहारा दिया ताकि वह गिर न जाए।

“माँ, यह कोई मज़ाक नहीं है!” आर्यन ने थोड़ा तेज़ आवाज़ में कहा, उसकी आँखों में फिक्र और झुंझलाहट साफ़ थी। “अगर आप अभी यह दवाई नहीं लेंगी, तो मैं अभी पापा को फोन लगा रहा हूँ। उन्हें ही देखने दीजिये कि उनकी ‘डॉक्टर पत्नी’ अपनी सेहत के साथ क्या खिलवाड़ कर रही है।”

अंजलि ने तकिये में मुँह छिपा लिया और धीरे से बुदबुदाई, “नहीं आर्यन… उन्हें परेशान मत कर। वह वहाँ काम में व्यस्त होंगे। मैं… मैं बस थोड़ी देर में ले लूँगी, प्रॉमिस।”

“नहीं माँ, अभी!” आर्यन ने अपना हाथ जेब में डाला, पर उसे अहसास हुआ कि उसका फोन ऊपर अपने कमरे में चार्जिंग पर लगा रह गया है। उसकी नज़र बगल में बेडसाइड टेबल पर रखी अंजलि के फोन पर पड़ी।

उसने बिना सोचे-समझे झपटकर माँ का फोन उठा लिया। “मैं उन्हीं के फोन से पापा को वीडियो कॉल करता हूँ, तभी आप मानेंगी।” अंजलि ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया, “आर्यन, रुक… मत कर…” लेकिन कमज़ोरी की वजह से वह बस बिस्तर पर ही रह गई।

आर्यन ने जैसे ही फोन का लॉक खोला—जो शायद अभी हाल ही के इस्तेमाल की वजह से अनलॉक ही था—उसकी उंगलियाँ स्क्रीन पर ठिठक गईं। उसका चेहरा सफेद पड़ गया और वह जो कुछ बोलने वाला था, शब्द उसके गले में ही फंस कर रह गए।

फोन के ब्राउज़र पर एक एडल्ट साइट खुली हुई थी। स्क्रीन पर जो दृश्य और शब्द थे, वे किसी भी बेटे के लिए अपनी माँ के फोन पर देखना अकल्पनीय था। आर्यन का दिमाग सुन्न हो गया। उसे अचानक उन सिसकारियों, उस तेज़ बुखार जैसी तपिश, और माँ के चेहरे की उस अजीब लालिमा का मतलब समझ आने लगा, जिसे वह अब तक ‘बीमारी’ समझ रहा था।

वहाँ कोई घृणा (hatred) नहीं थी, न ही कोई गुस्सा। था तो सिर्फ एक गहरा शॉक (Shock)। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। वह जिस माँ को एक आदर्श, एक शांत डॉक्टर और एक निस्वार्थ ममता की मूरत मानता था, उनके व्यक्तित्व का यह छिपा हुआ पहलू उसके सामने एकदम नग्न होकर आ गया था।

अंजलि ने आर्यन के चेहरे के उड़ते हुए रंग को देख लिया था। वह समझ गई थी कि आर्यन ने क्या देख लिया है। कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो किसी भी शोर से ज़्यादा भयानक था।

आर्यन ने बिना एक शब्द बोले, बिना माँ की तरफ देखे, धीरे से फोन वापस टेबल पर रख दिया। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। उसने दवाई की गोली और पानी का गिलास भी वहीं छोड़ दिया। वह मुड़ा और भारी कदमों से, बिना पीछे मुड़े कमरे से बाहर निकल गया। उसका दिमाग सुन्न था, पैर मशीन की तरह चल रहे थे। वह सीधा ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गया, पीछे अपनी माँ को उस स्तब्ध अंधेरे में अकेला छोड़कर।

आर्यन सीधा लेटा हुआ छत पर घूमते पंखे की परछाईं को घूर रहा था। कमरे में सिर्फ पंखे की ‘सर-सर’ सुनाई दे रही थी, लेकिन उसके कानों में अभी भी नीचे के कमरे से आई वो सिसकारियाँ गूँज रही थीं।

उसकी आँखों के सामने बार-बार फोन की वो स्क्रीन और उस पर खुली साइट घूम रही थी। उसे अब समझ आ रहा था कि वो ‘103 डिग्री बुखार’ असल में क्या था। वह जिसे कोई जानलेवा बीमारी समझकर घबरा रहा था, जिसे थर्मामीटर से नाप रहा था और जिसके लिए दवाइयाँ लाने के लिए पागलों की तरह भाग रहा था—वह असल में उसकी माँ की अपनी एक एकांत और निजी दुनिया का हिस्सा था।

“धिक्कार है मुझ पर!” आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और तकिये में अपना चेहरा दबा लिया। उसे खुद पर इतनी शर्म महसूस हो रही थी कि उसे लग रहा था वह अब कभी माँ की आँखों में आँखें डाल कर बात नहीं कर पाएगा।

उसे अपनी नादानी पर गुस्सा आ रहा था। “मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ,” उसने खुद से बुदबुदाते हुए कहा। “माँ बार-बार कह रही थीं कि मैं ऊपर चला जाऊँ, वो बार-बार कह रही थीं कि वो ठीक हैं… पर मैं अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। मैंने जबरदस्ती उनका फोन उठाया, उनका लॉक खोला… मैंने उनकी प्राइवेसी (Privacy) की धज्जियाँ उड़ा दीं।”

वह सोच रहा था कि माँ इस वक्त नीचे क्या महसूस कर रही होंगी। क्या वह शर्मिंदा होंगी? क्या वह डर गई होंगी? एक तरफ उसे उस सच्चाई को देखकर शॉक लगा था, तो दूसरी तरफ उसे इस बात का पछतावा था कि उसने अपनी माँ को उस स्थिति में ला खड़ा किया जहाँ अब उनके बीच एक कभी न मिटने वाली असहजता (Awkwardness) पैदा हो गई थी।

पूरी रात वह करवटें बदलता रहा। कभी उसे माँ के अकेलेपन का अहसास होता, तो कभी अपनी मर्यादा लांघने का दुःख। सुबह की पहली किरण तक उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह बस इसी उधेड़बुन में था कि जब सूरज निकलेगा और वह नीचे जाएगा, तो क्या वह दोबारा वही ‘नॉर्मल’ बेटा बन पाएगा?

रात खत्म हो गई थी, लेकिन आर्यन के मन का द्वंद्व (Conflict) अभी शुरू ही हुआ था।

शुरुआत के कुछ मिनट तो अंजलि बिल्कुल सुन्न रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह ज़मीन में धंस जाए या उठकर आर्यन को रोके। उसका चेहरा शर्म से लाल था, और दिल की धड़कनें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं। उसे पता था कि आर्यन ने फोन की स्क्रीन देख ली है और इसी वजह से वह बिना कुछ बोले, इतनी हड़बड़ी में ऊपर भागा है।

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उसकी घबराहट एक अजीब सी शांति और फिर एक बहुत ही हल्की सी मुस्कान में बदलने लगी।

उसने अंधेरे में ही तकिए को अपनी बाहों में समेटा और सोचने लगी, “पागल लड़का… कितना डर गया था।” उसे याद आया कि कैसे आर्यन बदहवास होकर थर्मामीटर लेकर आया था, कैसे उसने 103 डिग्री बुखार की रीडिंग देखकर लगभग अपनी जान निकाल ली थी, और कैसे वह एक छोटे बच्चे की तरह ज़िद कर रहा था कि वह उसे दवाई खिलाकर ही मानेगा।

उसे अपने बेटे की उस मासूमियत और नादानी पर अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी। उसे इस बात की कोई शिकायत नहीं थी कि उसने उसका फोन देख लिया, बल्कि उसे इस बात का सुकून था कि उसका बेटा उसकी इतनी परवाह (Care) करता है। उसे अहसास हुआ कि आर्यन अब सिर्फ उसका बच्चा नहीं रहा, बल्कि वह उसकी सेहत और उसकी खुशी का रक्षक बन गया है।

“कितना फिक्रमंद था मेरे लिए…” उसने मन ही मन सोचा। उसकी वो सिसकारियाँ, जिन्हें आर्यन ने ‘बीमारी’ समझ लिया था, दरअसल एक लंबे समय के अकेलेपन और दबी हुई इच्छाओं का नतीजा थीं, जिसे वह एक डॉक्टर होने के नाते भी शायद कभी बयां नहीं कर पाती।

अंजलि को हल्की सी शर्मिंदगी तो महसूस हो रही थी कि उसके बेटे ने उसके व्यक्तित्व का वो सिरा छू लिया जो दुनिया से छिपा था, पर उसके ममतामयी दिल में आर्यन के लिए प्यार और बढ़ गया। उसे पता था कि सुबह होते ही वह आर्यन को समझा लेगी और फिर से सब कुछ ‘नॉर्मल’ कर देगी।

इसी संतोष और हल्की सी मुस्कान के साथ, उसकी भारी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। दवाइयाँ तो उसने नहीं ली थीं, लेकिन बेटे की उस बेपनाह फिक्र ने उसके मन को एक ऐसी शांति दी कि वह गहरी नींद की आगोश में चली गई।

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