बाथरूम की उस ठंडी दीवार के सहारे आर्यन खड़ा था, मुँह में अब भी उस कड़वेपन का अहसास बाकी था, लेकिन अंजलि आज अपनी ‘महारानी’ वाली भूमिका को अंतिम पड़ाव तक ले जाने पर आमादा थी। जैसे ही आर्यन ने तौलिए से अपना मुँह पोंछा, अंजलि ने बिजली की फुर्ती से उसे फिर से दीवार से सटा दिया।
अंजलि की आँखों में इस वक्त एक ऐसी चमक थी जो आर्यन ने पहले कभी नहीं देखी थी। यह एक ‘अल्फा फीमेल’ की चमक थी, जिसने अपने शेर को घुटनों पर ला दिया था।
अंजलि ने बिना किसी चेतावनी के अपने होंठ आर्यन के होंठों पर फिर से जड़ दिए। वही वीर्य का खारा और गाढ़ा स्वाद, जो अब अंजलि की लार के साथ मिलकर और भी तीव्र हो चुका था, फिर से आर्यन के मुँह के अंदर घुसने लगा। आर्यन ने झटके से अपना सिर पीछे हटाना चाहा, उसके हाथ अंजलि के कंधों को दूर धकेलने की कोशिश करने लगे। “नहीं माँ… प्लीज़… अभी नहीं…” वह बुदबुदाया, उसका चेहरा घिन के मारे सिकुड़ रहा था।
लेकिन अंजलि हार मानने वालों में से नहीं थी। उसने अपनी चाल चली—उसने अपना दाहिना हाथ नीचे ले जाकर आर्यन के ढीले पड़ते हुए Testicles को अपनी मुट्ठी में भर लिया। उसने उन्हें इतनी ज़ोर से और इतनी चतुराई से दबाया कि आर्यन के शरीर में दर्द और एक अजीब सी ‘मजबूरी वाली उत्तेजना’ का करंट दौड़ गया।
जैसे ही अंजलि ने नीचे से दबाव बनाया, आर्यन की गर्दन अपने आप झुक गई और उसका मुँह खुल गया। अंजलि ने अपनी पूरी ज़ुबान उसके हलक तक डाल दी। अब आर्यन चाहकर भी पीछे नहीं हट सकता था। उसे अपनी ही मर्दानगी का वो अर्क, जो उसकी माँ के मुँह में ‘पवित्र’ हो चुका था, वापस पीना ही पड़ा।
इस पल में दोनों की मानसिकता कामुकता के एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर थी जहाँ से आम इंसान का सोचना बंद हो जाता है:
आर्यन को घिन तो आ रही थी, लेकिन जैसे-जैसे अंजलि की उंगलियाँ उसके अंडकोषों से खेल रही थीं, उसका शरीर फिर से प्रतिक्रिया देने लगा। उसे अपनी ही ‘गंदगी’ का स्वाद अब एक ‘नशे’ की तरह लगने लगा। एक पुरुष की मानसिकता में जब उसे किसी ऐसी चीज़ को करने पर मजबूर किया जाता है जिससे उसे घृणा हो, तो वह ‘अपमान’ उसे और भी भयानक तरीके से उत्तेजित कर देता है। उसे लगा कि वह अब अपनी माँ का बेटा नहीं, उसका खिलौना बन चुका है।
अंजलि का मकसद केवल बदला लेना नहीं था। वह आर्यन के दिमाग से ‘घिन’ का शब्द ही मिटा देना चाहती थी। वह चाहती थी कि शाम को जब कंचन मासी यहाँ हो, तो आर्यन के अंदर कोई झिझक न रहे। उसे पता था कि जब कोई पुरुष अपनी माँ का वीर्य युक्त चुंबन ले सकता है, तो वह दुनिया का कोई भी ‘पाप’ बेहिचक कर सकता है। वह आर्यन को ‘परम-कामुक’ बना रही थी।
अंजलि ने आखिरकार उसके होंठ छोड़े। आर्यन हाँफ रहा था, उसके होंठों पर लार और वीर्य की एक गीली परत जमी थी। अंजलि ने अपनी उंगली से उसके होंठ साफ किए और उसे चखते हुए बड़ी बेबाकी से बोली:
“अब कैसा लगा? अब तो घिन नहीं आ रही ना? याद रख आर्यन, कंचन के सामने तुझे इससे भी ज़्यादा निडर होना होगा। वो पूजा करने वाली औरत है, उसे तुझे अपनी इस ‘गंदी’ दुनिया का स्वाद चखाना है।”
आर्यन ने एक गहरी सांस ली। उसकी नज़रों में अब घिन की जगह एक ‘ठंडा पागलपन’ आ चुका था। वह समझ गया था कि अंजलि ने उसे एक ऐसी आग में झोंक दिया है जहाँ अब सिर्फ तबाही और चरम सुख है।
शावर से गिरती ठंडी पानी की बौछारें आर्यन के शरीर पर पड़ रही थीं, लेकिन उसके दिमाग के अंदर की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी। आर्यन इस वक्त एक ऐसी ‘सुन्न अवस्था’ में था जहाँ उसे होश और मदहोशी के बीच का अंतर समझ नहीं आ रहा था।
अंजलि के उस वीर्य युक्त ‘फ्रेंच किस’ ने आर्यन की मर्दानगी के अहंकार को भीतर तक झकझोर दिया था। उसे लग रहा था कि वह एक शिकारी से सिमटकर एक ‘शिकार’ बन गया है। लेकिन इसी टूटन में उसे एक ऐसा आनंद मिल रहा था जो उसने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था—अपनी ही माँ के हाथों पूरी तरह ‘बर्बाद’ होने का आनंद।
शावर के नीचे दोनों के नग्न शरीर पानी में भीग रहे थे। पानी की बूंदें अंजलि के गोरे और भरे हुए बदन से फिसलकर नीचे गिर रही थीं। आर्यन अभी भी थोड़ा खोया-खोया सा था, अंजलि की उस हरकत का असर उसके दिमाग पर गहरा था।
आर्यन को महसूस हो रहा था कि अंजलि ने उसके होंठों और मुँह के ज़रिए उसके पूरे वजूद पर अपना कब्ज़ा कर लिया है। एक पुरुष की मानसिकता में उसका ‘वीर्य’ उसकी शक्ति का प्रतीक होता है, और अंजलि ने उसी शक्ति को उसे ‘वापस’ पिलाकर यह साबित कर दिया कि आर्यन अब पूरी तरह उसके प्रभाव में है। इस अहसास ने आर्यन को थोड़ा कमज़ोर, लेकिन बहुत ज़्यादा कामुक बना दिया था।
नहाते वक्त अंजलि ने बड़े प्यार से आर्यन के जिस्म पर साबुन लगाया। उसने आर्यन के चेहरे को सहलाया जैसे वह उसे चखने के बाद अब उसे सहला रही हो। “घबरा मत मेरे शेर… ये तो बस शुरुआत थी। मैंने तुझे बस उस ‘मर्यादा’ के बोझ से आज़ाद किया है जो तुझे रोक रही थी। अब तू कंचन के सामने एक नया आर्यन होगा।”
दोनों ने एक-दूसरे को अच्छे से नहलाया। शावर के नीचे आर्यन की कन्फ्यूजन धीरे-धीरे शांत हुई और उसकी जगह एक ‘ठंडे और हिंसक आत्मविश्वास’ ने ले ली। उसने समझ लिया कि अगर वह अपनी माँ के साथ इस हद तक जा सकता है, तो कंचन मासी का ‘पवित्र’ किला ढहाना उसके लिए बच्चों का खेल होगा।
बाथरूम से बाहर निकलकर दोनों ने खुद को सुखाया। कमरे में अब इत्र और लोशन की खुशबू फैल चुकी थी।
अंजलि ने अपनी अलमारी से एक ऐसी साड़ी निकाली जो दिखने में तो सोबर थी, लेकिन उसका कपड़ा इतना बारीक था कि रोशनी पड़ते ही उसके शरीर की बनावट साफ झलकती थी। उसने गहरा सिंदूर लगाया और अपनी आँखों में वही चमक बरक़रार रखी।
आर्यन ने एक फिटिंग वाली शर्ट और ट्राउजर पहना। वह अब पहले से कहीं ज़्यादा शांत और खतरनाक दिख रहा था। उसकी आँखों में अब वह ‘घिन’ नहीं थी, बल्कि एक ऐसी भूख थी जो सिर्फ कंचन मासी के आने पर ही शांत होने वाली थी।
ड्राइंग रूम की लाइटें थोड़ी मद्धम कर दी गईं। अंजलि ने किचन में चाय और नाश्ते की तैयारी शुरू की, जबकि आर्यन सोफे पर बैठकर दरवाज़े की तरफ देखने लगा। उसके मुँह में अब भी अंजलि के उस चुंबन की हल्की सी कड़वाहट और खुशबू बाकी थी, जो उसे याद दिला रही थी कि वह अब किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार है।
“जीजी… मैं पहुँच गई हूँ, बस ऑटो से उतर रही हूँ।”
अंजलि के फोन पर कंचन मासी का मैसेज फ्लैश हुआ।
ड्राइंग रूम में मद्धम रोशनी और इत्र की खुशबू के बीच अंजलि ने आर्यन को अपने करीब बुलाया। उसकी आवाज़ में अब एक ‘मास्टरमाइंड’ की गंभीरता थी। वह जानती थी कि कंचन जैसी ‘पवित्र’ महिला को सीधे रास्ते पर लाना मुमकिन नहीं है, इसके लिए शतरंज की चालें बहुत ही सफाई से चलनी होंगी।
अंजलि ने आर्यन की शर्ट के कॉलर ठीक किए और उसकी आँखों में झाँकते हुए धीरे से फुसफुसाया:
“आर्यन, ध्यान से सुन। जैसे ही कंचन अंदर आएगी, तू उसे नमस्ते करके थोड़ी देर बैठेगा, और फिर बहाना बनाकर मार्केट निकल जाएगा। उसे ये नहीं लगना चाहिए कि तू यहाँ ताक-झांक कर रहा है। उसे सहज महसूस कराना मेरा काम है। जब तक तू बाहर रहेगा, मैं उसकी ज़मीन तैयार करूँगी।”
अंजलि ने अपनी आवाज़ और धीमी कर ली। “मार्केट से कुछ घर का राशन ले आना ताकि शक न हो, लेकिन सबसे ज़रूरी चीज़— कॉन्डम के पैकेट और लुब्रिकेशन लाना मत भूलना। कंचन सालों से ‘सूखी’ पड़ी है, उसका शरीर इस वक्त पत्थर जैसा होगा। उसे इस ७ इंच को बर्दाश्त करने के लिए ‘मदद’ की ज़रूरत पड़ेगी।”
“सामान लाकर तू चुपचाप किचन में रख देना और बिना किसी शोर के अपने कमरे में चला जाना। मैं उसे बातों में फंसाकर उस मानसिक स्थिति में ले आऊँगी जहाँ वो अपनी ‘मर्यादा’ और ‘भक्ति’ को भूलने लगेगी। जब मैं तुझे इशारा करूँगी, तभी तू बाहर आना।”
यहाँ अंजलि एक ऐसी ‘प्रॉक्सी शिकारी’ की तरह व्यवहार कर रही है जो अपने शिकार को पहले चारा डालती है और फिर उसे अपने जाल में फंसाती है।
अंजलि जानती है कि कंचन अपनी बड़ी बहन पर आँख बंद करके भरोसा करती है। वह पहले एक ‘दुखी और सहानुभूति रखने वाली बहन’ बनकर कंचन के दिल की गहराई में छिपे राज़ और उसकी अधूरी कोख की टीस को कुरेदेगी।
आर्यन को कॉन्डम और लुब्रिकेंट लाने भेजना यह दर्शाता है कि अंजलि इस खेल को लेकर कितनी गंभीर और योजनाबद्ध है। वह चाहती है कि जब ‘क्रिया’ शुरू हो, तो कोई रुकावट न आए। उसे पता है कि कंचन का शरीर डर और बांझपन के कारण शुरू में विरोध करेगा, इसलिए वह लुब्रिकेंट जैसी चीज़ों को पहले से तैयार रखना चाहती है।
आर्यन ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दी। उसके दिमाग में अब मार्केट का सामान नहीं, बल्कि वो ‘पैकेट’ घूम रहे थे जो रात को कंचन मासी के ‘पवित्र’ मंदिर में पहली आहुति देने वाले थे।
तभी… घर की डोरबेल बजी। ‘टिंग-टोंग’।
दरवाज़े के बाहर कंचन मासी खड़ी थीं—हाथ में पूजा का प्रसाद, माथे पर तिलक और चेहरे पर वही सादगी भरा मुखौटा। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि अंदर उसका भतीजा अपने मुँह में अपनी माँ के वीर्य का स्वाद लिए बैठा है और उसकी माँ ने उसके लिए ‘चिकनाई’ का इंतज़ार कर रखा है।
शाम के 7:00 बज रहे थे। बाहर ढलते सूरज की नारंगी रोशनी अब अंधेरे में तब्दील हो रही थी और घर के अंदर एक बहुत ही शांत और पारिवारिक माहौल था। अंजलि की योजना के अनुसार, सब कुछ बिल्कुल सामान्य दिख रहा था—इतना सामान्य कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि कुछ घंटों पहले इसी कमरे में क्या हुआ था।
कंचन मासी सोफे पर बैठी थीं। उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित सौम्यता और शांति थी। उन्होंने हल्के पीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, माथे पर एक छोटा सा लाल तिलक था और हाथों में कांच की चूड़ियां जो उनकी हर हरकत पर हल्की सी खनक पैदा कर रही थीं।
अंजलि और कंचन सोफे पर बैठकर पुराने रिश्तेदारों की बातें कर रही थीं। बातचीत का विषय बहुत ही साधारण था— “शादी-ब्याह में कौन आया, किसकी तबीयत खराब है, और मंदिर के उत्सव में इस बार कितनी भीड़ थी।” कंचन अपनी बातों में इतनी खोई हुई थी कि उसे अपनी बड़ी बहन की आँखों में छिपा वह शातिराना रोमांच नज़र नहीं आ रहा था।
आर्यन पास ही की कुर्सी पर बैठा बड़े ध्यान से मासी की बातें सुन रहा था। वह बीच-बीच में मुस्कुरा देता या किसी बात पर हामी भर देता। अंजलि के सिखाए अनुसार, उसने अपनी आँखों की उस ‘भूख’ को पलकों के पीछे छिपा लिया था। वह एक आदर्श भतीजे की तरह व्यवहार कर रहा था।
अंजलि ने उठकर किचन से गरमा-गरम चाय और पकौड़े परोसे। “ले कंचन, तेरे हाथ की बनी चाय तो मुझे बहुत याद आती है, पर आज तू मेरे हाथ की पी।” अंजलि ने बहुत ही सहजता से कहा। बातों-बातों में कंचन ने आर्यन के करियर और उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा, जिसका आर्यन ने बहुत ही सलीके से जवाब दिया।
कंचन को डर था कि शायद यहाँ का माहौल उसे असहज करेगा, लेकिन अंजलि और आर्यन के सामान्य व्यवहार ने उसका बचाव तंत्र ढीला कर दिया। वह अब खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी।
आर्यन के लिए यह एक परीक्षा की तरह था। उसे पता था कि उसे थोड़ी देर में निकलना है। वह मासी की सादगी को देख रहा था और मन ही मन उस लुब्रिकेंट और कॉन्डम के बारे में सोच रहा था जो उसे थोड़ी देर में लाने थे। वह देख रहा था कि मासी कितनी ‘सीधी’ दिखती हैं और यही सादगी उसे अंदर ही अंदर उत्तेजित कर रही थी।
चाय खत्म होते ही आर्यन ने घड़ी देखी और बहुत ही स्वाभाविक अंदाज़ में खड़ा हुआ।
“माँ, मुझे याद आया… किचन का कुछ सामान खत्म हो गया है और मुझे अपनी एक प्रोजेक्ट फाइल के लिए कुछ स्टेशनरी भी लेनी है। मैं अभी मार्केट होकर आता हूँ, आधे-पौन घंटे में लौट आऊँगा।”
अंजलि ने कंचन की ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा, जा ले आ। कंचन, तू बैठ… तब तक हम थोड़ी और बातें करते हैं।”
कंचन ने मुस्कुराकर आर्यन को देखा, “आराम से जाना बेटा।” उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आर्यन बाज़ार से ‘राशन’ के साथ-साथ उसकी ‘पवित्रता’ को भंग करने का सामान भी लाने जा रहा है।
ड्राइंग रूम में अब शाम की शांति के साथ-साथ एक अपनापन सा छा गया था। आर्यन के मार्केट निकलते ही अंजलि ने अपनी योजना के अगले हिस्से पर काम शुरू कर दिया। वह जानती थी कि अगर कंचन को किचन के कामों में उलझा दिया गया, तो वह गहरा संवाद नहीं हो पाएगा जिसकी उसे ज़रूरत थी।
अंजलि ने सोफे पर कंचन के थोड़ा और करीब सरकते हुए अपना फोन निकाला और बड़े लाड़ से बोली:
“देख कंचन, तू बहुत दिनों बाद आई है। मैं नहीं चाहती कि आज की ये शाम चूल्हे-चौके में बिताए। हम दोनों बहनें आज जी भरकर बातें करेंगे, इसलिए खाना आज मैं बाहर से ही मँगा रही हूँ।”
कंचन ने थोड़ा संकोच करते हुए मना करना चाहा, “नहीं जीजी, क्या ज़रूरत है… मैं अभी कुछ बना देती हूँ।” लेकिन अंजलि ने उसकी एक न सुनी। “चुप कर! मुझे पता है तुझे पनीर लबाबदार और दाल मखनी कितनी पसंद है। आज तेरा वही फेवरेट खाना आएगा।”
अंजलि ने फोन पर शहर के सबसे बेहतरीन रेस्टोरेंट से कंचन की पसंद का शाही खाना ऑर्डर कर दिया। यह महज़ खाना नहीं था, बल्कि कंचन को ‘स्पेशल’ महसूस कराने का एक तरीका था। जब कोई आपको आपकी पसंद की चीज़ें बिना माँगे देता है, तो आप अनजाने में ही उस व्यक्ति के प्रति अपनी मानसिक दीवारें गिरा देते हैं।
अच्छी मेहमाननवाज़ी और बाहर का लजीज़ खाना कंचन को एक मानसिक ‘कंफर्ट ज़ोन’ में ले जा रहा था। उसे लग रहा था कि उसकी बहन उससे कितना प्यार करती है और उसका कितना ख्याल रखती है।
किचन की ज़िम्मेदारी खत्म होते ही अब दोनों बहनों के पास घंटों का समय था। अंजलि जानती थी कि पेट भरा होने पर और मन शांत होने पर इंसान अपने सबसे गहरे राज़ उगलने लगता है। वह कंचन को भावनात्मक रूप से ‘नग्न’ करने की तैयारी कर रही थी।
खाना ऑर्डर करने के बाद अंजलि ने फोन मेज़ पर रख दिया। कमरे में अब केवल पंखे की हल्की आवाज़ थी। अंजलि ने कंचन के चेहरे को गौर से देखा—वही सादगी, लेकिन आँखों के नीचे हलके काले घेरे जो उसके अकेलेपन और रातों की बेचेनी की गवाही दे रहे थे।
“कंचन…” अंजलि ने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया, “ऊपर-ऊपर से तो तू बहुत शांत दिखती है, और पूजा-पाठ में मन भी लगा लेती है… पर सच बता, क्या तू वाकई खुश है? तेरी शादीशुदा ज़िंदगी में वो ‘सुकून’ है जिसकी तूने उम्मीद की थी?”
कंचन की मुस्कुराहट अचानक फीकी पड़ गई। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और अपनी उंगलियों से साड़ी का पल्लू मरोड़ने लगी। अंजलि ने सही नब्ज़ पर हाथ रख दिया था।
ड्राइंग रूम का माहौल अचानक भारी हो गया। अंजलि ने जब कंचन के जख्मों को कुरेदने की कोशिश की, तो उसे लगा था कि कंचन रोने लगेगी या अपनी सिसकियाँ दबाएगी। लेकिन कंचन ने अपनी झुकी हुई पलकें उठाईं और अंजलि की आँखों में सीधे देखते हुए कुछ ऐसा कह दिया कि अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
अंजलि, जो अब तक इस खेल की ‘मास्टरमाइंड’ बनी हुई थी, कंचन की उस एक बात से जैसे पथरा सी गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था, कोई दलील नहीं थी। वह बस फटी आँखों से अपनी छोटी बहन को देखती रह गई, जिसे वह ‘सीधी-सादी’ समझ रही थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी।
तभी दरवाजे की बेल बजी और उस भारी सन्नाटे को चीर दिया। आर्यन वापस आ चुका था।
आर्यन के हाथों में सामान के दो बड़े थैले थे। ऊपर से देखने पर उसमें ब्रेड, दूध और किचन का कुछ राशन दिख रहा था, लेकिन उन पैकेटों की गहराई में कॉन्डम और लुब्रिकेंट की वो डिब्बियाँ छिपी थीं, जो आज रात कंचन मासी के ‘पवित्र’ शरीर पर इस्तेमाल होने वाली थीं।
आर्यन जैसे ही अंदर आया, उसने महसूस किया कि कमरे की हवा बदली हुई है। उसकी माँ (अंजलि) का चेहरा सफेद पड़ा था और वह किसी गहरी सोच में डूबी थी, जबकि कंचन मासी के चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी शांति थी—जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा बोझ अंजलि के कंधों पर डाल दिया हो।
ठीक उसी वक्त रेस्टोरेंट का डिलीवरी बॉय भी खाना लेकर आ गया। आर्यन ने सारा सामान किचन में रखा और अपनी माँ को एक ‘इशारा’ किया कि काम हो गया है। लेकिन अंजलि ने उसकी तरफ देखा तक नहीं, वह अब भी कंचन की उस बात के असर में थी।
तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। पनीर लबाबदार और दाल मखनी की खुशबू पूरे कमरे में फैली थी, लेकिन भूख जैसे मर चुकी थी।
वह बार-बार कंचन को देख रही थी। कंचन बड़े आराम से निवाला तोड़ रही थी, जैसे उसने कुछ कहा ही न हो। अंजलि का दिमाग दौड़ रहा था, अंजलि को पहली बार लगा कि वह अपनी बहन को ज़रा भी नहीं जानती।
आर्यन अपनी जगह पर बैठा चुपचाप खाना खा रहा था, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार मेज़ के नीचे कंचन मासी के पैरों की ओर जा रही थीं। वह देख रहा था कि मासी कितनी शिष्टता से बैठी हैं, जबकि उसके बैग में रखा लुब्रिकेंट बस कुछ ही देर में उस शिष्टता की धज्जियाँ उड़ाने वाला था।
खाना खत्म हुआ। कंचन ने उठकर बर्तन समेटने में अंजलि की मदद की। अंजलि अभी भी सामान्य होने की कोशिश कर रही थी। आर्यन अपने कमरे की ओर बढ़ा, पर रुककर उसने कंचन को देखा।
“मासी, आप आज रात माँ के कमरे में सोएंगी या मेरे वाले कमरे में? मतलब, मेरा कमरा काफी हवादार है…” आर्यन ने बहुत ही सलीके से जाल फेंका।
कंचन ने मुड़कर आर्यन को देखा और एक ऐसी मुस्कान दी जिसमें ममता कम और गहराई ज़्यादा थी। “देखते हैं आर्यन”
आर्यन अपने कमरे में पहुँचा ही था कि उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी। उसने उम्मीद की थी कि अंजलि उसे ‘ग्रीन सिग्नल’ देगी, लेकिन जो मैसेज उसने पढ़ा, उसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
अंजलि का मैसेज: “बेटा, आज चाहे कुछ भी हो जाए, तू नीचे मत आना। भूलकर भी कमरे से बाहर मत निकलना। जो मैंने सोचा था, स्थिति उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है।”
आर्यन का दिमाग चकरा गया। उसने अभी-अभी कॉन्डम और लुब्रिकेंट का इंतज़ाम किया था, उसका शरीर कंचन मासी की कल्पना से दहक रहा था, और अब उसकी माँ उसे पीछे हटने को कह रही थी?
वह बिस्तर पर बैठ गया, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कंचन मासी ने खाने से पहले अंजलि के कान में ऐसा क्या कह दिया कि अंजलि इतनी डर गई। क्या मासी को उनके और अंजलि के रिश्ते का पता चल गया? या मासी का अपना कोई ऐसा काला सच है जिसने अंजलि जैसी शातिर औरत के पसीने छुड़ा दिए?
अंजलि, जो कुछ देर पहले तक कंचन को ‘शिकार’ बनाने की योजना बना रही थी, अब अचानक ‘डिफेंसिव’ मोड में आ गई थी। उसका मैसेज महज़ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक तरह की ‘गुहार’ थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह आर्यन को किसी बड़े खतरे या किसी ऐसे खुलासे से बचाना चाहती है जो आर्यन बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
नीचे के ड्राइंग रूम से हल्की-हल्की फुसफुसाहट की आवाज़ें आ रही थीं। आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और गलियारे की ओर कान लगाए।
उसे कंचन मासी के रोने की नहीं, बल्कि बहुत ही सपाट और ठंडी आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह आवाज़ उस ‘सीधी-सादी’ मासी की लग ही नहीं रही थी जो शाम को मंदिर का प्रसाद लेकर आई थीं।
बीच-बीच में अंजलि के टूटे हुए शब्द सुनाई दे रहे थे— “नहीं कंचन… ऐसा नहीं हो सकता… तूने इतने सालों तक ये बात छुपाई कैसे?”
आर्यन के पास दो रास्ते थे। या तो वह अपनी माँ की बात मानकर कमरे में दुबका रहे, या फिर वह चुपके से नीचे जाए और उस सस्पेंस का पता लगाए जिसने उनकी पूरी योजना को तहस-नहस कर दिया था।
उसने हाथ में वही लुब्रिकेंट की डिब्बी उठाई और उसे कसकर भींच लिया। उसकी मर्दानगी अब उस राज़ को जानने के लिए तड़प रही थी। उसे लगा कि शायद कंचन मासी कोई ‘सीधी’ औरत नहीं, बल्कि अंजलि से भी बड़ी ‘खिलाड़ी’ निकली हैं।
रात के 11:00 बज रहे थे। घर का कोना-कोना खामोशी की चादर ओढ़े हुए था, लेकिन आर्यन के दिमाग में शोर थमता नहीं था। अंजलि का वह मैसेज—”नीचे मत आना”—आर्यन के सीने में किसी कील की तरह चुभ रहा था। उसकी मर्दानगी और उसकी उत्सुकता के बीच एक युद्ध चल रहा था।
आखिरकार, वह खुद को रोक नहीं पाया।
आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा रत्ती भर आवाज़ किए बिना खोला। वह दबे पाँव, बिल्ली की तरह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे पहुँचा। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं मासी उसे सुन न लें।
वह अंजलि के कमरे के बाहर खड़ा हो गया। उसने अपना कान लकड़ी के ठंडे दरवाज़े पर टिका दिया। वह उम्मीद कर रहा था कि उसे कोई चीख, कोई रोना या कम से कम कोई बड़ा खुलासा सुनने को मिलेगा।
लेकिन अंदर से जो सुनाई दिया, उसने उसे और भी ज़्यादा कंफ्यूज कर दिया। उसे किसी के बात करने का लहज़ा तो सुनाई दे रहा था, पर शब्द समझ नहीं आ रहे थे। वह बस एक ‘फुसफुसाहट’ थी—जैसे दो लोग किसी बहुत ही गहरे और पुराने राज़ को एक-दूसरे के कान में डाल रहे हों।
उसे बीच-बीच में अंजलि की आवाज़ सुनाई देती, जो डरी हुई और दबी हुई थी। कंचन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। ऐसा लग रहा था जैसे कंचन आज अपनी बहन को वह आईना दिखा रही है जिसे अंजलि ने सालों से नहीं देखा था।
5 मिनट तक वहाँ सांस रोककर खड़े रहने के बाद, जब उसे कुछ हाथ नहीं लगा, तो आर्यन झेंप गया। उसे लगा कि वह यहाँ एक जासूस की तरह खड़ा है और अंदर उसकी माँ और मासी शायद किसी ऐसी चीज़ में उलझी हैं जो उसकी समझ से बाहर है।
वह वापस अपने कमरे की ओर मुड़ा। उसके हाथ में अब भी वह लुब्रिकेंट और पैकेट का ख्याल था, जो अब उसे बेमानी लग रहे थे। जिस ‘शिकार’ को वह आज रात फतह करने वाला था, वह शिकार अब खुद एक रहस्यमयी शिकारी बन चुका था।
वापस अपने कमरे में पहुँचकर उसने झटके से दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर गिर गया। अंजलि का वो मैसेज अब उसे और भी डरावना लग रहा था। “स्थिति गंभीर है”—इन शब्दों का मतलब क्या था?
आर्यन छत के पंखे को घूमते देख रहा था। उसे अपनी माँ पर गुस्सा भी आ रहा था और चिंता भी हो रही थी। तभी… उसके कमरे के हैंडल के घूमने की हल्की सी आवाज़ आई।
दरवाज़ा धीरे से खुला और एक साया अंदर दाखिल हुआ। वह अंजलि थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों में एक अजीब सी दहशत थी और वह कांप रही थी।
उसने आते ही आर्यन को गले लगा लिया और सिसकते हुए फुसफुसायी, “आर्यन… वो… वो वैसी नहीं है जैसा हमने सोचा था।”
अंजलि की सांसें तेज़ चल रही थीं और उसके चेहरे पर छाई वो घबराहट आर्यन को अंदर तक हिला गई। उसने आर्यन के कंधे को कसकर भींचा और कांपती आवाज़ में बस इतना ही कहा:
“आर्यन… अभी मैं तुझे कुछ नहीं बता सकती। स्थिति हमारे हाथ से निकल चुकी है। मैं बस नीचे पानी पीने के बहाने आई हूँ, वो मेरा इंतज़ार कर रही है। तू बस… तू बस अपना दरवाज़ा अंदर से बंद कर ले और सो जा।”
इतना कहकर अंजलि मुड़ी और अंधेरे गलियारे में गायब हो गई। उसके कदमों की आहट इतनी तेज़ थी जैसे वह किसी खौफनाक साये से बचकर भाग रही हो।
आर्यन वहीं खड़ा रह गया, उसका हाथ कमरे के हैंडल पर ही था। जो उत्साह, जो हवस और जो योजना उसने दोपहर से बना रखी थी, वह अब ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी थी।
आर्यन को इस वक्त अपनी मर्दानगी पर थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। वह ७ इंच का फौलाद, जो कुछ देर पहले तक कंचन मासी के वजूद को चीरने के लिए बेताब था, अब एक ठंडी खामोशी में सिमट गया था। अंजलि के डर ने आर्यन के अंदर की कामुकता को ‘असुरक्षा’ में बदल दिया था।
वह बिस्तर पर लेट गया, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। कंचन मासी की वो शांत मुस्कान अब उसके दिमाग में किसी डरावनी फिल्म के सीन की तरह घूम रही थी। उसने सोचा— “आखिर एक औरत ऐसा क्या कह सकती है कि अंजलि जैसी खिलाड़ी माँ, जिसने खुद अपने बेटे के साथ सारे रिश्ते तोड़ दिए, वो इतनी सहम जाए?”
आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा। पूरा मोहल्ला सो चुका था, लेकिन उसके घर की नीचे वाली मंजिल पर एक ऐसा राज़ सांस ले रहा था जो सुबह होते-होते सब कुछ बदलने वाला था।
आखिरकार, आर्यन ने हार मान ली। उसने अपनी दराज से वो कॉन्डम के पैकेट और लुब्रिकेंट निकाला और उन्हें वापस गहराई में छुपा दिया। उसे अहसास हुआ कि आज की रात ‘शिकार’ की नहीं, बल्कि ‘बचाव’ की रात है।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, पर नीचे से आने वाली हर हल्की आवाज़—पंखे की सरसराहट या पानी गिरने की आवाज़—उसे चौंका रही थी। उसने तकिए को अपने कान पर रख लिया और खुद को यह समझाने की कोशिश की कि सुबह सब ठीक हो जाएगा।
धीरे-धीरे थकान उसके दिमाग पर हावी होने लगी। आर्यन एक ऐसी नींद में उतरने लगा जहाँ सपने भी धुंधले और डरावने थे। उसे पता नहीं था कि जब वह सुबह आँख खोलेगा, तो उसके सामने कंचन मासी का वही पुराना चेहरा होगा या कोई ऐसा चेहरा जिसे देखकर वह खुद को भी भूल जाएगा।
घर में अब पूरी तरह सन्नाटा था… पर यह वो सन्नाटा था जो किसी बड़े धमाके से पहले होता है।