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दोपहर के 2:15 बज रहे थे। कमरे में पसरा सन्नाटा अंजलि के दिमाग में चल रहे युद्ध को और गहरा कर रहा था। आर्यन की गोद में उसका सिर था, और हाथ उस 7 इंच के कड़क फौलाद पर टिका था जो नेकर के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था। अंजलि इस वक्त एक ऐसी ऊहापोह में थी जहाँ संस्कार, ममता, हवस और सहानुभूति का एक अजीब मिश्रण बन चुका था।

अंजलि की मानसिकता को अगर गहराई से समझा जाए, तो वह इस वक्त तीन रास्तों के चौराहे पर खड़ी थी:

अंजलि एक ऐसी औरत थी जिसने अपनी मर्यादाएँ पहले ही आर्यन के कदमों में ढेर कर दी थीं। उसके मन के एक कोने में यह ‘गंदी फंतासी’ हिलोरे ले रही थी कि जो सुख वह भोग रही है, उसमें उसकी सगी बहन भी शामिल हो। वह कल्पना कर रही थी कि जब उसका जवान बेटा उसकी बहन (कंचन) को अपनी मर्दानगी के नीचे कुचलेगा और वह खुद उस दृश्य को देखेगी, तो वह सुख कैसा होगा। उसे लग रहा था कि अगर उसने कंचन को शामिल नहीं किया, तो उसकी यह ‘त्रिकोणीय हवस’ हमेशा के लिए अधूरी रह जाएगी।

अंजलि कंचन से प्यार करती थी। उसे अपनी बहन की ‘सूनी कोख’ का दर्द चुभता था। एक औरत होने के नाते वह जानती थी कि बांझपन का दंश एक स्त्री को अंदर ही अंदर मार देता है। उसके मन में यह विचार आया कि— “क्या पता, आर्यन की इस फौलादी मर्दानगी में वो दम हो जो कंचन के पति के ठंडे शरीर में नहीं है?” उसे लगा कि यह सिर्फ हवस नहीं, बल्कि अपनी बहन की मदद करने का एक ‘अजीब’ तरीका भी हो सकता है। वह कंचन को उस भक्ति के नीरस जीवन से निकालकर फिर से एक ‘स्त्री’ की तरह जीवंत देखना चाहती थी।

लेकिन वहीं, उसका एक हिस्सा कांप भी रहा था। कंचन अब ‘पवित्रता’ का चोला ओढ़ चुकी है। अगर आर्यन ने उसे हाथ लगाया और उसने विद्रोह कर दिया, तो पूरा परिवार तबाह हो जाएगा। अंजलि डर रही थी कि कहीं वह अपनी बहन को एक ऐसे नरक में न धकेल दे जहाँ से वापसी मुमकिन न हो।

एक औरत की मानसिकता में जब ‘सहानुभूति’ और ‘वासना’ हाथ मिला लेती हैं, तो वह बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार हो जाती है। अंजलि ने महसूस किया कि कंचन की भक्ति असल में उसकी अतृप्ति का ही दूसरा नाम है। वह सोचने लगी कि अगर वह कंचन को आर्यन के करीब लाती है, तो वह एक साथ दो काम करेगी—अपनी बहन की प्यास बुझाएगी और अपनी खुद की फंतासी को हकीकत में बदलेगी।

“आर्यन…” अंजलि ने धीरे से उसका हाथ दबाते हुए कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और डर एक साथ था। “तू जानता है तू आग से खेल रहा है। कंचन वैसी नहीं है जैसी मैं हूँ। वो मंदिर की चौखट छोड़कर तेरे बिस्तर तक आसानी से नहीं आएगी। लेकिन… लेकिन मैं उसे तड़पते हुए भी नहीं देख सकती। उसकी कोख को भरने के लिए अगर ये गुनाह भी करना पड़े, तो शायद मैं तैयार हूँ।”

अंजलि ने अपने होंठ भींचे और आर्यन की आँखों में झाँका। उसने तय कर लिया था कि वह कंचन को बुलाएगी। उसे यकीन था कि आर्यन का यह 7 इंच का जादू जब कंचन के सामने होगा, तो उसकी सारी भक्ति और पूजा-पाठ धरे के धरे रह जाएंगे।

“ठीक है… मैं उसे फोन करती हूँ। पर याद रखना, आज सिर्फ उसे ‘आमंत्रण’ देना है, उसे डराना नहीं।” अंजलि ने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया।

अंजलि ने गहरी साँस ली और अपने थरथराते हाथों से फोन का डायल पैड खोला। पास ही लेटा आर्यन अपनी शिकारी नज़रों से अपनी माँ के चेहरे के बदलते हाव-भाव देख रहा था। उसे पता था कि यह एक फोन कॉल उनके इस ‘वर्जित खेल’ में एक नया और बड़ा अध्याय जोड़ने वाला है।

फोन की घंटी बजते ही अंजलि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। दूसरी तरफ से एक शांत और सौम्य आवाज़ आई— “हेलो, जीजी? जय XXXXXX!”

अंजलि ने अपनी आवाज़ को सामान्य किया और बड़ी चतुराई से बातचीत शुरू की। “जय XXXXX कंचन! कैसी है तू? बस आज सुबह से तेरी बहुत याद आ रही थी। मन बहुत भारी-भारी सा लग रहा था, सोचा तुझसे बात कर लूँ।” कंचन ने अपनी आदतन मिठास से जवाब दिया और अपने घर-परिवार और पूजा-पाठ की बातें करने लगी।

अंजलि ने धीरे से अपनी चाल चली। “कंचन, मेरा बहुत मन था कि मैं तेरे पास कुछ दिन के लिए आ जाऊँ, पर देख ना… आर्यन का कॉलेज चल रहा है। घर पर वो अकेला है, उसे छोड़कर मैं कहीं जा नहीं सकती। पर सच कहूँ तो आज अकेली हूँ और मन बहुत उदास है।” अंजलि की आवाज़ में जो ‘अकेलेपन’ का दर्द था, उसने कंचन के ममतामयी और कोमल दिल पर असर किया।

जब अंजलि ने उसे घर आने को कहा, तो कंचन ने पहले हिचकिचाते हुए मना किया। “जीजी, आप जानती हैं मंदिर में आज विशेष पाठ है, और फिर घर पर भी…।” लेकिन अंजलि ने हार नहीं मानी। उसने थोड़ा ज़ोर देते हुए कहा, “क्या अपनी बहन के लिए एक दिन नहीं निकाल सकती? क्या पता फिर कब मौका मिले।”

अंजलि की ज़िद के आगे कंचन पिघल गई। उसने एक ठंडी साँस भरी और कहा, “ठीक है जीजी, आप इतना कह रही हैं तो मैं आज शाम को आती हूँ। पर सिर्फ एक रात के लिए… कल सुबह मुझे जल्दी वापस निकलना होगा।”

यहाँ कंचन की मानसिकता को समझना बहुत दिलचस्प है। वह जो ‘सिर्फ एक रात’ की शर्त रख रही है, वह असल में उसके अपने डर का बचाव है। वह जानती है कि अंजलि के घर जाने का मतलब है पुरानी यादों का ताज़ा होना। उसके अवचेतन मन में कहीं न कहीं उस ‘पुरानी आग’ का खौफ है, इसलिए वह खुद को यकीन दिला रही है कि वह जल्दी लौट आएगी। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि अंजलि का ‘अकेलापन’ महज़ एक जाल है और उसका जवान भतीजा उसके स्वागत के लिए अपने 7 इंच के हथियार के साथ तैयार खड़ा है।

जैसे ही अंजलि ने फोन काटा, आर्यन ने झटके से उसे अपनी बाहों में भर लिया। “मान गई ना वो? देखा माँ… आपकी आवाज़ में जो जादू है, उससे वो बच नहीं पाई।”

अंजलि का चेहरा अब पसीने से भीग चुका था। उसने आर्यन की आँखों में देखा और फुसफुसाते हुए कहा, “वो आ रही है आर्यन… पर याद रखना, वो मेरी बहन है। उसके साथ जो भी होगा, उसकी ज़िम्मेदारी तेरी है। तूने उसे ‘एक रात’ के लिए बुलाया है, पर मुझे डर है कि ये रात हम तीनों की ज़िंदगी बदल देगी।”

दोपहर के 3 बज रहे थे। बाहर सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, लेकिन कमरे के अंदर का माहौल अब उस ‘एक रात’ की कल्पना से और भी ज़्यादा गर्म और भारी हो चुका था। कंचन मासी का फोन कटते ही आर्यन के अंदर का शिकारी पूरी तरह जाग उठा। उसने अब कोई ढोंग या मर्यादा बनाए रखने की ज़रूरत नहीं समझी।

अंजलि अभी फोन हाथ में लिए सोच ही रही थी कि उसने क्या कर दिया है, तभी आर्यन ने एक झटके से अपना नेकर नीचे उतार दिया।

अंजलि की नज़रें जैसे ही नीचे गईं, उसके गले में थूक सूख गया। आर्यन का 7 इंच का काला फौलाद किसी खूंखार जानवर की तरह आज़ाद होकर उसके चेहरे के ठीक सामने लहरा रहा था। उसकी नसें उभरी हुई थीं और वह उत्तेजना के मारे फड़क रहा था।

आर्यन इस वक्त पूरी तरह ‘डोमिनेंट’ मानसिकता में था। वह अपनी माँ को यह एहसास कराना चाहता था कि अब वह उस मोड़ पर है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। नेकर उतारकर उसने यह साफ कर दिया कि कंचन मासी का आना महज़ एक मुलाकात नहीं, बल्कि एक ‘शिकार’ की शुरुआत है। वह अपनी माँ की आँखों में उस ७ इंच के प्रति ‘खौफ’ और ‘हवस’ का मिला-जुला भाव देखना चाहता था।

अंजलि की स्थिति बहुत जटिल थी। एक तरफ वह अपनी सगी बहन के लिए चिंतित थी, लेकिन दूसरी तरफ अपने सामने उस नंगे, कड़क और विशाल अंग को देखकर उसका शरीर फिर से जवाब देने लगा था। एक औरत की मानसिकता में जब ‘भय’ और ‘कामुकता’ का मिलन होता है, तो वह और भी ज़्यादा उत्तेजित हो जाती है। उसे लग रहा था कि उसका बेटा अब एक ऐसा ‘नर’ बन चुका है जो उसकी पूरी नस्ल पर कब्ज़ा करने की ताकत रखता है।

जब एक औरत अपने सामने उस पुरुष अंग को इतना कड़क और बेबाक देखती है, जिसे उसने खुद पैदा किया हो, तो उसके अंदर ‘नैतिकता’ और ‘प्रकृति’ के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ जाता है।

अंजलि को उस ७ इंच के लोहे को देखकर यह यकीन हो गया कि कंचन की बरसों की तपस्या और ‘बांझपन’ का सन्नाटा इस प्रहार के सामने टिक नहीं पाएगा। उसे लगा कि यह अंग सिर्फ हवस का साधन नहीं, बल्कि एक ‘विनाशकारी शक्ति’ है।

अंजलि ने अनजाने में ही अपनी जीभ अपने सूखे होंठों पर फेरी। आर्यन का जान-बूझकर नंगा होना उसके लिए एक संदेश था— “अब तू सिर्फ मेरी माँ नहीं, मेरी इस योजना की साझीदार है।” वह उस नग्नता को ठुकरा नहीं सकी, बल्कि उसे एक अजीब सी ‘प्रशंसा’ के साथ देखती रही।

आर्यन ने बिना कुछ बोले अपनी माँ के चेहरे को अपनी ओर मोड़ा और अपना वो दहकता हुआ अंग उसके गालों से छुआ दिया। “देख रही हो माँ? ये कंचन मासी के स्वागत के लिए तैयार है। 12 साल का सूखा अब इसी से खत्म होगा।”

अंजलि का शरीर थरथरा उठा। उसने महसूस किया कि आर्यन अब किसी की नहीं सुनेगा। “तू… तू पागल हो गया है आर्यन… वो तेरी मासी है,” अंजलि ने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ अनजाने में ही उस ७ इंच के फौलाद की ओर बढ़ रहे थे।

दोपहर के 3:15 बज रहे थे। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि अंजलि के दिल की धड़कनें साफ सुनी जा सकती थीं। आर्यन अब बिस्तर के किनारे पर किसी सिंहासन पर बैठे सम्राट की तरह बैठ गया। उसकी टांगें फैली हुई थीं और उसके बीच से निकलता वह 7 इंच का फौलादी मूसल ऊपर की ओर सिर उठाए अंजलि को चुनौती दे रहा था।

आर्यन ने अपनी आँखों से एक तीखा और अधिकारपूर्ण इशारा नीचे की ओर किया। वह इशारा एक बेटे का नहीं, बल्कि एक स्वामी का था। अंजलि, जो अब तक कांप रही थी, उस इशारे के सम्मोहन में ऐसी बंधी कि उसके घुटने अपने आप ज़मीन पर टिक गए।

ज़मीन पर घुटनों के बल बैठी अंजलि की नज़रें ठीक उस विशाल अंग पर थीं। इस दृश्य को अगर एक औरत की मानसिकता से समझा जाए, तो यह पूर्ण समर्पण का क्षण था।

अंजलि के सामने वही अंग था जिसने सुबह उसे बेदम कर दिया था। अब वह उसे अपनी आँखों के इतना करीब पाकर मंत्रमुग्ध थी। उसने अपनी कांपती उंगलियों से उस मूसल को छुआ। वह आग की तरह गर्म था और उसकी नसें किसी जीवित साँप की तरह फड़क रही थीं।

अंजलि ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोला। उसने अपनी नज़रों को ऊपर उठाकर एक बार आर्यन को देखा, जैसे वह अंतिम अनुमति माँग रही हो। आर्यन ने उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे आगे की ओर धकेला। जैसे ही अंजलि ने उस ७ इंच के गर्म फौलाद का ‘टोपा’ अपने मुँह में लिया, उसके पूरे बदन में करंट दौड़ गया।

एक औरत के लिए यह क्रिया केवल हवस नहीं, बल्कि भक्ति बन जाती है। उसे आर्यन के पसीने और मर्दानगी की वह सोंधी महक मदहोश कर रही थी। वह अपनी ज़ुबान से उस सुपारी को सहलाने लगी। उसकी लार ने उस अंग को और भी चमकीला और चिकना बना दिया था।

जब अंजलि उस अंग को अपने मुँह के अंदर ले रही थी, तो उसके दिमाग में एक साथ कई भावनाएं चल रही थीं:

वह कल्पना कर रही थी कि कुछ घंटों बाद उसकी बहन कंचन, जो अभी मंदिर में पूजा कर रही है, उसे भी इसी तरह घुटनों के बल बैठकर इस ‘दिव्य अंग’ की सेवा करनी होगी। यह सोचकर अंजलि के मुँह में और भी रस भर आया।

उसे महसूस हो रहा था कि उसका मुँह उस विशाल अंग को पूरा समाने में छोटा पड़ रहा है। यह अहसास उसे एक ‘मादा’ होने का गौरव दे रहा था कि वह इतने विशाल ‘नर’ को तृप्त कर रही है।

अब उसके अंदर की ‘माँ’ पूरी तरह मर चुकी थी। वह केवल एक प्यासी औरत थी, जो अपने बेटे की मर्दानगी को अपना ईश्वर मान चुकी थी।

आर्यन ने अंजलि के सिर को पकड़कर अपनी कमर के झटके शुरू किए। अंजलि का गला उस गहराई को सहने की कोशिश कर रहा था। ‘गप-गप’ की आवाज़ें कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। अंजलि की आँखों से पानी निकल आया था, पर वह हटना नहीं चाहती थी। वह उस ७ इंच के ज़हर को अपनी रूह तक उतार लेना चाहती थी।

वह जानती थी कि यह ‘तैयारी’ सिर्फ उसके लिए नहीं है। वह आर्यन को उस ‘शिकार’ के लिए तैयार कर रही थी जो शाम को इस घर में कदम रखने वाली थी।

दोपहर की उस मदहोश खामोशी में आर्यन अब किसी और ही लोक में पहुँच चुका था। बिस्तर पर पैर फैलाकर बैठे आर्यन के चेहरे पर एक ऐसी विजयी मुस्कान थी, जो केवल उस पुरुष के चेहरे पर आती है जिसने अपनी सबसे बड़ी चुनौती (अपनी माँ) को अपनी दासी बना लिया हो।

अंजलि आज जिस शिद्दत और कलाकारी से उस 7 इंच के फौलाद को चूस रही थी, वह आर्यन की कल्पना से भी परे था। शायद मासी के आने की खबर और अपने अतीत के राज़ उगल देने के बाद अंजलि के अंदर की सारी हिचक खत्म हो चुकी थी।

कमरे में केवल ‘गप-गप’ और अंजलि की भारी साँसों की आवाज़ें गूँज रही थीं। इस दृश्य को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि अंजलि का आर्यन की मर्दानगी के प्रति पूर्ण समर्पण था।

अंजलि अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल किसी कलाकार की तरह कर रही थी। वह कभी उस सुपारी के चारों ओर अपनी ज़ुबान फिराती, तो कभी पूरे ७ इंच के लट्ठ को अपने गले की गहराई तक उतार लेती। उसकी आँखें बंद थीं और वह उस अंग के एक-एक रेशे को अपनी जीभ से महसूस कर रही थी। उसे पता था कि आर्यन को कहाँ और कैसे सबसे ज़्यादा सुख मिलता है।

आर्यन ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया। उसकी आँखें आधी बंद थीं और उसके हाथ अंजलि के बालों में मजबूती से धंसे हुए थे। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे अंजलि की गर्म और गीली गुफा उसके पूरे अस्तित्व को सोख रही हो। अंजलि की लार ने उस अंग को इतना चिकना बना दिया था कि वह बिना किसी घर्षण के उसके मुँह के अंदर-बाहर हो रहा था।

आर्यन के लिए सबसे बड़ा आनंद शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक था। वह देख रहा था कि वह औरत, जो कल तक उसे नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी, आज उसके पैरों के बीच घुटनों के बल बैठकर उसके पसीने और उसकी गंध का स्वाद ले रही है। यह अहसास उसे एक अजेय पुरुष बना रहा था।

अंजलि आज अपनी पूरी ‘औरतियत’ को झोंक रही थी। उसकी मानसिकता अब एक ऐसी प्रेमिका की थी जो अपने प्रेमी को उस शिखर पर पहुँचा देना चाहती है जहाँ से उसे दुनिया की कोई और चीज़ नज़र न आए।

अंजलि के मन में कहीं न कहीं यह बात भी थी कि शाम को कंचन आने वाली है। वह चाहती थी कि आर्यन को वह इतना सुख दे दे कि जब कंचन आए, तो आर्यन उसकी तुलना अंजलि से करे और अंजलि को ही ‘श्रेष्ठ’ पाए।

वह आर्यन के अंदर के उस ‘ज्वालामुखी’ को शांत करने के बजाय उसे और भड़का रही थी। वह चाहती थी कि जब कंचन इस कमरे में कदम रखे, तो आर्यन की भूख इतनी प्रबल हो कि वह कंचन को कच्चा चबा जाए।

आर्यन की कमर अब अपने आप झटके मारने लगी थी। अंजलि के मुँह का दबाव और उसकी ज़ुबान की गर्मी ने आर्यन के धैर्य की परीक्षा लेनी शुरू कर दी थी। आर्यन का शरीर अब अकड़ने लगा था और उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं।

“उफ़्फ़… माँ… आज तो तूने कमाल कर दिया… बस… ऐसे ही… कंचन मासी को भी यही सिखाना है तुझे…” आर्यन ने हांफते हुए फुसफुसाया।

दोपहर की उस तपती और उमस भरी खामोशी में अंजलि ने अब अपना सबसे शातिराना और कामुक दांव चला। आर्यन अपने परमानंद के शिखर पर था, उसकी आँखें बंद थीं और वह बस फटने ही वाला था कि तभी अचानक… अंजलि ने अपना मुँह पीछे खींच लिया।

वह ‘गप-गप’ का संगीत अचानक रुक गया। आर्यन ने एक झटके में अपनी आँखें खोलीं, उसका ७ इंच का फौलाद हवा में बिना किसी सहारे के थरथरा रहा था—पूरी तरह गीला, चमकीला और प्यासा।

अंजलि के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो किसी देवी की नहीं, बल्कि एक छल करने वाली अप्सरा की थी। उसने अपने होंठों के कोनों पर लगी आर्यन की मर्दानगी की बूंदों को अपनी उंगली से साफ किया और घुटनों के बल बैठी-बैठी ही आर्यन की आँखों में आँखें डालकर उसे ऊपर आने का इशारा किया।

अंजलि भूली नहीं थी कि सुबह आर्यन ने उसे तड़पाया था, उसे ‘टीज़’ किया था और उससे ज़बरदस्ती राज़ उगलवाए थे। वह चाहती थी कि आर्यन को भी उस अधूरेपन का अहसास हो। लेकिन उसका बदला नफरत भरा नहीं, बल्कि और भी ज़्यादा उत्तेजक था। वह चाहती थी कि आर्यन खुद अपने उस ‘अंग’ का स्वाद ले जो अभी-अभी उसकी माँ के मुँह की गहराई से बाहर आया है।

आर्यन हक्का-बक्का रह गया। उसका शरीर स्खलन के कगार पर था और अंजलि ने उसे बीच मँझधार में छोड़ दिया था। लेकिन जब उसने अंजलि का वो ‘किस’ वाला इशारा देखा, तो उसकी रगों में दौड़ता खून खौल उठा। उसे समझ आ गया कि उसकी माँ अब केवल एक ‘दासी’ नहीं रही, वह इस खेल की ‘डायरेक्टर’ बन रही है।

आर्यन बिस्तर से नीचे उतरा और अंजलि के सामने घुटनों के बल बैठ गया। अंजलि ने अपनी गर्दन आगे बढ़ाई और आर्यन के होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया।

जैसे ही आर्यन की ज़ुबान अंजलि के मुँह के अंदर गई, उसे अपना ही वो ‘खारा और गाढ़ा’ स्वाद महसूस हुआ जो अभी-अभी उसके ७ इंच के लोहे से अंजलि के मुँह में लगा था। यह एक औरत की मानसिकता की पराकाष्ठा है—अपने प्रेमी को उसका अपना ही अर्क चखाना।

आर्यन के लिए यह अनुभव बिजली के झटके जैसा था। अपनी ही मर्दानगी का स्वाद अपनी माँ के लार के साथ मिलाकर पीना… इस विचार ने उसके अंदर की हवस को १० गुना बढ़ा दिया। अंजलि ने उसके होंठों को ऐसे चूसा जैसे वह उसे चिढ़ा रही हो कि देखो, “जो तुमने मेरे साथ किया, मैं उसे तुम्हारे अंदर वापस डाल रही हूँ।”

चुंबन के दौरान अंजलि ने एक पल के लिए अपनी आँखें खोलीं। उसकी नज़रों में एक चुनौती थी— “क्या अब भी तुम्हें लगता है कि तुम मुझे कंट्रोल कर रहे हो?”

कमरे की हवा अब इतनी भारी हो चुकी थी कि सांस लेना मुश्किल था। आर्यन का वो ७ इंच का फौलाद अब अंजलि के पेट से सटकर खड़ा था। अंजलि ने चुंबन तोड़ते हुए आर्यन के कान में फुसफुसाया:

“कैसा लगा अपना ही स्वाद, आर्यन? सुबह मुझे बहुत नचाया था ना… अब समझ आया कि अधूरा रहने की तड़प क्या होती है?”

आर्यन के चेहरे पर एक पागलपन छा गया। उसने अंजलि के कंधों को दबोच लिया। “माँ… तू सच में बहुत खतरनाक होती जा रही है।”

उस चुंबन के बाद कमरे का तापमान जैसे उबलने लगा था। अंजलि की आँखों में वो शरारती चमक अब एक गहरी, आदिम प्यास में बदल चुकी थी। आर्यन के होंठों पर अपना ही स्वाद छोड़कर अंजलि ने उसे पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। आर्यन का शरीर अब एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह कांप रहा था जो फटने के लिए छटपटा रहा है।

अंजलि ने देखा कि आर्यन की सांसें उखड़ रही हैं और उसका 7 इंच का फौलाद अब पहले से भी ज़्यादा सख्त और गहरा लाल पड़ चुका है, जैसे वह खून के दबाव से फट जाएगा। अंजलि ने एक पल की भी देरी नहीं की और अपनी गर्दन झुकाकर वही वर्जित क्रिया फिर से शुरू कर दी।

जैसे ही अंजलि के गर्म होंठों ने उस दहकते हुए अंग को दोबारा छुआ, आर्यन के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। इस बार अंजलि का अंदाज़ बदला हुआ था। अब उसमें ‘बदला’ नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘दीवानगी’ थी जैसे वह उस अंग को अपने वजूद का हिस्सा बना लेना चाहती हो।

यहाँ अंजलि एक ऐसी औरत की भूमिका में थी जो अपने पुरुष की मर्दानगी को पूरी तरह सोख लेना चाहती है। वह अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज़ी से अपनी गर्दन हिला रही थी। उसका गला उस ७ इंच की गहराई को चुनौती दे रहा था। आर्यन की जांघें थरथरा रही थीं और उसके हाथ अंजलि के बालों को बिस्तर की चादर की तरह भींच रहे थे।

अंजलि जानती थी कि आर्यन अब आखिरी सीमा पर है। वह अपनी जीभ से उस सुपारी के निचले हिस्से को सहला रही थी, जहाँ से उत्तेजना का करंट सीधा आर्यन की रीढ़ की हड्डी तक पहुँच रहा था। वह चाहती थी कि आर्यन का वो ‘अभिषेक’ सीधा उसके हलक में हो, ताकि वह उस जीत को निगल सके।

आर्यन, जो अब तक खुद को ‘शिकारी’ समझ रहा था, अपनी माँ की इस कलाकारी के सामने पूरी तरह असहाय हो गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। उसे लग रहा था कि अंजलि का मुँह कोई जन्नत है जहाँ पहुँचकर उसकी सारी अकड़, सारा अहंकार पिघलकर बहने वाला है।

कमरे में अब केवल ‘गप-गप-गप’ की तेज़ आवाज़ें आ रही थीं, जो अंजलि की सिसकियों और आर्यन की भारी आहों के साथ मिल गई थीं। अंजलि के पसीने की बूंदें आर्यन की जांघों पर गिर रही थीं।

अंजलि अब अपनी आँखें ऊपर उठाकर आर्यन की ओर देख रही थी—वह नज़ारा किसी भी पुरुष को पागल करने के लिए काफी था। एक माँ का अपने बेटे के सामने घुटनों पर होना, उसकी आँखों में हवस का वो नंगा नाच, और मुँह में उस विशाल अंग की जकड़… यह दृश्य उस ‘एक रात’ के लिए आर्यन को पूरी तरह चार्ज कर चुका था जो कंचन मासी के साथ गुज़रने वाली थी।

दोपहर के 4:20 बज रहे थे। कमरे की हवा इतनी बोझिल हो चुकी थी कि सांस लेना भी भारी लग रहा था। अंजलि घुटनों के बल बैठी आर्यन के 7 इंच के फौलाद को अपनी आत्मा तक उतार रही थी। आर्यन का शरीर अब लकड़ी की तरह सख्त हो चुका था, उसके पैर बिस्तर पर कांप रहे थे।

जैसे ही अंजलि ने अपनी रेशमी हथेलियों को नीचे ले जाकर आर्यन के Testicles को अपनी उंगलियों से हल्का सा सहलाया, आर्यन की बर्दाश्त का बांध टूट गया।

अंजलि की उस जादुई छुअन ने आर्यन के रीढ़ की हड्डी में बिजली का ऐसा झटका दिया कि उसके मुँह से एक लंबी आह निकली। उसके ७ इंच के मूसल ने झटके मारे और वीर्य की पहली तेज़ धार अंजलि के हलक में जा गिरी। आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, उसका शरीर ढीला पड़ने लगा और वह परमानंद की उस अवस्था में पहुँच गया जहाँ दुनिया धुंधली हो जाती है।

आर्यन को लगा कि अब शांति मिलेगी, लेकिन अंजलि आज कुछ और ही तय करके बैठी थी। उसने वह सारा गाढ़ा और गर्म लावा अपने मुँह में ही रोक लिया। उसने उसे निगला नहीं। जैसे ही आर्यन ने शांत होकर गहरी सांस लेनी चाही, अंजलि झपटकर उसके ऊपर चढ़ गई और अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं।

इससे पहले कि आर्यन कुछ समझ पाता, अंजलि ने अपने होंठ उसके होंठों पर चिपका दिए और अपनी ज़ुबान उसके मुँह के अंदर धकेल दी। आर्यन की अपनी ही मर्दानगी का वो गर्म, खारा और चिपचिपा अर्क अंजलि की ज़ुबान के ज़रिए उसके अपने मुँह में वापस आ गया।

आर्यन का जी बुरी तरह मितला उठा। खुद का वीर्य अपनी ही माँ के मुँह से वापस अपने मुँह में लेना… यह उसके लिए ‘घिनौना’ था। उसे एक पल के लिए घिन आई, उसकी रूह कांप गई। लेकिन इसी घृणा के पीछे एक बहुत ही गहरा कामुक मनोविज्ञान था। उसे महसूस हुआ कि उसकी माँ ने उसे पूरी तरह से अपना ‘गुलाम’ बना लिया है—जहाँ उसकी मर्दानगी भी उसकी अपनी नहीं रही, वह भी अंजलि की मर्ज़ी से उसके अंदर वापस जा रही थी।

अंजलि इस वक्त अपनी जीत का आनंद ले रही थी। एक औरत के लिए अपने पुरुष को उसका अपना ही ‘अर्क’ पिलाना Ultimate Dominance की निशानी होती है।

अंजलि चाहती थी कि आर्यन को पता चले कि वह उससे अलग नहीं है। जो आर्यन के अंदर है, वह अंजलि का है, और जो अंजलि के अंदर है, वह अब आर्यन का स्वाद बन चुका है।

अंजलि मन ही मन सोच रही थी— “जब तू अपनी माँ के साथ यह सब कर सकता है, तो कंचन के साथ तुझे कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।” वह आर्यन की ‘घिन’ को खत्म करके उसे एक ऐसे स्तर पर ले जा रही थी जहाँ कोई भी चीज़ ‘गंदी’ न रहे।

आर्यन ने अंजलि को खुद से थोड़ा दूर ढकेला, उसके होंठों पर अब भी उस गाढ़े सफेद द्रव्य की लकीरें थीं। उसने अपनी थूक गटकते हुए अंजलि को देखा। उसकी नज़रों में अब भी घिन थी, पर शरीर उस अपमानजनक सुख से बुरी तरह कांप रहा था।

“माँ… तू… तू पागल हो गई है। ये क्या किया तूने?” आर्यन ने हांफते हुए अपना मुँह साफ किया।

अंजलि ने अपने होंठों को अपनी ज़ुबान से चाटा और मुस्कुराते हुए बोली, “स्वाद कड़वा है, पर यही तो असली सच्चाई है आर्यन। अब जा, नहा ले… शाम को कंचन आ रही है। उसे तो तू इससे भी कड़वा स्वाद चखाएगा ना?”

आर्यन का दिमाग इस वक्त किसी तेज़ घूमने वाले चक्रवात की तरह था। वह हक्का-बक्का होकर अंजलि को देख रहा था, जो बिस्तर पर बिखरे हुए बालों और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए बैठी थी। आर्यन के मुँह के अंदर अब भी वह अपनी ही मर्दानगी का खारा और चिपचिपा स्वाद महसूस कर रहा था, जो अंजलि ने एक ‘वर्जित चुंबन’ के ज़रिए उसके अंदर वापस धकेल दिया था।

आर्यन के लिए यह अनुभव ‘कामुक रोमांच’ और ‘असहज घृणा’ का एक ऐसा मेल था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। वह इस बात से पूरी तरह कन्फ्यूज़ था कि उसकी ‘भोली’ दिखने वाली माँ अचानक इतनी शातिर और शिकारी कैसे हो गई।

आर्यन लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की ओर भागा। उसने बेसिन का नल पूरी रफ्तार से खोल दिया और अंजलि के उस ‘गंदे प्यार’ को मुँह से बाहर निकालने के लिए कुल्ला करने लगा।

आर्यन जब बार-बार कुल्ला कर रहा था, तो उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ मुँह साफ करना नहीं था, बल्कि वह उस ‘अधीनता’ को धोने की कोशिश कर रहा था जो अंजलि ने उस पर थोप दी थी। अब तक आर्यन खुद को इस खेल का खिलाड़ी समझ रहा था, लेकिन आज अंजलि ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ एक मोहरा नहीं है—वह शतरंज की बिसात बिछाने वाली असली ‘क्वीन’ है।

बाथरूम के बाहर बिस्तर पर बैठी अंजलि आर्यन की हरकतों को सुन रही थी। वह जानती थी कि आर्यन को घिन आ रही है, और यही उसका असली ‘मास्टरस्ट्रोक’ था। वह चाहती थी कि आर्यन का अहंकार थोड़ा टूटे, ताकि वह कंचन मासी के आने पर और भी ज़्यादा सावधानी और शिद्दत से काम करे।

अंजलि धीरे से उठी और बाथरूम के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। उसने देखा कि आर्यन आईने में खुद को देख रहा है, उसके होंठ कुल्ला करने के कारण लाल हो चुके थे।

अंजलि ने महसूस किया कि अब आर्यन उसकी मुट्ठी में है। जब एक औरत अपने पुरुष को उसके अपने ही ‘अर्क’ का स्वाद चखा देती है, तो वह उस पुरुष के मन से हर तरह की झिझक खत्म कर देती है।

वह आर्यन के पास गई और उसके पीछे खड़ी होकर आईने में उसकी आँखों से आँखें मिलाईं। “क्यों? बहुत घिन आ रही है? आर्यन, अगर तू अपनी ही चीज़ से घिन करेगा, तो दुनिया को कैसे फतह करेगा? याद रख, शाम को जब कंचन यहाँ होगी, तो तुझे उसे भी इसी स्वाद तक पहुँचाना है।”

आर्यन ने तौलिए से अपना मुँह पोंछा और पलटकर अंजलि को देखा। उसकी कन्फ्यूजन अब धीरे-धीरे एक ठंडे इरादे में बदल रही थी। अंजलि की इस ‘घिनौनी’ हरकत ने उसे मानसिक रूप से और भी पत्थर बना दिया था।

“माँ… आपने जो किया, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। पर अब मुझे समझ आ गया कि आप क्या चाहती हैं। आप चाहती हैं कि मैं पूरी तरह से एक जानवर बन जाऊँ। ठीक है… तो शाम को कंचन मासी का स्वागत एक जानवर ही करेगा।”

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