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ड्राइंग रूम की लाइट जलाते ही घर जगमगा उठा। आर्यन ने सामान के थैले सीधे रसोई की स्लैब पर रख दिए, जबकि अंजलि सोफे पर बैठकर अपनी सैंडल उतारने लगी। दिन भर की भागदौड़ और क्लिनिक की व्यस्तता के बाद, घर की यह शांति बहुत सुखद लग रही थी।

“ओह, आखिरकार घर पहुँच गए,” अंजलि ने एक लंबी राहत की सांस लेते हुए कहा। “आर्यन, तू ये सामान यहीं रहने दे, मैं आकर इसे सलीके से जमा दूँगी। अभी तो बस ऐसा लग रहा है कि गरम पानी से नहा लूँ तो सारी थकान मिट जाए।”

आर्यन रसोई से बाहर आया और बोला, “हाँ माँ, आप जाओ। वैसे भी पसीने और धूल से काफी चिपचिपाहट महसूस हो रही है। मैं भी अपने कमरे में जाकर शावर ले लेता हूँ, फिर फ्रेश होकर सब्जी काटने में आपकी मदद करूँगा।”

अंजलि मुस्कुराते हुए उठी और अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी। “ठीक है, तू जा। मैं भी बस पंद्रह-बीस मिनट में आती हूँ। आज शावर की बहुत सख्त ज़रूरत है।”

आर्यन भी अपने कमरे की तरफ मुड़ गया। “ठीक है माँ, मिलते हैं थोड़ी देर में।”

अंजलि अपने बेडरूम में दाखिल हुई और दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। उसने खिड़की के परदे गिराए और अपना बैग मेज पर रखा। वह आईने के सामने खड़ी हुई और अपने जूड़े को खोल दिया, जिससे उसके घने बाल उसके कंधों पर बिखर गए। उसने एक गहरी सांस ली और अपने बाथरूम की ओर बढ़ गई।

उधर आर्यन भी अपने कमरे में पहुँच चुका था। उसने अपनी शर्ट उतारी और तौलिया उठाकर सीधे बाथरूम का रुख किया। घर के दो अलग-अलग कोनों में, माँ और बेटा दोनों ही दिन भर की धूल और थकान को उतारने के लिए तैयार थे। बाहर हॉल में अब सन्नाटा था, बस रसोई में रखे ताजे टमाटरों और सब्जियों की महक हवा में घुली हुई थी।

रसोई में पहुँचते ही मसालों और ताजी कटी हुई सब्जियों की एक मिली-जुली खुशबू हवा में तैरने लगी। अंजलि ने चॉपिंग बोर्ड निकाला और बहुत ही सलीके से प्याज काटने लगी। उसके हाथ बड़ी फुर्ती से चल रहे थे—सालों का अनुभव जो था।

आर्यन ने पास आकर चाकू उठाना चाहा, “माँ, लाओ प्याज मैं काट देता हूँ, आपकी आँखों में पानी आ जाएगा।”

अंजलि ने मुस्कुराकर उसे कोहनी से थोड़ा पीछे धकेला, “अरे हट, तू रहने दे। तू काटेगा तो आधे मोटे और आधे पतले होंगे। फिर ग्रेवी सही नहीं बनेगी। तू बस आराम से वहां स्टूल पर बैठ और मुझे ये बता कि तेरे उस नए प्रोजेक्ट का क्या हुआ जिसके बारे में तू कल बता रहा था?”

आर्यन वहीं काउंटर के पास रखे स्टूल पर बैठ गया और अपनी माँ को काम करते हुए देखने लगा। “प्रोजेक्ट तो ठीक चल रहा है माँ, बस थोड़ी रिसर्च बाकी है। वैसे आप अकेले सब कर लेती हो, मुझे बुरा लगता है कि मैं बस बैठा रहता हूँ।”

“बेटा, माँ के लिए अपने बच्चे को खिलाना कोई काम नहीं, सुकून होता है,” अंजलि ने कड़ाही चढ़ाते हुए कहा। अचानक उसकी नज़र कोने में रखे खाली दूध के जग पर पड़ी। वह ठिठक गई। “ओह! एक गड़बड़ हो गई।”

आर्यन ने चकित होकर पूछा, “क्या हुआ माँ? नमक खत्म हो गया क्या?”

अंजलि ने अपना माथा पीटा, “नमक नहीं रे, हम मार्ट से दूध लाना ही भूल गए! सुबह की चाय और रात को तेरे पीने के लिए दूध बिल्कुल नहीं है। मेरा ध्यान ही नहीं रहा, इतनी सारी सब्जियों के चक्कर में मुख्य चीज़ ही रह गई।”

आर्यन तुरंत खड़ा हो गया। “कोई बात नहीं माँ, इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? नीचे नुक्कड़ वाली डेयरी खुली होगी अभी। मैं बस पाँच मिनट में लेकर आता हूँ।”

अंजलि ने उसे पर्स से पैसे देते हुए कहा, “सुन, ज्यादा दूर मत जाना, अगर नुक्कड़ वाली दुकान बंद हो तो लौट आना, हम बिना दूध के काम चला लेंगे। रात काफी हो गई है और मैं नहीं चाहती कि तू बेवजह बाहर भटके।”

“अरे माँ, मैं बच्चा नहीं हूँ अब। आप बस कड़ाही चढ़ाओ, मैं गया और आया,” आर्यन ने चाबी उठाई और मुस्कुराते हुए बाहर की ओर लपका।

अंजलि उसे जाते हुए देखती रही। उसके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। उसने गैस धीमी की और गुनगुनाते हुए मसाले भूनने लगी। घर में मलाई कोफ्ते की ग्रेवी पकने की आवाज़ और उसकी खुशबू अब गहराने लगी थी।

“ये लीजिए माँ, डेयरी खुली थी,” आर्यन ने दूध का पैकेट काउंटर पर रखते हुए कहा।

अंजलि ने मुस्कुराकर उसे देखा, “शुक्रिया बेटा। अब जल्दी से हाथ धोकर आ जा, खाना ठंडा हो रहा है।”

दोनों मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अंजलि ने आर्यन की थाली में दो रोटियाँ और कोफ्ता परोसा। पहला निवाला लेते ही आर्यन की आँखों में चमक आ गई। “माँ, सच में… आपके हाथ के खाने का कोई मुकाबला नहीं है। होटल का खाना इसके सामने कुछ भी नहीं है।”

अंजलि ने धीरे से रोटी का टुकड़ा तोड़ा, “बस-बस, इतनी तारीफ मत कर। मुझे पता है तुझे भूख लगी है इसलिए सब अच्छा लग रहा है।”

अगले आधे घंटे तक उनके बीच बहुत ही सहज और लंबी बातें हुईं। अंजलि ने उसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिनों के कुछ पुराने किस्से सुनाए, कैसे वह और उसके पिता पहली बार मिले थे। आर्यन बड़े ध्यान से सुन रहा था। बातों-बातों में हँसी-मजाक भी हुआ और दिन भर की सारी थकान जैसे उस खाने की मेज पर धुल गई।

जब खाना खत्म हुआ, तो मेज पर बर्तनों का ढेर लगा था। अंजलि उठी और बर्तन समेटने लगी, “चलो, अब मैं ये साफ कर लेती हूँ, फिर सो जाते हैं।”

आर्यन ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया और उसे वापस कुर्सी पर बिठा दिया। “नहीं माँ, आज नहीं। आज बर्तन मैं धोऊँगा। आप सुबह से क्लिनिक में खड़ी रहती हैं, फिर आपने बाज़ार में वक्त बिताया और अब खाना भी बनाया। अब आप सिर्फ आराम करेंगी।”

अंजलि ने विरोध करना चाहा, “अरे रहने दे आर्यन, तू थक जाएगा। तुझे कल जल्दी कॉलेज भी जाना है।”

आर्यन ने ज़िद पकड़ ली, “बिल्कुल नहीं माँ। ये मेरा घर भी है। आप जाइए अपने कमरे में और आराम से कोई किताब पढ़िए या सो जाइए। मैं बस दस मिनट में सब चकाचक कर दूँगा।”

अंजलि ने हार मान ली। उसके चेहरे पर गर्व और प्यार का मिला-जुला भाव था। “ठीक है, बड़े साहब। आज आपकी हुकूमत चलेगी। पर ध्यान से, वो कांच के गिलास मत तोड़ देना।”

“भरोसा रखिये माँ,” आर्यन ने हँसते हुए एप्रन पहना और सिंक की ओर बढ़ गया।

अंजलि अपने कमरे की ओर बढ़ी। जाते-जाते उसने मुड़कर देखा, आर्यन बहुत ही तल्लीनता से बर्तन धो रहा था। उसे लगा कि उसका बेटा अब वाकई उसकी ताकत बन गया है। वह अपने कमरे में दाखिल हुई, मद्धम रोशनी वाली नाइट लैंप जलाई और बिस्तर पर लेट गई। दिन भर की भागदौड़ के बाद, बिस्तर की कोमलता उसे सुकून दे रही थी।

जब अंजलि रसोई में पहुँची, तो वह हैरान रह गई। सिंक पूरी तरह साफ था, एक भी बर्तन बाहर नहीं था और स्लैब को भी आर्यन ने गीले कपड़े से पोंछकर चमका दिया था। डाइनिंग टेबल की कुर्सियां भी अपनी जगह पर सलीके से लगी थीं।

“अरे वाह!” अंजलि के मुँह से धीरे से निकला।

आर्यन वहीं खड़ा अपना हाथ पोंछ रहा था। माँ को देखकर वह मुस्कुराया, “देख लीजिए डॉक्टर साहब, क्लिनिक की तरह यहाँ भी सब हाइजीनिक (hygienic) है या नहीं?”

अंजलि ने पास आकर उसके सिर पर हाथ फेरा, “तूने तो वाकई कमाल कर दिया आर्यन। मुझे लगा था तू बस बर्तन धोकर छोड़ देगा, पर तूने तो पूरा किचन ही चकाचक कर दिया। बहुत बढ़िया!”

आर्यन ने गर्व से सिर हिलाया। तभी अंजलि को याद आया कि वह दूध गरम करना भूल गई थी। वह स्टोव की ओर बढ़ी और दूध का पतीला चढ़ाया।

“सुन आर्यन,” अंजलि ने मुड़कर कहा, “तूने बहुत काम कर लिया। अब तू ऊपर अपने कमरे में जा और आराम कर। मैं यहाँ दूध गरम कर रही हूँ, जैसे ही उबल जाएगा, मैं यहीं काउंटर पर ढक कर रख दूँगी। तू जब सोने लगे, तो नीचे आकर अपना गिलास लेकर पी लेना। ठीक है?”

आर्यन ने एक लंबी जम्हाई ली, “ठीक है माँ। वैसे भी अब मुझे नींद आ रही है। आप भी ज्यादा देर मत जागना। गुड नाइट!”

“गुड नाइट बेटा, सो जा,” अंजलि ने उसे जाते हुए देखा।

आर्यन सीढ़ियों की ओर बढ़ा। उसका कमरा पहली मंजिल (First Floor) पर था। सन्नाटे भरे घर में उसकी सीढ़ियाँ चढ़ने की ‘धप-धप’ की आवाज़ गूँजी और फिर ऊपर के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

अंजलि अकेली रसोई में खड़ी थी। दूध उबलने का इंतज़ार करते हुए वह खामोशी से खिड़की के बाहर रात के अंधेरे को देख रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि आज की शाम, सालों बाद, उसे एक बहुत ही मुकम्मल और शांत अहसास दे गई थी। दूध में उबाल आया, उसने गैस बंद की और पतीले को जाली से ढंक दिया।

फिर वह भी धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ गई, यह सोचकर कि उसका बेटा अब वाकई उसकी परछाईं बन चुका है।

आर्यन ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपनी स्टडी टेबल की ओर बढ़ा। मेज पर बिखरी हुई कुछ किताबें और आधा खुला हुआ जर्नल उसे उसके अधूरे असाइनमेंट की याद दिला रहे थे। उसने अपनी टी-शर्ट उतारी, कुर्सी पर फेंकी और नंगे बदन ही लैपटॉप खोलकर बैठ गया।

अगले आधे घंटे तक वह पूरी तरह से अपने कॉलेज के काम में डूब गया। उसने कुछ नोट्स तैयार किए, पिछले हफ्ते के छूटे हुए लेक्चर के पीडीएफ (PDF) चेक किए और अपने प्रोजेक्ट की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया। काम खत्म करने के बाद उसने एक लंबी अंगड़ाई ली और अपनी गर्दन के तनाव को कम करने के लिए उसे दोनों तरफ झटका।

“चलो, आज का कोटा तो पूरा हुआ,” उसने खुद से बुदबुदाते हुए लैपटॉप बंद कर दिया।

अब वक्त था थोड़ा ‘मी-टाइम’ (Me-time) का। वह अपने बिस्तर पर ढह गया और तकिए का सहारा लेकर अपना फोन निकाला। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला। रंग-बिरंगी रील्स, दोस्तों की पार्टियों की तस्वीरें और मीम्स की बाढ़ के बीच वह बस अंगूठा चलाता रहा। कभी किसी पुरानी दोस्त की फोटो पर रुकता, तो कभी किसी फनी वीडियो पर मुस्कुरा देता।

इंस्टाग्राम से मन भरा तो वह यूट्यूब पर चला गया। वहां उसने कुछ टेक-रिव्यूज देखे और फिर कुछ पुरानी यादों को ताजा करने के लिए कुछ अनप्लग्ड गानों की प्लेलिस्ट चला दी। मद्धम संगीत कमरे के सन्नाटे में घुलने लगा। फोन की स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर चमक रही थी और वह बस बिना किसी मकसद के एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर स्क्रॉल करता रहा।

रात अब गहरी हो चली थी। बाहर की दुनिया सो चुकी थी, लेकिन आर्यन का दिमाग अभी भी उन वीडियो और सूचनाओं के समंदर में तैर रहा था। उसे अहसास ही नहीं हुआ कि वक्त कैसे पंख लगाकर उड़ गया। अचानक उसे याद आया कि नीचे रसोई में माँ ने उसके लिए दूध रखा है।

आर्यन ने एक लंबी जम्हाई ली और बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी टी-शर्ट वापस नहीं पहनी, बस अपने लोअर में ही कमरे से बाहर निकला। उसे पता था कि उसकी माँ की नींद बहुत कच्ची है, और वह उन्हें इस वक्त जगाना नहीं चाहता था।

उसने सीढ़ियों पर अपने पैर बहुत ही सावधानी से रखे। हर कदम पर वह ध्यान दे रहा था कि लकड़ी की सीढ़ी कहीं ‘चूँ’ की आवाज़ न कर दे। पहली मंजिल से नीचे उतरते वक्त पूरे घर में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, जिसमें केवल क्लॉक की ‘टिक-टिक’ सुनाई दे रही थी।

“माँ सो रही होंगी,” उसने मन ही मन सोचा। उसने नीचे हॉल की लाइट नहीं जलाई, बस अपने फोन की टॉर्च की हल्की रोशनी फर्श पर डाली ताकि किसी फर्नीचर से टकरा न जाए।

अंजलि के कमरे का दरवाज़ा बंद था और अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। आर्यन दबे पाँव रसोई की ओर बढ़ा। रात के इस पहर में रसोई का स्टील और टाइल्स टॉर्च की रोशनी में थोड़े ठंडे और चमकदार लग रहे थे।

रसोई के काउंटर पर वही पतीला रखा था जिसे उसकी माँ ने ढक कर छोड़ा था। आर्यन ने टॉर्च को स्लैब पर टिकाया और धीरे से जाली हटाई। दूध अब भी हल्का गुनगुना था। उसने पास ही रखा अपना पसंदीदा कांच का गिलास उठाया। सन्नाटे में गिलास के शेल्फ से टकराने की हल्की सी ‘खनक’ हुई, जिससे आर्यन एक पल के लिए ठिठक गया और माँ के कमरे की तरफ देखा।

जब उसे यकीन हो गया कि सब शांत है, तो उसने बहुत ही सावधानी से पतीले से दूध गिलास में डालना शुरू किया। दूध के गिरने की धार वाली आवाज़ उस खामोश रसोई में बहुत साफ़ सुनाई दे रही थी।

आर्यन ने बहुत ही सावधानी से अपने कदम पीछे मोड़े। एक हाथ में दूध का गिलास था और दूसरे हाथ में फोन, जिसकी टॉर्च की रोशनी वह नीचे फर्श पर डाल रहा था ताकि रास्ता साफ दिखे। घर का सन्नाटा अब पहले से कहीं ज्यादा गहरा महसूस हो रहा था, जैसे दीवारें भी सांस ले रही हों।

जैसे ही वह सीढ़ियों की ओर बढ़ने के लिए अपनी माँ के बेडरूम के दरवाजे के सामने से गुजरा, उसके कदम ठिठक गए।

हवा में एक बहुत ही महीन और दबी हुई आवाज़ तैर रही थी। यह आवाज़ इतनी धीमी थी कि अगर घर में ज़रा भी शोर होता, तो शायद सुनाई न देती। आर्यन ने अपनी साँसें रोक लीं। उसे लगा शायद माँ नींद में कुछ बोल रही हैं या शायद कोई सपना देख रही हैं।

उसकी जिज्ञासा (curiosity) ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। उसने टॉर्च बंद की और अंधेरे में ही दीवार का सहारा लेकर अपना कान धीरे से दरवाजे की लकड़ी के पास ले गया।

अंदर से रह-रह कर हल्की-हल्की सिसकारियों की आवाज़ आ रही थी। वह आवाज़ किसी दर्द की नहीं थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी बेचैनी और भारीपन था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपनी ही साँसों को काबू करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन नाकाम हो रहा हो। सिसकारियों के बीच बीच में चादर के रगड़ने की सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी।

आर्यन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि अंदर क्या हो रहा है। क्या माँ की तबीयत खराब है? क्या उन्हें कोई तकलीफ हो रही है? या फिर इस आधी रात के सन्नाटे में वह कुछ ऐसा सुन रहा था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

वह वहीं जड़वत (frozen) खड़ा रह गया, हाथ में दूध का गिलास अब भी वैसा ही था, लेकिन उसका पूरा ध्यान उस बंद दरवाजे के पीछे छिपी उन सिसकारियों पर टिक गया था।

एक पल के लिए उसने सोचा कि अंदर झाँक कर देखे, पर फिर उसे लगा कि आधी रात को माँ के कमरे में बिना दस्तक दिए जाना ठीक नहीं होगा। घबराहट और उलझन में, उसने अपने कदम पीछे खींचे और दबे पाँव सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

ऊपर अपने कमरे में पहुँचकर उसने सबसे पहले दूध का गिलास मेज पर रखा। उसने एक घूँट भी नहीं पिया; उसकी भूख और प्यास जैसे कहीं गायब हो गई थी। वह अपने बिस्तर के कोने पर बैठ गया और अपनी हथेलियों में सिर टिका लिया।

“क्या माँ की तबीयत खराब है?” उसने खुद से सवाल किया। “क्या उन्हें कोई बुरा सपना आया है? या फिर क्लिनिक की थकान की वजह से उन्हें तेज बुखार तो नहीं चढ़ गया?”

आर्यन को याद आया कि शाम को माँ काफी थकी हुई लग रही थीं। एक डॉक्टर होने के बावजूद, वह अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देती थीं। वह सोच रहा था कि शायद उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही हो या कोई पुराना दर्द उभर आया हो। लेकिन वो आवाजें… वे कुछ अलग थीं, कुछ ऐसी जो उसने पहले कभी नहीं सुनी थीं।

वह बिस्तर पर लेटा तो सही, पर उसकी आँखें छत की ओर टिकी थीं। कमरे का पंखा एक ही रफ्तार से घूम रहा था, लेकिन आर्यन का दिमाग घोड़े की तरह दौड़ रहा था। “अगर उन्हें वाकई जरूरत हुई और मैं ऊपर सोता रहा, तो?” यह सोचकर उसे अपनी फिक्र होने लगी।

एक तरफ माँ की फिक्र थी और दूसरी तरफ वो संकोच (hesitation) जो उसे वापस नीचे जाकर पूछने से रोक रहा था। वह बस इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि क्या उसे नीचे जाकर एक बार फिर से चेक करना चाहिए या सुबह होने का इंतज़ार करना चाहिए। रात का सन्नाटा अब उसे और भी डरावना और भारी लगने लगा था।

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