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सुबह की ताजी हवा और रसोई से आती गरम चाय की खुशबू ने घर के माहौल को बिल्कुल सामान्य बना दिया था। आर्यन जब नाश्ते की टेबल पर पहुँचा, तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कल रात का वह नग्न मंजर उसकी बंद आँखों के सामने अभी भी किसी बिजली की तरह कौंध रहा था। वह अपनी माँ की नज़रों से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

अंजलि ने प्लेट में गरमा-गरम परांठा रखते हुए बहुत ही सहजता से पूछा, “अब कैसा महसूस कर रहा है आर्यन? कल रात तो तू बिना कुछ कहे ही गहरी नींद में चला गया था।”

आर्यन ने चाय का कप पकड़ा, उसके हाथ थोड़े कांप रहे थे। “माँ… वह… मुझे पता नहीं क्या हुआ। अचानक सिर घूमने लगा और फिर मुझे कुछ याद नहीं।” वह थोड़ा अजीब और शर्मिंदा महसूस कर रहा था। उसे लग रहा था कि वह कितना कमज़ोर साबित हुआ कि अपनी माँ की खूबसूरती को देख कर ही बेहोश हो गया।

अंजलि उसकी इस उलझन को भाँप गई। उसने टेबल के दूसरी तरफ से आर्यन का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे हल्का सा दबाया।

“आर्यन, मेरी तरफ देख,” अंजलि ने बहुत ही कोमल और शांत स्वर में कहा।

आर्यन ने धीरे से नज़रें उठाईं। अंजलि की आँखों में कोई गुस्सा या उपहास नहीं था, बल्कि एक गहरी सांत्वना थी।

“डरने की या अजीब महसूस करने की कोई बात नहीं है बेटा। कल रात जो हुआ, वह तेरे दिमाग के लिए एक बहुत बड़ा ‘शॉक’ था। जब शरीर और मन एक साथ इतनी उत्तेजना और सच्चाई का सामना करते हैं, तो कभी-कभी ऐसा हो जाता है। इसमें तेरी कोई गलती नहीं है,” अंजलि ने उसे तसल्ली देते हुए कहा।

आर्यन को थोड़ा सुकून मिला, पर उसके मन में कल रात की वह तस्वीर अभी भी छपी हुई थी। “माँ, क्या हम… क्या हम उस बारे में बात करेंगे?”

अंजलि ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ हटाया और नाश्ता शुरू किया। “अभी नहीं। अभी तुझे कॉलेज जाना है और मुझे क्लिनिक। दिन भर इस बारे में सोचकर अपना दिमाग भारी मत करना। हम शाम को आराम से बैठकर बात करेंगे। तब तक तू बस शांत रह और यह नाश्ता खत्म कर।”

अंजलि की इस ‘मैच्योर’ बात ने आर्यन को एक सुरक्षित अहसास दिया। उसे लगा कि उसकी माँ ने उसे फिर से उस ‘गिल्ट’ के गड्ढे में गिरने से बचा लिया है। शाम का इंतज़ार अब उसके लिए किसी चुनौती की तरह नहीं, बल्कि एक नई और गहरी समझ की शुरुआत जैसा लग रहा था।

दोपहर का वक्त था और अंजलि अपने क्लिनिक के केबिन में बैठी थी। सामने मेज पर कुछ मरीजों की फाइलें खुली थीं, लेकिन उसका ध्यान फाइलों से कहीं दूर अपने बेटे आर्यन पर अटका हुआ था। सुबह से ही उसके दिमाग में कल रात का वह मंजर किसी फिल्म की रील की तरह घूम रहा था।

उसने अपनी कुर्सी के पीछे सिर टिकाया और एक गहरी ठंडी सांस ली।

अंजलि के मन में एक अजीब सी उलझन थी। वह खुद से ही बुदबुदायी, “सिर्फ Boobs को देखकर ही वह लड़का बेहोश हो गया? इतना गहरा असर पड़ा उस पर?”

एक डॉक्टर के तौर पर वह जानती थी कि आर्यन इस वक्त ‘हाइपर-स्टिमुलेशन’ (Hyper-stimulation) के दौर से गुजर रहा है। उसकी उम्र, उसकी जिज्ञासा और फिर अपनी ही माँ को उस रूप में देखना—यह उसके कोमल मन के लिए किसी बिजली के झटके जैसा था। अंजलि को फिक्र इस बात की नहीं थी कि आर्यन उत्तेजित हुआ, फिक्र इस बात की थी कि वह उस उत्तेजना को मानसिक रूप से संभाल नहीं पाया।

“मुझे इस स्थिति को बहुत ही सही ढंग और समझदारी से संभालना होगा,” अंजलि ने खुद से कहा। “अगर मैंने उसे अभी बीच मझधार में छोड़ दिया, तो वह ज़िंदगी भर औरतों के सामने असहज महसूस करेगा। उसे ‘सेक्सुअलिटी’ और ‘शारीरिक सच्चाई’ को एक सामान्य चीज़ की तरह स्वीकार करना सिखाना होगा।”

अंजलि ने तय कर लिया था कि वह अब पीछे नहीं हटेगी। उसने जो दरवाज़ा कल रात खोला था, उसे अब पूरा खोलना होगा ताकि आर्यन के मन का सारा डर और अचरज निकल जाए। वह जानती थी कि जिज्ञासा जब तक अधूरी रहती है, तब तक वह पागलपन बनी रहती है।

उसने घड़ी देखी। शाम होने वाली थी। उसने मन ही मन एक योजना बनाई कि आज रात वह आर्यन को सिर्फ ‘स्पर्श’ नहीं कराएगी, बल्कि उसे इस शारीरिक बनावट और खिंचाव के प्रति इतना सहज कर देगी कि उसका ‘शॉक’ हमेशा के लिए खत्म हो जाए।

“आज रात… उसे यह समझना होगा कि यह शरीर सिर्फ एक मांस का लोथड़ा नहीं, बल्कि भावनाओं और संवेदनाओं का एक सुंदर मेल है। उसे डराना नहीं, उसे सिखाना है,” अंजलि के चेहरे पर एक दृढ़ संकल्प था।

उसने अपना बैग उठाया और क्लिनिक से घर की ओर चल दी। आज की शाम और रात उनके रिश्ते की सबसे महत्वपूर्ण रात होने वाली थी।

शाम का वक्त था और घर में वही जानी-पहचानी खुशबू फैली हुई थी। अंजलि क्लिनिक से एक नए संकल्प के साथ लौटी थी। उसने देखा कि आर्यन थोड़ा गुमसुम था, शायद वह अभी भी रात की उस ‘बेहोशी’ और अपनी प्रतिक्रिया को लेकर शर्मिंदा था। अंजलि जानती थी कि उसे सबसे पहले इस भारीपन को खत्म करना होगा।

उसने आज रात का खाना थोड़ा जल्दी लगा दिया और आर्यन को आवाज़ दी।

डिनर टेबल पर अंजलि ने आज उसकी पसंद के राजमा-चावल बनाए थे। आर्यन चुपचाप अपना निवाला तोड़ रहा था, उसकी नज़रें प्लेट में ही गड़ी थीं।

अंजलि ने उसे गौर से देखा और फिर एक शरारती मुस्कान के साथ बोली, “वैसे आर्यन, आज मुझे क्लिनिक में एक बहुत ही ‘नाजुक’ पेशेंट मिला। बिल्कुल तेरी तरह।”

आर्यन ने चौंककर नज़रें उठाईं। “मेरी तरह? मतलब? उसे क्या हुआ था?”

अंजलि ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा और थोड़ा नाटक करते हुए कहा, “बेचारा… बस थोड़ा सा ब्लड प्रेशर लो हो गया था। मैंने जैसे ही उसका चेकअप करने के लिए Stethoscope निकाला, वो तो डर के मारे पीला ही पड़ गया। मुझे तो लगा कहीं कल रात की तरह वो भी वहीं… ‘ढेर’ न हो जाए।”

आर्यन का चेहरा एकदम से लाल हो गया। वह समझ गया कि माँ उसकी टांग खींच रही हैं। “माँ! आप भी न… वो… वो बस अचानक हुआ था। मेरा मतलब है, मैं तैयार नहीं था।”

अंजलि ज़ोर से हँस पड़ी। उसकी हँसी ने कमरे के तनाव को एक पल में पिघला दिया। “अच्छा? तैयार नहीं था? तो अगली बार क्या मुझे ‘नोटिस’ भेजना पड़ेगा? ‘मिस्टर आर्यन, आज रात 10 बजे प्रदर्शन होने वाला है, कृपया अपना दिल थाम कर बैठें’?”

आर्यन भी अब अपनी हँसी नहीं रोक पाया। “नहीं-नहीं, नोटिस की ज़रूरत नहीं है। बस… इस बार मैं थोड़ा ‘बैकअप’ लेकर बैठूँगा।”

अंजलि ने अपनी थाली से एक चम्मच राजमा उसे चखाया। “चल, अब ये उदास चेहरा छोड़। देख, तूने कल रात जो देखा, वो कोई जादू या डरावनी चीज़ नहीं थी। वो सिर्फ तेरा ही एक हिस्सा है जिससे तू आज तक अनजान था। और जो बेहोशी हुई… उसे मैं अपनी ‘खूबसूरती’ की तारीफ समझूँ या तेरी ‘कमज़ोरी’?”

आर्यन ने शरारत से अंजलि की आँखों में झाँका। “खूबसूरती की तारीफ ही समझिये माँ। क्योंकि उतनी ‘खूबसूरती’ झेलना हर किसी के बस की बात नहीं है।”

अंजलि ने हल्के से उसका कान खींचा। “बड़ा शातिर हो गया है तू बातों में। चल, जल्दी खाना खत्म कर। आज रात मुझे तुझे कुछ और ‘मेडिकल ज्ञान’ देना है, ताकि अगली बार तू कम से कम होश में तो रहे।”

खाने के बाद दोनों ने साथ मिलकर बर्तन समेटे। माहौल अब पूरी तरह से हल्का और खुशनुमा हो चुका था। लेकिन उस हँसी-मज़ाक के पीछे एक गहरी उत्तेजना और इंतज़ार था। दोनों जानते थे कि आज रात अंजलि उसे उस ‘अधूरी’ मंज़िल तक ले जाएगी जहाँ से कल वह लौट आया था।

बेडरूम में उस रात एक अजीब सी खामोशी थी, लेकिन यह खामोशी भारी नहीं, बल्कि सुकून भरी थी। कोने में रखा छोटा सा लैंप अपनी हल्की पीली रोशनी पूरे कमरे में बिखेर रहा था, जिससे माहौल बहुत ही आरामदायक (Cozy) और सुरक्षित लग रहा था। इतनी रोशनी काफी थी कि वे एक-दूसरे के चेहरे के भाव देख सकें, पर इतनी कम कि कोई झिझक न हो।

दोनों बिस्तर पर टिक कर बैठे थे। अंजलि ने अपनी रेशमी जुल्फों को पीछे किया और आर्यन की ओर मुड़कर एक बहुत ही निजी सवाल पूछा।

“आर्यन… सच-सच बता, क्या तेरी कॉलेज में कोई गर्लफ्रेंड है? या कभी रही है?” अंजलि की आवाज़ में एक सहेली जैसी जिज्ञासा थी।

आर्यन ने अपनी नज़रें झुका लीं और धीरे से अपना सिर हिलाया। “नहीं माँ… कभी नहीं। सच कहूँ तो, मैंने कभी उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया।”

अंजलि को थोड़ा अचरज हुआ। उसने शरारत से पूछा, “इतना हैंडसम बेटा है मेरा, और कोई लड़की पसंद नहीं आई? या फिर तू ही बहुत ‘शर्मीला’ है?”

“शर्मीला नहीं माँ, बस मैं शुरू से ही इन सब मामलों में बहुत सीधा रहा हूँ,” आर्यन ने सादगी से जवाब दिया। “मुझे समझ ही नहीं आता था कि लड़कियों से कैसे बात करूँ या उन्हें कैसे देखूँ। मेरे लिए पढ़ाई और घर ही सब कुछ था। और वैसे भी… जो ‘खूबसूरती’ और ‘सुकून’ मुझे घर में दिखता था, उसके आगे बाहर की दुनिया फीकी लगती थी।”

अंजलि ने महसूस किया कि आर्यन वाकई बहुत मासूम है। उसकी ‘सीधाई’ ही वजह थी कि कल रात वह अपनी माँ के उस रूप को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा था। उसने कभी किसी दूसरी लड़की को उस नज़र से देखा ही नहीं था, इसलिए उसके लिए यह सब किसी ‘मिरेकल’ जैसा था।

“तू वाकई बहुत भोला है आर्यन,” अंजलि ने उसका हाथ सहलाते हुए कहा। “पर अब तू बड़ा हो गया है। तेरे अंदर जो ये बदलाव आ रहे हैं, जो ये उत्तेजना महसूस होती है, वह एक स्वस्थ मर्द की निशानी है। बस तुझे इसे संभालना नहीं आता क्योंकि तूने कभी किसी के साथ ‘एक्सपेरिमेंट’ नहीं किया।”

उसने आर्यन की आँखों में झाँका। “इसीलिए शायद कुदरत ने तुझे मेरे पास भेजा है। ताकि तू अपनी पहली ‘टीचर’ से वह सब सीख सके जो तुझे दुनिया के सामने एक आत्मविश्वास से भरा पुरुष बनाएगा।”

आर्यन ने महसूस किया कि उसका डर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। लैंप की उस हल्की रोशनी में, अंजलि का चेहरा उसे दुनिया का सबसे खूबसूरत और भरोसेमंद चेहरा लग रहा था।

लैंप की वह मद्धम पीली रोशनी कमरे में एक सुरक्षित और गहरा एहसास पैदा कर रही थी। अंजलि ने महसूस किया कि आर्यन की धड़कनें अब भी थोड़ी तेज़ हैं, लेकिन उसकी आँखों में अब वह डर नहीं, बल्कि एक समर्पण था। अंजलि ने बहुत ही धीमे और सुरीले अंदाज़ में उसकी आँखों में झाँका।

अंजलि ने आर्यन का हाथ अपने हाथ में लिया और बहुत ही गंभीरता से उसे समझाया। “आर्यन… देख बेटा, आज की रात सिर्फ तेरे और मेरे बीच की उस सच्चाई की है जिसे तूने अब तक सिर्फ डर में देखा है। पर अब मैं तुझसे पूछती हूँ… क्या अब तुम तैयार हो?”

आर्यन ने एक लंबी सांस ली और धीमे से सिर हिलाया।

अंजलि ने आगे कहा, “एक बात का ध्यान रखना। अगर तुझे कुछ भी न सूझे, या तेरा दिमाग काम करना बंद कर दे, या तुझे लगे कि तू फिर से कल की तरह ‘ब्लैंक’ हो रहा है… तो घबराना मत। बस मुझे एक छोटा सा इशारा कर देना, मैं तुझे संभाल लूँगी।”

उसने आर्यन की आँखों में एक चुनौती और एक प्यार भरी चमक के साथ देखा और वह बात कह दी जिसने आर्यन के अंदर के पुरुष को जगा दिया।

“पर इस बार… पहल तुम्हें करनी है।”

अंजलि ने जैसे उसे पूरी बागडोर थमा दी थी। उसने साफ़ कर दिया था कि वह अब सिर्फ एक ‘दर्शक’ नहीं रहेगी, बल्कि वह चाहती थी कि आर्यन खुद अपनी झिझक तोड़े और अपनी मर्दानगी के उस पहले पायदान पर कदम रखे।

“बस इतना सा ही है… इसमें कुछ भी पहाड़ तोड़ने जैसा नहीं है। अपनी माँ पर भरोसा रख और अपनी भावनाओं को रास्ता दे,” अंजलि ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें मूंद लीं, जैसे वह आर्यन के अगले कदम का इंतज़ार कर रही हो।

आर्यन के सामने अब वह ‘कोरा कागज’ था जिसे उसे खुद अपनी हिम्मत से भरना था।

आर्यन का दिल किसी नगाड़े की तरह धड़क रहा था। अंजलि ने ‘पहल’ करने का पूरा मौका उसे दे दिया था, लेकिन आर्यन के लिए यह किसी हिमालय पर चढ़ने जैसा था। उसने अपनी पूरी हिम्मत जुटाई और बहुत ही कांपते हुए अपने हाथ को अंजलि के कुर्ते के बटनों की ओर बढ़ाया।

आर्यन की उंगलियां अंजलि के करीब पहुँचीं, लेकिन जैसे ही उसने उस रेशमी कपड़े को छुआ, उसके हाथ इतनी बुरी तरह थरथराने लगे कि वह एक बटन भी नहीं खोल पाया। वह जितना कोशिश करता, उसकी घबराहट उतनी ही बढ़ती जाती। वह बार-बार कोशिश करता, पर उसके हाथ जैसे उसका साथ ही नहीं दे रहे थे। वह अपनी इस ‘नाकामी’ पर खुद ही चिढ़ने लगा और पसीने-पसीने हो गया।

आर्यन को इस कदर जद्दोजहद करते देख अंजलि अपनी हँसी नहीं रोक पाई। कमरे के उस गंभीर और उत्तेजक सन्नाटे के बीच अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“अरे… अरे… बस कर आर्यन! तू तो ऐसे बटन खोल रहा है जैसे किसी बम को डिफ्यूज कर रहा हो,” अंजलि ने हँसते हुए कहा और उसका कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में ले लिया।

उसकी इस सहज हँसी ने भारी माहौल को एक पल में हल्का कर दिया। आर्यन की जो घबराहट उसे डरा रही थी, वह माँ के इस दोस्ताना अंदाज़ से अचानक गायब हो गई।

“माँ… यह… यह जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं,” आर्यन ने थोड़ा झेंपते हुए और मुस्कुराते हुए कहा।

अंजलि ने उसकी आँखों में शरारत से देखा। “अच्छा जी? डॉक्टर बनना आसान है, पर दो बटन खोलना मुश्किल? देख, अगर तू इतना डरेगा, तो फिर अपनी इस ‘टीचर’ से क्या सीखेगा? रिलैक्स … मैं कहीं भाग नहीं रही हूँ।”

अंजलि ने उसका हाथ पकड़कर उसे सहलाया ताकि उसकी कंपकंपी बंद हो। “दोबारा कोशिश कर। इस बार डर से नहीं, हक से। याद रख, मैंने तुझे आज़ादी दी है।”

आर्यन को अब खुद पर भरोसा होने लगा। माँ की उस हँसी ने उसे अहसास दिलाया कि यहाँ कुछ भी ‘अजीब’ या ‘पाप’ नहीं हो रहा, बल्कि यह उनके बीच का एक बहुत ही खूबसूरत और निजी पल है।

आर्यन की नाकाम कोशिश और फिर अंजलि की उस खिली-खिली हँसी ने माहौल को थोड़ा हल्का तो किया था, लेकिन आर्यन फिर से किसी गहरी सोच में डूब गया। वह अपने हाथ को देख रहा था जो अभी भी थोड़ा कांप रहा था। उसके मन में शायद यह चल रहा था कि वह अपनी माँ के सामने इतना कमज़ोर क्यों पड़ जाता है। उसका जिस्म घबराहट के मारे थोड़ा ठंडा पड़ गया था।

अंजलि एक डॉक्टर थी, वह समझ गई कि सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। उसे आर्यन के ‘नर्वस सिस्टम’ को शांत करने के लिए शारीरिक गर्माहट की ज़रूरत है।

अंजलि ने बिना कुछ बोले, बहुत ही कोमलता से अपने हाथ बढ़ाए और आर्यन को अपनी बाहों में भर लिया। उसने उसे एक बहुत ही गहरा और सुकून भरा हग किया।

आर्यन का सिर अंजलि के कंधे पर था। जैसे ही अंजलि का शरीर आर्यन से सटा, उसे अपनी माँ के जिस्म की वह कुदरती और तेज गर्मी महसूस होने लगी। अंजलि ने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया था, जिससे आर्यन के चेहरे पर उनके कुर्ते की सरसराहट और उसके नीचे की धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं।

“शांत हो जा आर्यन… देख, मैं यहीं हूँ,” अंजलि ने उसके कानों के पास बहुत ही धीमी आवाज़ में फुसफुसाया।

वह चाहती थी कि आर्यन इस जिस्म की गर्मी को महसूस करे। उसने महसूस किया कि आर्यन का ठंडा पड़ चुका शरीर धीरे-धीरे पिघल रहा है। उस आलिंगन में एक ऐसी सुरक्षा थी जिसने आर्यन के अंदर के ‘डर’ को सोख लिया। अंजलि की त्वचा की महक और उसकी साँसों की लय ने आर्यन को एक नई ऊर्जा दी।

आर्यन ने भी धीरे से अपने हाथ माँ की पीठ पर रखे। उसे अहसास हुआ कि यह शरीर जिससे वह डर रहा था, वह दरअसल उसका सबसे बड़ा सहारा है। अंजलि ने उसके बालों को सहलाते हुए उसे थोड़ी देर तक वैसे ही थामे रखा, ताकि उसके खून की गर्माहट आर्यन की रगों में भी उतर सके।

“अब लग रही है थोड़ी गर्मी?” अंजलि ने उसे बाहों में लिए हुए ही हल्के से पूछा।

आर्यन ने एक लंबी और सुकून भरी सांस ली। उसका डर अब भाप बनकर उड़ रहा था। उसे महसूस हुआ कि माँ के इस स्पर्श ने उसके अंदर की सारी झिझक को एक जादुई तरीके से खत्म कर दिया है। अब वह ‘नाकाम’ होने के डर से आज़ाद था।

उस गर्म और रेशमी आलिंगन में आर्यन को एक ऐसी सुरक्षा महसूस हुई, जिसने उसके अंदर के सारे डर को सोख लिया। अंजलि के शरीर की प्राकृतिक गर्माहट अब आर्यन की रगों में उतर रही थी। धीरे-धीरे, आर्यन की कंपकंपी बंद हुई और उसकी बंद मुट्ठियाँ खुल गईं।

उसने अनजाने में ही अपनी हथेलियाँ अंजलि की पीठ पर टिका दीं।

आर्यन ने बहुत ही कोमलता से अपनी उंगलियों को अंजलि की पीठ पर ऊपर-नीचे फेरना शुरू किया। कुर्ते के पतले कपड़े के नीचे से उसे अपनी माँ की रीढ़ की हड्डी और उनके शरीर की सुडौल बनावट का अहसास हो रहा था। उसे अब अपनी माँ एक ‘अनजानी पहेली’ नहीं, बल्कि एक ‘सहारा’ लग रही थीं।

अंजलि ने महसूस किया कि आर्यन की साँसें अब सामान्य हो गई हैं और उसका शरीर, जो पहले बर्फ की तरह ठंडा था, अब गर्म होने लगा है। वह समझ गई कि मैदान तैयार है—उसका बेटा अब मानसिक और शारीरिक रूप से शांत हो चुका है।

अंजलि ने धीरे से खुद को उस आलिंगन से अलग किया। उसने पीछे हटकर आर्यन के दोनों कंधों को पकड़ा और उसकी आँखों में सीधे झाँका। उन आँखों में अब पहले जैसी घबराहट नहीं, बल्कि एक नई चमक थी।

“अब लग रहा है न कि तू यहीं है, मेरे पास?” अंजलि ने एक हौसला बढ़ाने वाली मुस्कान के साथ पूछा। “देख, डर सिर्फ एक परछाई होती है, जिसे छू लो तो वो गायब हो जाती है।”

उसने आर्यन का हाथ धीरे से छोड़ा और बिस्तर पर थोड़ी सीधी होकर बैठ गई। लैंप की पीली रोशनी उनके चेहरे के आधे हिस्से को रोशन कर रही थी।

“अब… फिर से कोशिश कर। इस बार तू फेल नहीं होगा,” अंजलि ने बहुत ही धीमे और गहरे स्वर में उसे आदेश दिया, जो एक चुनौती भी थी और प्यार भरा प्रोत्साहन भी।

आर्यन ने एक गहरी साँस ली। उसने अपनी उंगलियों को देखा, जो अब बिल्कुल स्थिर थीं। उसने अपनी नज़रें अंजलि के चेहरे से हटाकर उनके कुर्ते के पहले बटन पर टिका दीं। इस बार उसके मन में कोई ‘बम डिफ्यूज’ करने जैसा तनाव नहीं था, बल्कि एक ‘जिज्ञासा’ थी जिसे उसे पूरा करना था।

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