अगले दिन मैं और पापा कार लेकर स्टेशन गए सुबह आठ बजे ,जब ट्रेन आई और दादाजी ट्रेन में से उतरे ..दादाजी को देखकर पापा आगे गए और उन्होंने और मैंने उनके पैर छुए .
दादाजी मुझे देखकर बड़े खुश हुए, वो बिलकुल नहीं बदले थे, वैसे ही खुशमिजाज, हट्टे-कट्टे, धोती कुरता पहने, मोटी और घनी मूंछे जिनमे सफ़ेद बाल ज्यादा थे और सर पर शानदार पगड़ी..
हम सभी वापिस आये, दरवाजा मम्मी ने खोला , मैं तो उनका बदला हुआ रूप देखकर हैरान रह गया. उन्होंने हरे रंग की साडी पहनी हुई थी, और अपने सर पर पल्लू डाला हुआ था, उन्होंने झुककर अपने ससुर के पैर छुए और दादाजी ने उन्हें सुखी रहने का आशीर्वाद दिया.
दादाजी :”अरे बहु, मैं तुम्हारे लिए खासतोर से गाँव का अचार लाया हूँ, ये ले..और ऋतू कहाँ है..?
मम्मी : “पिताजी, वो तो अभी स्कूल चली गयी, शाम तक आ जायेगी, आप थक गए होंगे, आप नहा धोकर आइये, मैं आपके लिए खाना लगाती हूँ.
और मम्मी ने सोनी को आवाज लगायी “सोनिईईई….ओ सोनिई ….पिताजी का सामान ले जा…और उनके लिए गर्म पानी लगा दे..”
सोनी मम्मी की आवाज सुनकर दौड़ी चली आई, वो ऊपर मेरे कमरे की सफाई कर रही थी, नीचे उतरते वक़्त उसके हिलते हुए मुम्मे देखकर मेरे मुंह और लंड में पानी आ गया, जैसे ही वो नीचे आई, दादाजी की नजर उसकी छाती पर पड़ी..
दादाजी : “कोन है ये…नौकरानी है क्या…”
मम्मी ने सहमते हुए हाँ में सर हिलाया.
दादाजी : “अरे..तेरे पास दुपट्टा नहीं है क्या…जवान लड़की है, और घर में बिना दुप्पट्टे के घूम रही है…कुछ सिखाया नहीं है तेरे घर वालों ने… और बहु, तुने भी कुछ नहीं कहा, तुझे तो इतनी समझ होनी चाहिए की इसे समझाए…..”
और अगले दस मिनट तक दादाजी ने सोनी और मम्मी की तो जैसे ले ली…..वो बोलते जा रहे थे, और गाँव और शहर में कितना फर्क है, ये सब बताते जा रहे थे, मम्मी और सोनी अपना सर झुकाए उनकी बात सुन रहे थे, पापा तो कमरे से बाहर ही चले गए, उनकी इतनी हिम्मत नहीं थी की बीच में पड़कर अपनी शामत बुलाये..
वैसे मम्मी को तो दादाजी के बारे में मालुम ही था, पर सोनी को उनके सामने लाने से पहले वो उसे बताना भूल गयी की बिना चुन्नी के उनके सामने न जाना… सोनी ने पूरा लेक्चर सुनने के बाद अपना दुप्पट्टा उठाया और उन्हें अपने पर्वतों पर ओढ कर उन्हें दुनिया की नजरों से ओझल कर दिया..
दादाजी नहाने चले गए, और मम्मी ने गहरी सांस लेकर मेरी तरफ देखा और कहा “आशु बेटा…देखा, मैं इसी बात से डर रही थी…
मुझे मालुम था की ये कुछ ना कुछ नुक्स जरुर निकाल लेंगे…कुछ कर बेटा…तुने तो पहले भी कई बार ऐसे काम किये हैं, इन्हें भी तू ही संभाल सकता है..”
मैं उनका इशारा समझ रहा था. मैंने मजे लेने के लिए उनसे पूछा..
मैं : “यानी, मैं दादाजी को भी अपने चुदाई के खेल में शामिल कर लूँ, मतलब आप अपने ससुर से चुदाई करवाना चाहती हैं..हूँ..” मैंने मसखरी वाले लहजे में उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा.
मेरी बात सुनकर किचन में खड़ी अन्नू, जो खाना बना रही थी, वो भी मुस्कुराने लगी.
मम्मी : “अब मैं क्या करूँ, जब से खुल कर लंड मिलने लगा है, इस तरह घुट कर जीना तो मैं भूल ही गयी हूँ,
अभी तो पिताजी लगभग पंद्रह दिन तक रहेंगे, उनके सामने हमेशा ये साडी और चुदाई भी सिर्फ तेरे पापा से, वो भी रात को… !! ना बाबा ना..मुझे तो ये सोचकर भी चक्कर आ रहे हैं, मैं तो तेरा लंड लिए बिना वैसे भी नहीं रह सकती और जब से ये अन्नू ने मेरी चूत की मालिश करके उसे चुसना शुरू किया है, मैं तो इसकी अडिक्ट हो गयी हूँ, मैं कैसे रहूंगी इतने दिनों तक इन सबके बिना…”
उनकी आँखों में निराशा के भाव थे.
मैं :”आप फ़िक्र मत करो मम्मी…मैं कुछ करता हूँ…जल्दी ही आपकी चुदाई का इन्तजाम करता हूँ…..”
मेरी बात सुनकर वो थोडा नोर्मल हुई..
मैं कॉलेज के लिए लेट हो गया था, मैंने जल्दी से नाश्ता किया और बाईक उठा कर चल दिया, कॉलेज में पहुँचते ही सन्नी और विशाल ने मुझे घेर लिया और आज का प्रोग्राम पूछने लगे..
मैंने उन्हें सारी बात बताई और कहा की अगले 15 दिनों तक के लिए अब सब भूल जाओ…मेरी बात सुनते ही सन्नी बोला “यार…ऐसा मत बोल…तुझे और पैसे चाहिए तो वो बोल, पर कसम से, जब से मैंने ऋतू की चूत मारी है, मेरे दिलो दिमाग में सिर्फ उसकी चूत की तस्वीरे ही घूम रही है, मेरे लंड को अगर उसकी चूत ना मिली तो मैं ना जाने क्या कर डालूं…तू कुछ भी कर, मुझे ऋतू की चूत मारनी ही है, अगर तू चाहे तो उसे लेकर मेरे फार्म हाउस पर आ जा. वहां कोई नहीं होता..”
मैं जानता था की सन्नी एक बड़े घर का बेटा है, और उसका महरोली में एक फार्म हॉउस भी है, जो काफी बड़ा है, उसमे एक हिस्से में बड़े-२ कमरे, पीछे स्विमिंग पूल और उसके पीछे स्टोर रूम जैसा एक और कमरा..हम कई बार वहां जाकर मस्ती करते थे, बीयर पीते थे.. पर मुझे मालुम था की ऋतू अगर स्कूल के अलावा ज्यादा देर तक बाहर रही तो दादाजी उसके लिए भी बोलेंगे..
पर जैसे ही सन्नी ने अपने फार्म हॉउस के बारे में कहा, मेरे दिमाग में एक खतरनाक ख़याल आने लगा…मैंने उन्हें कहा की मैं थोड़ी देर में उनसे मिलता हूँ और ये कहकर मैं केफेटेरिया में गया और चाय लेकर एक कोने में बैठ गया..
अब मैंने अपनी योजना बनानी शुरू की, कैसे क्या होगा, और कब होगा,.. पर इसके लिए मुझे सन्नी और विशाल की जरुरत पड़ेगी..घर पर तो सभी तैयार हो जायेंगे, मम्मी तो पहले से तैयार है कुछ भी करने को, उन्हें तो बस खुल कर चुदाई करवानी है, चाहे वो मेरे लंड से हो या उनके ससुर के लंड से..ऋतू भी मेरी बात नहीं टालेगी और रही बात पापा की तो उन्हें मम्मी संभाल लेगी, वैसे वो भी मना नहीं करेंगे..
मैंने मन ही मन पूरी योजना बनायीं और वापिस सन्नी और विशाल के पास चल दिया, सन्नी और विशाल को जब मैंने अपना प्लान बताया तो वो भी सकते में आ गए, पर ऋतू की चूत मारने के लालच में वो दोनों जल्दी ही मेरा साथ देने के लिए तैयार हो गए.
अगले दिन का प्लान बनाकर मैं शाम को वापिस घर आ गया, थोड़ी ही देर में ऋतू भी आ गयी, उसने स्कूल ड्रेस पहनी हुई थी, इसलिए वो दादाजी के प्रकोप से बच गयी, वर्ना जैसे कपडे वो घर पर पहनती है उन्हें देखकर दादाजी उसकी भी क्लास लगा देते.
दादाजी को देखते ही ऋतू उछलती हुई उनके पास आई और उनके गले लग गयी..
दादाजी “ओरी पगली…कितनी बड़ी हो गयी है रे…कैसी है मेरी बिटिया रानी..”
ऋतू : “अच्छी हूँ…दादाजी, आप सुनाओ, इस बार बड़े दिनों के बाद मेरी याद आई..हूँ…”
वैसे तो मन ही मन उन्हें कोस रही थी, पर मुंह से कुछ और निकल रहा था..आखिर उसकी चूत पर भी तो ढक्कन लगने वाला था, 15 दिनों के लिए…जो उसे भी बर्दाश्त नहीं था.
वैसे मैं जानता था, मम्मी के पास तो पापा हैं, अन्नू और सोनी भी कहीं बाहर मुंह मार लेंगी, पर ऋतू बेचारी, उसका क्या, वो तो चुदाई के लिए पूरी तरह से मेरे ऊपर निर्भर थी,
पापा से भी वो चुदाई नहीं करवा सकती थी, दादाजी के रहते..अगर रात को वो मेरे कमरे में पकड़ी गयी तो हम सबकी शामत आ जायेगी..
दादाजी : “अरे बेटा, याद तो तेरी बहुत आती थी…पर काम भी इतना था न खेतों में ..अब आया हूँ 15 -20 दिनों के वास्ते, तेरे पास ही रहूँगा..चल जा , तू अभी थक कर आई है स्कूल से, मुंह हाथ धो कर कुछ खा ले..जा..”
और ऋतू ऊपर चल दी, उसके पीछे-२ मम्मी भी चली गयी, उसे बताने की दादाजी के सामने उसे किस तरह के कपडे पहनने है… ऋतू थोड़ी देर बाद नीचे आई, उसने पीले रंग का सलवार कुरता पहना हुआ था, और साथ में सफ़ेद रंग के दुप्पट्टे से उसने अपनी छाती ढकी हुई थी, बड़ी ही प्यारी लग रही थी वो उस ड्रेस में, पर मुझे अब उसे इस तरह के कपड़ो में देखने की आदत नहीं रही थी, इसलिए थोडा अजीब सा लग रहा था. ऋतू भी मेरी नजरों में नजरें डालकर कुछ पूछने की कोशिश कर रही थी, जैसे कह रही हो “ये कहाँ फंस गयी…भैय्या कुछ करो…”
अगले दिन, मैं कॉलेज नहीं गया, सन्नी और विशाल भी मेरे साथ ही थे, हमने मार्केट से अपनी योजना के अनुसार जरुरत का सामान लिया, और उसके फार्म हॉउस पर गए और सब कुछ सेट किया,
वहां काम करते-२ काफी देर हो गयी, मैं वापिस घर गया तो दादाजी पार्क में टहलने गए हुए थे, मैंने जल्दी से सभी को इकठ्ठा किया और उन्हें अपनी योजना बताई, जिसे सुनकर मम्मी-पापा के तो होश ही उड़ गए, उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ की मैंने ऐसी योजना बनायीं है, पर उन्हें मालुम था की यही एक रास्ता है जिसपर चलकर सभी लोग खुलकर पहले की तरह चुदाई कर सकते हैं.
ऋतू तो मेरा प्लान सुनकर ख़ुशी से पागल हो गयी और सभी के सामने मेरे से लिपट कर मुझे किस करने लगी, मम्मी ने उसे बड़ी मुश्किल से मुझसे अलग किया, क्योंकि दादाजी के आने का समय हो चूका था..
रात को खाना खाते समय
मैं : “दादाजी, कल तो सभी की छुट्टी है, गुड फ्रायडे की.क्यों न कहीं घुमने चले..
दादाजी : “अच्छा…ठीक है…कहाँ चलना है”
ऋतू (मेरे प्लान के अनुसार बोली) : “क़ुतुब मीनार देखने चलते हैं..मैंने दिल्ली में रहते हुए उसे आज तक नहीं देखा…प्लीस दादाजी…वहां चलो न…प्लीस प्लीस….” वो बच्चो की तरह उनसे जिद्द करने लगी.
दादाजी : “अच्छा ठीक है…कल वहीँ चलते हैं…”
पापा : “पर मेरे ऑफिस की छुट्टी नहीं है…मैं नहीं जा पाउँगा…”
दादाजी : “फिर हम कैसे जायेंगे, वो तो बड़ी दूर है ”
पापा : “आप ऐसा करना, आशु सभी को कार में ले जाएगा, मैं मेट्रो से चला जाऊंगा कल के दिन, ठीक है…”
और सभी अगले दिन का प्लान बनाने लगे, प्लान तो मेरा बन चूका था..
पापा ऑफिस चले गए, सभी लोग तैयार होकर चल दिए, ऋतू ने सलवार कुरता पहना था, और मम्मी ने साडी, मैंने जेंस और टी शर्ट और दादाजी ने धोती कुरता.
सभी क़ुतुब मीनार की और चल दिए, हमने पुरे दिन वहां मस्ती की, खाना खाया, घुमे, फोटो खिंची, शाम को जब हल्का अँधेरा होने लगा तो दादाजी ने चलने को कहा, हम सभी बाहर निकल आये.
मुझे मालुम था की इस समय बाहर रोड पर गुडगाँव से दिल्ली आने वालों का ट्रेफिक काफी होगा, ऑफिस का ऑफ टाइम हो चूका था, इसलिए मैंने कहा की थोडा आगे से घुमाकर दुसरे रास्ते से निकल जायेंगे, दादाजी को दिल्ली के जाम के बारे में मालुम था, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा.
काफी आगे आकर मैंने गाडी रोक दी,
दादाजी : “क्या हुआ बेटा, गाडी क्यों रोक दी, ये तो बड़ा सुनसान सा इलाका लग रहा है..”
मैं : “दरअसल दादाजी, मुझे लगता है की मैं रास्ता भूल गया हूँ, मैंने गलत रोड ले लिया है, किसी से पूछना पड़ेगा…”
मैंने गाडी धीरे-२ आगे लेनी शुरू कर दी, आगे मोड़ पर एक आदमी खड़ा होकर सिगरेट पी रहा था, अँधेरा होने की वजह से उनका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था..
मैंने उससे पूछा : “अरे सुनो भैय्या, ये लाजपत नगर जाने के लिए कोनसा रास्ता है…”
उसने कोई जवाब नहीं दिया, दादाजी ने पीछे का शीशा नीचे किया और उससे कड़क कर पूछा : “ओये…बहरा हे क्या..सुनाई नहीं पड़ा तुझे…लाजपत नगर का रास्ता कोण सा है…”वो अपनी ठेठ गाँव वाली भाषा में उससे पूछ रहे थे..
वो आगे आया, कोई कुछ समझ पाता, उसने अपनी जेब से एक बोतल निकाली और उसमे से स्प्रे करके पूरी कार में फेला दिया, कोई कुछ न समझ पाया, क्योंकि अगले ही पल सबकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया, और हम सभी बेहोशी के आगोश में जा पहुंचे..
मैं गहरी बेहोशी में था, दादाजी मुझे झंझोड़ रहे थे” ….आशु……ओ आशु….उठ बेटा…”
मेरा सर दर्द से फटा जा रहा था, मैंने अपनी आँखें खोली, सामने दादाजी की धुंधली सी शक्ल आई, उन्होंने फिर से मुझे जोर से पुकारा…
“आशु…जल्दी उठ…ये देख..हम कैसी मुसीबत में है..”
मैंने अपनी आँखें मली और उठ कर बैठ गया, वो एक बड़ा सा कमरा था जिसमे काफी अँधेरा था , पर ऊपर रोशनदान से आती चाँद की हलकी रौशनी की वजह से शक्ल तो दिखाई ही दे रही थी..
मैंने चारों तरफ देखा, मम्मी और ऋतू एक कोने में बेहोशी की हालत में थी, पर एक बात गौर करने वाली थी, उन्होंने सिर्फ ब्रा पेंटी पहनी हुई थी… मैंने अपनी शरीर पर नजर दौडाई तो पाया की वहां भी सिर्फ मेरा जोक्की है और दादाजी भी अपने धारीदार कच्छे में ही थे..
अब मैं आपको बताता हूँ, ये सब मेरा ही प्लान था, मैंने ही सन्नी और विशाल के साथ मिलकर ये योजना बनायीं थी, की हम सभी को इस तरह से उठा कर सन्नी के फार्म हाउस में ले आये, और इस बड़े कमरे में, जिसपर सिर्फ एक बड़ा सा दरवाजा था, और एक छोटा सा रोशनदान और वो भी काफी ऊपर था, मैंने और उन दोनों ने मिलकर इस कमरे में एक कैमरा और स्पीकर लगा दिया था, जिसका कण्ट्रोल सन्नी के कमरे में यानी वहीँ फार्म हाउस के दुसरे बड़े कमरे में था,
सन्नी ने चार पांच दिनों के लिए वहां के नौकरो को छुट्टी दे दी थी, और सन्नी और विशाल दुसरे कमरे में बैठकर वहां से सभी चीजों को कण्ट्रोल कर रहे थे, मैंने पापा को भी इस प्लान में शामिल कर लिया था, वो भी सन्नी और विशाल के साथ ही बैठकर टीवी स्क्रीन पर देख सकते थे की यहाँ क्या हो रहा है.. और पापा के कहने पर ही मैंने सोनी और अन्नू को भी वहीँ आने को कह दिया था अगले चार-पांच दिनों के लिए…ताकि वो दोनों बहने मिलकर इन तीनो के अच्छी तरह से “सेवा” करती रहें..वैसे भी इस तरह की मुफ्त की चुदाई की बात जब उन्होंने सुनी तो दोनों बहने फूली नहीं समायी.. और वहां रोड पर सन्नी ही खड़ा था जिसने स्प्रे करके हम सभी को बेहोश कर दिया था, और फिर पास ही खड़े विशाल ने और सन्नी ने मिलकर हम सभी को यहाँ फार्म हाउस के इस कमरे में पहुंचा दिया,
पापा पहले से ही यहाँ पर थे, उनके सामने ही इन दोनों ने मम्मी और ऋतू के कपडे उतारे, बस उनकी ब्रा और पेंटी नहीं उतारी, फिर दादाजी और मेरे कपडे भी उतार दिए..ये सब प्लान के अनुसार ही हो रहा था.
अब हमारा आधा काम तो हो ही गया था, दादाजी के साथ-२ मम्मी और ऋतू भी यहाँ आ चुकी थी, अब देखना यह था की दादाजी कब तक अपने पर काबू रख सकते हैं, क्योंकि मम्मी और ऋतू को मैंने पहले ही समझा दिया था की उन्हें यहाँ पर आकर क्या करना है…
मैं : “अरे…दादाजी…ये हम कहाँ है….और मेरे कपडे…मेरे कपडे कहाँ है…आपके भी नहीं है…और ये ..ये देखो..ऋतू और मम्मी के भी…ये हो क्या रहा है…” मैंने हडबडाहट में कहा.
दादाजी : “बेटा….मैं भी यही सोच रहा हूँ…” और फिर वो जोर से चिल्लाये…”ओये….कोई है…क्या…भेन चोदो…किसने हमें यहाँ बंद किया है….सामने आओ…तुम्हारी माँ की चूत साले …” दादाजी के मुंह से गालियों की बौछार सी होने लगी…
उनकी तेज आवाज सुनकर मम्मी और ऋतू भी अपनी बेहोशी से जाग गए…उन्हें मालुम तो था की उनका अपहरण योजना के अनुसार हुआ है…पर दादाजी को दिखाने के लिए उन्होंने डरने का नाटक किया…
मम्मी : “हे भगवान्…..ये हम कहाँ है….और मेरे कपडे….मेरे कपडे कहाँ गए…बाबूजी…आशु…मेरे कपडे नहीं है..और ऋतू के भी…किसने किया ये घिनोना काम….”
ऋतू : “मम्मी…..मुझे बड़ा डर लग रहा है….भैय्या …दादाजी…कुछ करो….” और वो रोने का नाटक करने लगी…
तभी कमरे की लाइट जल उठी …पुरे कमरे में उजाला फेल गया..
तेज रौशनी में देखने के लायक होते ही सबसे पहले दादाजी की नजरे मम्मी और ऋतू पर गयी और अगले ही पल उन्होंने अपना सर घुमा कर दूसरी तरफ कर लिया… मैंने देखा की मम्मी और ऋतू एक दुसरे के साथ चिपकी खड़ी हैं…जैसे शर्मा रही हो…और उनकी ब्रा और पेंटी से झांकता उनका शरीर बड़ा ही आकर्षक लग रहा था…
खासकर मम्मी का, जिन्होंने जान बुझकर छोटी सी ब्रा पहनी थी जिसमे उनके मोटे मुम्मे समां नहीं पा रहे थे और नीचे थोंग था जिसका पतला सा धागा उनकी गांड के ढकने में असमर्थ सा लग रहा था…
कुल मिला कर वो दोनों बड़ी ही सेक्सी लग रही थी, ना जाने सन्नी और विशाल ने उनके कपडे उतारते हुए अपने आप पर कैसे काबू रखा होगा,
अगर पापा वहां न होते उनके साथ तो शायद वो एक-२ बार तो मम्मी और ऋतू की चूत मार ही लेते बेहोशी की हालत में…
दादाजी ने जब अपनी बहु और पोती के लगभग नग्न हालत में देखा तो वो फिर से चिल्लाने लगे…
“ओये…भेन के लोड़ो…कोण है…किसने ये सब किया है….हमारे कपडे उतार कर यहाँ क्यों बंद किया है…खोलो ये दरवाजा….क्या चाहते हो तुम…खोलो….” और उन्होंने दरवाजे पर लाते मारना शुरू कर दिया…पर ये सब बेकार था, क्योंकि वो दरवाजा काफी मोटा और मजबूत था, दादाजी की सेहत और बलिष्ट शरीर का ध्यान रखते हुए ही मैंने वो कमरा चुना था जिस पर ऐसा मोटा दरवाजा था…
वो दरअसल फार्म हाउस के पीछे वाला कमरा था, जिसमे वहां का नौकर रहता था, एक कोने में लकड़ी का एक बेड था, जिसपर दो तकिये थे, और नीचे सिर्फ एक चादर, कोने में ही एक पानी की टंकी थी, जिसमे पीने का पानी बाहर से आता था,उसके ऊपर एक शावर भी लगा था, साथ ही खुली सी किचन भी थी, जिसका सामान हमने पहले से ही हटा दिया था, साथ ही एक छोटी सी टॉयलेट बनी हुई थी, जिसपर दरवाजा तो था पर अन्दर से कुण्डी नहीं थी..
कमरे में रौशनी के बाद स्पीकर में से विशाल की मोटी और बदली हुई सी खुंखार आवाज गूंजी…
“हा हा हा…..हा हा हा……ओये बुड्ढे…ज्यादा उछल मत…..तू जानता नहीं है शायद…तू अब मेरी कैद में है…मैं वही मैडमेन हूँ, जिसकी चर्चा आजकल हर जगह हो रही है… अगर मेरे बारे में जानना है तो अपने परिवार वालों से पूछ ले…हा हा……हा ….”
दादाजी ने मेरी तरफ देखा…
मैंने डरने वाला मुंह बनाया और कहा “दादाजी… ये …ये तो मेडमेन है…आजकल इसका बड़ा डर फेला हुआ है…ये तो साईको है…ये परिवार वालों को उठा लेता है…और अपनी मनमानी करता है…”
दादाजी : “कैसी मनमानी…?”
मैं : “पता नहीं…दादाजी…पर मैंने ये सुना है की ये किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाता….”
दादाजी (गुस्से में) : “नुकसान नहीं पहुंचाता…ये क्या है फिर….हमें इस कमरे में बंद कर दिया , हमारी बहु बेटी के कपडे उतार दिए…ये क्या नुक्सान नहीं है ….”
और फिर वो ऊपर कैमरे की तरफ देखकर चिल्लाये : “तुम चाहते क्या हो…. ये सब करने का मतलब क्या है आखिर…”
आवाज : “मैं क्या चाहता हूँ, ये मैं जल्दी ही बता दूंगा…पर एक वादा करता हूँ, तुम सब अगर मेरा कहना मानते रहो तो मैं तुम्हे जल्दी ही यहाँ से आजाद कर दूंगा….वर्ना किसी को तुम लोगो की लाश भी नहीं मिलेगी…”
उसकी आवाज सुनकर दादाजी का चेहरा देखने लायक था, वो डर से गए…
आवाज : “पहले तुम लोग कुछ खा पी लो…फिर बात करते हैं….
” और फिर ऊपर से रोशनदान खुला और उसमे से एक रस्सी में बंधा हुआ थेला नीचे आने लगा, मैंने भागकर थेला खोल लिया, उसमे पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक थी, साथ ही चिप्स के भी पेकेट थे, भूख तो बड़ी तेज लगी थी, मैंने पेकेट खोले और बीच में बैठ गया.
मैं : “मम्मी, ऋतू, तुम आओ यहाँ और कुछ खा लो….”
दादाजी (तेज आवाज में ) : “ये क्या कर रहा है आशु…उनकी हालत तो देख…उन्होंने कपडे नहीं पहने हुए..अपनी माँ और बहन को ऐसी हालत में तू कैसे देख सकता है उन्हें ,
तू यहाँ आ और दूसरी तरफ मुंह करले , मेरी तरह….बहु और ऋतू वहां दूसरी तरफ मुंह करके खा लेंगी…और हम यहाँ…”
मैं : “दादाजी…आप क्या बात कर रहे हैं…माना की हम सभी ऐसी हालत में यहाँ पर हैं, पर ऐसे रूल बना कर इस छोटे से कमरे में और मुश्किल पैदा मत करो…
माफ़ करना दादाजी…पर हमें नहीं मालुम की हम यहाँ कब तक रह पायेंगे…और एक ही कमरे में एक दुसरे से मुंह मोड़कर बैठना कब तक हो पायेगा…मुझसे ये नहीं होगा…”
ऋतू : “हाँ…दादाजी…और फिर हम लोग तो परिवार वाले हैं…ऐसा करने से क्या प्रोब्लम हो सकती है…”
मम्मी भी धीमी सी आवाज में बोली : “ये बच्चे ठीक कह रहे है बाबूजी…आप फिकर मत करो..अब हालात ही ऐसे हैं जो हमारे हाथ में नहीं है..तो हम कर भी क्या सकते हैं…
और इस तरह कब तक बैठेंगे..ये इन सबका हल नहीं है बाबूजी..आप तो इस कमीने से जिसने हमें यहाँ कैद किया है, पूछो की ये चाहता क्या है…और हमें कब तक यहाँ इस हालत में रहना होगा.”
दादाजी (कुछ सोचते हुए) : “तुम ठीक कहती हो बहु…पर इस तरह से तुम्हे देखना…मेरा मतलब है…चलो कोई बात नहीं…अगर तुम कहती हो तो…”
उन्होंने ऊपर कैमरे की तरफ मुंह करते हुए कहा “और ये क्या चाहता है…ये तो वही जाने ” और फिर अपनी गहरी नजर मम्मी की छोटी सी ब्रा के ऊपर जमा दी. और जब उन्होंने मम्मी की तरफ मुंह घुमाया , पता नहीं क्यों पर मुझे महसूस हुआ की शायद दादाजी भी यही चाहते थे…बस दुसरे के मुंह से सुनना चाहते थे. मम्मी ने उन्हें अपने अर्धनग्न शरीर को घूरते देखा तो वो भी शर्म से सिमटने के बजाये अपनी मोटी छाती तानकर अपनी सुन्दरता का प्रदर्शन करने लगी अपने ससुर के सामने..
ऋतू तो पहले से ही बेफिक्री वाला अभिनय कर रही थी, जैसे ये सब नंगेपन से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता…
वो भागकर आई अपनी ब्रा में कैद मुम्मे उछालते हुए और मेरे साथ बैठ गयी…मैंने पिज्जा खोला और सभी को खाने को दिया… खाना खाने के बाद एकदम से स्पीकर पर फिर से विशाल की कड़क आवाज गूंजी…
“मैं तुम लोगो की मेहमान नवाजी अच्छी तरह से करूँगा…जब तक तुम लोगो में आपस में प्यार न हो जाए….”
दादाजी : “प्यार….कैसा प्यार? हम सभी एक दुसरे से काफी प्यार करते हैं….तुम कहना क्या चाहते हो..”
आवाज : “हा हा हा….बुड्ढे…जो मैं कहना चाहता हूँ वो तू अच्छी तरह से समझ रहा है….
मैं चाहता हूँ की तुम आपस में एक दुसरे से असली प्यार करो…जैसा एक स्त्री और पुरुष के बीच होता है….जैसा..”
वो बोल भी नहीं पाया था की दादाजी ने बीच में ही चीख कर कहा “ओये कुत्ते…..भुतनी के…..भेन चोद….अपनी जुबान पर लगाम लगा…तेरी हिम्मत कैसे हुई ये सब बोलने की और सोचने की….
तू जानता है की ये मेरी बहु और पोती है, और ये मेरा पोता यानी इसका बेटा और भाई है…तू ऐसी नीच बाते सोच भी कैसे सकता है… बस एक बार तू मेरे सामने आ जा…तेरी बोटियाँ-२ करके कुत्तों को खिला दूंगा…भेन चोद…” दादाजी का चेहरा गुस्से से तमतमा गया..
हम तीनो कुछ नहीं बोले थे, सिर्फ बैठे हुए उन्हें बोलते हुए देख रहे थे..
आवाज : “ओ..बुड्ढे….इस तरह से भोंकने से कुछ नहीं होगा…ये मत भूलो की तुम मेरी कैद में हो, तुम्हारे पास काफी समय है….. सोच लो…पर एक बात जान लो…जब भी तुम्हारा इरादा बदले तो मुझे जरुर बताना की क्या सोचकर तुमने अपना इरादा बदला….हा हा…..तब तक मजे करो…इस कमरे में..”
दादाजी भी उसकी बात सुनकर थोडा ढीले पड़ गए, वो शायद जानते थे की ये गुस्से का नहीं ठन्डे दिमाग से सोचने का समय है..
दादाजी : “पर तुम्हे इन सबसे क्या मिलेगा….तुम हो कौन ….और हमें ही तुमने क्यों चुना….”
आवाज : “हा हा ….मेरे बारे में सारा शहर जानता है…मैं तो बस तुम जैसे परिवार वालो को यहाँ लाता हूँ…और उनमे प्यार जगाता हूँ….हा हा …और उसे देखकर मुझे बड़ा सकून मिलता है…
आजकल की दुनिया में जब घर पर रहकर ही तुम आपस में प्यार कर सकते हो….तो बाहर की दुनिया में क्यों ठोकरें खाए…..मैं बस यही धारणा बदलना चाहता हूँ आम इंसान की…..इसलिए ये सब करता हूँ…
मेरा ये तरीका गैर कानूनी है…पर मेरा विश्वास करो…इसमें मजा सबसे ज्यादा तुम लोगो को ही आता है…मैं तो बस अपने दिल को सकून पहुँचाने के लिए ये सब करता हूँ…
मैं ना तो तुम लोगो के बीच में आऊंगा और ना ही कोई जबरदस्ती करने को कहूँगा…जो कुछ भी होगा..आपसी रजामंदी से होगा… और ये कब होगा ..तुम जानो..और तब तक मेरी मेहमान नवाजी का लुत्फ़ उठाओ….हा हा हा….”
विशाल मेरी लिखी हुई स्क्रिप्ट ही पढ़ रहा था दादाजी के सामने, स्पीकर पर.
दादाजी : “कुत्ते…तू जो कोई भी है…बड़ी ही गन्दी सोच है तेरी…जो तू चाहता है…वो कभी नहीं होगा…तू चाहे जब तक हमें यहाँ कैद रख ले पर तेरी ये मंशा कभी पूरी नहीं होगी…”
आवाज : “हा हा ….वो तो वक़्त ही बताएगा….”
और फिर स्पीकर से आवाज आनी बंद हो गयी..
मम्मी ने रोते हुए दादाजी से कहा “बाबूजी..ये हम किस मुसीबत में फंस गए…हे भगवान्…ये दिन दिखने से पहले तुने मुझे उठा क्यों नहीं लिया….उनूउ …उनूउ….उनहू ” और मम्मी जोर-२ से रोने लगी (नौटंकी साली.)
दादाजी : “तू फिकर मत कर बहु…इसके इरादे बड़े गंदे हैं…मुझे तो सोचकर ही घिन्न आ रही है…ऐसे भी इंसान होते हैं इस दुनिया में…जो इतनी गिरी हुई हरकत भी कर सकते हैं…
एक बार मैं बाहर निकल जाऊ , इन्हें पुलिस के हवाले करके ये सारा नाटक हमेशा के लिए बंद कर दूंगा…”
फिर दादाजी कुछ सोचकर मेरी तरफ मुडे “तू बता रहा था की इसके बारे में तुने पहले भी सुना है.., तो क्या जो लोग पहले इसके चुंगल में थे, उन्होंने उसकी खबर नहीं की पुलिस को…”!!
मैं : “मुझे पता नहीं दादाजी…मैंने तो बस ये सुना था की कोई मेडमेन है जो इस तरह से पुरे परिवार वालों को उठवा लेता है और कुछ दिन अपनी कैद में रखने के बाद छोड भी देता है, किसी को भी नुक्सान पहुंचाए बिना…
और वो इसकी कैद में क्या करते हैं…और क्यों पुलिस को भी वो अपने अपहरण की कहानी नहीं बताते….मुझे इसका पता नहीं….”
दादाजी फिर से मेरी बात सुनकर सोचने में लग गए..
रात काफी हो चुकी थी, शायद दस बज रहे थे, दादाजी ने कहा की अभी सो जाते हैं, शायद उनका बेटा पुलिस को खबर दे दे जब हम घर न पहुंचे तो…और तभी वो यहाँ से निकल सकते हैं…
पर ये बेचारे दादाजी नहीं जानते थे की दुसरे कमरे में उनका बेटा मेरे दोनों दोस्तों के साथ बैठकर उनकी लाचारी का तमाशा टीवी स्क्रीन पर देख रहा है और मजे ले रहा है… और साथ में ही सोनी और अन्नू भी हैं जो पूरी तरह से नंगी होकर एक सभी का मनोरंजन कर रही थी.
पापा : “आःह्ह्ह सोनी…..मेरी जान……चूस ..आह्ह……………अपनी बीबी को अपने बाप के सामने इस तरह से देखकर बड़ा मजा आ रहा है….चूस साली….” सन्नी और विशाल भी अन्नू की चूत और गांड एक साथ मार रहे थे, उन्होंने हमारे घर पर सोनी की तो मार ही ली थी पर आज जब उन्होंने अन्नू को देखा तो उसपर ही टूट पड़े…
सोनी तो पापा के लंड को चूसकर उन्हें तैयार कर रही थी, और फिर उसे उनका लंड अपनी चूत में भी लेना था….
अगले चार दिन ऐसी ही चुदाई में बीतने वाले थे, ये सोचकर वो दोनों बहने काफी खुश थी..
सन्नी और विशाल ने भी जब से मम्मी और ऋतू को आधा नंगा किया था, उनकी हालत काफी ख़राब हो चुकी थी, उनके लंड तभी से खड़े हुए थे, पर जब पापा ने उन्हें सोनी और अन्नू के बारे में बताया तो उनकी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं रही…
विशाल तो खासकर मम्मी के भरे पुरे शरीर को देखकर उनका दीवाना सा हो गया था…पर वो जानता था की उनकी चूत वो अभी नहीं मार पायेगा… पर तब तक के लिए उन्हें सोनी और अन्नू मिल गयी थी…और तब तक के लिए वो टीवी स्क्रीन पर ही मम्मी और साथ ही प्यारी ऋतू को देखकर काम चला लेंगे…
रात काफी हो चुकी थी, उन्होंने स्क्रीन पर देखा की दादाजी और मैं, नीचे जमीं पर सो गए हैं, और मम्मी और ऋतू ऊपर बेड पर..
असली खेल तो अब शुरू होगा..
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