शाम को जगदीश राय 3 बजे घर पहुँच गया। दरवाज़ा निशा ने खोल दिया। निशा बिना कुछ कहे अंदर को जाने लगी।
जगदीश राय: आशा आ गयी…?
निशा : हाँ आ गई।
जगदीश राय: उसे भी बुलाओ और तुम भी आओ। मुझे कुछ बात करनी है…
निशा: पापा…।इसकी…कोई…
जगदीश राय (भारी आवाज़ में) : जो बोलै है …वह करो…
थोड़ी देर बाद आशा और निशा दोनों ड्राइंग रूम में पापा के सामने खड़े थे।
जगदीश राय: बैठो…पिछले कई दिनों…इस घर में…जो कुछ भी चल रहा था … वह क्यों हुआ …कैसे हुआ…मैं नहीं जानता…
जगदीश राय: और जो भी हुआ है…इसमें सब गलती मेरी है…तुम्हारी कुछ नहीं…
जगदीश राय: इस लिए…आज के बाद…सब कुछ बंद…।तुम दोनों बहने हो…और तुम्हे ज़िन्दगी भर हर वक़्त प्यार से रहना है…
निशा: पर पापा…
जगदीश राय: बीच में मत टोको…।।आज से…जैसे हम थे…।।तुम्हारी मम्मी के वक़्त वैसे ही रहेंगे…समझी…।अब तुम दोनों गले मिलो और यह सब भूल जाओ।
आशा और निशा दोनों अपने पापा के तरफ घूरते रहे और फिर दोनों मुस्कुरा दी।
निशा: पापा…हमने तो कब की सूलह कर दी…और गले भी मिल लिए…और क्या आप के कहने से क्या सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा…
जगदीश राय: कोशिश तो कर सकती है।
निशा: नहीं पापा…जो भी हुआ है…सही या गलत मैं नहीं जानती…लेकिन…हालात के अनुसार हुआ है…आप और मैं या आप और आशा दोनों हालात के चँगुल मैं फस गये। अब इससे पीछे जाना मुमकिन नही।
जगदीश राय: तुम बोलना क्या चाहती हो।
निशा: यहि की गलती मेरी है…मुझे आप दोनों के प्यार और खेल को देखकर ग़ुस्सा नहीं करना चाहिए था। आशा का भी आप पर उतना ही हक़ है जितना मेरा। और वैसे भी मैं तो सिर्फ आपको खुश देखना चाहती थी। और वही ख़ुशी आपको आशा दे उसमे कोई बुराई नही।
जगदीश राय का मुह खुला ही रह गया।
जगदीश राय:क्या…तुम…
निशा: हाँ पापा…आजसे आप की मर्ज़ी…माँ की कमी पूरी करने के लिए आपकी दोनों बेटियां तैयार है।।क्योंकि आप हमारे प्यारे पापा है…
जगदीश राय को यकीन नहीं हो रहा था की क्या सुन रहा है।
निशा: तो ठीक है…क्या अब मैं आपके लिए चाय बना लाऊँ…की किसी को और कुछ बातें करनी है।
आशा जो अब तक चुप थी, बोल पडी।
आशा (शरारती ढंग से): क्या चाय से पहले…मैं और पापा एक राउंड खेल खेलकर आये…?
निशा: चुपकर…बेशरम…
आशा: नही दीदी।…।तीन दिन हो चुके अब…।अब सहा नहीं जाता।।।
निशा: मारूंगी अभी मैं तुझे…जा ऊपर होमवर्क कम्पलीट कर…।पापा इससे तो आप पूरा हफ्ता अपने कमरे से बाहर रखना…
आशा: पापा…आप दीदी की बात मत सुनना।
जगदीश राय को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वह क्या बोले।
जगदीश राय: तुम दोनों मेरी प्यारी बेटी हो।
आशा ने निशा को ठेंगा दिखाकर , ऊपर कमरे की तरफ भाग गयी। निशा भी हँस दी।
और 3 दिनों के बाद आज जगदीश राय बेहद खुश था। वह सोफ़े पर बैठा और पेपर उठा कर पढने लगा।
पर दिमाग पर यह सवाल था की आज किसकी बारी होनी चाहिये।
शाम को जब आशा और सशा पढाई कर रहे थे और निशा किचन में खाना बना रही थी तो जगदीश राय किचन में चला गया और निशा को बाँहों में भरकर चूमने लगा।आज 3 दिनों में जगदीश राय की प्यास बहुत बढ़ गई थी।उसने निशा की गांड को सहलाते हुए कहा।
जगदीश राय:बेटी तुमने अपना वादा पूरा नहीं किया।
निशा:कौन सा वादा पापा।
जगदीश राय:टूर पर जाते समय तुमने वादा किया था की तुम मुझे स्पेशल गिफ्ट दोगी।कब दोगी तुम और आज रात मेरे पास आओगी ना।प्लीज
निशा: ओके पापा।मैं रात के 12 बजे आऊँगी।और गिफ्ट भी दूँगी।पहले अभी तो छोड़िए।
जगदीश राय:निशा के होठों को चूसकर ओके बेटी मैं इंतज़ार करुँगा।
जब सभी खाना खाकर सो जाते है।लेकिन जगदीश राय की आँखों में नींद नहीं थी।उसका लंड अकड़ा हुवा था।वह 12 बजे तक जाग रहा था अपना लंड सहलाते हुए।वह पहले ही आशा को बता चूका था की आज रात वो निशा के साथ बिताएगा।तुम कल दिन में स्कुल बंक करके आ जाना।मैं भी ऑफिस से छुट्टी ले के 12 बजे तक आ जाउँगा।
रात के ठीक बारह बजे निशा जगदीश राय के रूम में आती है।वो भी सिर्फ ब्रा और पेंटी में। ठीक किसी मॉडल की तरह चलते हुए आकर जगदीश राय के बेड पर बैठ जाती है।
जगदीश राय अब निशा को पीछे अपनी बाँहों में भर लेता हैं और अपने जलते हुए होंठो को निशा की गर्देन पर रखकर धीरे धीरे चाटने लगता हैं और बहुत धीरे धीरे उसकी पीठ तक नीचे सरकता हुआ नीचे आता हैं. निशा की बेकरारी सॉफ उसकी सिसकारियों से सुनाई दे रही थी.जगदीश राय आज उसे पूरा पागल करने के मूड में था. वो चाहता था कि निशा पूरी तरह से बेकरार होकर उसकी बाहों में अपने आप को पूरा समर्पण कर दे. वैसे तो निशा ने ये बात बोल दी थी मगर करने और कहने में बहुत फ़र्क होता हैं.
जगदीश राय बहुत देर तक निशा के ऐसे ही पूरे बदन को जीभ से चाटता हैं और उधर निशा का सब्र जवाब देने लगता हैं.
निशा- पापा अब बस भी करो. क्या आप मुझे पागल करना चाहते हैं. अब मुझसे बर्दास्त नही होता.
जगदीश राय- इतनी जल्दी भी क्या हैं बेटी अभी तो पूरी रात पड़ी हैं. अभी तो मैने सिर्फ़ चिंगारी भड़काई हैं.अभी तो आग लगाना बाकी हैं.अब देखना ये हैं ये आग कितनी जल्दी शोले में बदल जाती हैं.
निशा- ये तो वक़्त ही बताएगा पापा कि आप के अंदर कितनी आग हैं. आज मैं भी देखूँगी कि आप में कितना दम हैं और इतना कहकर निशा मुस्कुरा देती हैं………
जगदीश राय- तू मुझे चॅलेंज कर रही हैं देख लेना मैं दावे से कहता हूँ कि तू मेरे सामने टिक नहीं पाएगी. मैं अच्छे से जानता हूँ कि किसी भी लड़की को कैसे वश में किया जाता हैं.
निशा मुस्कुराते हुए- ये तो वक़्त ही बतायेगा कि आपका पलड़ा भारी हैं या मेरा.
जगदीश राय- फिर ठीक हैं लग गयी बाज़ी. अगर तू मेरे सामने अपनी घुटने ना टेक दे तो मैं आज के बाद हमेशा के लिए तेरी गुलामी करूँगा ये तेरे पापा की ज़ुबान हैं.
निशा- सोच लो पापा कहीं ये सौदा आपको महँगा ना पड़ जाए.
जगदीश राय- मर्द हूँ एक बार जो कसम ले ली तो फिर पीछे नहीं हटूँगा. मगर तू मुझे किसी भी बात के लिए मना नहीं करेगी. बोल मंजूर हैं.
निशा मुस्कुराते हुए- फिर ठीक हैं मुझे आपकी शर्त मंज़ूर हैं.
जगदीश राय कुछ देर ऐसे ही खामोश रहता हैं फिर गहरे विचार के बाद वो निशा के बिल्कुल करीब आता हैं. वैसे जगदीश राय मंझा हुआ खिलाड़ी था. इसकी दो वजह थी एक तो उसका हथियार काफ़ी दमदार था और दूसरा वो बहुत सैयम से काम लेता था. किसी भी परिस्थिति में वो विचलित नही होता था.
और पिछलों कुछ दिनों में आशा की कुँवारी गांड मारकर उसका मनोबल और भी बढ़ चूका था।
इस लिए उसे पूरा विश्वास था कि वो हर हाल में बाज़ी ज़रूर जीत जाएगा. हालाकी निशा की रगों में भी उसका ही खून था मगर निशा इन सब मामलों में एक्सपर्ट नहीं थी. उसने तो अपनी ज़िंदगी में बस अपने पापा के साथ सेक्स किया था. इस वजह से उसे सेक्स के बारे में ज़्यादा पता नहीं था.
जगदीश राय एक दम धीरे से निशा के पीछे आता हैं और और उसके कंधे पर अपने लब रखकर एक प्यारा सा किस करता हैं और अपने दोनो हाथों को धीरे से बढ़ाकर निशा के दोनो बूब्स को धीरे धीरे मसलना शुरू कर देता हैं. निशा मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लेती हैं और उसके मूह से सिसकारी निकल जाती हैं.
जगदीश राय फिर अपना होंठ निशा के पीठ पर रखकर फिर से उसी अंदाज़ में हौले हौले चाटना शुरू करता हैं. निशा की पैंटी पूरी भीग चुकी थी. वो तो बड़े मुश्किल से अपने आप को संभालने की नाकाम कोशिश कर रही थी.
निशा- पापा बस भी करो मुझे कुछ हो रहा हैं.
जगदीश राय-क्या हो रहा हैं बता ना. क्या तेरी चूत गीली हो गयी हैं. हां शायद यही वजह हैं और इतना कहकर जगदीश राय एक पल में अपना हाथ नीचे लेजा कर निशा की चूत को अपनी मुट्ठी में थाम लेता हैं.निशा के मूह से एक तेज़ सिसकारी निकल पड़ती है. फिर धीरे धीरे वो अपना हाथ निशा की पैंटी के अंदर सरका देता हैं और उसके क्लिट को अपनी उंगली से मसल्ने लगता हैं. निशा एक दम से बेचैन हो जाती हैं और जवाब में वो अपना लिप्स को अपने पापा के लिप्स पर रखकर उसे चूसने लगती हैं.
एक हाथ से जगदीश राय निशा के बूब्स को मसल रहा था और दूसरे हाथों से वो निशा की चूत को सहला रहा था. और निशा उसके लिप्स को चूस रही थी. माहौल पूरा आग लगा देने वाला था. थोड़ी देर में जगदीश राय का हाथ पूरा गीला हो जाता हैं.
निशा- पापा………….. अब बस भी करो मुझसे अब बर्दास्त नही हो रहा. आप शर्त जीत गये.

