आज फिर वह वही मैक्सी पहनकर पापा के रूम में चल दी। हाथ में दूध भी था।
उसने बिना नॉक किये रूम खोला। उसके पापा प्रेमचंद की एक किताब पढ़ रहे थे।
जगदीश राय अचानक से हुई एंट्री से चौक गया। और जब निशा को मैक्सी में देखा तो पिघल गया।
उसके मम्मे नाइटी में कल से भी ज्यादा प्यारे लग रहे थे।
जगदीश राय बेड के किनारे पर पिलो टीकाकार लेटा हुआ था।
निशा उसके एकदम पास आ गयी। निशा ने अपनी टाँग पापा के टाँग से लगा दी और बोली।
निशा: पापा यह लो दूध।
जगदीश राय निशा को देखते देखते गिलास हाथ में ले लिया।
निशा: थोड़ा हटिये, मुझे बैठना है।
यह कहकर निशा सीधे बेड के किनारे पर बैठ गयी। जगदीश राय को हटने या हिलने का मौका भी नहीं दिया। और इससे निशा की आधी से ज्यादा गाण्ड जगदीश राय के दाए पैर के ऊपर थी। और निशा की गाण्ड उसके मम्मो की तरह बड़ी थी।
जगदीश राय को एक बहुत मुलायम गाण्ड का स्पर्श हुआ, और उसे इस स्पर्श से एक करंट सी लग गयी।
उसका लंड तुरंत अपने ज़ोर दीखाने लगा। उसने धीरे से अपना पैर निशा की गाण्ड के निचे से हटाया।
निशा ने हँस्ते हुआ पूछा: क्यू, क्या मैं बहुत भारी हूँ।
जगदीश राय: नही तो। सब ठीक है
निशा (थोडा उदास होकर): आप दूध पीजिये।
जगदीश राय ने तिरन्त गिलास ख़तम कर दी , इस उम्मीद में की निशा यहाँ से चलि जाए।
उसके मन में अजीब कश्मकश थी।
निशा (गिलास लेते हुए): पापा, आप क्या मुझसे नाराज़ है।
जगदीश राय: नहीं तो बेटी।
निशा: फिर आप मुझसे बात भी नहीं कर रहे है, सीधे मुह। आँख भी नहीं मिला रहे है। क्या मुझसे कोई गलती हुई है क्या।
जगदीश राय: नहीं बेटी बिलकुल नही।
निशा: तो फिर क्या हुआ।
जगदीश राय (सर झुका कर): वह बेटी …। कल जो हुआ…। वह…।उसकी वजह…मेरा मतलब है…
निशा (सर झुका कर): कल जो हुआ, सो हुआ। पर उसे क्या मैं आपकी निशा नहीं रही। क्या आप मेरे पापा नहीं रहे।
जगदीश राय : नहीं बेटी। तुम तो हर वक़्त मेरी प्यारी निशा हो।
जगदीश राय को अपने बरताव पर ग़ुस्सा आने लगा था।
निशा: और आप मेंरे प्यारे पापा है।

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