निशा के पैर सीढी चढने के क़ाबिल नहीं थे, कांप रहे थे। थोडा तो ओर्गास्म का असर था और थोड़ा गुज़रे हुये पल का।
फिर भी वह अपने कमरे तक तेज़ी से चली गयी और अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया।
दरवज़ा बंद करते ही वह अपने बेड पर लेट गयी। ऑंखे मूंदकर अपने सासों को काबू में लाने का प्रयत्न करने लगी।
पर उसके ऑंखों के सामने अपना पापा का तेल से लथपथ शरीर और उनकी काम वासना की नज़र लगतार झलक रहा था। वह चाहते हुए भी उसे दूर नहीं कर पा रही थी।वह बेड से उठी और अपनी चिपचिपी पेंटी में हाथ डालकर उसे खीच कर बाहर निकाल फेका।पेंटी की हालत देखकर वह हैरान रह गयी।
निशा (मन ही मन में): क्या इतना सारा पानी निकला मेरा। ओह गॉड़। पेंटी पूरी गिली हो गयी।
वह अपना हाथ चूत में ले गयी और अपने दाए हाथ की बड़ी ऊँगली चूत में घुसा दी।
निशा: आहहः।।।
मुह से एक ख़ुशी की आह निकली। फिर उसने धीरे से ऊँगली बहार खीच लिया। ऊँगली पूरी गिली थी और उसपर लगा हुआ पानी बल्ब की रौशनी में चमक रहा था।
निशा बहुत बार मुठ मार चुकी थी, पर इतना पानी और मज़ा उसे कभी नहीं मिला था।
वह उठी और बाथरूम जाकर पिशाब करने के बाद, वह थोड़ा बेहतर महसूस कर पायी। और झूक कर वॉशबेसिन में अपने चेहरे पर बहुत सारा पानी मारा।
अपना पानी लगा चेहरा , मिरर में देखने लगी। और सोचने लगी।।।।
निशा: यह क्या हो गया था मुझे। अपने पापा को कैसे मैं ऐसा देखने लगी। और पापा मुझे ऐसा क्यों घूर रहे थे। क्या उनका भी हाल मेरे जैसा हुआ होगा? नहीं , बिलकुल नही। पर उनका चेहरे का भाव में तो वासना भरी हुई थी। और वह मेरी चूत को क्यों घूर रहे थे?
यह सवाल वह अपने आप से कर रही थी। वह अपना मुह पोंछ कर एक दूसरी टीशर्ट पहन ली और शॉर्ट्स पहन ली। इस बार उसने एक मोटी पेंटी पहन लिया जो वह अपने पीरियड्स के वक़्त पहनती है।
उसे अब अपने चूत पर भरोसा नहीं रहा या यु कहिये अपने आप पर भरोसा नहीं था।
अब उसे बाहर जाकर खाना बनाना था। रात होने वाली थी, आशा सशा आती ही होंगी। पर वह पापा को फेस नहीं करना चाहती थी। दरवाज़ा के पास आकर वह सोचने लगी की क्या करे।
निशा मन में: शायद मैं पापा के नहाने जाने तक वेट करती हूँ, फिर चली जाऊंगी।

