सूरज की किरणें अब खिड़की के पर्दों को चीरकर कमरे के अंदर तक फैल चुकी थीं। घड़ी की सुइयाँ 10 बजा रही थीं। घर के बाहर की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी, लेकिन इस कमरे के अंदर वक्त जैसे थम सा गया था।
आर्यन और अंजलि, दोनों ही उस गहरी और थका देने वाली नींद से जागे, जो जिस्मानी और मानसिक युद्ध के बाद आती है। आर्यन का कॉलेज छूट चुका था और अंजलि ने अपनी क्लिनिक न जाने का मन बना लिया था। उसने कांपते हाथों से अपने असिस्टेंट को मैसेज कर दिया था कि उसकी ‘तबीयत खराब’ है—और एक तरह से यह सच भी था, क्योंकि उसका बदन और रूह दोनों ही बुरी तरह टूटे हुए थे।
बिस्तर पर बिखरी हुई चादरें और कमरे की हवा में फैली वो महक रात और सुबह के उस ‘तांडव’ की गवाह थीं। आर्यन ने आँखें खोलीं और अंजलि की ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन अंजलि ने झटके से अपनी पीठ उसकी ओर कर ली।
अंजलि के चेहरे पर आज वो ‘तृप्ति’ नहीं थी जो अमूमन ऐसे पलों के बाद होती है। उसकी आँखों में एक अजीब सी चुभन और गुस्सा था। वह इस बात से बेहद आहत थी कि आर्यन ने उसके ‘चरम सुख’ की बेबसी का फायदा उठाकर उससे उसकी छोटी बहन (कंचन मासी) वाला वो काला सच उगलवा लिया था। उसे लग रहा था कि आर्यन ने उसकी रूह को नंगा कर दिया है।
अंजलि मन ही मन खुद को कोस रही थी कि उसने उस ७ इंच के दबाव में आकर अपने और अपनी बहन के उस राज़ को क्यों खोल दिया। “तूने अच्छा नहीं किया आर्यन…” अंजलि ने भारी और दबी हुई आवाज़ में कहा, उसकी पीठ अब भी आर्यन की तरफ थी। “तूने मुझे मजबूर किया। तू जानता था कि मैं उस वक्त होश में नहीं थी।”
आर्यन बिस्तर पर उठकर बैठ गया। उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक विजयी मुस्कान थी। उसने अपनी माँ की नग्न और गोरी पीठ को गौर से देखा, जिस पर अब भी उसकी उंगलियों और दांतों के निशान थे। “माँ, सच कड़वा होता है, पर वो बाहर आ ही जाता है। अब मुझे पता है कि मेरी ‘सीधी-सादी’ मासी के अंदर भी वही आग है जो आपमें है।”
अंजलि ने चादर को अपने सीने तक खींच लिया। उसे अब आर्यन की नज़रों से डर लग रहा था। उसे अहसास हो गया था कि अब आर्यन उसे और उसकी बहन, दोनों को अपनी उंगलियों पर नचाएगा। “अब तू क्या चाहता है? क्या तू कंचन को भी इसी आग में झोंकेगा?” अंजलि की आवाज़ में डर और गुस्सा मिला हुआ था।
कमरे में सन्नाटा छा गया। अंजलि की नाराज़गी ज़ाहिर थी, लेकिन उसकी साँसें अब भी आर्यन की मौजूदगी से तेज़ हो रही थीं। वह नाराज़ थी, पर वह यह भी जानती थी कि अब वह इस ‘लत’ से कभी बाहर नहीं निकल पाएगी। आर्यन ने झुककर उसकी गर्दन पर एक छोटा सा चुंबन लिया, जिससे अंजलि का पूरा शरीर एक बार फिर सिहर उठा।
“नाराज़ मत हो माँ… अब तो खेल और भी दिलचस्प होगा,” आर्यन ने फुसफुसाते हुए कहा।
सूरज की तेज़ धूप अब खिड़की के पर्दों से छनकर अंजलि के चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन उसके मन में छाया अंधेरा और कड़वाहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी। आर्यन ने महसूस किया कि इस बार मामला सिर्फ जिस्मानी नहीं, बल्कि भावनाओं के गहरे घाव का है।
आर्यन धीरे से खिसककर अंजलि के करीब आया। उसने अपने मज़बूत हाथ अंजलि की नग्न और कोमल कमर पर रखे। अंजलि का शरीर आर्यन के स्पर्श से एक पल के लिए सिहरा, पर उसने तुरंत अपनी मांसपेशियों को सख्त कर लिया।
आर्यन ने अपना चेहरा अंजलि के कंधे के पास झुकाया और बहुत ही मद्धम, रेशमी आवाज़ में कहा, “माँ… अभी भी गुस्सा हो? मैंने जो कुछ भी पूछा या कहा, वो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं आपको पूरी तरह जानना चाहता था। आपके और मेरे बीच अब कोई पर्दा नहीं रहना चाहिए। कंचन मासी वाली बात सुनकर मैं आपसे दूर नहीं हुआ, बल्कि मुझे लगा कि हम एक-दूसरे के और करीब आ गए हैं।”
आर्यन ने अंजलि को पीछे से अपनी बाहों के घेरे में लेने की कोशिश की। उसने चाहा कि अंजलि मुड़े और उसके सीने से लग जाए। उसने अंजलि की गर्दन के उस संवेदनशील हिस्से पर अपने होंठ टिका दिए जहाँ सुबह उसने गहरे निशान छोड़े थे। “चलो ना माँ, गुस्सा छोड़ो… देखो आज हम दोनों घर पर अकेले हैं। कॉलेज और क्लिनिक दोनों की छुट्टी है। आज का पूरा दिन सिर्फ आपका और मेरा है।”
लेकिन अंजलि इस बार पिघलने के मूड में नहीं थी। उसने आर्यन के हाथों को अपनी कमर से झटक दिया और बिस्तर पर थोड़ा और दूर खिसक गई। “नहीं आर्यन, बस बहुत हुआ! तूने आज वो सीमा पार की है जिसे मैं कभी खुद को माफ नहीं कर पा पाऊँगी। तूने मेरी बेबसी का फायदा उठाया। तूने मुझे उस हाल में मजबूर किया जब मैं ‘ना’ कहने की स्थिति में नहीं थी।”
अंजलि अब उठकर बैठ गई, उसने चादर को अपने जिस्म पर लपेटा और घुटनों में सिर देकर सुबकने लगी। “तूने मुझे अपनी ‘रांड’ बना दिया, मुझे गालियां दीं, और फिर मेरे परिवार के सबसे बड़े राज़ को छीन लिया। मुझे अब खुद से घिन आ रही है। जा यहाँ से… मुझे अकेला छोड़ दे।”
आर्यन शांत होकर उसे देखता रहा। उसने समझ लिया था कि अंजलि की नाराज़गी ऊपरी नहीं है; उसे इस बात का डर सता रहा है कि अब आर्यन के पास उसकी बहन कंचन का भी ‘कंट्रोल’ आ गया है। अंजलि का स्वाभिमान और उसकी ममता इस वक्त उसके अंदर की हवस से लड़ रहे थे।
आर्यन ने एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि अंजलि को मनाना इतना आसान नहीं होगा, लेकिन वह यह भी जानता था कि अंजलि के जिस्म की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है।
आर्यन समझ गया था कि इस वक्त ज़ोर-ज़बर्दस्ती या कामुक बातें आग में घी का काम करेंगी। अंजलि की रूह जख्मी थी और उसे मरहम की ज़रूरत थी, न कि और ज़्यादा हवस की। उसने एक गहरी सांस ली और बिना कुछ बोले बिस्तर से उठ गया। उसने अपना नेकर पहना और कमरे से बाहर निकल गया।
करीब आधे घंटे बाद, जब अंजलि अभी भी चादर में लिपटी अपनी किस्मत और शर्मिंदगी पर आँसू बहा रही थी, कमरे के दरवाज़े पर एक हल्की दस्तक हुई। आर्यन हाथ में एक ट्रे लिए अंदर आया।
ट्रे में गरमा-गरम कॉफी के दो मग, मक्खन में डूबे हुए टोस्ट और अंजलि के पसंदीदा कटे हुए फल थे। आर्यन ने कोई आवाज़ नहीं की। उसने चुपचाप ट्रे को साइड टेबल पर रखा और अंजलि के पैरों के पास बेड पर बैठ गया। वह अब एक ‘वहशी प्रेमी’ नहीं, बल्कि वही ‘छोटा आर्यन’ लग रहा था जो माँ की ज़रा सी तकलीफ पर बेचैन हो जाता था।
आर्यन ने धीरे से अंजलि के कांपते हुए पैर को सहलाया। इस बार उसकी छुअन में हवस नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति और माफी थी। “माँ… मैं जानता हूँ मैंने आज सुबह अपनी सीमाएं लांघीं। मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहीं था, बस उस पागलपन में मैं भूल गया कि आप मेरी माँ भी हो। प्लीज, कुछ खा लो… सुबह से आपने सिर्फ आँसू पिए हैं।”
कॉफी की सोंधी महक और आर्यन के नरम शब्दों ने अंजलि के गुस्से की दीवार में एक दरार कर दी। उसने अपनी भीगी आँखों से आर्यन की ओर देखा। आर्यन की आँखों में इस वक्त वही मासूमियत थी जो बचपन में हुआ करती थी। अंजलि का ममतामयी दिल, जो कुछ देर पहले नफरत से भरा था, अब धीरे-धीरे पसीने लगा। एक माँ चाहे कितनी भी नाराज़ क्यों न हो, अपने बेटे की सेवा और उसकी झुकी हुई नज़रों के आगे हार ही जाती है।
अंजलि ने धीरे से हाथ बढ़ाकर कॉफी का मग उठा लिया। उसने एक छोटा सा घूँट भरा और अपनी नज़रें झुका लीं। “तू बहुत शातिर है आर्यन… पहले मुझे बर्बाद करता है और फिर ऐसे प्यार दिखाता है जैसे कुछ हुआ ही न हो।” उसकी आवाज़ अब सख्त नहीं थी, उसमें एक दर्द भरी मिठास लौट आई थी।
आर्यन ने मुस्कुराकर अंजलि के माथे को चूमा। “मैं शातिर नहीं हूँ माँ, बस आपका हूँ। और जो अपना होता है, वो हक भी जताता है और माफ़ी भी माँगता है।” अंजलि ने एक ठंडी आह भरी और धीरे-धीरे टोस्ट खाने लगी। कमरे का तनाव अब कम हो चुका था, लेकिन कंचन मासी का वो राज़ अब भी दोनों के बीच एक अदृश्य पुल की तरह मौजूद था।
अंजलि को लग रहा था कि वह आर्यन की इस ‘दोहरी शख्सियत’ के जाल में पूरी तरह फंस चुकी है—जहाँ एक पल वह उसे अपनी जांघों तले कुचलता है और अगले ही पल उसे किसी देवी की तरह पूजने लगता है।
ड्राइंग रूम में पसरा हुआ सन्नाटा अब एक भारी और संजीदा बातचीत में तब्दील हो चुका था। आर्यन ने अंजलि के करीब बैठकर उसके हाथों को अपनी हथेलियों में लिया। अंजलि की नज़रें अब भी झुकी हुई थीं, लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा सख्त नहीं था।
आर्यन ने अंजलि की आँखों में आँखें डालकर बहुत ही संजीदगी से अपनी बात शुरू की:
“माँ, आप जो नाराज़ हो रही हैं, एक बार ठंडे दिमाग से सोचिए। मैंने ये सब क्यों किया? क्योंकि मुझे पता था कि आपके अंदर एक ऐसी प्यास है जिसे दुनिया का कोई ‘नॉर्मल’ रिश्ता नहीं बुझा सकता। आपको वो ‘गंदापन’, वो गालियाँ और वो बेबाकी चाहिए थी जो आपके दबे हुए अरमानों को बाहर ला सके। मैंने सिर्फ वही रोल निभाया जो आपका मन बरसों से चाहता था।”
आर्यन ने अंजलि का हाथ अपने दिल पर रखा और बहुत ही गंभीर स्वर में कहा, “मैं आज इस खुदा की कसम खाता हूँ माँ… आपके, पापा के और कंचन मासी के बीच का ये जो भी राज़ है, ये इसी कमरे की दीवारों के बीच दफन रहेगा। दुनिया को छोड़ो, खुद मासी को भी कभी कानो-कान खबर नहीं होगी कि मुझे ये सब पता है। मैं आपका बेटा हूँ माँ, आपका दुश्मन नहीं।”
इस पूरे प्रकरण में अंजलि की मानसिक स्थिति को समझना बहुत ज़रूरी है, जो हर उस औरत की कहानी बयां करती है जिसके अंदर दबी हुई फंतासियां और सामाजिक मर्यादाओं के बीच युद्ध चलता है:
एक औरत के लिए अपने सबसे गंदे राज़ को किसी के सामने ज़ाहिर कर देना बहुत बड़ा ‘मानसिक बोझ’ हल्का करने जैसा होता है। अंजलि जो अब तक मासी वाला राज़ अकेले ढो रही थी, उसे आर्यन के सामने उगलने के बाद एक अजीब सी ‘शुद्धि’ महसूस हुई। यद्यपि वह नाराज़ थी, लेकिन अवचेतन मन में वह खुश थी कि अब वह इस राज़ के साथ अकेली नहीं है।
औरत की मानसिकता में अक्सर ‘समर्पण’ का एक गहरा कोना होता है। जब आर्यन ने उससे सच उगलवाया, तो अंजलि को अपनी ‘कमज़ोरी’ का अहसास हुआ। एक औरत को तब और भी ज़्यादा कामुक सुख मिलता है जब उसका ‘नर’ इतना शक्तिशाली हो कि वह उसके मन के ताले तोड़ सके। आर्यन का यह रूप उसे डराता भी है और उसे एक ‘अजीब सुरक्षा’ का अहसास भी कराता है।
जब आर्यन ने कसम खाई, तो अंजलि के मन की घबराहट खत्म हो गई। औरत की मानसिकता यह चाहती है कि उसका साथी उसे उसके ‘सबसे गंदे’ रूप में भी स्वीकार करे और उसे दुनिया से बचाकर रखे। आर्यन ने वही किया—उसने अंजलि के राज़ को स्वीकार किया और सुरक्षा का वचन दिया।
अंजलि ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसका तनाव अब ढीला पड़ चुका था। उसने पहली बार सिर उठाकर आर्यन को देखा। उसकी आँखों में अब शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी ‘अधीनता’ थी। उसने महसूस किया कि आर्यन ने न केवल उसके जिस्म को जीता है, बल्कि उसके अतीत और भविष्य को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया है।
“तूने मुझे पूरी तरह खाली कर दिया है आर्यन… अब मेरे पास तुझसे छुपाने को कुछ नहीं बचा,” अंजलि ने एक धीमी मुस्कान के साथ कहा।
दोपहर के 12 बज चुके थे। बाहर सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, लेकिन कमरे के अंदर का माहौल अब एक ठंडी और रहस्यमयी चादर में लिपटा हुआ था। नाश्ते के बाद अंजलि का मन हल्का हो गया था, और आर्यन के ‘सुरक्षा के वादे’ ने उसके अंदर के डर को एक गहरे विश्वास में बदल दिया था।
अंजलि अब सोफे पर आर्यन की बाहों में सिमटी हुई थी। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और यादों के उस गलियारे में पहुँच गई जहाँ उसने अपनी बहन कंचन के साथ मिलकर समाज की हर दीवार को गिरा दिया था।
अंजलि ने आर्यन की छाती पर अपनी उंगलियां फेरते हुए धीमी आवाज़ में बोलना शुरू किया, जैसे वह कोई गुप्त मंत्र पढ़ रही हो।
“आर्यन, तुझे लगता है कि तेरी मासी बहुत सीधी है, पर सच तो ये है कि वो मुझसे भी दो कदम आगे है। जब तू छोटा था और तेरे पापा काम के सिलसिले में शहर से बाहर जाते थे, तब कंचन अक्सर यहाँ रहने आती थी। हम दोनों बहनों के बीच कोई शर्म नहीं थी। हम एक ही बिस्तर पर सोते थे और घंटों एक-दूसरे के जिस्म की बनावट और अपनी अधूरी इच्छाओं के बारे में बातें करते थे।”
अंजलि की आवाज़ में अब एक अजीब सी मादकता थी। “मुझे याद है वो गर्मी की दोपहर, जब हम दोनों ने तय किया कि हम एक-दूसरे को वैसे ही देखेंगे जैसे खुदा ने हमें बनाया है। हमने सारे कपड़े उतार दिए और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी तुलना करने लगीं। कंचन की कमर मुझसे थोड़ी पतली है, लेकिन उसके उभार मुझसे भी ज़्यादा सख्त और नुकीले हैं। उसने पहली बार मुझे सिखाया था कि एक औरत ही दूसरी औरत को वो सुख दे सकती है जो कोई मर्द नहीं समझ सकता।”
अंजलि ने एक गहरी सांस ली। “कंचन को ‘शेयरिंग’ का बहुत शौक है। वो कहती थी कि अगर कोई चीज़ अच्छी है, तो उसे अकेले क्यों भोगना? तेरे पापा के साथ जो कुछ भी हुआ, उसमें कंचन ने ही पहल की थी। उसने मुझसे कहा था, ‘जीजी, आज इसे मिलकर चखते हैं।’ उस रात हम तीनों ने मर्यादा की हर हद पार कर दी थी। कंचन ने उसे वैसे ही खुश किया जैसे आज तूने मुझे किया है।”
अंजलि ने आर्यन के कान के पास झुककर फुसफुसाया, “तेरी मासी को ऊँचे और कड़क मर्दों का बहुत शौक है। वो अक्सर मुझसे कहती थी कि उसे कोई ऐसा चाहिए जो उसे हुक्म दे सके, जो उसे उसकी औकात याद दिला सके। आज जब तू मुझे गालियां दे रहा था, तो मुझे कंचन की वही बातें याद आ रही थीं।”
अंजलि अब इस राज़ को आर्यन के साथ साझा करके एक तरह की ‘मानसिक कामुकता’ का आनंद ले रही थी। एक औरत जब अपनी बहन के साथ बिताए निजी पलों को अपने ‘प्रेमी’ को बताती है, तो उसे एक अलग स्तर का रोमांच मिलता है। उसे महसूस हो रहा था कि वह आर्यन को कंचन की ओर आकर्षित नहीं कर रही, बल्कि वह आर्यन को यह बता रही है कि उसका पूरा खानदान ही इसी ‘मिट्टी’ का बना है।
आर्यन के लिए यह जानकारी किसी खज़ाने से कम नहीं थी। उसके दिमाग में अब कंचन मासी की एक नई छवि बन रही थी—एक ऐसी मासी जो ऊपर से शांत है, लेकिन अंदर से ज्वालामुखी दबाए बैठी है।
अंजलि ने अपनी बात खत्म की और आर्यन के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया। “अब तू मेरा सब कुछ जान गया है आर्यन… मेरी रूह भी और मेरा अतीत भी। अब बता, क्या तू अब भी अपनी इस माँ से वैसा ही प्यार करेगा?”
आर्यन की आँखों में एक नई चमक थी। वह समझ गया था कि अब कंचन मासी भी उसके इस ‘खेल’ का हिस्सा बनने वाली हैं, भले ही उन्हें अभी इस बात का पता न हो।
आर्यन की आँखें इस खुलासे से फटी की फटी रह गईं। उसके दिमाग में कंचन मासी की जो छवि थी—सफेद या हल्के रंग की साड़ियाँ, माथे पर छोटी सी बिंदी, और हाथ में हमेशा रहने वाली पूजा की थाली—वह अंजलि की बातों से पूरी तरह मेल नहीं खा रही थी।
आर्यन ने अंजलि की कमर में हाथ डालते हुए उसे थोड़ा और करीब खींचा और अचरज से पूछा, “क्या? मासी? माँ, आप यकीन से कह रही हैं? कंचन मासी तो इतनी सीधी दिखती हैं, हर वक्त पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन… मंदिर के बिना तो उनका दिन शुरू नहीं होता। मुझे तो लगा था कि वो इन सब बातों से कोसों दूर होंगी।”
अंजलि ने एक फीकी मुस्कान दी और आर्यन के सीने पर अपनी उंगलियां फिराते हुए कहा:
“आर्यन, जो जितना ज़्यादा शांत और धार्मिक दिखता है, उसके अंदर उतनी ही गहरी आग दबी होती है। कंचन का वो पूजा-पाठ सिर्फ दुनिया के लिए एक ढाल है। वो खुद को उन कामों में इसलिए व्यस्त रखती है ताकि दुनिया उसकी नज़रों में छिपी हवस को न पढ़ सके। वो जितनी सफाई से अपनी साड़ी का पल्लू संभालती है, उतनी ही सफाई से उसने अपने इस राज़ को बरसों से संभाल कर रखा है।”
आर्यन ने उत्सुकता में अगला सवाल दागा, “तो क्या… क्या मासी की शादी के बाद भी आप दोनों ने ये सब साथ में किया? मतलब, क्या वो सिलसिला अब भी जारी है?”
अंजलि ने तुरंत अपना सिर हिलाया और आर्यन की आँखों में देखकर बड़ी संजीदगी से कहा, “नहीं आर्यन… वो जो कुछ भी हुआ, वो बस एक ही बार हुआ था। वो एक ऐसी रात थी जब हम सब भावनाओं और हालात के बहाव में बह गए थे। कंचन की शादी के बाद वो बहुत बदल गई। उसने अपने उस ‘गुनाह’ को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया और खुद को पूरी तरह भक्ति में डुबो लिया। उसके बाद हम बहनों ने कभी उस बारे में बात नहीं की, और न ही फिर कभी किसी तीसरे को अपने बीच आने दिया।”
अंजलि की इस बात में एक गहरी सच्चाई छिपी थी। एक औरत की मानसिकता अक्सर ‘एक बार की गलती’ को जीवन भर के लिए एक सबक बना लेती है। अंजलि ने बताया कि कंचन मासी ने उस एक रात के बाद अपने चरित्र पर ऐसा पर्दा डाल लिया कि अब उसे भेद पाना लगभग नामुमकिन है।
अंजलि ने बताया कि कंचन आज भी उस एक रात के लिए खुद को दोषी मानती है, और शायद यही वजह है कि वह अब इतनी ज़्यादा धार्मिक हो गई है। वह अपने उस ‘कामुक रूप’ को फिर से बाहर नहीं आने देना चाहती।
अंजलि जहाँ खुद को आर्यन के हवाले कर चुकी थी, वहीं वह यह भी जानती थी कि कंचन को फिर से उस रास्ते पर लाना आसान नहीं होगा।
आर्यन चुपचाप कुछ सोचने लगा। उसके दिमाग में अब कंचन मासी का वह चेहरा घूम रहा था जो मंदिर की घंटियों के बीच शांत दिखता था, लेकिन अंजलि ने उस शांति के पीछे छिपे तूफ़ान की गवाही दे दी थी। भले ही वह एक बार हुआ था, लेकिन ‘वह हुआ तो था’—यही बात आर्यन के लिए काफी थी।
“तो मासी अब पूरी तरह ‘पवित्र’ बन चुकी हैं…” आर्यन ने गुनगुनाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी चुनौती थी।
दोपहर की उस खामोशी में अंजलि की आवाज़ में अब एक अजीब सी उदासी और चिंता घुल गई थी। आर्यन अंजलि की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था और अंजलि धीरे-धीरे उसके बालों में उंगलियां फेर रही थी, जैसे वह अपने अतीत के पन्नों को एक-एक करके पलट रही हो।
अंजलि ने एक लंबी ठंडी आह भरी और खिड़की से बाहर ताकते हुए कहा:
“सच कहूँ आर्यन, तो अब कंचन और मेरे बीच वैसी बातें नहीं होतीं। शादी के इतने साल बीत गए, लेकिन वो अपनी ही दुनिया में सिमट गई है। शायद उस एक रात के Guilt ने उसे मुझसे भी दूर कर दिया। बहुत समय हो गया है मैंने उससे खुलकर बात नहीं की। हमारी बातें अब सिर्फ औपचारिकताओं तक ही सीमित रह गई हैं।”
अंजलि की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई। “उसकी शादी को इतने साल हो गए, लेकिन उसकी गोद अब तक सूनी है। कोई बच्चा नहीं हुआ उसे। एक औरत के लिए ये बहुत बड़ी टीस होती है, आर्यन। शायद यही वजह है कि उसका रुझान पूजा-पाठ की तरफ और भी बढ़ गया। वो अपनी कोख के खालीपन को मंदिर की घंटियों के शोर में दबाने की कोशिश करती है।”
“पिछली बार जब वो मुझसे मिलने आई थी, तो बहुत उदास थी। उसने मुझसे झिझकते हुए पूछा था कि क्या मैं उसे किसी अच्छी गाइनोकोलॉजिस्ट का पता बता सकती हूँ। मैंने उसे सलाह भी दी और एक डॉक्टर का नाम भी बताया था, पर उसके बाद उसने कभी पलटकर नहीं बताया कि क्या हुआ। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में भी वो ‘आग’ खत्म हो चुकी है।”
यहाँ अंजलि एक ऐसी औरत की मानसिकता का वर्णन कर रही थी जो अंदर से टूटी हुई है:
कंचन मासी का माँ न बन पाना उसके लिए एक मानसिक बोझ बन गया है। जब एक औरत को लगता है कि वह ‘पूर्ण’ नहीं है, तो वह अक्सर वैराग्य या भक्ति का रास्ता चुन लेती है ताकि वह अपनी शारीरिक ज़रूरतों और इच्छाओं को ‘पाप’ मानकर दबा सके।
अंजलि जानती थी कि कंचन के अंदर अब भी वो ‘चिनगारी’ कहीं न कहीं ज़िंदा है, लेकिन संतान न होने के दुख और पूजा-पाठ के पर्दे ने उसे पत्थर बना दिया है। वह अपनी बहन से भी अब कतराती है, क्योंकि अंजलि उसे उसके उस पुराने ‘उन्मुक्त’ रूप की याद दिलाती है।
आर्यन ने अंजलि की बात गौर से सुनी। उसके दिमाग में अब एक नया और गहरा खेल चल रहा था। एक ऐसी औरत जो बरसों से अतृप्त है, जिसकी कोख सूनी है और जो भक्ति के नाम पर अपनी हवस को दबाए बैठी है—ऐसी औरत को फिर से ‘जीवित’ करना आर्यन के लिए एक नई चुनौती की तरह था।
“तो मासी को डॉक्टर की नहीं, शायद किसी ‘खास’ इलाज की ज़रूरत है…” आर्यन ने बुदबुदाते हुए अंजलि की हथेली को चूम लिया।
दोपहर की उस तपती खामोशी में अंजलि ने महसूस किया कि कंचन की बातें जैसे-जैसे गहरी हो रही हैं, आर्यन के शरीर की हलचल बदल रही है। वह उसकी गोद में सिर रखकर लेटा तो था, लेकिन उसका ध्यान अब बातों से ज़्यादा उस ‘कल्पना’ में खो गया था जहाँ मासी की पवित्रता और उनकी दबी हुई हवस का मिलन हो रहा था।
अंजलि ने बात करते-करते अचानक अपनी नज़रें नीचे झुकाईं और जो देखा, उसने उसकी धड़कनें बढ़ा दीं। आर्यन के नेकर के ऊपर से ही उसका ७ इंच का फौलाद अब एक कड़क खंभे की तरह तन चुका था। कंचन मासी के अधूरेपन और उनकी दबी हुई आग के ज़िक्र ने आर्यन के अंदर की दरिंदगी को फिर से जगा दिया था।
अंजलि ने अपनी एक उंगली से आर्यन की नाक को हल्के से दबाया और एक शरारती मुस्कान के साथ उसे डांटते हुए कहा, “ओह हो… तो साहबज़ादे का ध्यान मासी की तकलीफ पर कम और अपनी इस ‘लाठी’ पर ज़्यादा है? शर्म नहीं आती तुझे? मैं अपनी बहन के सूनी गोद की बात कर रही हूँ और तू यहाँ उसके नाम से ही घोड़े दौड़ा रहा है?”
आर्यन थोड़ा झेंप गया, लेकिन उसने नज़रें नहीं चुराईं। उसने देखा कि अंजलि की आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। वह अपनी माँ के चेहरे के करीब आया और मुस्कुराते हुए बोला, “क्या करूँ माँ… आपकी बातें ही इतनी ‘गरम’ हैं। मासी का वो पूजा-पाठ वाला चेहरा और उसके पीछे छिपी वो आग… सोचकर ही मेरा ये ७ इंच बेकाबू हो रहा है।”
अंजलि ने नेकर के ऊपर से ही उस उभरे हुए हिस्से को गौर से देखा। वह जानती थी कि आर्यन अब कंचन को सिर्फ एक ‘मासी’ की नज़र से नहीं देख रहा। “तू बहुत बिगड़ गया है आर्यन। कंचन अगर देख ले कि तू उसके बारे में क्या सोच रहा है, तो वो शायद मंदिर से बाहर ही न निकले।” अंजलि ने हंसते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ अनजाने में ही आर्यन के बालों को सहला रहे थे
यहाँ अंजलि की मानसिक स्थिति बड़ी दिलचस्प थी:
उसे थोड़ा बुरा लगा कि उसकी बहन का ज़िक्र आर्यन को इतना उत्तेजित कर रहा है।
साथ ही, उसे यह सोचकर रोमांच भी हो रहा था कि उसका जवान बेटा अब उसके खानदान की ‘पवित्र’ महिलाओं के मुखौटे उतारने के लिए तैयार है। उसे अपनी बहन के साथ बिताई वो ‘एक रात’ याद आ गई और उसे लगा कि शायद कंचन की ज़िंदगी का सन्नाटा सिर्फ आर्यन जैसा ‘तूफ़ान’ ही तोड़ सकता है।
अंजलि ने अपना हाथ धीरे से आर्यन के उस उभरे हुए हिस्से के पास ले जाकर रोक लिया। “देख कैसे अकड़ के खड़ा है ये… जैसे अभी कंचन को यहीं बुला लेगा। बता, क्या चल रहा है तेरे इस शातिर दिमाग में?”
आर्यन ने अंजलि की कलाई पकड़ ली और उसे उस तने हुए लोहे पर टिका दिया। “यही चल रहा है माँ… कि मासी को डॉक्टर की नहीं, बल्कि इस ७ इंच की ‘दवा’ की ज़रूरत है। क्या आप अपनी बहन की मदद नहीं करेंगी?”