ऊपर के कमरे में आर्यन ने रात भर की उधेड़बुन के बाद आखिरकार हिम्मत जुटाई। उसने अपना बैग उठाया, गहरी साँस ली और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। उसका दिल अभी भी ज़ोर से धड़क रहा था। उसे लग रहा था कि वह माँ का सामना कैसे करेगा? क्या वह कल रात वाली बात छेड़ेंगी? या फिर एक भारी खामोशी उनके बीच हमेशा के लिए दीवार बन जाएगी?
जब वह नीचे पहुँचा, अंजलि रसोई के काउंटर पर खड़ी चाय छान रही थी। वह बिल्कुल शांत और सहज दिख रही थी, जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो।
“आ जा आर्यन, नाश्ता लग गया है। जल्दी कर वरना कॉलेज के लिए देर हो जाएगी,” अंजलि ने बिना पीछे मुड़े, बहुत ही स्वाभाविक आवाज़ में कहा।
आर्यन मेज के पास आया और कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसने अपनी नज़रें झुका रखी थीं, जैसे फर्श की टाइल्स में कोई बहुत ज़रूरी चीज़ ढूँढ रहा हो। वह अपनी प्लेट में रखे पराँठे को देख तो रहा था, पर उसे उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह लग रही थी।
अंजलि ने चाय का कप उसके पास रखा और उसके सिर पर बहुत ही कोमलता से हाथ फेरा। उस एक स्पर्श ने आर्यन के अंदर के सारे बांध तोड़ दिए। उसने अपनी नज़रें ऊपर नहीं उठाईं, बस अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश की।
“माँ…” उसकी आवाज़ थोड़ी भर्राई हुई थी। “मुझे… मुझे कल रात के लिए सॉरी कहना है। मुझे आपका फोन नहीं छूना चाहिए था। मेरी वजह से आपको… आपको बुरा लगा होगा। मैं बस… आपकी फिक्र कर रहा था पर मुझे अपनी हद पार नहीं करनी चाहिए थी।”
अंजलि ने एक लंबी और गहरी साँस ली। उसने आर्यन के सामने वाली कुर्सी खींची और बैठ गई। उसने अपना हाथ आर्यन के हाथ पर रखा, जो अभी भी कांप रहा था।
उसने बहुत ही शांत और प्यार भरी आवाज़ में कहा, “पगले, सॉरी किस बात के लिए? उस फिक्र के लिए जो तूने अपनी माँ के लिए दिखाई? या उस प्यार के लिए कि तू रात भर मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहा?”
आर्यन ने धीरे से अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसने देखा कि माँ की आँखों में कोई गुस्सा या शर्मिंदगी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा सुकून और गर्व था।
अंजलि ने थोड़ी शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, मेरा फोन मेरा अपना निजी कोना है, और शायद तू अभी इतना बड़ा नहीं हुआ कि उस कोने को पूरी तरह समझ सके। पर इसका मतलब यह नहीं कि तूने कोई गुनाह कर दिया। तू मेरा बेटा है, और तेरी फिक्र ही मेरी सबसे बड़ी दवाई है। अब ये ‘सॉरी-वोरी’ छोड़ और चुपचाप नाश्ता कर, वरना टिफिन ठंडा हो जाएगा।”
आर्यन के सीने से जैसे एक बहुत बड़ा पत्थर हट गया। उसने एक हल्की मुस्कान दी और पराँठे का निवाला तोड़ा। वह समझ गया था कि रिश्ता चाहे कितना भी परिपक्व (mature) क्यों न हो जाए, माँ की ममता हमेशा उन असहज सच्चाइयों से बड़ी होती है।
नाश्ते की मेज पर अब माहौल थोड़ा हल्का तो हुआ था, लेकिन एक अनकही हिचकिचाहट अभी भी हवा में तैर रही थी। अंजलि जानती थी कि आर्यन एक समझदार और संवेदनशील लड़का है, और अगर उसने इस बात को यहीं सुलझाया नहीं, तो शायद वह हमेशा के लिए अपने मन में एक गांठ बांध लेगा।
उसने चाय का घूँट लिया और बहुत ही शांत भाव से आर्यन की ओर देखा, जो अब भी थोड़ा सिमटा हुआ बैठा था।
“आर्यन,” अंजलि ने बहुत ही कोमल स्वर में उसे पुकारा। आर्यन ने अपनी नज़रें उठाईं।
“बेटा, कल रात जो हुआ… मैं चाहती हूँ कि तू उसे एक अलग नज़रिए से देख। देख, हम सब इंसान हैं। चाहे कोई डॉक्टर हो, माँ हो या बेटा—हर किसी का अपना एक निजी संसार होता है, अपनी कुछ ज़रूरतें और अपना एक तरीका होता है खुद को शांत रखने का।”
उसने थोड़ा रुक कर आर्यन के हाथ पर अपना हाथ रखा। “कल जो तूने देखा या सुना, वह कोई बीमारी नहीं थी जिसे दवाइयों से ठीक किया जा सके। वह बस एक तरीका था मेरे अपने तनाव (stress) को दूर करने का। कभी-कभी शरीर और मन को शांत करने के लिए इंसान को अपने अकेलेपन में कुछ चीज़ों का सहारा लेना पड़ता है। इसमें न कुछ गलत है, न कुछ शर्मनाक।”
आर्यन खामोशी से सुन रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसकी माँ उसे एक ‘बच्चे’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘वयस्क’ (adult) की तरह समझा रही हैं।
अंजलि ने हल्की मुस्कान के साथ बात जारी रखी, “और सुन… अगली बार अगर कभी तुझे रात को ऐसी कोई आवाज़ सुनाई दे, या लगे कि मैं बेचैन हूँ, तो तुझे पागलों की तरह घबराने या थर्मामीटर लेकर दौड़ने की ज़रूरत नहीं है। तेरी माँ अपनी देखभाल करना जानती है। तू बस ये समझ ले कि वो मेरा अपना ‘मी-टाइम’ है।”
उसने थोड़ा मज़ाकिया लहजे में उसकी नाक खींची, “तू बस अपनी पढ़ाई और अपनी लाइफ पर ध्यान दे। मेरी फिक्र करना अच्छी बात है, पर इतनी भी नहीं कि तू खुद की नींद खराब कर ले। समझ गया?”
आर्यन के चेहरे पर अब एक वास्तविक राहत आई। उसे समझ आ गया कि माँ उससे कुछ छिपा नहीं रही हैं, बल्कि उसे यह बता रही हैं कि वह भी एक हाड़-मांस की इंसान हैं जिनकी अपनी एक प्राइवेट लाइफ है।
“जी माँ, मैं समझ गया। सॉरी फिर से, कि मैंने बात को कुछ और ही समझ लिया था,” आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।
“चल अब, मुस्कुराता हुआ कॉलेज जा। और हाँ, रास्ते में वो दूध का खाली पैकेट डस्टबिन में डाल देना जो तू कल रात काउंटर पर ही छोड़ आया था,” अंजलि ने हँसते हुए उसे विदा किया।
आर्यन अपना बैग उठाकर बाहर निकला, तो उसे महसूस हुआ कि सुबह की हवा आज वाकई बहुत ताज़ा है। उनके बीच का वो भारीपन अब एक गहरी समझ में बदल चुका था।
शाम का समय था। बाहर आसमान में गोधूलि की लालिमा धीरे-धीरे धुंधली होकर स्याह हो रही थी। घर के अंदर की फिजा अब बिल्कुल बदल चुकी थी। सुबह की वो हल्की सी हिचकिचाहट और रात का वो भारीपन अब कहीं नहीं था। रसोई से फिर वही चिर-परिचित मसालों की खुशबू आ रही थी, जो इस घर की जीवंतता का प्रतीक थी।
आर्यन कॉलेज से वापस आकर हाथ-मुँह धोकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया था। अंजलि ने आज सादा लेकिन स्वादिष्ट खाना बनाया था—दाल तड़का, भिंडी की सब्जी और फुल्के।
“आज कॉलेज में क्या खास हुआ?” अंजलि ने रोटी पर घी लगाते हुए बहुत ही सहजता से पूछा।
आर्यन ने एक निवाला लिया और बोला, “वही रूटीन माँ। बस आज लाइब्रेरी में थोड़ा ज्यादा वक्त बिताया। प्रोजेक्ट के लिए कुछ पुरानी रिपोर्ट्स देखनी थी। और हाँ, आज तो कैंटीन का समोसा खाकर मेरा पेट ही भर गया था, पर आपकी दाल की खुशबू ने फिर से भूख जगा दी।”
अंजलि ने हँसते हुए उसकी थाली में एक और रोटी रखी। “समोसे कम खाया कर, सेहत के लिए अच्छे नहीं होते। और क्लिनिक में भी आज काफी रश था। मौसम बदल रहा है न, तो वायरल के पेशेंट्स बहुत बढ़ गए हैं।”
दोनों के बीच बातें इतनी सामान्य थीं कि लग ही नहीं रहा था कि कुछ घंटों पहले उनके बीच कोई असहज स्थिति बनी थी। वे फिल्म की चर्चा करने लगे, जो अगले हफ्ते रिलीज होने वाली थी। आर्यन ने अपने दोस्तों के किसी मज़ाक का ज़िक्र किया, जिस पर अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी।
खाना खत्म करने के बाद, आर्यन ने अपनी प्लेट उठाई। अंजलि ने उसे देखा और मुस्कुराई, “आज फिर बर्तन धोने का इरादा है क्या?”
आर्यन ने मज़ाक में सिर हिलाया, “नहीं माँ, आज मेरा कोटा पूरा हो गया है। आज आप धोइये, मैं ज़रा अपनी पढ़ाई खत्म करता हूँ।”
“जा-जा, पढ़ाई कर,” अंजलि ने प्यार से उसे झिड़का।
आर्यन जब अपनी सीढ़ियों की ओर बढ़ा, तो उसने पीछे मुड़कर देखा। माँ अपनी धुन में रसोई समेट रही थीं। दोनों को पता था कि अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं है, बल्कि एक ऐसी समझ है जो शब्दों से परे है। रात का सन्नाटा अब डरावना नहीं, बल्कि एक सुकून देने वाली चादर जैसा था।
करीब आधे घंटे बाद, जब आर्यन ने ऊपर अपना थोड़ा काम निपटा लिया, उसे फिर से दूध की याद आई। इस बार उसके कदमों में वह हिचकिचाहट नहीं थी जो पिछली रात थी। वह सीढ़ियों से उतरकर सीधे रसोई की ओर बढ़ा।
रसोई का नज़ारा बिल्कुल बदला हुआ था। अंजलि अपना काम खत्म कर चुकी थी। स्लैब बिल्कुल साफ था, बर्तन अपनी जगह पर सलीके से लगे थे और सिंक सूखा हुआ था। अंजलि काउंटर के पास खड़ी अपनी आखिरी चाय का कप हाथ में लिए खिड़की के बाहर देख रही थी।
आर्यन को आता देख वह मुड़ी और मुस्कुराई, “आ गया दूध पीने? मुझे लगा था आज तू ऊपर ही सो जाएगा।”
आर्यन ने मुस्कुराते हुए शेल्फ से अपना गिलास निकाला, “बिना दूध के नींद कहाँ आती है माँ? और वैसे भी, आज तो मुझे पता है कि दूध कहाँ रखा है और टेम्परेचर भी बिल्कुल सही होगा।”
उसने हल्की शरारत के साथ बात कही, जिस पर अंजलि ने बस अपनी आँखें घुमाईं और मुस्कुरा दी। आर्यन ने पतीले से दूध गिलास में डाला। दूध अब भी हल्का गुनगुना था।
“माँ, आप बहुत जल्दी काम खत्म कर लेती हैं,” आर्यन ने दूध का घूँट लेते हुए कहा। “अभी तो मैंने सोचा था कि शायद आप यहीं मिलेंगी।”
अंजलि ने अपना चाय का खाली कप सिंक में रखते हुए कहा, “आदत हो गई है बेटा। और फिर, घर साफ रहता है तो मन को भी शांति मिलती है। अब तू ये दूध खत्म कर और चुपचाप सोने जा। कल सुबह जल्दी उठना है।”
आर्यन ने गिलास खाली किया और उसे सिंक में धोकर रख दिया। “जी माँ, आप भी सो जाइये। आज रात आपको ‘बुखार’ नहीं चढ़ना चाहिए,” उसने बहुत ही दबे स्वर में, मज़ाक और मासूमियत के मेल के साथ कहा।
अंजलि ने उसे हल्का सा धक्का दिया और हँसते हुए बोली, “चल बदमाश, ज्यादा स्मार्ट मत बन। गुड नाइट!”
“गुड नाइट माँ!” आर्यन मुस्कुराते हुए ऊपर की ओर बढ़ गया।
रसोई की लाइट बंद करते हुए अंजलि के मन में एक गहरा संतोष था। घर में अब कोई अनकही बात नहीं थी, कोई भारीपन नहीं था। सब कुछ साफ़, पारदर्शी और गरिमापूर्ण था। रात की खामोशी अब दोनों के लिए सुकून भरी थी।
आर्यन सीढ़ियों की ओर बढ़ा तो सही, लेकिन दूसरी या तीसरी पायदान पर पहुँचते ही उसके कदम ठिठक गए। उसके मन में एक ऐसा सवाल कौंधा जिसने उसे वापस मुड़ने पर मजबूर कर दिया। वह धीरे से घूमा और रसोई की दहलीज पर खड़ी माँ को देखने लगा।
आर्यन के चेहरे पर इस वक्त भावनाओं का एक अजीब सा संगम था। उसकी आँखों में वो मासूमियत थी जो बचपन में हुआ करती थी, आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट और कल रात की घटना को लेकर मन के किसी कोने में दबी हुई हल्की सी शर्म।
उसने रेलिंग को कसकर पकड़ा और धीमी आवाज़ में पूछा, “माँ… एक बात पूछूँ?”
अंजलि, जो रसोई की लाइट बंद करने ही वाली थी, रुक गई। उसने मुड़कर आर्यन की ओर देखा, “हाँ बेटा, बोल?”
आर्यन ने नज़रें थोड़ी झुका लीं और फिर हिम्मत जुटाकर कहा, “कल रात… जो कुछ हुआ… उसके बाद मुझे एक डर लग रहा है। कल तो मैंने आपकी उन आवाज़ों को और शरीर की गर्मी को गलत समझ लिया था। लेकिन माँ, अगर कभी भविष्य में आपको वाकई में तेज़ बुखार हो या सच में कोई तकलीफ हो… तो मुझे कैसे पता चलेगा? मैं तो यही सोचकर रुक जाऊँगा कि शायद आप अपने ‘निजी पल’ में हैं।”
सवाल बहुत ही गहरा और संजीदा था। आर्यन की चिंता जायज़ थी—कहीं कल की उस घटना की वजह से उनके बीच संवाद की वो डोर न टूट जाए जो मुश्किल समय में काम आती है।
अंजलि कुछ पल के लिए शांत रही। उसने आर्यन के चेहरे पर पसरी उस फिक्र को देखा जो बिल्कुल शुद्ध थी। वह धीरे से चलकर सीढ़ियों के पास आई और आर्यन के कंधे पर हाथ रखा।
उसने बहुत ही सुकून भरी आवाज़ में कहा, “बेटा, माँ और बेटे के बीच एक ऐसा अदृश्य तार होता है जिसे किसी ‘गलतफहमी’ की ज़रूरत नहीं पड़ती। अगर कभी मुझे वाकई तुम्हारी ज़रूरत होगी, तो मेरी आवाज़ में वो दर्द और पुकार खुद-ब-खुद आ जाएगी जिसे तू पहचान लेगा। और दूसरी बात…”
उसने आर्यन की आँखों में झाँककर मुस्कुराते हुए कहा, “अब तू इतना बड़ा और समझदार हो गया है कि तू ‘दिखावे’ और ‘हकीकत’ के बीच का फर्क समझ सके। भरोसा रख, अगर कभी मुझे तकलीफ हुई, तो मैं खुद तुझे आवाज़ दे दूँगी। अब उस बात को लेकर अपने मन में कोई बोझ मत रख।”
आर्यन के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आ गई। उसकी सारी उलझन उस एक जवाब से सुलझ गई थी।
“थैंक यू माँ। गुड नाइट,” उसने हल्के मन से कहा।
“गुड नाइट, मेरे फिक्रमंद डॉक्टर!” अंजलि ने चुटकी ली और आर्यन मुस्कुराता हुआ तेज़ी से ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गया।