Episode 8
सुधा दीदी सुबह की हल्की रोशनी में पूरी तरह से नंगी लेटी हुई थी और मेरे अगले कदम का इंतजार कर रही थी। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान और चेहरे पर शर्म थी। मैं धीरे-धीरे खुद को भी कपड़ों से आजाद करने लगा। जैसे-जैसे मैंने अपनी शर्ट और फिर बाकी कपड़े उतारने शुरू किए, दीदी की आँखें चौड़ी हो गई। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान और गहरी चमक साफ झलक रही थी। कभी वह नज़रें चुरा लेती, तो कभी हिम्मत कर के मेरी ओर देखने लगती। उनके गालों की लाली और तेज़ हो गई थी, जैसे मेरे हर कपड़े उतारने के साथ उनकी साँसें और भारी हो रही हो।
जब मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए, तो मैं धीरे-धीरे दीदी के और पास आ गया। मैं उनके पैरों के बीच जाकर बैठा। दीदी ने हल्के से अपनी जाँघें खोल दी, ताकि मैं उनके और करीब आ सकूँ। उनकी इस हरकत से मुझे उनके सबसे गहरे हिस्से के पास आराम से जगह मिल गई। उनका बदन गर्म था, और मैं उनके बीच में बैठ कर उनकी साँसों की गर्मी महसूस कर सकता था। दीदी की आँखें शर्म से झुकी हुई थी, लेकिन उनके शरीर की भाषा साफ बता रही थी कि वह इस पल को पूरी तरह स्वीकार कर चुकी थी।
मैंने काँपते हाथों से उनकी जाँघों को सहलाना शुरू किया। उनकी त्वचा गर्म और मुलायम थी, मेरे हाथों के नीचे हल्की-सी नमी और उनकी गर्मी साफ महसूस हो रही थी। जैसे ही मेरी उँगलियाँ उनके और नाजुक हिस्से तक पहुँची, उनकी साँसों की रफ्तार बदलने लगी। हर सांस छोटी और भारी होती जा रही थी। उनके चेहरे पर हल्की घबराहट और चाह दोनों झलक रहे थे, वह लगातार होंठ काट रही थी और कभी आँखें खोल कर मुझे देखतीं तो कभी झट से पलके बंद कर लेती।
कुछ देर उनके उस हिस्से को छूने के बाद मैंने धीरे से अपना हाथ हटा लिया और अपना लंड उनके पास ले आया। जैसे ही मेरी गर्म और सख़्त नोक उनकी नर्मी से टकराई, मेरे पूरे शरीर में एक झटका-सा महसूस हुआ। दीदी की पलकों में हल्की हलचल हुई, उन्होंने आँखें खोली और मेरी तरफ देखा। उनकी नज़रों में डर नहीं था, बस एक गहरी झिझक और अंदर छुपी हुई चाह साफ दिखाई दे रही थी।
मैं धीरे-धीरे और झुक गया ताकि मेरा लंड उनके नाज़ुक हिस्से से लगातार लगा रहे। जैसे ही हल्की रगड़ शुरू हुई, मेरे पूरे शरीर में गर्मी दौड़ने लगी। दीदी का शरीर भी मेरी हर हल्की हरकत पर हलचल दे रहा था। उन्होंने अपने पैरों को और फैला दिया, इतना कि मैं आसानी से उनके और करीब बैठ सकूँ। उनके इस इशारे से मुझे और हिम्मत मिली।
अब मेरा लंड उनके नाजुक हिस्से के ऊपर रगड़ खा रहा था। कभी नोक हल्के से ऊपर की तरफ खिसक जाती, कभी नीचे। इस लगातार छूने से मेरे शरीर की धड़कन तेज़ हो रही थी। दीदी की साँसें तेज़ और भारी थी, उनके सीने का उठना-गिरना साफ दिखाई दे रहा था। उनके होंठ बार-बार काँप रहे थे, कभी वह उन्हें भींच लेती और कभी हल्का खोल देती, जैसे कुछ कहना चाह रही हों। लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आ पा रही थी।
उन्होंने चादर को कस कर पकड़ रखा था। उनकी उंगलियाँ इतनी जोर से धंसी हुई थी कि गाठें सफेद पड़ गई थी। उनके चेहरे पर गहरी लाली थी और माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थी। जब मेरी नोक बार-बार उनके उसी हिस्से से टकरा रही थी, तो उनके पूरे शरीर में हल्का-सा झटका जाता दिख रहा था। उनकी जाँघें कभी कस जाती तो कभी ढीली हो जाती।
मैं धीरे-धीरे और दबाव से टच कर रहा था ताकि वह महसूस करें कि मैं पूरी तरह उनके पास हूँ। उनकी आँखें अब ज़्यादातर बंद थी, लेकिन कभी-कभी आधी खुलती और मेरी तरफ देखने की कोशिश करती। उनकी साँसें इतनी भारी थी कि वह मेरे चेहरे तक महसूस हो रही थी। मैं उनके बहुत करीब था, मेरा सीना उनके पैरों से लगा हुआ था और मेरा लंड लगातार उनके नाज़ुक हिस्से से सटा हुआ था।
हर सेकंड लंबा और भारी लग रहा था। मैं अपनी जगह पर रुक कर भी उनके बदन की हर हलचल को महसूस कर पा रहा था। दीदी पूरी तरह तनाव और सुख के बीच फंसी हुई लग रही थी। उनके होंठों से धीरे-धीरे कराह जैसी आवाज़ें निकलने लगी, बहुत हल्की लेकिन साफ। यह सब मुझे और करीब खींच रहा था। मैंने और जोर से उन्हें टच नहीं किया, बस लगातार वही टिका रहा ताकि वह आराम से उस एहसास में खो जाएँ।
वह अब धीरे-धीरे अपने पैरों को हिलाने लगीं, जैसे खुद मुझे और पास खींच रही हों। उनका चेहरा पूरी तरह लाल हो गया था, आँखों के कोनों में हल्की नमी दिख रही थी। उनकी साँसों की आवाज़ कमरे में साफ गूँज रही थी। मैं वहीं उनके पास, उनके पैरों के बीच, अपने लंड को उनके उस हिस्से से लगा कर टिका रहा और हर छोटे-से-छोटे बदलाव को महसूस करता रहा।
उसी दौरान दीदी ने आँखें खोली, मेरे चेहरे की तरफ देखा और धीमी लेकिन साफ आवाज़ में बोलीं “अब और मत खेलो, इसे अंदर डालो।”
मैंने जैसे ही अपनी नोक उनके बीच धकेलने की कोशिश की, उन्होंने अचानक मुझे रोक लिया। उनकी उंगलियाँ मेरे सीने पर आकर टिक गई। उन्होंने गहरी सांस लेकर धीरे से कहा – “रुको… अभी मत करो। यह बहुत सूखा और टाइट है। पहले अपने लंड पर कुछ लगा लो, नहीं तो दर्द होगा।” उनकी आवाज़ गंभीर थी लेकिन उसमें चाह साफ झलक रही थी। उनकी बात सुन कर मैंने रुक कर उनकी आँखों में देखा और महसूस किया कि वह तैयार तो थी, लेकिन चाहती थी कि सब आराम से और बिना तकलीफ़ के हो।
मैंने उनकी बात सुनते ही पास रखी टेबल की तरफ देखा। उस टेबल पर दीदी का छोटा-सा मेकअप किट हमेशा रहता था। मैं तुरंत उठ कर वहां गया और धीरे से ढक्कन खोला। अंदर अलग-अलग क्रीम और लोशन की बोतलें रखी थी। मेरी नज़र एक छोटे से क्रीम के डिब्बे पर गई। मैंने उसे उठाया और हाथ में पकड़ कर पलट-पलट कर देखा। उसके अंदर हल्की-सी खुशबू वाली क्रीम थी, जो नरम और चिकनी लग रही थी।
मैंने उस डिब्बे का ढक्कन खोलते ही हल्की मीठी महक महसूस की। क्रीम उँगलियों पर लेते ही ठंडी और मुलायम लगी। मैं डिब्बा हाथ में लेकर वापस दीदी के पास आया। वह अब भी पैरों को हल्का फैला कर लेटी थी, चेहरे पर गहरी लाली और आँखों में इंतजार साफ दिखाई दे रहा था। उनके होंठ कांप रहे थे जैसे वह खुद को रोक रही हों।
मैं उनके पैरों के बीच बैठ गया। दीदी ने थोड़ा कमर उठा कर जगह बनाई ताकि मैं आसानी से उनके और करीब आ सकूँ। मैंने उँगलियों पर थोड़ी-सी क्रीम ली और पहले अपने लंड पर लगाने लगा। क्रीम की ठंडक मेरी गर्म त्वचा पर फैल गई। मैंने धीरे-धीरे नोक से लेकर नीचे तक पूरी लंबाई पर उसे फैलाया। क्रीम लगाते ही मेरा लंड और चमकदार और फिसलन वाला हो गया।
मैंने एक नजर दीदी की तरफ डाली। वह चुप-चाप मुझे देख रही थी, उनकी आँखें आधी बंद थी और चेहरे पर चाह और बेचैनी थी। मैंने एक बार फिर उँगलियों पर थोड़ी क्रीम ली और अब धीरे से उनके नाजुक हिस्से पर लगाना शुरू किया।
जैसे ही मेरी उँगलियाँ उनके उस हिस्से से टकराई, वह हल्का-सा सिहर उठी। उनकी जाँघें अपने आप कस गई और उन्होंने होंठ काट लिए। मैंने धीरे-धीरे, बहुत सावधानी से उनकी त्वचा पर क्रीम फैलाना शुरू किया। नमी और चिकनाहट उनके नाजुक हिस्से में फैलने लगी। मैंने हल्के-हल्के गोलाई में अपनी उँगलियाँ चला कर क्रीम को अंदर तक पहुँचाया। दीदी की साँसें और भारी होती जा रही थी। उनकी छाती जोर-जोर से उठ-गिर रही थी, और उन्होंने चादर को कस कर पकड़ रखा था।
उनके चेहरे पर अब हल्की-हल्की कराह की आवाजें दिखने लगी। हर बार जब मेरी उँगलियाँ उनकी नाज़ुक जगह को छूती, वह हल्की-सी काँप जातीं। मैंने ध्यान से उनके पूरे हिस्से पर क्रीम फैलाई ताकि कोई जगह सूखी ना रहे। धीरे-धीरे उनकी जाँघें थोड़ी ढीली होने लगी और उनका शरीर अब पहले की तरह सख्त नहीं लग रहा था।
अब वह और ज्यादा आराम से लेट गई, आँखें बंद कर ली और होंठों से हल्की-हल्की आवाजें निकलने लगी। उनकी सांसें मेरे कानों तक साफ पहुँच रही थी। मैंने आखिरी बार अपना लंड देखा, क्रीम से पूरी तरह फिसलन भरा और तैयार। फिर मैंने उनकी तरफ झुक कर उनके गाल को हल्के से चूमा और उनके पैरों के बीच और मजबूती से बैठ गया।
काफी देर इंतजार और तैयारी के बाद आखिरकार वह पल आने वाला था, जब मैं सच में अपनी दीदी के साथ सेक्स करने के लिए तैयार हो चुका था। मैं उनके और करीब झुका ही था कि अचानक दरवाजे पर किसी ने जोर से दस्तक दी। कमरे का सारा माहौल एक-दम से बदल गया। दीदी घबरा कर तुरंत उठने की कोशिश करने लगी और मेरी धड़कनें तेज हो गई।
दीदी ने जल्दी से हल्की आवाज़ में पूछा, “कौन है?”
बाहर से भारी और परिचित आवाज़ आई—”मैं हूँ, पापा… दरवाज़ा खोलो, तुमसे बात करनी है।”
यह सुनते ही दीदी का चेहरा और भी सफेद पड़ गया और उन्होंने मेरी तरफ डर और बेचैनी से देखा। फिर उन्होंने धीरे से जवाब दिया, “पापा… मैं अभी ठीक से कपड़े पहने हुए नहीं हूँ। थोड़ी देर में ड्रॉइंग रूम में आकर आपसे मिलती हूँ।”
पापा चुप हो गए और बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई। दीदी ने गहरी सांस ली, फिर जल्दी से चादर हटाई और पास रखे टिश्यू से अपने नाजुक हिस्से से क्रीम को साफ करने लगी। उन्होंने बड़ी सावधानी से पूरा हिस्सा पोंछा, ताकि कोई निशान ना रह जाए। इसके बाद वह तुरंत अपनी अलमारी की तरफ गई और कपड़े निकाल कर पहनने लगी।
मैं बस वहीं बैठा उन्हें देखता रहा, मन ही मन चाहता रहा कि हर पल उन्हें ऐसे ही देखता रहूँ। जब उन्होंने कपड़े पहन लिए, तो मेरी तरफ मुड़ी। चेहरे पर हल्की मुस्कान लाकर उन्होंने मेरे पास आकर मुझे एक आखिरी बार होंठों पर चूमा। वह किस्स छोटा था लेकिन उसके अंदर गहरी मोहब्बत और वादा छिपा हुआ था। फिर बिना कुछ कहे वह धीरे से दरवाज़ा खोल कर बाहर चली गई और मैं अकेला कमरे में रह गया।
मैं दीदी के बाहर जाने के बाद कुछ देर वहीं बैठा रह गया। उनकी खुशबू और उनके होंठों का अहसास अब भी मेरे साथ था। लेकिन मुझे भी जल्दी होश आया कि अगर पापा या माँ को शक हुआ तो बड़ी मुसीबत हो सकती थी। मैंने जल्दी-जल्दी चादर हटाई और उठ कर अपने कपड़े पहनने लगा। शर्ट और पैंट पहनते हुए मेरे दिमाग में बस दीदी की ही तस्वीरें घूम रही थी—कैसे उन्होंने मुझे आखिरी बार चूमा और फिर बाहर चली गई।
कपड़े पहनने के बाद मैंने आईने में खुद को देखा। चेहरे पर अब भी लालिमा थी और आँखों में चाह साफ झलक रही थी। मैं सोच रहा था कि काश मैं भी उनके पीछे बाहर जाता, लेकिन फिर ध्यान आया कि मैं अक्सर देर तक सोया रहता हूँ। अगर अचानक अभी बाहर गया तो पापा-मम्मी को शक हो सकता है कि मैं दीदी के कमरे में क्यों था।
इसी सोच में मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला और अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। मेरे कदम हल्के थे ताकि कोई आवाज़ ना हो। कमरे में पहुँचकर मैंने दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर गिर गया। दिल अब भी तेजी से धड़क रहा था और दिमाग में वही लम्हे बार-बार दोहराए जा रहे थे। मैं बस यही चाहता था कि यह सब कभी खत्म न हो और हर रोज़ मुझे ऐसे ही दीदी के साथ पल बिताने को मिले।
करीब तीन घंटे बाद, सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी। मैं उठा और सोचने लगा कि आखिर पापा सुबह-सुबह दीदी से क्या बात करना चाहते थे। दीदी अभी ड्रॉइंग रूम में हैं, लेकिन मैं कुछ अंदाजा लगाना चाहता था। मैंने कपड़े पहन लिए और धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, ताकि घर में किसी को भी मेरी आवाज़ सुनाई ना दे। मेरा मन बेचैन था, और हर कदम पर मैं सोच रहा था कि क्या सच में कुछ गंभीर बात हो सकती थी, या बस मामूली कोई चर्चा।
नीचे पहुँचते ही मैंने देखा कि घर में सुबह की हल्की हलचल हो रही थी। पापा अपने ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे, कपड़े पहन रहे थे और जल्दी में थे। माँ रसोई में थी, चाय बना रही थी और खाने के लिए कुछ तैयार कर रही थी। दीदी अभी बाथरूम में थी, शायद जल्दी से तैयार हो रही थी। घर में सब कुछ आम लग रहा था, लेकिन मैं यह जानने के लिए और भी चौकस हो गया कि पापा ने सुबह-सुबह दीदी को क्यों बुलाया था।
मैंने धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठ गया और चाय का कप उठाया। चाय पीते-पीते मैं अपनी सोच में खो गया, और मन ही मन योजना बना रहा था कि आगे क्या करना था। पापा जल्दी में तैयार होकर घर से बाहर निकल गए और माँ रसोई में ही काम कर रही थी। अब मेरे लिए मौका था कि मैं देखूं कि दीदी बाथरूम में क्या कर रही थी। मैं चुप-चाप बाथरूम के पास गया, हर कदम बहुत आराम से रखा ताकि कोई आवाज़ ना हो और किसी का ध्यान मुझ पर ना जाए।
बाथरूम के बाहर खड़े होकर मैंने धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी। भीतर से दीदी की आवाज़ आई, “कौन है?”
मैंने हल्की हिचकिचाहट के साथ कहा, “दीदी, यह मैं हूँ, गोलू।”
कुछ पल चुप्पी रही, फिर धीरे से कुंडी खुली। दीदी ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर आने का इशारा किया। मैंने आस-पास देखा और फिर चुप-चाप अंदर चला गया।
अंदर भाप और पानी की हल्की-हल्की बूंदों की खुशबू थी। शॉवर चल रहा था और उससे उठती नमी पूरे बाथरूम में फैली हुई थी। दीदी के गीले बाल उनकी पीठ और गालों से चिपके हुए थे, और उनके चेहरे पर चमकती बूंदें किसी मोती की तरह दमक रही थी। उनकी आँखों में हल्की सी हैरानी और मुस्कान थी, जैसे अचानक मुझे देख कर वो थोड़ा चौंक भी गई और सहज भी रही।
शॉवर की धार से उनका पूरा बदन ढका हुआ था, पानी की लहरें उनकी त्वचा पर फिसलती हुई बह रही थी। उस पल में उनकी भीगी हुई सूरत और खुशी भरा अंदाज़ इतना खास लग रहा था कि मानो समय ठहर गया हो। मैंने चुप-चाप सांस रोक कर उन्हें देखा, और माहौल में सिर्फ पानी की गिरती आवाज़ और हमारी चुप्पी गूंज रही थी।
दीदी ने धीरे से कहा, “गोलू… तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” उनकी आवाज़ में हैरानी थी।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं बस उनके करीब गया। उस पल में हमारे बीच की दूरी बहुत छोटी रह गई थी। उनके होंठों पर हल्की थरथराहट थी, और मेरी सांसें उनके चेहरे को छू रही थी। धीरे-धीरे मैंने उनका हाथ थाम लिया और बिना कुछ कहे उन्हें अपने पास खींच लिया। हमारी नज़रों ने जैसे ही एक-दूसरे को पकड़ा, हर सवाल और हर जवाब उसी खामोशी में छिप गया।
फिर मैंने झुक कर उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह पल बहुत कोमल था—ना तो जल्दी, ना ही कोई दबाव। बस एक सहज अहसास, जैसे सारी दुनिया थम गई हो और हम दोनों उस एक छोटे से पल में खो गए हों।
दीदी पहले तो थोड़ी चौंकीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी साँसें भी मेरे साथ मिल गई। भाप और पानी की महक के बीच यह खामोश लम्हा हमारे बीच एक अनोखी डोर बाँध गया।
हम दोनों बिल्कुल करीब खड़े थे। मैंने धीरे से उसके होंठों को छुआ, जैसे हल्का सा टेस्ट ले रहा हूँ। शुरुआत में बस हल्की सी टच थी, लेकिन उस छोटे से पल में भी मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसकी साँसें मेरे गाल पर गर्माहट छोड़ रही थी और होंठों पर उसका हल्का सा कांपना मुझे साफ़ महसूस हो रहा था।
कुछ सेकंड के लिए वो रुकी, फिर आँखें बंद करके और पास आ गई। इस बार हमारे होंठ पूरी तरह से मिले। गीले और मुलायम होंठ जब आपस में दबे, तो एहसास और गहरा हो गया। मेरा दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था, और वो भी बिना किसी झिझक के उसी पल में खो गई थी।
हम बार-बार अलग होते और फिर धीरे से एक-दूसरे को चूमते। हर बार का स्पर्श पिछले से ज्यादा साफ़ और गहरा था। अब उसके चेहरे पर कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बस एक सीधी-सी मुस्कान और उसकी बंद आँखें, जैसे वो पूरी तरह से इस पल में डूबी हो।
शॉवर का पानी हमारे चेहरों पर गिर रहा था, बूंदें होंठों पर भी महसूस हो रही थी। लेकिन इन सबके बीच हमारी किस साफ़, गहरी और सच्ची लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया में सिर्फ हम दोनों रह गए हों।
मैंने उसे उसी दौरान अपनी बाँहों में कस कर थाम लिया। पानी की धार के बीच उसका भीगा हुआ बदन मेरे सीने से चिपक गया। वो भी हल्के से मेरे कंधे पर झुक गई, और हमारी किस्स और गहरी हो गई। उसका चेहरा मेरे हाथों के बीच आराम से था और मैं उसे जितना पास कर सकता था, उतना अपने पास खींच रहा था। शॉवर का पानी हमारे चेहरों पर गिर रहा था, बूंदें होंठों पर भी महसूस हो रही थी। लेकिन इन सबके बीच हमारी किस्स और हमारी गहरी झप्पी, दोनों साथ-साथ चल रही थी।
फिर अचानक मैंने हल्के से उसके होंठों से दूरी बनाई। उसने आँखें खोली और मुझे सवाल भरी नज़रों से देखा। मैंने धीरे से पूछा, “वैसे… सुबह पापा ने तुम्हें क्यों बुलाया था?”
ये सुन कर उसने खुद को मेरी बाहों से अलग किया और तुरंत शॉवर बंद कर दिया। कुछ पल के लिए चुप खड़ी रही, फिर धीमी आवाज़ में बोली, “उस दिन शादी में पापा की मुलाकात एक फैमिली से हुई थी। उन्हें मैं अच्छी लगी… और आज वो फैमिली मुझे देखने हमारे घर आने वाली है। वह रिश्ता देखने के लिए आ रहे हैं।”
मैं कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। अभी कुछ सेकंड पहले हम दोनों किस में खोए हुए थे और अब अचानक शादी की बात सामने आ गई। मैं उलझन में उसकी तरफ देखने लगा, फिर धीरे से बोला, “ये सब तो बस एक फॉर्मेलिटी है ना? तुम उस लड़के से शादी करने वाली तो नहीं हो… है ना?”
वो थोड़ी देर के लिए चुप रही, फिर गंभीर होते हुए बोली, “अगर मम्मी-पापा को वो फैमिली पसंद है, तो मैं मना नहीं कर सकती।”
फिर उसने तौलिये में अपने आप को लपेट लिया। भीगे बाल उसके कंधों पर गिर रहे थे और उसके चेहरे पर अभी-अभी का शावर का असर साफ दिख रहा था। तौलिये की हल्की पट्टी उसके बदन पर ढकी हुई थी, लेकिन उसकी छाती का हल्का आकार और सीने के बीच की रेखा थोड़ी दिखाई दे रही थी। उसकी आँखों में खेल और थोड़ी मस्ती थी, और हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर अब भी थी। शावर के बाद उसकी ताजगी और नमी उसके पूरे अंदाज़ में झलक रही थी, और तौलिये के पीछे से उसके हल्के झुकाव और कंधों की हरकतें उसे और भी ध्यान देने लायक बना रही थी
कुछ पल बाद वह बाथरूम से बाहर निकली। मैं चुप-चाप खड़ा रह कर उसे निकलते देख रहा था। उसकी चाल में हल्की लचक थी, और तौलिये के पीछे से उसकी पीठ और पीछे का हल्का आकार दिखाई दे रहा था। उसके पीछे का हिस्सा तौलिये में ढका हुआ था, लेकिन हर हल्की झुकाव और कदम की गति के साथ उसकी पीठ की रेखा और पिछले हिस्से की हल्की गति भी झलक रही थी। वह धीरे-धीरे कमरे की तरफ बढ़ गई, और मैं बस वहीं खड़ा रह गया, उसकी चाल, मूड और हर हल्की हरकत को ध्यान से देखते हुए।
To be continued