मासी का घर
अध्याय 3.5 – प्रस्ताव
घर पर पहुंचने के बाद, विशाखा कुछ कहे बिना ही अपने कमरे में चली गई और में वही हॉल में सोफे पर अपना मोबाइल चलाते हुए बैठ गया। ऐसा नहीं था कि जो हुआ था मैं उसे भुला चुका था, मैं समझ नहीं पा रहा था कि विशाखा के मन क्या चल रहा है।
हम दोनों काफी अच्छे से घूमे, काफी बातें की लेकिन जो उसने आखिर में किया इसका उद्देश्य क्या था। उसके ओठों के स्पर्श से जो मेरे गालों को महसूस हुआ था वह उसके ओठों के हटने के बाद भी, अभी तक हो रहा था।
मैं मोबाइल चला ही रहा था तभी मेरी मासी उनके कमरे से निकल कर हॉल में आती है। वे मेरे सामने ही अपने कमर पर हाथों को रखें, मेरी ओर देखती हुई खड़ी थी मगर विशाखा की उस हरकत के विचारों में मैं डूबा हुआ था।


मासी ने मुझे कुछ देर ऐसे ही देखा और फिर मेरे बाजू में आकर बैठ गई, एकदम सट के। में काफी देर से एक ही वीडियो देख रहा था।
मासी: “फोन छोड़ो जरा… आंखें खराब हो जाएगी।”
मेरा ध्यान एकदम से मासी की ओर गया। फिर में सारे विचार छोड़ कर मासी से बात करने लगा,
मैं: “अरे मासी, वैसे भी जिंदगी में कुछ मजा नहीं है, फोन ही एक सहारा है।”
मासी: “हां, और लोग बोरिंग लगते है न?”
मैं: “आप तो कभी बोरिंग हो ही नहीं सकती, सिर्फ सब अपने अपने कामों में व्यस्त है।”
मासी: “और बताओ कॉलेज कैसा चल रहा है तुम्हारा, पढ़ाई के अलावा और कुछ भी करती हो या सिर्फ मोबाइल से चिपके रहते हो।”
मैं: “पढ़ाई तो चल रही है, उसके अलावा इवेंट्स में भी पार्टिसिपेट कर लेता हूं, अच्छा खासा टाइमपास होता है।”
मासी: “अरे वाह, किन किन चीजों में पार्टिसिपेट किया था?”
मैं: “अपना तो स्पोर्ट्स ही है, और कभी कभी पेंटिंग कंपटीशन में भी हिस्सा ले लेता हूं।”
ऐसे ही हमारी काफी बातें हुई, सूरज ढलने लगा और अंधेरा बढ़ने लगा। मासी और मेरी काफी अच्छी जमती है, वे मुझसे काफी मजाकिया स्वभाव से बातें करती है। मासी से लंबी देर तक बातें करने के बाद मैं अपने कमरे में जाने लगा।
जाते जाते मुझे विशाखा के कमरे का दरवाजा खुला हुआ नजर आया। मैं उसके साथ उस विषय बात करना चाहता था। मैं उसके दरवाजे पर खड़ा हो गया। वह दरवाजे के ओर ही देख रही थी। मैने कहा,
मैं: “विशाखा… जो तालाब के किनारे हुआ उसका मतलब क्या था।”
विशाखा आगे बढ़ी और दरवाजे को बंद करते हुए हल्की आवाज में बोली,
विशाखा: “खुद समझ जाओ!”
मैं फिर से सोच में चला गया। सोचते सोचते मैं अपने कमरे में आ गया। मैं अपने सिर को खुजा ही रहा था कि पीछे विशाखा की से वह आई।
विशाखा: “बुद्धू!”
मैं पीछे मुड़ा। वह मेरे नज़दीक आई और मेरे आंखों में देखने लगी।
विशाखा: “बचपन से ही तुम मुझे काफी पसंद हो। विशाल, तुम मेरे crush हो। मैं तुम्हे काफी ज्यादा पसंद करती हूं।”
ऐसा कह कर वह भाग कर अपने कमरे में चली गई। मैं शर्म से लाल हो चुका था। फिर में बिस्तर पर लेट गया और पता नहीं कब मेरी आंख लग गई।
मैं जब उठा तो खाने का समय हो चुका था। मैं नीचे गया तो विशाखा डायनिंग टेबल पर बैठी हुई थी और मासी खाना लगा रही थी। मैं विशाखा के बाजू में जाकर बैठ गया। उसने उसके बाद के शब्द नहीं
कहा था। मेरी मासी भी बैठ गई और हम खाना खाने लगे।