कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 90

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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मैने बिना वक्त गंवाए अपना सामान पैक किया और बाहर निकल गया. सारे परिजन बेबसी से दर्शक बने खड़े रह गए.

मै दरवाजे पर खड़ा था और रिंकी मेरी बाइक के पीछे खड़ी थी। कुछ बोलने से पहले ही हम दोनों नजदीक आकर खड़े हो गये। मैंने देखा, उसके चेहरे पर गजब की ताजगी और आत्मसंतुष्टि थी। उसके मन में दादाजी (मेरे पिता) के प्रति कोई मैल भाव नहीं था। वो खुद को भी एक बदचलन लड़की नहीं मानती थी। अपनी मम्मी के लिए भी उसके मन में कोई बैर भाव नहीं था। परिस्थितियां ही ऐसी बन गई थीं कि सब घालमेल हो गया था।

उसके भीतर एक आत्ममंथन चल रहा था कि मैने उसे टोक दिया-‘ रिंकी, क्या सोच रही हो?

‘कुछ खास नही, पापा।’ मैं सोच रही थी-‘अब मैं इस प्यार और लगाव को क्या कहूं? कैसे यह कह दूं, कि मै बदचलन हूँ या मेरे पापा चरित्रहीन हैं? मुझे एक साथ इतने सारे लोग प्यार करने वाले मिले हैं। मेरे लिए तो सभी अच्छे हैं। यह कहते हुए उसने मेरी ओर देखा तो मै उससे आंखें मिला न सका!

कुछ पल की चुप्पी के बाद वो बोली-‘पापा, तुम मम्मी के लिए या दुनिया के लिए जैसे भी हो लेकिन मेरे लिए तो सिर्फ मेरे सबसे अच्छे पापा हो और मम्मी से जो खुशी तुम्हे मिलनी चाहिए थी वो हर खुशी मै तुमको दूंगी.

‘मैं रिंकी के आशय को समझ गया था, उसका इशारा हमारे इस नाजायज रिंश्ते को जायज बना कर एक नया नाम देने की तरफ था “

मै उससे बोला.. ‘मै जानता हूं रिंकी, जैसे ही कुसुम से मेरा तलाक़ होगा हम जल्द ही शादी कर अपने इस रिश्ते को एक नई शुरवात करेंगे’ यह सुनते ही उसने मुझे अपने गले से लगा लिया।

मै बिना ये सोचे समझे कि अपनी जिस पत्नी को मै तलाक़ देकर पीछा छुड़ाने की बात कर रहा हूँ वो 4-5 महीने की गर्भ से थी, और मै कुछ महीनों में पिता बनने वाला हू. रिंकी के मोहजाल में फंसा मै इस बार उसे छोड़ने अपने ससुराल नहीं गया । मै और रिंकी कहीं दूर जाकर बस गए।

दूसरी तरफ एकएक कर के सब घर वाले कुसुम को तसल्ली दे कर चले गए उसकी बहनो को छोड़ कर. बहने भी कब तक रुकती, दो तीन दिन होते होते वह भी चली गयी.

औफिस वालों का बहुत सहयोग कुसुम को मिल रहा था. उसके सीनियर विभाग से बाहर के विभागों की मीटिंग में कुसुम को वे नहीं भेजते. 6-7 महीने की गर्भास्था के दौरान औफिस और घर को संभालना कुसुम के लिए आसान नहीं था. कुसुम शारीरिक रूप से कम मानसिक रूप से ज्यादा थक गई थी. सचाई यह थी कि वह सास ससुर के साथ होने के बाबजूद नितांत अकेली थी.

 ऐसा नहीं कि उस को अपने पति अरुण की कमी नहीं खलती थी. कई बार एक अजीब सा अकेलापन उस को डसने लग जाता. रात को जरा सी आहट से डर और घबराहट से आंख खुल जाती थी. थकाहारा शरीर पुरूष के स्नेहसिक्त स्पर्श और मजबूत बांहों के लिए तरस रहा था जिस के सुरक्षित घेरे में वह एक निश्चिंतताभरी नींद सो सके. रात भर बस वो यही गाना गुनगुनाती 👇

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दूसरी तरफ उस दिन के बाद तो मै जैसे अपने घर को भूल ही गया. ऐसा कभी मेरे साथ भी हो सकता था ये मैने कभी सोचा नही था. वकील की सलाह मशविरा के बाद मैने कुसुम के ऊपर झूठा मुकदमा दर्ज कराया, मैने कुसुम की चरित्रहीनता का तो कुसुम ने मेरे खिलाफ सिर्फ घरेलू हिंसा, मारपीट का मामला दर्ज कराया।

आपसी सहमति से तलाक मिलने में ज्यादा समय न लगा. और 7-8 महीने के बाद ही हमें तलाक़ मिल गया इन 7-8 महीनों के बीतते बीतते कुसुम ने एक प्यारे से बेटे को जनम दिया.

वह दिन अच्छे से याद है मुझको जब कोर्ट ने हमारे तलाक पर मुहर लगाई थी. हम दोनों पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी। दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।

यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के परिजन एक ही टी-स्टॉल पर बैठे थे , यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि हम दोनों तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और हम दोनों .

”कांग्रेच्यूलेशन …. आप जो चाहते थे वही हुआ ….” कुसुम ने कहा।

”तुम्हें भी बधाई ….. तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ….” मै बोला।

”तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????” कुसुम ने पूछा।

”तुम बताओ?”

मेरे पूछने पर कुसुम ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ”तुमने मेरे खिलाफ चरित्रहीन पत्नी का मुकदमा दर्ज किया था….अच्छा हुआ…. अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।”

”वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था” ”मै जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है… तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, ” मै बोला।

कुसुम चुप रही, न दुःख, न गुस्सा। उसने एक बार मुझ को देखा।

कुछ पल चुप रहने के बाद मैने गहरी साँस ली और कहा, ”तुमने भी तो मेरे खिलाफ मारपीट वाला मुकदमा दर्ज किया था।”

” झूठा किया था”…. कुसुम बोली

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोली, ”मैं अगर तुम्हारा सच कोर्ट में बताती तो अभी तुम यहा नही जेल में होते… हम दोनों को एक दूसरे से अलग होना था सो हो गये बस अब यही सच है….!

प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।

कुसुम ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय उस के उंगलियों पर गिरी।

स्सी… की आवाज़ निकली।

मेरे गले में उसी क्षण ‘ओह’ की आवाज़ निकली। कुसुम ने मुझको देखा। मै उसी को देखे जा रहा था।

”तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?”

”ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,” कुसुम ने बात खत्म करनी चाही।

”तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।” मैने कहा तो कुसुम फीकी हँसी हँस दी।

चाय की पहली चुस्की लेने के बाद मै कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ”तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।”

”चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,” ”वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहना, ” बेटा बड़ा होगा … सौ खर्च होते हैं….” हमारे बेटे को आँचल में छिपाते हुए कुसुम ने कहा।

उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

मै उसका चेहरा देखता रहा….कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी मेरी पत्नी हुआ करती थी। मैं अपनी मर्दानगी, वासना, हवस के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।”

कुसुम भी मुझ को देख रही थी और सोच रही थी, ”कितना सरल स्वभाव का है यह आदमी, जो कभी मेरा पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था मुझसे…!

दोनों चुप थे, बेहद चुप।

दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश। दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे….!

”मुझे एक बात कहनी है, ”  आवाज़ में झिझक थी।

”कहो, ” कुसुम ने नजल आँखों से मुझे देखा।

”डरता हूँ,” मैने कहा।

”डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,” कुसुम ने कहा।

”तुम बहुत याद आती रही,” मै बोला।

”तुम भी,” कुसुम ने कहा।

”मैं तुम्हें अब भी प्यार करता हूँ।”

”मैं भी.” कुसुम ने कहा।

हम दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं। दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।

”क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?” मैने पूछा।

”कौन-सा मोड़?”

”हम फिर से साथ-साथ रहने लगें… एक साथ… पति-पत्नी ना सही तो… बहुत अच्छे दोस्त बन कर।”

”और ये……?” दूर मोटर साइकिल के पास खड़ी रिंकी की ओर इशारा करते हुए कुसुम ने पूछा।

उस दिन रिंकी भी मौजूद थी. उस के चेहरे पर खिंची विद्रूप विजयी मुसकान कुसुम के दिल को छलनी कर रही थी….!

मेरे पास कुसुम की बात का कोई जबाब न था, मै उठा कुसुम के पास आया और अपने प्यारे से बेटे को उसकी गोदी में से उठाने की कोशिश की. कुसुम ने एकदम से मेरे बेटे को अपनी बांहों में जकड़ कर कठोर शब्दों में बोली, ‘ मेरे बेटे को छूने की भी हिम्मत मत करना.’ और तेज कदमों से उस को ले कर चली गई. मै देखता ही रह गया.

शायद कुसुम को मेरा अपनी खुद की औलाद के लिए तड़पना सुकून सा दे रहा था. मैने जो उस के साथ विश्वासघात किया था, बिना उस की किसी गलती के उस को जो वेदना दी थी, उस की यह सजा तो मुझ को मिलनी ही चाहिए थी.

जारी है….. ✍🏻

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