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यह हो ही नहीं सकता कि कोई बच्चा अपनी मां को धोखा दे । पर कुसुम गलत थी उसे पता ही नहीं था कि उसकी बेटी उसकी सौतन बनने का ख्वाब सजाये थी. यह सब देख कुसुम आगबबूला हो गई…..! 

उस ने मुझ को जोर से चिल्लाकर कर अपने पास बुला कर मुझे मोबाइल में फोटो दिखाते हुए बोली… 

‘‘ मेरी बेटी की जिंदगी बरबाद कर के तुम्हे गुलछर्रे नहीं उड़ाने दूंगी अरुण कुमार। मै तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर दूंगी. तुम अभी मुझे जानते नहीं हो…???

मेरे पाप की लंका का दहन हो चुका था, और इस वक्त की परिस्थिति की नाजुकता का अंदाज़ा होने लगा. ‘पता नहीं अब क्या होगा?? यह चंद फोटो मेरी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी पर भारी पड़ गयी…!साली ये फोटो मैने डिलीट क्यों नही की थी। यह मेरे दिमाग़ में क्यों नहीं आया.??’ मै अपनी हार पर निराशा और कुसुम के भय से भयभीत हो रहा था…. हे भगवान मेरी भी मत मारी गयी थी, जो ये फोटो मैने मोबाइल में सहेजे हुए थे। इन फोटो ने तो मुझे बर्बाद कर के ही छोड़ा।

अब गूँगे की तरह खड़े रहोगे या मुह से कुछ बकोगे भी….??? अरुण मुझे सिर्फ सच सुनना आखिर क्या है ये सब….???? 

कुसुम की कर्कश आवाज मेरे कानों में एक बार फिर से गूंजी। 

मै बिस्तर पर बैठ गया, मेरा सिर झुका हुआ था लेकिन मैने अब तक हार नही मानी थी। और मैने सारी सच्चाई बड़े धेर्य के साथ विस्तारपूर्वक कुसुम को बताना शुरू किया। 

कुसुम शायद तुम नहीं समझोगी मेरे प्यार और हवस के भेद को क्योंकि जो मेरा है, उसकी समझ भी तो मेरी है न, तुम्हारी नज़रों का, सोच का, मैं क्या कर सकता हूं भला।

मैं जब एक बेटी की तरह रिंकी को दुलारता हूं इसका मतलब ये नहीं की हवस से वसीभूत हूं मैं, इसका मतलब ये है की मुझे सच में उसे दुलारना होता है, अपनी सगी बेटी की तरह निश्चल भाव से…… मैं जब उससे लिपटता हूं दुलारते वक्त, या फिर बात करते वक्त, तो वो हवस नहीं बस एक सुकून होता है मेरे लिए, जो ये एहसास कराता है की, हां मेरी बेटी मेरे पास है पर सोच तुम्हारी, मेरे एहसासों को हवस तक ले के जा रही है। 

मैं जब उसे अधिकांश वक्त चूमता हूं माथे पे, होंठो पे या गालों पे तो ये भी मेरी हवस नहीं होती पर तुम मानती हो और चाहती हो की मैं भी इसे मानू की ये मेरी हवस हैं लेकिन सच कहूं वो मेरी हवस नहीं होती वो बस अपना प्यार जाहिर करने का तरीका मात्र है, 

ये सारे फोटो और वीडियो मेरी बेटी रिंकी के साथ मेरे उसी प्यार, दुलार, लाड़ की निशानी है। ठीक जिस तरह जब एक माँ अपने बेटे को खुद से लपेट कर आँचल में समेट कर आगोश में लेती है तो उस वक्त सिर्फ माँ के ह्रदय में ममता के भाव ही होते है, ठीक मेरा भी अपनी बेटी के साथ इस तरह लिपटना, उसे आलिंगन करना सिर्फ और सिर्फ बाप की बापता का ही भाव है। 

चलो अपनी बेटी से प्यार के बारे में मैंने बता दिया अब मै थोड़ा हवस के बारे में बात कर लेता हू । हवस होती है जो किसी परस्त्री पर गलत तरीके से डाली गयी नजर, ना की अपनी बेटी पर डाली गयी निगाह, अगर मेरी बात तुम तक, तुम्हारे दिल दिमाग तक पहुंचे तब तुम समझोगी प्रेम की अधिकता आसक्ति की वजह होती है, और आसक्ति की अधिकता हवस को जन्म देती है, और अपनी बेटी के साथ प्यार करना हवस नहीं होती है, आसक्ति की भावना से प्रेरित परस्त्री से प्यार हवस होती है।

“मेरी नीयत में बेशक फरेब था. लेकिन मैने जो कहा, वह सोलह आने सच था.”……! 

मुझे नही पता उसे मेरे कहे शब्दों के मायने ठीक से समझ आये या नही। लेकिन मेरा छोड़ा गया शब्दों का तीर कहीं ना कही कुसुम के दिल दिमाग में सही निशाने पर लगा था। अब इस वक्त मुझे उसके मुख से बस अगले निकलने शब्दों का इंतजार था। 

मेरी बात सुन कर कुसुम सोच में डूब गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इन चंद बाप बेटी के फोटो की वजह से अनायास जो स्थिति बन गई है, उससे कैसे निपटा जाए.

कुसुम का गुस्सा भी अब शांत हो कर सुस्त पड़ गया था. कुछ देर खामोश बैठी रहने के बाद वो उठ कर दबे पाँव बेडरूम के दरवाज़े के पास गयी. वो कुछ पल खड़ी खड़ी सोचती रही और फिर वापस बिस्तर पर आ कर बैठ गयी. और रिंकी को फोन लगाने लगी। 

ये देख मै डर गया ‘कहीं रिंकी ने कुसुम के सामने मुँह खोल दिया, तो मैं तो कहीं का नहीं रहूँगा…’

 कुसुम ने रिंकी को फोन कर के सिर्फ उसके वापस आने का समय पूछा ??? और फोन काट दिया। काफी सोचविचार के बाद कुसुम ने मुझ को इस हिदायत के साथ साफ साफ दो टूक शब्दों में कहा कि मै कभी भी उसकी बेटी रिंकी पर बुरी नजर नहीं डालूँगा ! यह बात कुसुम ने अपने तक सीमित रखी । 

उसी रात जब कुसुम आकर मेरे बगल में लेटी तो सो मैने उसको कुछ सुख देने का सोचा, लेकिन एक दो बार जब कुसुम ने मेरे उकसावे का जवाब नहीं दिया तो मै चुपचाप लेट कर सोने लगा. 

“ऐसा नहीं है कि कुसुम मुझ से प्यार नहीं करती. मगर कई बार रिश्तों में ऐसे मोड़ आते हैं,तब रिश्ते भार बन जाते हैं और मन में खालीपन घर कर जाता है. कुसुम की जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही दौर आया था. और जिंदगी में एक नया अध्याय जुड़ने लगा था.”

एक बात जो मैं आसानी से महसूस कर सकता था, वह यह कि मेरी बीवी कुसुम की खोजी निगाहें अब शायद मुझ पर ज्यादा गहरी रहने लगी थीं. मेरे अंदर चल रही भावनात्मक उथलपुथल और अनकही दास्तान का जैसे उसे एहसास हो चला था. यहां तक कि यदाकदा वह मेरे मोबाइल भी चैक करने लगी थी. 

उस दिन के बाद मैंने कभी भी कुसुम से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की. न ही कुसुम ने कुछ कहा. मगर उस की शक करने और मुझ पर नजर रखने की आदत बरकरार रही. 

मेरी मम्मी भी कुसुम की उदासी का कारण नही जान पायी। जब वो कभी उससे उदासी की वजह पूछती तो कुसुम बस नौकरी और काम का बहाना बना देती. मोबाइल की फोटो वाली घटना के बाद से ही कुसुम ने मेरे साथ कभी भी शारीरिक संम्बंध नहीं बनाए थे। हालांकि पहले भी कुसुम की अन्य शहर में नौकरी के कारण हम दोनों 15 दिन में एक या दो बार ही सेक्स करते थे पर अब तो वो भी बिल्कुल बन्द हो चुका था। मै अपनी तरफ से भी कभी कोशिश करता तो भी कुसुम का ठंडा रेस्पांस देखकर मै भी ठंडा हो जाता.. उस फोटो कांड के बाद मेरा सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि अब कुसुम पहले जैसी हसमुंख इंसान नही रही थी, ना जाने दिल में कौनसी चोट खाये बैठी थी…! 

उधर रिंकी की जिंदगी में पापा के प्यार की बगिया बखूबी खिलने लगी थी. वो मैसेज व शायरी के साथ साथ अब रोमांटिक वीडियोज और चटपटे जोक्स भी शेयर करने लगी थी. कभी कभी मुझे चिंता होती कि मैं इन्हें देखते वक्त इतना घबराया हुआ सा क्यों रहता हूं? निश्चिंत हो कर इन का आनंद क्यों नहीं उठा पाता? जाहिर है, चोरी छिपे कुछ किया जाए तो मन में घबराहट तो होती ही है और वही मेरे साथ भी होता था. आखिर कहीं न कहीं मैं अपनी बीवी से धोखा ही तो कर रहा था. इस बात का अपराधबोध तो मुझे था ही. 

अब तो समय के साथ रिंकी की हिमाकतें और भी बढ़ने लगी थीं. मैं भी बहता जा रहा था. एक अजीब सा जनून था जिंदगी में. वैसे कभी कभी मुझे ऐसा लगता जैसे यह सब बिलकुल सही नहीं. इधर कुसुम को धोखा देने का अपराधबोध तो दूसरी तरफ रिंकी का बढ़ता आकर्षण. मैं न चाहते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पा रहा था 

एक दिन रिंकी ने मुझे एक रोमांटिक सा वीडियो शेयर किया और तभी कुसुम भी बड़े गौर से मुझे देखती हुई गुजरी. मैं चुपके से अपना मोबाइल ले कर बाहर बालकनी में आ गया. वीडियो डाउनलोड कर इधर उधर देखने लगा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा. जब निश्चिंत हो गया कि कुसुम आसपास नहीं है, तो वीडियो का आनंद लेने लगा. उस वक्त मुझे अंदर से एक अजीब सा रोमांटिक एहसास हुआ. उस समय अपनी बेटी रिंकी को बांहों में भरने की तमन्ना भी हुई मगर तुरंत स्वयं को संयमित करता हुआ अंदर आ गया.

कुसुम की अनुभवी निगाहें मुझ पर टिकी थीं. निगाहें चुराता हुआ मैं लैपटौप खोल कर बैठ गया. मुझे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? मन का एक कोना एक अनजान से अपराधबोध से घिर गया. क्या मैं यह ठीक कर रहा हूं? मैंने कुसुम की तरफ देखा.

कुसुम सामने उदास सी बैठी थी, जैसे उसे मेरे मन में चल रही उथलपुथल का एहसास हो गया था. अचानक वह पास आ कर बोली, ‘‘ मैने काफी सोच विचार कर एक फैसला लिया है कि “रिंकी को अपनी नानी के घर रहना चाहिए, उसकी नानी, जूली की शादी के बाद अब बिल्कुल अकेली पड़ गयी हैं, वहा उनके साथ रहेगी थोड़ा गृहशथि के काम मे हाथ बटायेगी, उसका कॉलेज भी नानी के घर के ही पास है “

(शायद कुसुम का दिमागी तर्क था कि उसकी बेटी नानी के घर जा कर वह हर वक़्त उसके पति का सामना करने से बच सकेगी, उसे अब बाप बेटी की हँसी ठिठोली फूटी आँख नहीं सुहाती थी! कुसुम ने ये भी ठान लिया था कि अगर रिंकी ने नानी के घर जाने मे जरा सी भी आना कानी की तो वह जहर उगलने में एक पल की भी देरी नहीं करेगी) 

कुसुम की उदासी व रिंकी के दूर होने का एहसास मुझे अंदर तक द्रवित कर गया. ऐसा लगा जैसे रिंकी को बरगलाने मे मेरा ही हाथ है, और मैं ही उस का दोषी हूं. अजीब सी कशमकश में घिरा मैं सो गया. सुबह उठा तो मन शांत था मेरा.

मेरी हालत थोड़ी अजीब सी थी. रिंकी की जुदाई की पीड़ा लफ़्ज़ों में भी बयान नही की जा सकती. एक तरफ तो मैं आज नौकरी पर नही जाना चाहता था क्योंकि कुसुम ने मेरे साले को रिंकी को ले जाने के लिए बुलाया था और मै उसे अपने घर में 

 कयि महीनों बल्कि कयि सालों तक अपने पास रखना चाहता था. मगर ऐसा संभव तो नही था.

मै उस दिन अपनी नौकरी पर चला तो गया पर अपना दिल अपना चैन सब कुछ रिंकी के पास रख गया । रिंकी का भी यही हाल था । वह भी बेचैनी का अनुभव करती रही ।

कुसुम ने भी अपना इरादा पक्का कर लिया था, उसने सोचा तो था कि अगर घर में किसी ने मुझे रिंकी को अचानक से उसकी नानी के घर भेजने का कारण पूछा तो वह सास ससुर ( मेरी मम्मी पापा) को सब सच-सच बोल देगी, लेकिन जब उसने घर पर उसके फैसले पर किसी को कोई ऐतराज ना करते हुए देखा तो उस से कुछ कहते न बना. और बात टलते-टलते टल गयी. 

कुसुम को एक और बात भी खल रही थी, उसके मायके की आर्थिक हालत सही नही है, तो उसे ही रिंकी की पढाई और अन्य खर्चे के साथ-साथ मायके में माँ-बाप, भाई के खर्चा के लिए भी पैसा भेजना पड़ेगा. परंतु इस बात पर काफ़ी गहरायी से सोचने के बाद  ” अगर उसका पैसा ख़र्च होता भी है तो अब उसे फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए, यह उसका फर्ज था बस उसकी बेटी उसके पति से दूर रहे, भले ही इसके लिए उसका ज्यादा ख़र्चा हो रहा हो.”

दोपहर के खाना के बाद, रिंकी के नानी के घर जाने का समय आ गया. कुसुम ने साले की जिद करने के बाबजूद अपने आप ही उसके साथ जाना यह कह कर टाल दिया कि ऑफ़िस में पहले ही काफ़ी काम बाक़ी पड़ा है, सो वो अभी नहीं जा सकेगी. इसी तरह, कुछ अपनों का प्यार और कुछ अपने कल के बुरे अनुभवों से बाहर निकलने के सपने लिए रिंकी नानी के घर के लिए रवाना हो गयी.

उसी शाम को……! मुझे घर जाने की जल्दबाज़ी भी हो रही थी, जैसे जैसे घर नज़दीक आता जा रहा था मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी. मैं अपने मन को तस्सली दे रहा था कि शायद किसी वजह से कुसुम ने रिंकी को नानी के घर भेजने का फैसला बदल दिया हो….! 

मै जब घर में दाखिल हुआ तो देखा रिंकी घर पर नही थी. शायद ऊपर अपने कमरे में होगी.  मैं उसके कमरे की ओर चल पड़ा. मैं तेज़ तेज़ कदम उठा रहा था. मेरी उस समय एक ही ख्वाहिश थी कि जल्द से जल्द उसका खूबसूरत चेहरा देख लूँ, तभी मेरे दिल को सकुन आने वाला था. मगर कमरे मे पहुँचते ही मेरे पैर ठिठक गये. कमर बंद था. मुझे घबराहट होने लगी. मैं बैचैन मन को तस्सली देता वापस चल दिया. 

मैं अपने और रिंकी के कमरे से होकर मम्मी के कमरे में गया, पर वो वहाँ नही थी. शायद वो रसोई में थी. मैं रसोई की और गया देखा मम्मी वहीं थी और एक कुर्सी पर बैठी हुई थी, कुसुम भी पास खड़ी हुयी थी मेरी ओर उसकी पीठ थी. मैने रसोई की ओर जाते हुए मम्मी को पुकारा मगर वो सिर्फ तीन शब्द ही बोली…! 

“वो चली गयी….,.,…….”

उन्होंने पीछे मुड़कर भी नही देखा. मैं थोड़ा हैरान था, ये मम्मी को अचानक क्या हो गया. 

जारी है……. ✍🏻

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