” चूतिया है… इतनी सेक्सी औरत को सामने से एक बार भी ठीक से नहीं देखा…लानत है यार ! पीछे से देखकर क्या करेगा इडियट ? “.
” अभी रेस्टोरेंट वापस पहुँचते ही बाथरूम में जाकर हिलायेगा… नहीं तो रात को घर में तुम्हारे नाम पर पक्का मूठ मारेगा साला !!! “……मेरी साली और मै ठहाके मारकर हँसने लगें………!
नंगे बदन बैठे मेरे जांघिये में पेशाब करने के लिए बनाये गये छेद से लण्ड बाहर निकल आया था, और लण्ड के सुपाड़े से पानी जैसा लसलसा सा कुछ चू रहा था. प्रीति कि नज़र जब उस पर पड़ी तो उसने लण्ड के सुपाड़े को अपनी उंगलियों से ठेल कर वापस से अंडरवीयर के अंदर घुसा दिया, फिर अपना सिर मेरे कंधे पर रखते हुये मेरा चेहरा अपने हाथ से सहलाते हुये धीरे से बोली.
” Excited हो रहे हो जीजू ??? “
जवाब में मैने प्रीति का चेहरा अपने कंधे से उठाकर अपने हाथों में ले लिया, और उसके होंठों से अपने होंठ चिपका दियें. मुँह में मुँह डाले कुछ देर तक स्मूच करने के बाद
” कब चोदोगे ??? “. मेरे होंठों से अपने होंठ अलग करते हुये प्रीति ने धीरे से फुसफुसाते हुये पूछा, फिर मेरे खड़े लण्ड को आशा भरी ललचाई नज़रों से देखते हुये थोड़ी सी ऊँची आवाज़ में बोली. ” Fuck me ना प्लीज्… जीजू !!! “.
फौरन मैंने उसके दोनों तरफ घुटनो के बल बैठ कर पीछे से हाथ डाल कर चूचे पकड़ लिए, हौले हौले से उनको सहलाया. बहनचोद काफी बड़े संतरे जैसे चूचे थे वाकई में मेरी साली तो महा मर्दमार आइटम थी….
जैसे ही मेरे हाथ उसके मम्मों पर लगे एक तेज़ कंपकंपी उसके बदन में आयी. उसके मुंह से ऊँऊँऊँऊँऊँ… ऊँऊँऊँऊँ की ध्वनि निकली- ‘’ मैंने झुक कर उसकी रेशमी पीठ पर रीढ़ की हड्डी पर जीभ फिराई. नीचे से ऊपर तक, ऊपर से नीचे तक. मुंह में प्रीति जैसे पके हुए फल का स्वाद लूटने के लिए लार टपके जा रही थी इसलिए जीभ बहुत गीली थी. प्रीति ने सिसकारियाँ लेनी शुरू कर दीं. वह अपना सिर दाएं बाएं हिला रही थी जिससे उसके लम्बे बाल इधर उधर झटक रहे थे. धीरे धीरे पूरी पीठ पर जीभ घुमानी शुरू कर दी. प्रीति तड़प रही थी, आअह आअह आह आह कर रही थी.
मैं सोच रहा था कि जब साली बेहद गर्म हो जायगी तभी चूत में लंड दूंगा. जितनी तड़पेगी उतना ही चुदाई का आनन्द पाएगी.
पीछे से हाथ बढ़ाकर मैंने प्रीति की चूचियां पकड़ के हल्के से दबायीं. प्रीति चिहुंक उठी और आह आह आह करते हुए कांपने लगी. मैंने मम्मों को और ज़ोर से दबाया. प्रीति ने और ज़ोरों से आहें भरीं. मैंने उस को उठाया और पलट कर सीधा कर दिया. फ़ौरन ही प्रीति ने अपनी आँखों को दोनों बाँहों से ढक लिया. नंगी थी तो संभवतः शर्म लग रही होगी उस को. मैंने तसल्ली से उसके चूचुक पर निगाहें जमायीं. काफी बड़े संतरों जैसे गोल गोल गोल गोल चूचे थे. काली बड़ी बड़ी घुंडियां जिनके हल्के काले, काफी बड़े आकार के दायरे. बहनचोद निप्पल अकड़े हुए थे मानों कह रहे हों कि आओ मसल मसल के, कुचल कुचल के हमारी अकड़न दूर कर दो… ..
मैं प्रीति के मुंह के पास लंड ले गया और उसकी बाँहों को आँखों पर से हटा कर बोला- प्रीति, ले इस लौड़े को देख… तेरी शान में मादरचोद तन्नाया हुआ है… जब से तुझे देखा है तब से यह कमीना अकड़ अकड़ के नाक में दम किये हुए है.
मैंने लौड़ा प्रीति की नाक से लगा दिया. प्रीति ने फ़ुनफ़ुनाते हुए लंड को देखा तो देखती रह गई. सुपारा फूल के कुप्पा था. लाल सुर्ख हो रहा था. लंड की नसें अकड़न से उभरी हुई थीं और अंडे सख्त हो रहे थे. लौड़ा बार बार तुनक रहा था.
प्रीति ने लंड को गहरी गहरी साँसें लेते हुए अच्छे से सूंघा, सुपारी की खाल पीछे करके अपने गालों पर फिराया, फिर जीभ निकाल के सुपारी का स्वाद चखा. फिर अचानक से उसने लंड को जड़ से पकड़ लिया और उस पर चुम्मियों की बरसात कर डाली.
मैं बोला- साली साहिबा, आया पसंद तुझे यह लंड?,
प्रीति ने फंसी फंसी आवाज़ में कहा- बहुत सुन्दर है यह नाग… एकदम कोबरा जैसा… मैं तो हो गई इसकी गुलाम… “जब तुम्हारी गुलामी ही कर ली तो जो तुम कहो सब मंज़ूर है… जीजू… अब वो पाठ भी तो पढ़वाओ जिसके लिए यहाँ लेकर आए थे.”
मैं हंसकर बोला- क्यों, बहुत बेसब्री हो रही चुदने की… रुक ज़रा सा पहले तुझे अपनी जीभ का करिश्मा तो दिखा दूँ.
जवाब में प्रीति ने सिर्फ मुंह से आह आह आह की.
मैंने प्रीति के कान के पीछे अपनी जीभ गीली करके फिराई तो प्रीति कसमसाई. मैंने उसके कान की लौ को चूसा और फिर जीभ कान के अंदर घुमाई. प्रीति मस्ती में आकर ऊँ… ऊँ… .ऊँ… करने लगी.
उसका बदन अब बार बार कंपकंपाने लगा था. मैंने उसका मुखड़ा हाथों में लेकर उसके रसीले होंठ चूसे तो उसने भी आनन्दमग्न होकर चुम्मे में मेरा पूरा साथ दिया. उसने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी और उसके मुखरस का मज़ा लेते हुए मैं उसकी छोटी सी जीभ चूसने लगा।
फिर मैंने उसकी चूचियाँ निचोड़नी शुरू कीं. पहले मैं हौले हौले निचोड़ रहा था. प्रीति ने आहें भरनी शुरू कर दीं. उसने अपनी टांगें मेरी टांगों से कस के लपेट दीं. मैंने चूची अब थोड़ा ज़ोर से दबाईं. प्रीति को और मज़ा आया और वो सिसकारियां भरने लगी. मैंने चूचियाँ निचोड़ते हुए प्रीति के पेट को चाटना आरंभ किया. पेट पर जीभ गीली कर मैं दाएं से बायें चाटता, एक सिरे से दूसरे सिरे तक. उस सिरे पर पहुंच कर फिर चाटता हुआ वापस आता. इस चटाई ने तो प्रीति को बौरा दिया और वो अजीब अजीब सी आवाज़ें ऐसे निकाल रही थी जैसे उसका गला भिंच गया हो. अब वो कामावेश से तीव्र रूप से ग्रस्त थी.
मैं अब चूचियों को पूरी ताक़त से दबा रहा था, साथ साथ प्रीति के पेट को चाटते हुए अब मैं उसकी उभरी हुई नाभि तक जा पहुंचा था. नाभि को मुंह में लेकर मैंने चूसना शुरू कर दिया. फिर क्या था मज़े से पागल होकर प्रीति ने टांगें छटपटानी शुरू कर दीं. मैंने अपने दोनों अंगूठे प्रीति की चूचुक में पूरी ताक़त से गाड़ दिये.
वो मस्ता के बार बार जीजू जीजू जीजू पुकारने लगी, बोली- अब कितनी देर और इंतज़ार करवाओगे तुम? नीचे सारा जूस निकल गया… आहहह… उम्म्ह… अहह… हय… याह… जीजू जीजू… कमीने… हाय हाय हाय… किस ज़ालिम से फंसी मैं… ओ… ओ… ओ… ओ… हो.
आप से तुम और तुम से तू पर आ गयी थी प्रीति और एक गाली भी दी थी, हा हा हा आ गई हरामज़ादी लाइन पर.
मैं बोला- चुप रह कुतिया… अब पड़ी रह और मज़ा भोग… फालतू बक बक की तो तेरी मां चोद दूंगा.
अब उसकी चूत पर ध्यान देने के इरादे से मैंने उसकी पैंटी से नाक लगा कर गहरी सांस लेते हुए सूंघा. चूत की विशेष सुगंध से मेरे नथुने भर गए. आआह आआह आआह… दुनिया की सबसे नशीली सुगंध होती है चूत की सुगंध. मैंने नाक और भीतर घुसाने के कोशिश की तो कुछ सख्त सख्त सा महसूस हुआ. प्रीति ने सैनिटरी पैड लगाया हुआ था. क्या प्रीति माहवारी में थी? लेकिन चूत से माहवारी वाली खास गंध तो नहीं आयी. मैंने फिर से अच्छे से सूंघा. नहीं, माहवारी वाली सुगंध नहीं थी. फिर क्यों लगाया इस ने पैड?
इसका उत्तर तुरंत ही मिल गया. जब मैंने पैंटी उतारी तो पाया कि वो पैड पूरी तरह से सना हुआ था. यहाँ तक की पैंटी का भी कुछ भाग सना हुआ था. समझ में आ गया कि चूत का रस है. लेकिन बहुत गाढ़ा गाढ़ा.
प्रीति का जूस कोई सामान्य जूस नहीं था, यह तो शहद जैसा गाढ़ा था. यह कह लो कि मर्द के लौड़े के लावा जैसा. इसी लिए उस ने सेनेटरी पैड लगाया हुआ था वर्ना साली की पैंटी और सलवार में पिच्च पिच्च हो जाती.
मैंने मस्त होकर उछलते हुए कहा- प्रीति… यार तेरी चूत का जूस नहीं है, मलाई है… क्रीम है… रुक ज़रा चख के देखता हूँ.
मैंने पैड को ही अच्छे से चाटा. मादक स्वाद से भेजा भन्ना गया, शरीर में चुदास की ज़ोरदार तरंगें अपना ज़ोर मारने लगीं. चिकना चिकना, बहुत ही तेज़ नशे में टुन्न कर देने वाली मलाई थी. मैंने पैंटी को भी सूंघ सूंघ के चाट डाला. प्रीति की चूत और गांड की सुगंधों से नाक और मलाई के ज़ायके से मुंह के मज़े लग गए. भयंकर उत्तेजना से अंडे भारीपन से भर गए.
“आह आह आह… प्रीति तू तो सच मच में मर्द मार क़ातिल है. बहनचोद ऐसा जूस, जिसके सेवन से आदमी की रूह फड़क उठे! इसको रस कहना तो सरासर ग़लत होगा… ये तो मधु कहलाना चाहिए.”
इतना बोल कर मैंने प्रीति के झांट प्रदेश को चाटना आरम्भ किया. झांटें पांच छह रोज़ पहले साफ की गई थीं. बाल थोड़े थोड़े उगे हुए थे, किन्तु यह दिख रहा था कि बहुत गहरे काले रंग के झांटों के रोयें हैं. इसके अलावा झांटों का प्रदेश भी काफी बड़ा था. प्रीति के मुंह से बेसाख्ता सिसकारियाँ निकल रही थीं.
प्रीति बार बार मेरा नाम पुकारे जा रही थी. अब मैंने प्रीति की चूत के होंठों पर ध्यान दिया. चूत के होंठ काफी बड़े थे और गुलाबी गुलाबी थे. देखते ही अब मुझ पे पागलपन छा गया. मैंने होंठ चौड़े किये तो पूरी तरह मलाई से भरी गुलाबी चूत के जो दर्शन हुए तो यारों मेरा क्या हाल हुआ मैं बता नहीं सकता.
बुर से रस फफक फफक कर बहे जा रहा था. चूत के होंठों के ऊपर उसके स्वर्ण रस का प्यारा छोटा सा छेद दिखा जो कि ढका हुआ था. स्वर्ण रस के छेद की खाल को ज़रा सा ऊपर खींच कर छेद को नंगा कर दिया और अपनी जीभ अकड़ा के ज़ोर से छेद पर टुकुर करके मारी.
बस क्या था प्रीति तो जैसे बिदक गई. इतनी ज़ोर से सीत्कारें भरीं कि मैं डर गया कि होटल वाले दूसरे यात्री शिकायत ना कर दें कि इस कमरे में बहुत चोदाई का शोर हो रहा है. मैंने जीभ से बार ज़ोर ज़ोर से स्वर्ण रस के छेद पर प्रहार किये तो प्रीति दसियों बार झड़ी. गिड़गड़ाने लगी- जीजू, अब तो बख्श दे अब इतना तो मज़ा भी बर्दाश्त नहीं हो रहा.
मैंने गुर्रा कर कहा- अच्छा… तो बिल्कुल भी सबर नहीं हो रहा चुदक्कड़ पैदाइश… चल तू भी क्या याद करेगी अब ठोक ही देता हूँ तेरी मलाई वाली चूत को… अब हो जा तैयार इस लौड़े को झेलने!
मैंने वही किया जो प्रीति की फरमाईश थी. वो बौरा सी गयी थी. बेतहाशा फुदक फुदक कर चोदन खेल, खेल रही थी. कमरिया उछाल उछाल के अपने जीजा को चोद रही थी. क्या ज़बरदस्त चुदक्कड़ थी मेरी ये साली! क्या धक्के लगाती थी!! क्या सीत्कारें भरती थी!!! सुभानअल्लाह!!!!
हर धक्के पर मेरा टोपा धाड़ से जाकर प्रीति की बच्चेदानी पर धमाका करता जिसकी ठनक मुझे सिर तक महसूस होती. बहुत ही जबरजंग चुदाई हो रही थी. अचानक से प्रीति ने चार पांच धक्के बिजली की तेज़ी से ठोके और एक गहरी सीत्कार भरते हुए जीजू… जीजू… जीजू… मेरे जीजू पुकारते हुए स्खलित हो गई. वो एक बार नहीं कई दफा झड़ी. बुर की रसमलाई की तेज़ फुहारें मेरे लंड पर चारों तरफ से पड़ती हुई महसूस हुईं.
और तभी मुझे यूं लगा कि मेरे भीतर एक पटाखा फूटा. बड़े ज़ोर से मैं भी झड़ा जैसे कोई ज्वालामुखी फटा हो. दनादन मेरे लंड से वीर्य के मोटे मोटे लौंदे एक के पीछे एक बड़ी रफ़्तार से छूटे. प्रीति की सारी चूत भर गई मेरे मर्द मक्खन से. मेरा गर्म गर्म लेस चूत में जाते ही प्रीति फिर से झड़ी और एक दम से मेरे ऊपर गिर पड़ी. क्योंकि उसकी पीठ मेरी तरफ थी, इसलिये उसका मुंह मेरे घुटनों पर आ गया. उसके मुंह से गर्म गर्म साँसें हाँफते हुए मेरे घुटनों को भी गरम कर रही थीं.
मैंने प्रीति के निश्चल से निढाल शरीर को उठाकर अपनी बगल में लिटा दिया और खुद करवट लेकर उसकी तरफ मुंह करके लेट गया. मैंने प्रीति की चूचियों को सहलाता रहा जिससे प्रीति चुदने के बाद चढ़ने वाले नशे में कही सो न् जाए. मेरी बीबी कुसुम का भी यही हाल होता है. उसको भी बार बार चोदने के लिए मुझे जगाये रखना पड़ता है क्यूंकि मेरा लंड इतना हरामी है कि कमबख्त को जब तक तीन बार चूत में घुसकर उसकी खबर अच्छे से न मिले तब तक जान में आफत किये रखता है…… “
“मुझे यह अच्छे से पता है लौड़ाखोर औरतों की खासियत होती है कि चुदाई हुई और इन्हें नींद आयी. हालाँकि इस खासियत का उन मर्दो को बहुत फायदा मिलता है जिनके घरों में चूतो की भरमार होती है. एक को एक बार चोद के सुला दिया और चले गए घर में ठहरी हुई दूसरी स्त्री की आगोश में….. ह्म्म ह्म्म””
प्रीति ने मेरी नाक को उंगली और अंगूठे से बीच कर दो तीन बार हिलाया और मुस्कुराते हुए बोली- कितना दुखी करेगा साले वहशी दरिंदे… अभी तो दूध ऐसे दुःख रहे हैं जैसे इनका कचूमर निकल गया हो.’
मैं- तूने ही तो कहा था कमीनी इनका कीमा बना दो… तो बजा दिया साली साहिबा का हुक्म.
प्रीति- बड़े आए हुक्म बजाने वाले… तुम जैसों से तो मैं दूर से ही भली… पता नहीं तुम्हारी रस मलाई (कुसुम) तुम्हें कैसे झेलती है.
मैं- जैसे तूने झेला, वैसे ही वो भी झेलती है… क्यों आनन्द आया ना?
प्रीति- हाँ आया हरामी… खूब आया. जैसा मैंने तुझे पहली बार देख कर सपना लिया था वैसा ही मज़ा आया बल्कि उससे भी ज़्यादा.
मैंने पूछा- अच्छा? कब सपना देखा तूने इस चुदाई का?
प्रीति बोली- मैं क्यों बताऊँ? मैं न बताती अपने सपने को… यह तो मेरा प्राइवेट मामला है.’
मैंने ज़ोर से प्रीति के उरोजों को भँभोड़ा, तो प्रीति हुमक उठी.
“हरामज़ादी बोलेगी या असल में कीमा बना दूँ तेरा.”
“साले भेड़िये… बोलती हूँ न अब छोड़ भी दे… नहीं तो दर्द की गोली लेनी पड़ेगी… जिस दिन मैंने तुझे पहली बार देखा ना तुम्हारी शादी में उसी वक़्त कुसुम से जल भुन के मैं तो फुंक गई थी. ऐसा सजीला पति उसको मिला तो मेरी क्या गलती थी जो मेरे नसीब में बुढा जैसा निकम्मा आदमी लिखा था… पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा था कि तू चुदाई के लिए एक जोरदार मर्द होगा… फिर कल जब तुझे फिर से देखा तो सच कहती हूँ जीजू मेरी चूत ने बगावत कर दी… मुझ से एक एक पल काटना भारी पड़ रहा था… रात को जो तुम दोनों ने शोर मचाया ना उसने तो सच में जलती आग में घी टपका दिया… मुझे बहुत ज़्यादा जलन होती है कुसुम से… मैं तो खुद ही चाह रही थी कि तू कुछ आगे क़दम बढ़ाए तो तेरा लंड का मैं भी स्वाद चखूं, मेरी चूत भी चखे… तू तो निकला एक नंबर का बदमाश… चोद ही डाला न मुझको.”
मैंने हँसते हुए कहा- प्रीति देवी, मेरा भी यही हाल था. कल जब तुझे देखा तो लंड में तेज़ सुगबुगाहट सी हुई. जब तूने गांड पर हाथ फेरने पर कुछ नहीं कहा तो समझ में आ गया कि तू चुद लेगी… कल तेरे हाव भाव भी मुझे लुभाने वाले थे.
प्रीति- ओये… मै लड़की हूँ… तुझे और कैसे संदेशा देती अपनी इच्छा का… मैंने कहा अगर समझदार होगा तो यह इशारे पढ़ लेगा, नहीं तो यह है ही नहीं मेरे लायक… अच्छा एक बात बता तू कुसुम को रस मलाई क्यों कहता है. तुझे उसकी चूत की मलाई बहुत अच्छी लगती है इसीलिए ना?
मैं बोला- दो कारण हैं… चूत की मलाई बहुत पसंद है वह तो बात है ही परन्तु उसकी चूत से मलाई इतना ज़्यादा निकलता है जितनी उसकी सू सू निकलती है… मलाई की डेयरी है… उसकी चूत… . ह्म्म ह्म्म
इन सब बातों से प्रीति उत्तेजित होनी शुरू हो गयी थी. उसके हाथ मेरे लंड को सहलाने लगे थे. लंड को तो अकड़ने में देर ही कितनी लगती है. बहनचोद साली साहिबा के हाथ लगते ही फुंफकारें मारने लगा. प्रीति ने धीरे से अण्डों को सहलाया तो लौड़ा और ज़ोर से उचका.
उस ने कहा- जीजू अब तेरी साली साहिबा तुझे इनाम देगी… तूने बहुत मस्त कर दिया … अब चुप चाप बिना हाथ पैर हिलाए पड़ा रह और इनाम का मज़ा लूट.
इतना कह कर वो उठ बैठी और मेरी टाँगें चौड़ी करके उनके बीच में बैठ गयी. झुक के लंड पर चुम्मियों पर चुम्मियाँ दागीं. फिर उसने सुपारी की खाल पूरी पीछे कर के सुपारी नंगी कर दी. जहाँ सुपारी का लंड पर टांका होता है वहां जीभ घुमाने लगी.
“आह! आह! आह!”
कुतिया जैसे जीभ पूरी बाहर निकाल के सुपारी को खूब अच्छे से लप लप लप करके चाटा. लंड की नीचे वाली मोटी सी उभरी हुई नस को दबाते हुए उस ने गप्प से लौड़ा होंठों में दबा लिया और लगी चूमने. मज़े की अधिकता से लौड़ा फड़क उठा. कमीना पूरा फूल गया और प्रीति के मुंह की गर्मी का आनन्द उठाने लगा.
अब उस ने हौले हौले मेरे टट्टे झुलाने शुरू किये और सुपारी पर जीभ से टुकुर टुकुर करने लगी. उसके मुंह में लौड़ा घुसा होने की वजह से हरामज़ादी के मुंह में पानी भर आया था. इसलिए जीभ खूब गीली थी और उसकी टुकुर टुकुर से मेरे तमाम बदन में एक तेज़ झनझनाहट ऊपर नीचे, नीचे ऊपर दौड़ने लगी.
मस्ती में डूबकर मैं चिल्लाया- हाँ हाँ… चूसे जा साली साहिबा… ऐसे ही चूसती रह… बहुत मस्त चूसती है….
उस ने लण्ड बाहर निकाल के कहा- चुप करके पड़े रहो जीजू… अब ये मेरा है… मेरा जैसा दिल में आएगा वैसा चूसूंगी… बिलकुल मत बोल बीच में… यह इनाम है बस मज़ा लूट.
यह कह के गप्प से लण्ड को फिर से होंठों में दबा लिया और लगी पहले की तरह टुकटुकारने. काफी देर तक ऐसे ही चूसती रही. कुछ समय पश्चात् लंड को बाहर निकला, खाल पीछे करके एक बार फिर से टोपा पूरा नंगा कर दिया. सिर्फ टोपा मुंह के अंदर ले कर खाल ऊपर नीचे करना शुरू किया. उसका मुंह बहुत गरम था और तर भी. लंड के मज़े लग गये.
अचानक उस ने जीभ की नोक सुपारी के छेद में घुसाने की कोशिश की. मेरे पूरे बदन में एक सरसरी सी दौड़ गयी. मज़े की पराकाष्ठा हो चली थी. उसने तेज़ तेज़ लंड को हिलाना शुरू कर दिया. उसकी जीभ कमाल का आनन्द दे रही थी. कभी वह अपनी गरम गरम राल से तर जीभ टोपे पर घुमा घुमा के चाटती और कभी वह दुबारा जीभ को मोड़ के नोक लंड के छेद में डाल के एक तेज़ करंट मेरे बदन में फैला देती. क्या बढ़िया इनाम था!
यकायक लंड पूरा का पूरा मुंह में घुसा लिया. वह ब़ड़े प्यार से अंडों को सहला रही थी और तेज़ तेज़ सिर को आगे पीछे करती हुई लंड को मुंह में अंदर बाहर, अंदर बाहर, अंदर बाहर कर रही थी. उसके घने बाल इधर उधर लहरा रहे थे.
मज़े के मारे मेरी गांड फटी जा रही थी. मैं बड़ी तेज़ी से चरम सीमा की ओर बढ़ रहा था. मेरी साँसें तेज़ हो चली थीं और माथे पर पसीने की बूंदें झलक आईं थीं. उस ने रफतार और तेज़ कर दी. उसे महसूस होने लगा था कि मैं जल्दी ही झड़ सकता हूँ. उस का मुंह रस से लबालब था, लौड़ा अंदर बाहर होता तो सड़प… सड़प… सड़प की आवाज़ें निकलती थीं.
उस ने लंड और गांड के बीच में जो मुलायम सा भाग होता है, उसे ज़ोर से दबा दिया. उसने अपने दोनों अंगूठे उस कोमल जगह पर गाड़ दिये. एकदम से एक तेज़, गरम बिजली के करंट जैसी लहर मेरी रीढ़ से गुज़री, मेरे मुंह से एक ज़ोर की सीत्कार निकली और मैं झड़ा, मैंने उस के बाल जकड़ के एक ज़ोरदार धक्का मारा. लंड बड़ी तेज़ी से उसका पूरा मुंह पार करता हुआ धड़ाम से उसके गले से जाकर टकराया. ऊँची ऊँची सीत्कार की आवाज़ें निकलता हुआ मैं बहुत धड़ाके से झड़ा.
मेरे लौड़े ने बीस पचीस तुनके मारे और हर तुनके के साथ गरम वीर्य के मोटे मोटे थक्के उस के मुंह में झाड़े. सारा मक्खन निकल गया. मैं बिल्कुल निढाल हो कर बिस्तर पर फैल गया और अपनी सांसों को काबू पाने की चेष्टा करने लगा.
मेरा लंड झड़के मुरझा चुका था और प्रीति की लार व मेरे माल की बूँदों से लिबड़ा एक तरफ को पड़ा हुआ था. प्रीति ने सारा वीर्य पी लिया था और फिर उसने मेरे लौड़े को चाट चाट कर अच्छे से साफ किया, नीचे से ऊपर तक. उस ने लंड के निचले भाग में जो मोटी सी नस होती है, उसे दबा दबा के निचोड़ा. वीर्य की एक बड़ी बूंद टोपे के छेद से निकली जिसे उसने जीभ से उठाया और पी लिया. अब वह मेरे बगल में आकर लेट गई और प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ फिराने लगी- सच बता न जीजू… आया मज़ा मेरे जीजू को?
मैं- हाँ साली साहिबा, बहुत मज़ा आया… तू वाकई में चुदाई और चुसाई दोनों की बेहतरीन खिलाड़ी है… मस्त कर दिया तूने मुझे… तेरे इनाम पर मैं जाऊं कुर्बान…..??
“अच्छा जीजू ज़रा टाइम तो देख कितना हुआ है?”
घड़ी मैंने उतार कर टेबल पर रख दी थी, मैं उठ कर गया और देखा कि पौने एक बज चुके थे. प्रीति ने कहा- तो काफी टाइम हो गया अब चलना चाहिए.
मैंने कहा- ठीक है, पहले तू निकल होटल से, तेरे जाने की दस पंद्रह मिनट की बाद मैं चलूँगा. दोनों का एक साथ पहुंचना गलत हो जायगा.
“सच कह रहे हो जीजू… पहले मैं ही निकलती हूँ.” कहकर प्रीति ने अपने कपड़े पहने, बाथरूम में जाकर मुंह हाथ धोये और हल्का सा मेक अप करके तैयार हो गई.
मैंने भी तब तक अपने कपड़े पहन लिए थे. चलते चलते एक बहुत लम्बी चुम्मी ली, उस की चूचियां थोड़ी सी निचोड़ी और थोड़े से नितम्ब दबाये. आलिंगन में बंधे बंधे मै सोच रहा था…. शादी – शुदा स्त्री मांग में सिंदूर होने के बावजूद जुड़ जाती हैं किसी के अहसासों से कह देती है उससे कुछ अनकही बातें ऐसा नहीं की वो बदचलन हैं..या उसके चरित्र पर कोई दाग़ हैं,,तो फिर क्या हैं जो वो खोजती हैं, सोचा कभी, स्त्री क्या सोचती हैं, तन से वो हो जाती हैं शादीशुदा पर मन कुंवारा ही रह जाता हैं, किसी ने मन को छुआ ही नहीं कोई मन तक पहुंचा ही नही बस वो रीती सी रह जाती हैं,,और जब कोई मिलता हैं उसके जैसा जो उसके मन को पढ़ने लगता हैं, तो वो खुली किताब बन जाती हैं, खोल देती है अपनी सारी गिरहें, और नतमस्तक हो जाती हैं, सम्मुख, स्त्री अपना सबकुछ न्योछावर कर देती हैं, जहां वो बोल सके खुद की बोली, जी सके खुल के दो पल, बता सकें बिना रोक टोक अपनी बातें, हंस सके एक बेख़ौफ़ सी हसीं, हां लोग इसे इश्क ही कहते है. पर स्त्री तो बस दूर करती हैं. अपने मन का कुंवारापन,,,,,
फिर प्रीति बाय कहकर चली गई. पूरे पंद्रह मिनट बाद मैंने भी होटल का बिल अदा किया और वापिस वहीं चला गया जहाँ से आए थे… ….
जारी है.. ![]()

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