कर्ज और फर्ज | एक कश्मकश – Update 53

कर्ज और फर्ज एक कश्मकश - Erotic Family Sex Story
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” वासना की फिसलन “”

“पापा बाहर बारिश कम हो गयी है, मम्मी कभी भी आ सकती है….“क्या अभी यह संभव है” ????? ये एक ऐसा सवाल था जो वो मुझसे ज़यादा खुद से कर रही थी इसलिए मैने कोई जबाब नही दिया. असल मैं मेरे पास उस सवाल का कोई जबाब था ही नही और फिर से खामोशी छा गयी……..!

हम इतने करीब थे कि मैं उसके मम्मो को अपनी छाती के नज़दीक महसूस कर सकता था, यह पहली वार था जब हम ऐसे इतने करीब थे. मुझे नही मालूम कि उसके मम्मे वाकाई मुझे छू रहे थे या नही मगर वो मेरी पसलियों के बहुत करीब थे, बहुत बहुत करीब! उसके माममे हैं ही इतने सुडॉल्! कड़कती बिजली की गडगदहत् माहौल को रहस्यपूर्ण बना रही थी.

हम दोनो ने आज शाम काफ़ी वक़त एकसाथ गुज़ारा था, खूब मज़ा किया था, एक दूसरे के साथ का बहुत आनंद मिला था. मन में आनंद की तरंगे फूट रही थी और  किसी भी प्रकार की अतम्ग्लानि पूरी तेरह से गायब हो चुकी थी. माहौल की रोमांचिकता में तब और भी इज़ाफा हो गया जब उसने अपना हाथ (असावधानी से) मेरे बाएँ बाजू पर सहारे के लिए रख दिया.

मुझे जल्द ही समझ में आ गया के इंसानी दिमाग़ की यही फ़ितरत होती है कि वो किसी ग़लती की वजह से होने वाली आत्मग्लानी को यही कह कर टाल देता है कि ग़लती की वजह अवशयन्भावि थी. हम ने एक सुखद, कामुकता से भरपूर शाम बिताई थी इसलिए यह स्वाभाविक ही था हम एक दूसरे को खुद के इतने नज़दीक महसूस कर रहे थे कि वो चुंबन स्वाभाविक ही था. इसके इलावा वासना का अंधेरा इतना गहरा था कि हमे कुछ दिखाई भी तो नही दे रहा था.

जब एक बार पछतावे की भावना दिल से निकल गयी और उस ‘शरारत’ को न्यायोचित ठहरा दिया गया तो मेरे लिए रिंकी को नयी रोशनी में देखना बहुत मुश्किल नही रह गया था. मैं वाकई में अपनी बेटी को एक नयी रोशनी में देख रहा था. मैं उसे ऐसे रूप में देख रहा था जिसकी ओर पहले कभी मेरा ध्यान ही नही गया था.

तभी मेरा फोन बजता है ,स्क्रीन को देखकर मेरे दिल की धड़कने रुक सी गयी नाम था ,जान और कुसुम की तस्वीर वहां पर दिखाई दे रही थी ,मैंने काँपते हुए हाथो से फोन रिसीव किया,

“हैल्लो कहा हो आप “

“मैं घर में हु और तुम कहाँ हो ,”मेरी आवाज की थकान को जैसे वो पहचान गयी थी ,

“क्या हुआ आपको मैं कब से आपको काल कर रही हु पर आप फोन उठा कर जवाब ही नही दे रहे हो ,मैंने रिंकी को भी काल किया तो पता लगा की उसका फोन बंद आ रहा है। जानते हो मै कब से कितनी परेशान हु ,अब जल्दी से दरवाजे पर आ जाओ मैं घर पहुँचने वाली हु ,”

“हा आ रहा हु “

मैंने दरवाजा खोल कर सबका अभिनदंन (स्वागत) किया कुसुम मुझसे तब तक बात भी नही कर रही थी ,वो बड़े ही सलीके से दरवाजे के पास खड़ी थी । मैने उसके हाथों से सामान (बैग) लेने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया तो ये देखकर कुसुम एक मुस्कान बिखरा गयी ,वो शरारत भरी मुस्कान मासूम सी मेरी प्यारी कुसुम ,वाह जैसे कुछ हुआ ही ना हो मैं अपने सभी गम भूलकर बस उसे देखने लगा की कुसुम की सास (मेरी मम्मी) ने हल्के से खासते हुए हमे फिर से होश में लाया , कुसुम तो शर्म से पानी पानी हो गयी और फिर किचन के दरवाजे के पास चली गयी वही मेरे मम्मी और पापा दोनो ही हसने लगे …

दूसरी ओर रिंकी की आंखों में एक चमक मैंने देखी थी,जो कुसुम के आने पर थी ,पर रिंकी अभी भी उसे कोई भी भाव नही दे रही थी।

तभी दरवाज़े से इस ओर मेरी मम्मी दौड़ी चली आई और पूरे उत्साह के साथ आकर रिंकी को पीछे से पकड़ ली. बहुत खुश लग रही थी वो. भले मम्मी के स्तन रिंकी की पीठ पर उस पकड़ में दब रहे थे पर इस वक़्त इस पकड़ में किसी भी तरह की कामुकता नहीं सिर्फ आत्मीयता थी बल्कि एक ममता की तरह की भावना थी.

इस तरह दादी की खुशी देखकर दादा जी ने पूछा, “क्या बात है? बड़ी खुश लग रही हो?” खुश क्यो ना होऊ अपनी पोती से इतने  दिन बाद मिल रही हूँ।

 दूसरी ओर क्यों रिंकी का मन एक बार फिर विचलित होने लगा. रिंकी जानती थी कि मम्मी, पापा से पति पत्नी के बीच प्रेम की भावना से देख कर मुस्कुरा रही थी. न जाने क्यों पापा और मम्मी को इस तरह साथ साथ देखकर ही रिंकी के मन में थोडा सा गुस्सा आने लगा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों सोच रही है. क्या उसे जलन हो रही थी पापा को मम्मी के साथ आज रात को होने वाले सेक्स करते हुए सोच कर? मगर क्यों?

वो तो खुद अपनी मम्मी की सगी बेटी थी… फिर मम्मी, पापा (अपने पति) के साथ जो चाहे करे.. उसे क्या? पर पापा को मम्मी के आने पर अपनी बेटी को इस तरह नजर अंदाज नही करना चाहिए कम से कम अपनी बेटी के बारे में  कुछ ख्याल रखना चाहिए था. क्या जो अभी कुछ समय पहले हुआ वो सिर्फ एक मज़ाक था? पापा कुछ देर पहले की बात को ऐसे कैसे अनदेखा कर सकते है ? ऐसे ही न जाने कितने ही ख्याल रिंकी के मन में आने लगे.

 “मैंने रिंकी की तरफ निगाह घुमाई उसके मासूम से चहरे को देखा उसकी आंखे सच मे थोड़ी नम हुई थी मानो पल भर में वो रोने वाली हो ,वो अपना सर झुककर खड़ी थी ,पता नही क्यो कहना तो वो बहुत कुछ चाहती थी पर जैसे अपने दादा, दादी और मम्मी की उपस्थिति में कुछ नही कह पा रही थी ,मैं कुछ बोलने ही वाला था की मेरे पापा बोल पड़े।

प्रोफेसर साहब तुम दोनों बाप बेटी ने कुछ खाना वाना बनाया है कि नही… बड़ी जोरों से भूख लगी है ??

तभी मैने रिंकी से कहा, “जाकर खाने की मेज सजाओ रिंकी तुम्हारे दादा दादी खाने का इंतज़ार कर रहे है. सारा दिन बस मौज मस्ती करती हो. कुछ घर के काम में भी   हाथ बंटा दिया करो.” ना जाने क्यों अपने पापा के शब्दों को सुनकर मेरे अंदर का पापा जागने लगा।

रिंकी अपने पापा के मुंह से ऐसी बात सुनकर आश्चर्य में थी. कुछ सोचते हुए रिंकी खाना मेज पर लगाने लगी. और बेचैन हुई जा रही थी कि उसे मम्मी और पापा के बारे में सोच कर इर्ष्य क्यों हो रही है.”मै मम्मी और बांकी सभी के आने की ख़ुशी में शामिल क्यों नहीं हो पा रही हू?”

थोड़ी देर बाद खाना लग जाने पर  सभी ने साथ में खाना खाना शुरु किया.

“रिंकी … तुम्हारा स्कूल कैसा चल रहा है?”, कुसुम ने खाते हुए यूँ ही रिंकी से पूछा.

“अच्छा चल रहा है मम्मी.”, रिंकी ने पापा के मूड को देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा.

“अपनी बेटी को समझाओ कि स्कूल में मन लगाये. खूब मौज मस्ती करती रहती है सारा दिन.”, मैने अपनी थाली में चावल परोसते हुए कहा. (एक बार फिर से मेरे अंदर का बाप जागा।)

“अरुण … स्कूल के दिन ही तो मौज मस्ती करने वाले होते है. थोडा खुश रह लेगी तो इसमें बुरा क्या है.”, मेरी मम्मी ने मुझ को समझाते हुए कहा.

बाप बेटी के कुछ अनबन चल रही है ऐसा दादा दादी को समझ आ गया था. इसलिए बिना ज्यादा कुछ बोले वो खाना खाकर अपने कमरे में चले गए.

रिंकी और कुसुम ने खाने की मेज समेटी

कुसुम उससे बात करने की कोशिस कर रही थी वो मेरे बारे में ही पूछे जा रही थी… रिंकी ने कुसुम को सब बता दिया की कैसे मैं आजकल ज्यादा गुस्सैल हो गया हु ,कैसे मैं उसे बिना बात भी चिल्ला देता हु… रिंकी मेरी शिकायत कर रही थी और कुसुम के लिए ये एक गंभीर बात थी वो मेरी चिंता में थी की आखिर इन्हे हुआ क्या है……..कुसुम सोचती रही कि अरुण क्यों ऐसे मेरी बेटी पर नाराज़ हो रहे है? कही इसकी वजह मै तो नही हू। मैने अपने ऑफिस के कलिग के बारे में तो अरुण को बहुत पहले से ही बताया हुआ था फिर अब क्यों वो इस तरह रूखे हो रहे है? और बर्तन धोये बिना एक दुसरे से बात किये रिंकी को अनदेखा कर कुसुम अपने बेडरूम आ गयी जहाँ मै उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था.

मेरी आँखों की आतुरता देख कुसुम मुस्कुराते हुए बोली, “ज़रा रुको मैं अभी आती हूँ.” और पति को तडपाती हुई कुसुम कमर मटकाते हुए कमरे से लगे बाथरूम चली गयी. अपने पति को रिझाना कुसुम को बखूबी आता है.

जबकि दूसरी तरफ रिंकी बर्तन धो कर, किचिन का सारा काम निबटाने लगी।

किचिन में से जोर से खनकते बर्तनो की आवाज सुनकर मै अपने कमरे से किचिन में चला आया.

मेरे किचिन में आने के बाद एक अजीब सी और अनकही सी खामोशी का जन्म हो गया, मैं कुछ बोल नही पा रहा था और मेरी बेटी रिंकी अपनी नम आंखों से मुझे देखे जा रही थी….उसका भोलापन साला दिल को चीरने वाला था..वो कभी भी मेरे सामने किसी (अपनी मम्मी) को भी तजव्वो नही देती,यही मुझे उसे प्यार करने पर मजबूर कर रहा था.

बाप बेटी के बीच खामोशी रहे भी तो कब तक,जबकि वो एक दूजे को प्यार करते हो ,ये खामोशी हम दोनो के लिए ही जानलेवा थी…खाना हम खा चुके थे, घर के सभी लोग अपने अपने कमरे में जा चुके थे, कुसुम बाथरूम में थी।  रिंकी बिना बोले मेरे पास आकर खड़ी हो गयी ,हमारी नजर मिली उसके आंखों का आंसू मेरे दिल को पिघलने के लिए काफी था..

भीगी हुई आंखों के साथ मासूम मेरी बिटिया को देख लो..चहरे से मासूमियत टपकती हुई सी,वो मुह खोले तो कोयल बोले,वो हँसे तो मोती शरमाये,प्यारे से चहरे पर मायूसी भी बड़ी प्यारी लग रही थी…

मुझसे रहा नही गया और मैं हाथ फैला कर उसे अपने पास आने को कहा,वो जोरो से रोती हुई मेरे सीने से लिपट गयी….

इतनी शांति….इतना प्यार ……इतनी कोमलता…..waaaahhhhhhh

वो मुझे प्यार से मारने लगी, उसके बच्चों वाली हरकत से मुझे हसी आ गयी,

“पापा क्या हो गया था आपको,क्यो कर रहे थे इतना गुस्सा…और जब से मम्मी आयी है प्यार से बात भी नही की, और ना ही जाने क्या हो गया है…..”

अब इस पगली को क्या बताता की क्या हो गया है,जिसके कारण इतना तकलीफ में हु वही पूछ रही है की क्या हुआ…? ? ?

लेकिन पूरा नही आधा सच तो बोल गया…

“ तुम्हारी मम्मी के आने से मै बेचैन हो गया हू, कुछ समझ ही नही आ रहा है। दिमाग काम नही कर रहा है, कही मन नही लग रहा है”

रिंकी ने मेरे आंखों में देखा,साला प्यार तो सच्चा था मेरा जो मेरी आंखों से भी उसे दिखता था…उसके आंखों में रुके आंसू फिर से हल्के हल्के से बहने लगे..वो मुझे बस थोड़ी देर देखती रही और मेरे ऊपर कूद पड़ी…मेरे गालो को होठो को ऐसे चूमना शुरू कर दिया जैसे मानो जन्मो की प्यासी है,

उस चुंबन की आत्मीयता और गहराई पहले चुंबनो के मुक़ाबले खुद ब खुद बढ़ गयी थी, 

जब उसने उपर तक पहुँचने के लिए खुद को उपर की ओर उठाया तो मैने निश्चित तौर पे उसके सुडॉल् मम्मो को अपनी छाती से रगड़ते महसूस किया. मैने खुद को एकदम से उत्तेजित होते महसूस किया और फिर ना जाने कैसे, खुद बा खुद मेरी जीब बाहर निकली और मेरे होंठो को पूरा गीला कर दिया जब वो उसके होंठो को लगभग छूने वाले थे. वो मुझे अपनी आँखे बंद होने की वजह से होंठ गीले करते नही देख पाई होगी.

जैसे ही हमारे होंठ एक दूसरे से छुए, प्रतिकिरिया में खुद बा खुद उसका दूसरा हाथ मेरे दूसरे बाजू पर चला गया और इसे संकेत मान मेरे होंठो ने खुद बा खुद उसके होंठो पर हल्का सा दबाब बढ़ा दिया. यह एक छोटा सा चुंबन था मगर लंबे समय तक अपना असर छोड़ने वाला था.

उसके होंठ भी नम थे. उसने उन्हे नम किया था जैसे मैने अपने होंठ नम किए थे. क्योंकि मैं उसके उपर झुका हुआ था, इसलिए जब हमारे होंठ आपस में मिले और उन्होने एक दूसरे पर हल्का सा दवाब डाला तो दोनो की नमी के कारण उसका उपर का होंठ मेरे होंठो की गहराई में फिसल गया जबकि मेरा नीचे वाला होंठ उसके होंठो की गहराई में फिसल गया. और सहजता से दोनो ने एक दूसरे के होंठो को अपने होंठो में समेटे रखा. मैने उसका मुखरस चखा और वो बहुत ही मीठा था. मुझे यकीन था उसने भी मेरा मुख रस चखा था.

हमारा किचिन में यु छिप कर किया गया वो हल्का सा चुंबन एक असली चुंबन में तब्दील हो चुका था उसने अपना मुख मेरे मुख से दूर हटा लिया. हमारा चुंबन थोड़ा हड़बड़ी में ख़तम हुआ, वो मेरे कंधे पर सर रखकर खड़ी हो गयी…मैंने भी उसे अपनी बांहो में समा लिया… उस वक्त मैं अपनी बीवी कुसुम को बस एक ही पल में भूल गया, मुझे पता था तो बस अपनी बेटी का प्यार…मैं उसके बालो को सहलाता हुआ वहां खड़ा था की एक हल्की सी आहट ने मेरा ध्यान खिंचा…!

जैसे ही उस आहट का उसको एहसास हुआ तो वो एकदम परेशान हो उठी. उसके हाथों ने मुझे धीरे से दूर किया और वो धीरे से पापा गुडनाइट बुदबुदाई और जल्दी जल्दी अपने रूम को निकल गयी.

मैं कम से कम वहाँ पांच मिनिट खड़ा रहा होऊँगा फिर थोड़ा होश आने पर खुद को घसीटता अपने बेडरूम में गया और जाकर अपने बेड पर लेट गया. मेरे लिए यह स्वाभाविक ही था कि मैं अगले पल कुछ बुरा महसूस करते हुए सोच रहा था. हम ने एक दूसरे को ऐसे चूमा था जैसा हमारे रिश्ते में बिल्कुल भी स्वीकार्य नही था और फिर यह बात कि वो लगभग वहाँ से भागते हुए गयी थी, से साबित होता था कि हम ने कुछ ग़लत किया था. मुझे अब ये समझ नही आ रहा था कि सुबह माँ – बेटी एक दूसरे का सामना कैसे करेंगे…?? एक म्यान में दो तलवारे कैसे रहेगी।

उधर बाथरूम में आते ही कुसुम ने ब्लाउज में लगी हुई पिन को खोलकर अपने पल्लू को उतारा और फिर अपना ब्लाउज उतारने लगी. ब्लाउज को किनारे में रख कुसुम ने अपनी ब्रा उतार दी. और फिर से ब्लाउज पहनने लगी. ब्लाउज पहनकर कुसुम ने खुद को आईने में देखा. उसके हरे पारदर्शी ब्लाउज में उसके बड़े बड़े निप्पल साफ़ झलक रहे थे. फिर कुसुम ने अपने हाथो को ब्लाउज के अन्दर डालकर अपने स्तनों को ब्लाउज में सही तरह से एडजस्ट किया कि उसके निप्पल पॉइंट कर उभरे हुए दिखे. संतुष्ट होने पर कुसुम ने एक बार फिर अपनी सैटिन साड़ी के पल्लू को अपने कंधे पर चढ़ाया और फिर अपनी बिंदी को माथे पर सही जगह पर लगाया. कुसुम इस वक़्त बेहद हॉट दिख रही थी. और फिर उसने अपने होंठो पर लिप ग्लॉस लगाया ताकि उसके होंठ चुमते वक़्त और रसीले लगे. कुसुम ने एक बार फिर अपने आँचल को संभाला और मुस्कुराती हुई बाथरूम से निकल कर बेडरूम आ गयी.

कुसुम अपनी सेक्सी चाल से मुझ को रिझाने लगी और बिस्तर पर मेरे बगल में आकर बैठ गयी. फिर उसने अपने पैरो को ऊपर उठाकर बिस्तर पर रखा, फिर अपने घुटनों को मोड़ अपनी साड़ी के पल्लू को संभाला और फिर नटखट नजरो से मेरी ओर कातिल मुस्कान से घायल कर मुझसे मुंह फेरकर बगल में लेट गयी.

मैं उसके बालो को सहलाता हुआ वहां लेटा था की एक हल्की सी ध्वनि ने मेरा ध्यान भंग किया… msg का छोटा सा रिंगटोन.. कुसुम का मोबाइल मेरे बाजू में ही पड़ा था,कुसुम ने उसे उठाया देखा और बिना किसी भी एक्सप्रेशन के ही उसे फिर से अपने बाजू में फेक दिया…वो पहले के ही तरह कातिल मुस्कान से घायल कर मुझसे मुंह फेरकर बगल में अपनी आंखे बंद कर मेरे बाजुओ में खुद को संपर्पित करने की राह देखती रही।

पर मैं अब “वो नही था जो कुछ ही पलो पहले था” मेरा ध्यान उस मोबाइल की तरफ गया…वो फिर कुछ जला इस बार टोन नही बजा शायद कुसुम ने उसे साइलेंट में डाल दिया था,वो बस जलता और बज जाता,मुझे आभस हो गया की लगभग 5 msg आ चुके थे…पर कुसुम का ध्यान वहां नही था..थोड़ी देर में कुसुम मुझे और प्यार से देखने लगी,उसकी आंखे कह रही थी की वो क्या चाहती है,प्यार ..?????

या सेक्स..?????

जो भी हो बस मुझे ये समझ आ चुका था की उसकी वो नशीली आंखे अब मुझे अपनी ओर खिंच रही है,उसके देह से उठने वाली महक बता रही थी की वो मुझे आकर्षित कर रही है…

बिस्तर पर अपनी लेटी हुई पत्नी की ब्लाउज में खुली हुई पीठ और सैटिन साड़ी में लिपटी हुई खुबसूरत बड़ी सी गांड देख में और बेचैन हो उठा. सचमुच कुसुम को अपने पति को रिझाना बखूबी आता था. मै कुसुम के करीब आ गया और पीछे से अपनी पत्नी की कमर पे हाथ डालते हुए उसकी साड़ी के अन्दर हाथ डालने लगा और उसकी गर्दन पे चुमते हुए बोला, “अब और कितना तरसाओगी जानेमन? कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.”

मैने अब अपने हाथ कुसुम के ब्लाउज पर फेरने लगा और उसके स्तन दबाने लगा. कुसुम भी मुस्कुराती हुई अपने हाथ पीछे कर अपने पति के सर को अपने और करीब लाने लगी ताकि वो उसे गर्दन पर अच्छी तरह चूम सके. “आज तो तुमने ब्रा भी नहीं पहनी है डार्लिंग. अब मुझसे और रुका नहीं जाएगा.”, मैने कहा.

“तो आपको रोक कौन रहा है जानू… मैं तो आपकी ही हूँ.”, कुसुम ने मदहोशी भरी आवाज़ में कहा.

मै अब और उत्साह से कुसुम के बूब्स के बीच हाथ डालकर दबाने लगा और फिर उसकी पीठ पर चूमने लगा. धीरे धीरे मैने हाथो को निचे ले जाकर कुसुम की साड़ी की चुन्नटो के बीच ले गया जहाँ  कुसुम की चूत को उसकी साड़ी पर से ही सहला रहा था पर उसके दिल में कुछ और था. वो नहीं चाहती थी कि आज मै उसकी चूत सेहला सेहला कर वक्त से पहले गरम कर दू.

तो कुसुम ने अपने एक हाथ से मेरे उस हाथ को हटाया. और अपने हाथ को अपने पीछे लिपटे हुए पति के पैजामे में डाला और मेरा खड़ा लंड अपने कोमल हाथों से बाहर निकाल कर उसे हिलाने लगी. हिलते हाथो के साथ उसकी हरे कांच की चूड़ियों की खनक बेहद मोहक लग रही थी. कुसुम ने फिर उस लंड को अपनी गांड पर दबाया. मेरा लंड कुसुम के नर्म हाथो और गांड के बीच मचल उठा…

 कुसुम की सैटिन साड़ी के स्पर्श से तो वो और तन गया. “आज मेरी नहीं तुम्हारी खुश होने की बारी है प्रिये.”, कुसुम ने एक अच्छी पत्नी की भाँती मुझ से कहा और मेरे लंड को अपनी गांड पर लिपटी साड़ी पर जोर जोर से दबाने लगी. मै तो इस वक़्त और भी उत्तेजित हो गया.

मैने अपनी पत्नी को अपनी ओर पलटाया और उसकी आँखों में देखने लगा. कुसुम भी अपनी कातिल मुस्कान और रसीले होंठो के साथ उन्हें देखने लगी. मैने फिर कुसुम की साड़ी को उसके ब्लाउज के ऊपर से हटाया और उसका पारदर्शी ब्लाउज देख मै मचल उठा. बिना ब्रा के उस पारदर्शी ब्लाउज में कुसुम के बड़े बड़े स्तन साफ़ झलक रहे थे और उसके निप्पल सख्त हो गए थे. जिसे देख मै उन निप्पल को पकड़ अपनी उँगलियों से मसलने लगा तो कुसुम ने आँहें भरते हुए अपनी आँखें बंद कर ली.

“जानू आओ मैं तुम्हारे बूब्स को इस ब्लाउज से आज़ाद करता हूँ.”, मैने कहा और कुसुम के ब्लाउज की हुक खोलने लगा. “”पति भी न ऐसे ही होते है. बातें तो ऐसी करते है जैसे सब कुछ अपने लिए नहीं बल्कि सिर्फ पत्नी की ख़ुशी के लिए कर रहे है. बिना ब्रा के तो वैसे भी उसके स्तन आज़ाद ही थे.””

 कुसुम की ब्लाउज की सारी हुक खुलते ही मैने उन दोनों हिलते हुए स्तनों को अपने दोनों हाथो से जोरो से मसल दिया तो कुसुम एक मीठे दर्द भरी आंह निकाल कर मचलने लगी. और फिर मैने अपना सर उन दोनों नर्म बड़े बड़े स्तनों के बीच रख दिया और उन स्तनों को और चूमने लगा.

मदमस्त होती कुसुम ने भी अपने हाथो से मेरे सर को अपने बूब्स पर और जोर से दबाया और सर को अपने सैटिन साड़ी के आँचल से ढँक दिया. मै भी कामुक होकर कुसुम के स्तनों को चूसते रहा और अपनी जीभ से कुसुम के निप्पल को उकसाने लगा. मचलती हुई कुसुम से रहा न गया और बोली, “और जोर से चुसो न मेरे बूब्स को… मेरे निप्पल को अपने दांतों से कांटो न जानू” मैने भी वैसा ही किया तो उत्तेजना के मारे कुसुम ने अपनी मुट्ठियाँ भींच ली और आँखें बंद कर मज़ा लेने लगी… उसका तन बदन उसके स्तन पर हर चुम्बन पर लहरा उठता.

कुछ देर तक अपनी पत्नी के स्तनों का आनंद लेने के बाद मैने अपनी पत्नी को पलटाकर उठाया और उसे डौगी पोजीशन में बिस्तर में तैयार किया और खुद पत्नी की गांड के पीछे आ गया. इस वक़्त कुसुम के बाल बिखर गए थे, ब्लाउज खुला हुआ था जिसमे से उसके स्तन उस पोजीशन में लटक कर झूल रहे थे. अब तो बस कुसुम की गांड को बेसब्री से इंतज़ार था. मै ने भी ज्यादा देर न करते हुए कुसुम की साड़ी को पीछे से उठाया और उसकी पेंटी उतारकर अपने लंड से वहां छूने लगा.

कुसुम तो जैसे अब मदहोश हो चुकी थी. अब वो अपनी गांड को मदहोशी में लहराने लगी और अपने पति के लंड को और तरसाने लगी. पर वो तो खुद तरस रही थी. अपनी पत्नी की तड़प देखकर मैने भी झट से अपने लंड को कुसुम के अन्दर डाल दिया. उस एक झटके में कुसुम तो जैसे झूम उठी और उसके मुंह से एक आवाज़ एक आंह निकल पड़ी. कामुकता की मारी कुसुम अपने एक हाथ से अपने स्तनों को छूकर दबाने लगी. और मै भी अपने एक हाथ से कुसुम की डोग्गी पोजीशन में झूलते हुए स्तनों को पकड़ कर दबाने लगा.

“और जोर से दबाओ न!”, कुसुम मदहोशी में लगभग चीख उठी. तो पत्नी की बात सुनकर मै और जोर से दबाने लगा और जोर जोर से अपने लंड को अन्दर बाहर करने लगा. इस दौरान कुसुम के मुंह से निकलने वाली आन्हें और तेज़ हो गयी थी. अक्सर कुसुम ऐसी आवाजें नहीं निकाला करती थी क्योंकि उसकी बेटी रिंकी बगल के कमरे में ही सोया करती थी. पर आज न जाने कुसुम को क्या हो गया था, उसे बिलकुल परवाह नहीं थी कि उसकी ये चरम उत्तेजना में निकलने वाली आवाजें किसे सुनाई देती है. मुझ को तो वैसे ही ऐसी आवाज़ करके मदहोश होती हुई पत्नी ज्यादा आकर्षक लग रही थी तो मैने कुछ कहा नहीं. मै अपनी पत्नी के बड़े स्तनों को और जोर जोर से मसल मसल कर उसे और आनंद दे रहा था, और वहीँ लंड को भी बड़े तेज़ी से अन्दर बाहर कर रहा था.

और फिर कुछ समय में पति-पत्नी के बीच की ये लीला पूरी हो गयी. दोनों के चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव था. आज कुसुम बाकी दिनों के मुकाबले बहुत ज्यादा कामोत्तेजित थी. चाहे जो भी वजह थी इसके पीछे, मै बहुत खुश था. और फिर मै अपनी पत्नी के बड़े स्तनों के बीच सर रखकर सो गया. और कुसुम भी मेरे सर को जोर से अपने सीने से दबाकर मेरे सर पर हाथ फेरते फेरते सो गयी.

” पर होता है न कि अक्सर ऐसी रातें यूँ ही ख़त्म नहीं हो जाती. खासकर पति तो अपनी पत्नी को छूकर पूरी रात उकसाते रहते है””. मै रात भर हलकी हलकी नींद में कुसुम के स्तनों को दबाता तो कभी कुसुम के कठोर हो चुके निप्पलो को चूस कर उसे और उकसाता, और कुसुम बिस्तर में ही बेचैन होकर अपने तन को काबू में करने की कोशिश करती पर दोनों के जिस्म एक दुसरे के और करीब आ जाते.

और देखते ही देखते न जाने कब सुबह हो गयी दोनों को पता भी न चला. कुसुम बिस्तर में अभी भी पति की बांहों में लेटी हुई थी. उसने ब्लाउज तो पहना हुआ था पर उसके हुक खुले हुए थे और स्तन बाहर निकले हुए थे. कितने सुन्दर और सुडौल लग रहे थे वो स्तन. कुसुम की कमर के निचे अब भी साड़ी लिपटी हुई थी. साड़ी पहनने का यह तो फायदा है कि उसे बिना उतारे ही प्यार करने का आनंद लिया जा सकता है. और फिर उस साड़ी का मोहक कपडा यदि सैटिन हो तो पति पत्नी दोनों ही उसके स्पर्श से और उत्तेजित हो जाते है.

सुबह सुबह कुसुम की आँखें अब भी नींद से बंद थी. पर मै उसे ऐसे ही थोड़ी छोड़ने वाला था. मै तो कुसुम की कमर के निचे उसकी साड़ी पर हाथ फेरते हुए कुसुम की चूत को छूकर तरसाने लगा. क्योंकि कुसुम ने अन्दर पेंटी नहीं पहनी थी मेरा लंड खडा होकर चादर से उभरकर दिखने लगा.

मै अपनी पत्नी की इस खुबसूरत चूत को साड़ी पर से ही पकड़कर सहलाने लगा. कुसुम एक बार फिर बदहवास हो रही थी. लेकिन जहाँ एक ओर पति जब चाहे तब रोमांटिक होने को तैयार होते है, वहीँ एक पत्नी अपनी ज़िम्मेदारी भी जानती है. कुसुम को पता था कि उसे उठकर अपने सास ससुर पति के नाश्ता की तैयारी करनी है. खुद पर काबू करते हुए कुसुम ने अपने पति के हाथ को हटाया और बोली, “छोडो न जानू. मुझे अब तुम्हारा नाश्ता बनाना है”

“ऐसे कैसे छोड़ दू अपनी प्यारी पत्नी को. आखिर मुझे उसे भी तो खुश करना है.”, मैने कुसुम के लबो को चुमते हुए कहा. पर कुसुम मुझसे दूर होकर बिस्तर पर उठ बैठी और बोली, “मुझे खुश करना है या तो तुम्हारी अपनी ख़ुशी है. चलो अब छोडो मुझे.”

कुसुम ने अपनी साड़ी जो उठकर घुटनों के ऊपर तक आ गयी थी, उसे सरकाकर निचे किया. और फिर अपने ब्लाउज के हुक लगाने लगी. इतने सुन्दर स्तन वापस उस सेक्सी ब्लाउज में कैद होते देख मै और उत्तेजित होने लगा. ये पति भी न! ऐसे ही होते है. और फिर मै बोला, “ठीक है तुम्हे मुझे इसी तरह छोड़कर जाना है तो चली जाओ. पर तुम्हारी ये पेंटी मैं नहीं दूंगा.” मेरे हाथ में कुसुम की पेंटी थी.

“तो ठीक है. तुम्ही रख लो उसे. मैं बिना पेंटी के ही चली जाती हूँ.”, कुसुम हँस पड़ी और अपने सीने को साड़ी के आँचल से ढंकती हुई बिस्तर से उठ खड़ी हुई और अपने पति को तडपाती हुई जाने लगी. और मै वहीँ दिल में हसरतें लिए रह गया.

मुस्कुराती हुई कुसुम जब किचन पहुंची तो उसने देखा कि उसकी बेटी रिंकी जाग चुकी थी और ब्रेड टोस्ट का नाश्ता कर रही थी. कुसुम को एहसास हुआ कि उसने पैंटी नही पहनी है और सेटिन की साड़ी में V आकृति उभर कर दिख रही है. उसकी बेटी की जगह सास होती तो कुसुम उसे छिपाने की कोशिश करती.

दूसरी तरफ कल जो बाप और बेटी के बीच हुआ था, उसके बाद से न जाने क्यों रिंकी के दिल में कुसुम को लेकर नाराजगी थी. कुसुम ने रिंकी को अनदेखा करते हुए किचन में जाकर अपने काम करने लगी. सबसे पहले तो उसने अपने बालों को बांधकर जूडा बनाया और फिर पति के लिए चाय बनाने लगी.

इस वक़्त रिंकी का चेहरा भी कुछ उखड़ा हुआ था.

“लगता है कल रात पति-पत्नी के बीच बहुत प्रेम लीला हुई है.”, रिंकी ने अपनी मम्मी से कहा. उसकी आवाज़ में एक गुस्सा साफ़ झलक रहा था. आखिर उसे रात को मम्मी पापा (पति-पत्नी) की काम क्रीडा के दौरान आवाजें सुनाई पड़ ही गयी थी. पर क्यों नाराज़ थी वो कुसुम से? आखिर वो उसकी सगी माँ थी. फिर क्यों आज वो इतनी नाराज़ थी, ये तो वो खुद भी नहीं जानती थी.

“हाँ.. हमने कल रात प्यार किया है. तुझे क्या करना है?” हम पति पत्नी जो चाहे सो करे, मेरे पति तेरे पापा है, ये हमेशा याद रखना और अपनी मम्मी से इस तरह बात करते हुए तुझे शर्म नही आती…! कुसुम ने भी लगभग उखड़े स्वर में जवाब दिया.

 न जाने क्यों रिंकी को अपनी मम्मी को देखकर गुस्सा आ रहा था. वो समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसे अपनी मम्मी से क्या परेशानी है. अपनी मम्मी से रुखा जवाब मिलने पर रिंकी बिना कुछ कहे उठकर किचन से अपने कमरे की ओर चली गयी. और कुसुम भी अपने पति के लिए चाय बनाने में व्यस्त हो गयी.

अपने कमरे में बिस्तर में नाइटी पहनी रिंकी लेटी हुई अपने मन से लड़ रही थी वहीँ उसकी मनोदशा भी कुछ अलग ही थी. और उसके मन में एक गुस्सा भरा हुआ था. करवटें बदलती हुई रिंकी के मन में अपनी मम्मी के प्रति क्यों इतना गुस्सा था वो खुद समझ नहीं पा रही थी. यदि उसकी मम्मी ने उसके पापा (अपने पति) के साथ रात को सेक्स किया तो रिंकी को इस बात से क्यों फर्क पड़ रहा था?  रह रह कर उसके मन में  उसे रात की मम्मी की पापा के साथ किये सेक्स की आवाजे आ रही थी ऐसा क्यों हो रहा था उसेक साथ? वो मम्मी पापा के बीच हुए सेक्स के बारे में क्यों सोच रही थी? खुद के मन को रिंकी खुद ही नहीं समझ पा रही थी. उसका मन कर रहा था कि अपने कमरे से निकल कर अपनी मम्मी पर चीख पड़े. ऐसे ही न जाने क्या क्या सोचती हुई रिंकी न तो आज नहाई थी और न आज स्कूल गयी थी. उसे अपने कमरे के बाहर खटपट की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी. ज़रूर उसकी मम्मी अब नहाकर आ चुकी होगी और बाहर के कमरे में कुछ कर रही होगी. पर थोड़ी देर में वो खटपट भी बंद हो गयी. क्या उसे बाहर जाकर मम्मी से कुछ कहना चाहिए? और कहे भी तो क्या कहे? यही कि उसकी मम्मी उसके पापा (अपने पति) के साथ सेक्स न करे? ऐसा कैसे कह सकती थी वो. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो करे भी तो क्या करे? पर इस तरह बिस्तर में करवट बदलते तड़पती तो नहीं रह सकती थी वो. उसे कुछ तो करना होगा.

जारी है…….

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