टोना टोटका – Update 23 | Incest Story

टोना टोटका - Erotic Incest Story
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टोना टोटका – Update 23

राजु की गाङी अब लीला के साथ चल निकली थी जिससे उसने रुपा भुला सा दिया था, मगर इधर राजु को आये महिना भर ही हुवा था की राजु के बीना रुपा का बुरा हाल हो गया। शरु शुरु मे तो उसका जब दिल करता तो वो अपनी पति को अपने उपर चढा लेती थी जो की उसे आधे अधुरे तो पहुँचा देता, और बाकी का काम रुपा अपनी उँगलियों से अपने आप कर लेती थी, मगर लण्ड की जगह उँगलियाँ कैसे ले सकती थी और वो भी राजु के जैसे एकदम कङे व कुँवारे लण्ड की, उपर से उसमे जवानी भी नयी नयी फुटी थी इसलिये जवानी के जोश से वो एकदम भरा हुवा था।

जैसी कुटाई उसकी चुत की राजु अपने लण्ड से कर देता था वैसी कुटाई करना ना तो रुपा के पति के बस की बात थी और ना वो अपनी उँगलियों से वैसा कुछ कर सकती थी इसलिये जल्दी ही रुपा का मन अपने पति व उँगलियों से ये सब करके उब सा गया और उसकी चुत राजु के लण्ड के लिये तङपने लगी। अब सीधे सीधे तो वो किसी से कुछ कह नही सकती थी इसलिये अपनी सास व पति को उसने ये कहकर मना लिया की अभी कुछ दिन वो अपने मायके रहकर आ जाती है नही तो बाद जब उसका ज्यादा पेट दिखने लगेगा तो शरम के मारे वो अपने मायके नही जा पायेगी…

रुपा का पति व सास उसके पेट से हो जाने से पहले ही काफी खुश थे इसलिये रुपा के कुछ दिन मायके मे रहकर आने का उन्होने भी कोई ऐतराज नही किया। रुपा के पति को वैसे ही दुकान से फुर्शत नही मिलती थी उपर से फसल की कटाई के बाद दुकान पर नये बीज व खाद आदि लाने का भी काफी काम हो जाता है, मगर फिर भी एक रोज दुकान से समय निकालकर रुपा का पति उसे खुद ही उसके घर तक छोङ गया। 

रुपा अपने ससुराल से ही सोचकर आई थी की किसी ना किसी बहाने वो घर जाते ही राजु को अपने उपर चढा लेगी इसलिये घर आकर वो इतनी खुशी थी की उसने अपने पति को भी जाते समय मुङकर नही देखा। वो सीधे ही अपने सामान का थैला लेकर घर मे घुस गयी। अब घर के बाहर का दरवाजा तो खुला ही था मगर एक कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द था। घर आकर रुपा अब एक बार तो अपनी माँ को आवाज देने को हुई, मगर तभी कमरे के अन्दर से सिसकने कराहने व पलँग की चरमराने की सी आवाजे सुनकर वो एकदम चौँक सी गयी…

अब रुपा इतना तो समझती ही थी की इस तरह की आवाजे कब और क्यो आती है, इसलिये कमरे के दरवाजे के पास कान लगाकर पहले तो पहचानने की कोशिश करने लगी की, कमरे के अन्दर कौन है, मगर उसे जब कुछ समझ नही आया तो वो कभी राजु के साथ गप्पु की बहन की कल्पना करने लगी, तो कभी राजु के साथ पङोस की ही लङकी रेशमा के बारे मे सोचने लगी।

राजु के साथ कमरे मे जो भी था उससे रुपा को जोर की जलन सी हो रही थी तो साथ ही राजु पर भी जोरो का गुस्सा सा आ रहा था इसलिये एक बार तो उसका दिल किया की वो अभी ही कमरे का दरवाजा खुलवाकर राजु के साथ जो भी है उसे रँगे हाथो पकङ ले, मगर फिर कुछ सोचकर वो बिना कुछ बोले चुपचाप घर से बाहर आकर खङी हो गयी…

बाहर आकर रुपा को अब ये भी डर था की अगर उसे कोई ऐसे घर के बाहर खङे देखेगा तो क्या सोचेगा..? इसलिये घर के अन्दर के साथ साथ वो बाहर भी नजर रख रही थी की कोई उसे ऐसे बाहर खङे देख ना ले, मगर रुपा को ऐसे खङे खङे बहुत ज्यादा इन्तजार नही करना पङा, क्योंकि कुछ देर बाद ही कमरे का दरवाजा खुला और उसमे से सबसे पहले उसकी माँ बाहर निकलकर आई जिससे रुपा की साँसे थम सा गयी..

अपनी माँ के बिखरे बालो व कपङो की हालत से रुपा ये तो जान गयी थी की कमरे मे जो भी दो लोग थे उसमे से एक तो उसकी खुद की ही माँ थी, मगर ये सोचकर उसके दिल की धङकन अब बढ सी गयी की उसकी माँ के साथ जो दुसरा था अखिर वो कौन है..? वो भगवान से अब ये दुवा सी भी कर रही थी की उसकी माँ के साथ कमरे मे जो भी था वो चाहे जो भी हो भगवान की कर्पा से वो बस राजु ना हो..!

कमरे से बाहर आते ही लीला की नजर भी अब घर के बाहर खङी रुपा पर चली गयी जिससे वो भी थोङा घबरा सी गयी और…

“ह्.ह्.ह्.रे..अरे्.. तु कब आई..?” घबराहट मे लीला ने हकलाते हुवे से कहा और इधर उधर देखने के बहाने अपने बिखरे बालो व कपङो को सही से करने की कोशिश लगी जिससे…

“बस अभी आ ही रही हुँ..!” ये कहते हुवे रुपा ने अब एक बार तो अपनी माँ की ओर घुरकर देखा, फिर वो भी घर के अन्दर आ गयी, मगर ये जानने के लिये की उसकी माँ के साथ कमरे मे आखिर दुसरा कौन था..? उसकी नजरे कमरे के दरवाजे पर जम सी गयी। वो अभी भी भगवान से ये दुवा कर रही थी की कमरे मे जो चाहे वो हो बस कमरे से अब राजु बाहर ना निकले..!

रुपा के व्यवहार से लीला भी जान तो गयी ही थी की रुपा ने उसकी चोरी पकङ ली है, मगर फिर भी वो अब कुछ कहती तब तक अपनी कमीज के बटन बन्द करते हुवे राजु भी कमरे से बाहर आ गया जिसे देखते रुपा का दिल‌ एक बार तो रोने को हुवा, मगर फिर उसका चेहरा गुस्से से एकदम तमतमा साल गया। वो अब कुछ कहती तब तक‌ राजु की नजर भी रुपा पर पङ गयी। राजु को नही मालुम था की रुपा ने उसके व लीला के बारे मे‌ सब पता चल गया है इसलिये उसने अब अपनी जीज्जी को हाथ मे थैला लिये देखा तो…

“अरे् जीज्जी…! तुम‌ कब आई..?” ये कहते हुवे वो तुरन्त दौङकर रुपा के गले से लगा गया जिससे रुपा से ना तो कुछ बोलते बना और ना ही कुछ करते। वो गुस्से से एकदम लाल सी हो रही थी इसलिये…

“जीज्जी से बाद मे मिल लेने , जा तो पहले ट्रैक्टर वाले से कल अपने खेतो की जुताई करने को बोल आ..!” लीला ने उसे आँखे दिखाकर डाटते हुवे सा कहा जिससे राजु भी चुपचाप रुपा को छोङकर ट्रैक्टर वाले से अपने खेतो की जुताई के लिये कहने घर से बाहर निकल गया…

“क्या है ये सब माँ..? तुझे राजु के साथ ये सब करते बिल्कुल भी शरम नही आई..?” राजु के घर से बाहर निकलते ही रुपा अब गुस्से से अपनी माँ पर एकदम सवार सी हो गयी जिससे लीला ने एक बार तो चारो ओर देखा की कही छत से उन्हे कोई देख तो नही रहा, फिर…

“चल भीतर चल…, यहाँ कोई देखे सुने इससे अच्छा चल अन्दर कमरे मे बैठकर बात करते है..!” ये कहते हुवे लीला अब रुपा के हाथ से सामान का थैला लेकर अन्दर कमरे मे आ गयी जिससे…

“अब देखना क्या बाकी रह गया, जो नही देखना था वो तो मै खुद अपनी आँखो से देख चुकी हुँ..!” रुपा भी अब लीला के पीछे ही कमरे मे आ गयी, और पलँग पर बिछे बिस्तर पर बिछी चद्दर की अस्त व्यस्त हालत को देखते हुवे कहा। 

“चल बैठ यहाँ, फिर बैठकर आराम से बात करते है..!” लीला ने पलँग पर बैठते हुवे कहा जिससे…

रुपा: नही, मुझे नही बैठना.. ऐसे ही बोल जो तुझे कहना है..!

लीला: अरे.. पहले एक बार बैठ तो सही..!

लीला ने रुपा का हाथ पकङकर उसे बैठाते हुवर कहा जिससे..

रुपा: हो बोलो जो बोलना है..!

ये कहते हुवे रुपा भी अब बिस्तर पर बैठ तो गयी, मगर पलँग पर बिछी चद्दर पर एक जगह राजु व लीला की प्रेमलीला की निशानी का गीलापन सा लगा हुवा था, जिस पर रुपा का हाथ पङ गया। रुपा को अपने हाथ के नीचे अब कुछ गीला गीला सा महसूस हुवा तो उसे भी समझते देर नही लगी की ये गीलापन किसका है जिससे उसे जोरो की घीन्न सी और…

“छीःईई..!” कहते हुवे वो तुरन्त बिस्तर से उठकर खङी हो गयी।

लीला भी समझ गयी थी की रुपा ऐसे क्यो उठकर खङी हो गयी जिससे उसे भी अब जोरो की शरम सी आई इसलिये उसने पलँग से उठकर सारे बिस्तर को ही उठाकर एक ओर रख दिया, मगर रुपा का चेहरा गुस्से से अब और भी जोरो से तमतमा सा गया और…

रुपा: अब छुपाने से क्या होगा.., ये सब करने से पहले सोचना था..?

लीला: कभी तुने भी अपनी माँ के बारे मे सोचा है, विधवा हो गयी तो तो क्या हुवा,  आखिर मै भी तो एक औरत हुँ, मेरे भी कुछ अरमान होँगे, कुछ ख्वाहिशे होती होँगी, कभी सोचा है मेरे बारे मे..? अभी दो महिने भी नही हुवे होँगे राजु को तेरे ससुराल से आये और तु उसके पीछे पीछे ही यहाँ आ गयी जबकी तेरे साथ तो तेरा पति भी है। जब तुझसे अपने पति के रहते भी दो महिने नही रहा गया, तो कभी सोचा है मैने अकेले ये चार साल कैसे निकाले है..! लीला ने पहले तो रुपा को लम्बा चौङ भाषण सा दिया और आखिर मे…

चार साल हो गये तेरे बापु को मरे, कभी सोचा है मैने अकेले ये चार साल कैसे निकाले है, मुझ पर क्या बीतती होगी..!” ये कहते कहते  लीला ने अब रूआँसी सी हो आई…

रुपा को भी अपनी माँ की बाते अब कही ना कही सही ही लगी, क्योंकि चार साल हो आये थे उसके बापु को‌ गुजरे तब से वो अकेली सी हो गयी थी इसलिये रुपा भी अपनी माँ की ओर डबडबाई‌ नजरो से देखने लगी। जब वो खुद राजु के बिना दो महिने भी नही रह सकी तो‌ उसकी माँ तो पिछले चार सालो से अकेली रह रही थी‌..! अपनी माँ की बाते उसे भी अब सही लगने लगी थी मगर उसका राजु के साथ ये सब करना अभी भी सही नही लग रहा था इसलिये…

“पर माँ राजु के साथ..? वो‌ मुझसे भी छोटा है..!” रुपा ने लीला की ओर देखते हुवे ही कहा।

लीला: तो क्या करती..? मुझे क्या पता नही वो छोटा है, पर तेरे ससुराल से आने के बाद वो एकदम‌ मायुस सा हो गया था, पता है रात भर वो सोता तक नही था। यहाँ खेतो‌ मे फसल की कटाई करनी थी नही तो मै उसे वापस तेरे पास भी भेज देती मगर एक रात वो अब खुद ही उठकर मेरे पास आ गया तो मुझसे भी उसे मना नही किया गया।

रुपा: अच्छा..! तो ये सब उसका किया धरा है, आने दे उसे मै बताती हुँ, अपनी माँ समान बुवा के पास जाते शर्म नही आई उस बेशर्म को..?” रुपा का सारा गुस्सा लीला की बजाय अब राजु पर भङक आया।

लीला: उसे क्या कहेगी.. , इसमे उसका भी क्या कसुर, एक बार जरा सोचकर देख, जब उसके बीना तु दो महिने भी नही रह सकी जबकी तेरे साथ मे तो तेरा पति भी था, फिर वो भी क्या करता..? मैने देखी थी उसकी हालत इसलिये तो मै भी उसे मना नही कर सकी..?

रुपा: पर माँ अपनी माँ समान बुवा के साथ ये सब करते उसने एक बार भी नही सोचा..?

लील: उसमे इतनी समझ भी है जो वो ये सोचता..? और तु भी तो उसे अपना भाई समझती थी, जबकी तु तो अपने आपको बहुत समझदार मानती है..!

रुपा: पर वो तो तुमने….

लीला: मैने जो भी करवाया जो किया वो तेरी भलाई के लिये ही किया था पर तुने भी तो इसे अपनी जरुरत समझा, और चलो मैने जो करवाया सो करवाया, फिर अब क्यो आई है उसके पास..?

लीला एक खेली खाई और घाग औरत थी इसलिये उसने जिस तरह से रुपा को ये सब समझाया उससे रुपा को इसमे कुछ भी गलत नही लग रहा था, क्योंकि वो खुद भी तो यहाँ राजु के लिये ही आई थी जब वो खुद राजु के बिना नही रह सकी तो वो अपनी माँ को व राजु को कैसे कुछ कह सकती थी इसलिये उसका गुस्सा अब शाँत सा हो गया। 

लीला भी अब आगे कुछ और कहती तब तक राजु भी वापस घर गया और…

“जीज्जी अब वापस कब जाओगी..?” उसने कमरे घुसते ही रुपा की ओर देखते हुवे पुछा जिससे रुपा ने अब एक बार तो राजु को उपर से नीचे घुरकर देखा, मगर वो कुछ कहती तब तक…

“अभी तो आई है, और आते ही जाने की पुछ रहा है, कुछ शरम भी है तुझे नालायक..!” लीला ने उसे डाटते हुवे कहा जिससे…

राजु: व्.वो.. मै भी तो अब जीज्जी के साथ जाऊँगा ना इसलिये..!, तुमने ही तो बोला था खेतो के काम‌ निपटाकर जीज्जी के पास चले जाना, अब यहाँ खेतो के तो सारे काम कर दिये मैने, इसलिये मै भी अब उनके साथ ही जाऊँगा..!

राजु ने अब ये इतनी मासुमियत से कहा की रुपा का जो रहा सहा गुस्सा था वो भी जाता रहा जिससे…

रुपा: वापस जाऊँगी तब ले चलुँगी, पर अभी तो कुछ दिन मै यही तुम्हारे साथ ही रहुँगी..!

राजु: सच्च मे.!

राजु ने अब खुश होते हुवे कहा जिससे

रुपा:  हाँ.. हाँ.. सच मे..!

मगर तभी राजु की नजर पलँग पर समेटकर रखे हुवे बिस्तर पर गयी होगी की…

राजु: अरे..! बुवा पलँग से ये बिस्तर क्यो हटा दिया..? जीज्जी अब आराम कहाँ करेगी..? 

राजु ने अब पलँग पर समेटकर रखे हुवे बिस्तर को उठाते हुवे कहा जिससे…

“बिस्तर बाद मे लगा देना, पहले अपनी जीज्जी को पानी तो लाकर दे दे..!”

राजु: हाँ अभी देता हुँ..!

रुपा को प्यास नही लगी थी इसलिये वो अब एक बार तो राजु को रोकने को हुई मगर लीला ने उसे मना कर दिया और…

“लगा ले ये बिस्तर..!” लीला ने अब पलँग पर से उठते हुवे कहा तो रुपा अब उसकी ओर हैरानी से देखने लगी जिससे…

 “मै पशुओ को चारा डालकर दुध निकालती हुँ, तब तक थोङी देर कर ले उसके साथ आराम, देखा नही कितना उतावला हो रहा है ये भी तेरे लिये..!” लीला ने अब रुपा की ओर देखकर मुस्कुराते हुवे कहा जिससे रुपा को भी शरम सी आ गयी और…

“नही मै तब तक चाय बना लेती हुँ..!” रुपा ने भी शरम से मुस्कुराते हुवे कहा और लीला के साथ ही कमरे से बाहर आ गयी, तब राजु पानी ले आया था इसलिये…

राजु: कँहा जा रही हो जीज्जी..? ये लो पानी..!

रुपा: कही नही, चाय बना रही हुँ…!

रुपा ने राजु से पानी का गिलास लेते हुव कहा। उसे प्यास नही थी, मगर फिर भी थोङा सा पानी पिकर राजु को गिलास वापस कर दिया जिससे…

“वो बाद मे बुवा बना देगी ना, तब तक तुम आराम कर लो..!” राजु ने पहले तो लीला की ओर देखते हुवे कहा मगर फिर…

“नही तो मै बना देता हुँ…!” उसने गर्दन को नचाकर अब रुपा की ओर देखते हुवे कहा जिससे लीला व रुपा दोनो को ही हँशी आ गयी और…

“जा तु इसके साथ कर ले थोङी देर आराम, नही तो ऐसे ही तेरे पीछे पीछे घुमता रहेगा..!” लीला ने अब धीरे से रुपा के कान के पास मुँह ले जाकर फिर से कहा और दोनो ही अब एक दुसरे को देखकर हँशने लग गयी…

“नही मै बना लुँगी, जा तु माँ की मदत कर दे पशुओ को चारा डालने मे..!” रुपा ने अब लीला की ओर देख हँशते हुवे ही कहा जिससे राजु भी अब मन मसोसकर लीला के साथ पशुओ को चारा डालने बाहर आ गया…..

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