मेरी माँ बहने और उनका परिवार – Update 9

मेरी माँ बहने और उनका परिवार - Family Sex Story
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लगभग एक हफ्ते बाद मुझे कॉलेज के काम से छुट्टी मिली।  इस पुरे हफ्ते पढाई और असाइनमेंट में बिज़ी रहा।  शुक्रवार की शाम जब मैं थका हारा बैठा था तब माँ मेरे लिए चाय नाश्ता लेकर आई।  उन्होंने मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा – थक गया है तू।  मैंने भी उनके गोद में सर रख दिया और लेट गया।  मेरे लेटते ही उन्होंने ब्लाउज खोलकर अपने मुम्मे मेरे मुँह में डाल दिया।  मैं थका मंदा छोटे बच्चे की तरह उनका दूध पीने लगा।  दूध देखते ही मुझे लीला दी का ख्याल आय।

मैंने माँ से कहा – यार नाना ने भी मेरे खड़े लंड पर चोट कर दी।  आज मस्त ताज़ा ताज़ा दूध पी रहा होता।

माँ  भी गुस्से में आ गई।  उन्होंने कहा – रुक अभी बात करती हूँ।

उन्होंने तुरंत नाना को फ़ोन घुमाया – बाउजी ये आपने ठीक नहीं किया।

नाना – क्या हुआ , गुस्से में क्यों है ?

माँ – आपने लीला को झूठी बिमारी का बहाना बना कर यहाँ से बुला लिया।  हम अभी चैन से बैठ भी नहीं पाए थे बात चीत तो दूर की बात है।  इतनी ठरक भी ठीक नहीं है।

नाना – माफ़ कर दे।  तुझे तो पता है इतने दिन हो गए तजा दूध  पिए  हुए।  खुद को रोक नहीं पाया।

माँ – आप इतने स्वार्थी हो गए।  अपने नाती  तक का नहीं सोचा।  कुछ उसका भी हिस्सा है। मत भूलिए लीला के अलावा भी घर में लड़कियां है।  अब आपको किसी का भी दूध नसीब नहीं होगा।

नाना – अरे नाराज क्यों होती है।  आज ही भेजता हूँ लीला और सुशीला को।

माँ – उन दोनों ने भी मेरा दिल दुखाया है। उस लीला की तो शकल भी नहीं देखनी मुझे।  जवान लंड छोड़ कर बूढ़े का लंड लेने चली गई।  उसे

पता भी नहीं कि राज का लंड उसकी उसके भोसड़ा में भी न आएगा।

नाना – क्या कहती है।  मेरे से भी बड़ा।

माँ – मेरा दूध पिया है उसने।  आपसे भी मोटा और लम्बा।  न दीदी को पता न ही लीला को कि क्या खोया है। आज से रिश्ता ख़त्म।  आप भी भूल जाओ कि मैं आपकी बेटी हूँ और आपकी तीन नतिनी और भी हैं।

नाना माफ़ी मांगते रह गए पर माँ ने फ़ोन रख दिया।

मै – क्यों इतना गुस्सा होती हो मेर माँ।  मुझे तो लगा था आप मेरे लिए जुगाड़ कर रही हो पर आपने तो काम और बिगाड़ दिया।

माँ – सब्र रख।  लीला कि भी दिलवाऊंगी।  पर पहले उन सबको एहसास दिलाना जरूरी थे कि मेरा दिल दुखाया है।  अभी वैसे भी उसकी चूत मामा और नाना ने मिलकर सुजा दी होगी।  कोई फायदा नहीं है।

कुछ ही देर में मौसी का भी फ़ोन आया – माँ ने उन्हें भी खूब जम कर सुनाया। माँ ने  उनकी भी एक न सुनी।

शाम को  मामा और मामी घर आये।  उन्होंने माँ से माफ़ी मांगी।  मामा बोले – बाउजी बहुत शर्मिंदा हैं।  माफ़ कर दे उन्हें।  दीदी और लीला भी परेशान है।

माँ – जाने दे।  उन दोनों को पता नहीं क्या खोया है।  बाउजी कि तो ठरक का मैं कुछ कर नहीं सकती पर उन्होंने इस बार मेरे बेटे का दिल दुखाया है मैं माफ़ नहीं करुँगी।

मामी – जिज्जी क्या करें।  बाउजी कि ठरक का तो ये हाल है कि मैं बच्चा नहीं कर पा रही।  दिन रात लगे रहते हैं। मैं इनके साथ समय बिताना चाहती हूँ ताकि ये तो रहे कि बच्चा हम दोनों का हो।  पर वो हमें अकेला छोड़ते ही नहीं।

माँ – हरामी है।  चाहते होंगे तेरे कोख में अपना बच्चा देना।

मामा – गाओं में रुकते नहीं।  कहते हैं माँ कि याद  आती  है। मंजू और सुशीला जिज्जी को भी बोला पर सब घबराते हैं।

माँ – तुम दोनों ही कुछ दिनों के लिए घूम आओ।  इनके लिए कोई काम वाली लगा जाओ।

माँ – गाओं से ही किसी को बुला लो।

मामा – ठीक है।  ये भी सही है।  घूमने का ही प्लान कर लेते हैं।

माँ  को तभी सुधा दी का ख्याल आया।  वि भी तो बच्चा चाहती थी।  उन्होंने तुरंत सुधा दी को फ़ोन मिलाया। उनकी सास से बात की।

तय हुआ कि सुधा दी , उनके पति भी घूमने जायेंगे।  उससे किसी को शक भी नहीं होगा।  मामा मामी भी साथ में वहीँ निकल जायेंगे।  इधर से मैं जाऊंगा।  मौका देख कर मैं और सुधा दी एक हो लेंगे।  कुछ दिनों की छुट्टी में सुधा दी और मामी पेट से तो हो ही जाएँगी।

दोनों ने अपने डेट्स चेक किया कि कौन सा समाया उचित रहेगा दोनों के गर्भ के लिए। मामा मामी एकदम खुश हो गए।

मामी ने इसी ख़ुशी में बोल दिया – जिज्जी लीला ने भले ही राज को दुखी किया हो पर मेरा वादा है बच्चे के बाद मेरे दूध पर पहला हक़ राज का ही होगा।  अबकी बाउजी भी कुछ नहीं कर पाएंगे। मैं तो एकदम खुश हो गया।

मामा बोले – मेरा क्या होगा ?

मामी – मिलेगा पर बाद में।  जब राज परमिशन देगा।

मामा – ऐसा न हो घूमने जाने पर तुम्हारा इरादा बदल जाए और कहो मेरी जगह राज का बच्चा चाहिए।

मामी – उसके लिए निश्चिंत रहो।  पहला बच्चा आपका ही है।

मामा – मतलब दूसरा इसका हो सकता है।

मामी शर्मा कर – पहला तो कर लें।

फिर तय हुआ कि हम सब घूमने गोवा जायेंगे।  मामा मामी और मैं यहाँ से।  सुधा दी और उनके पति उनके घर से।  सुधा दी सोनिया को लाना चाहती थी पर माँ चाहती थी कि मेरा फोकस सिर्फ दीदी पर रहे।  हमारी प्लानिंग सुन कर सरला दी और जीजा भी तैयार हो गए। वो भी अब बच्चा चाहते थे।

हम सबकी तयारी देख श्वेता भी लालच में आ रही थी।  उसका भी गोवा घूमने का मन था।  उसने माँ से कहा।  माँ ने उसे भी मना कर दिया। श्वेता फिट भी जिद्द में थी।  माँ ने कहा – देख वहां ये सब एक तरह से हनीमून पर जा रहे हैं।  राज तो सिर्फ सुधा के लिए जा रहा है।  सब आपस में मशगूल रहेंगे तो वो बोर हो जाएगी।

श्वेता फिर भी जिद्द पर थी  आखिर में माँ के मुँह से निकल गया – देख ले।  अगर राज ने वहां तुझे भी चोद कर माँ बना दिया तो मत कहना।

अब श्वेता के पास कोई जवान नहीं था।  मन मसोस कर रह गई।

मैंने माँ को बोला  – जाने दो न।

माँ – क्या तुम दोनों अपने आप को रोक पाओगे ?

मैं भी चुप रह गया।  मेरे मन में आस थी कि शायद श्वेता कि चूत भी मिल जाये। पर श्वेता भी माने तब न। उसने तो अपनी चूत अपने होने वाले के लिए बचा कर रखी थी।

एक हफ्ते बाद का प्लान बना था।  सभी तैयारी में जुट गए थे। मैंने माँ से कहा-  माँ सुधा दी के लिए तो एक तरह कि पहली सुहागरात होगी।  मैं उन्हें कुछ गिफ्ट करना चाहता हूँ।  माँ यह सुन कर बड़ी खुश हुई।  उन्होंने अपने लाकर से अपना हार निकाला और मुझे देते हुए कहा – मैं तुझसे बहुत खुश हूँ।  चाहती हूँ सुधा भी एकदम खुश रहे।  बेचारी ने बहुत दिनों तक अपने आप को कष्ट दिया है।  मेरी बेटी में कोई कमी ना होने के बाद भी उसकी कोख सुनी थी।  तू अब उसे भरेगा।  ये गिफ्ट सके लिए है।  फिर माँ ने पापा कि एक अंगूठी मुझे दी।

मैंने कहा – माँ तुमने अपना हार तो दीदी को दे दिया पर अपनी असली बहु को क्या देगी।

माँ – क्या है तू। अभी एक सुहागरात के लिए जा रहा है पर चिंता अपनी किसी और की  है। खैर ये मेरा अपना हार है।  मेरी बेटी के लिए।  बहु के लिए खानदानी हार बचा कर रखा है। तू चिंता न कर।

मैं एकदम से खुश हो गया।  मैंने माँ को गले से लगा लिया।  माँ ने कहा – अब तू ये लिपटा चिपटी छोड़ दे।  अपने पानी को बचा।  तुझे रोज पौस्टिक खाना है।  मुझे स्वस्थ नाती चाहिए।

मैं – नाती व पोता ?

दोनों हंस पड़े।

नाना दुखी थे उन्हें लग रहा था कि उन्हें सजा मिल रही है।  पर शायद उनके लिए सजा नहीं सरप्राइज था। हमारा ट्रैन में एसी टू में रिजर्वेशन था।  जब ट्रैन में मैं , मामा और मामी बैठे थे।  सुधा दी और सरला दी हमें सीधे गोवा में रिसोर्ट पर ही अपने पतियों के साथ ही मिलने वाली थी।  सब जोड़े में थे एक मैं ही अकेला था।  पर गोवा जाकर मेरा ही जोड़ा बनना था।  वहां हमारी  एक सुन्दर से रिसोर्ट में बुकिंग हुई थी। सबके लिए हनीमून सूट बुक हुआ था।  रिसोर्ट का अपना प्राइवेट बीच भी था। ट्रेन में रस्ते भर मामा और मामी आपस में चुहलबाजी करते रह।  मैं एकदम बोर हो रहा था।  मुझे लगा कि मेरी दो दिन से ऊपर कि यात्रा जीवन कि सबसे खराब यात्रा होगी।

मुझे सरला दी के साथ कि ट्रैन यात्रा याद आ गई।  कितना मजा आया था।  उस यात्रा ने मेरी जिंदगी बदल दी थी।  खैर ट्रैन यात्रा महत्वपूर्ण नहीं थी।  मजा तो गोवा पहुंच कर आने वाला था जब मेरी मुलाकात सुधा दी से होगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे उनके साथ शुरुवात होगी।  क्या वो इतनी आसानी से मुझे अपनी चूत दे देंगी।  मैं तो बस ख्यालों में खोया रहा। मामा और मामी बेहद खुश थे , बहुत समय बाद उन्हें अकेले समय बिताने का अवसर मिला था।  पर मै खुश से ज्यादा रोमांचित था।  अपने ख्यालों में खोया हुआ। उन खयालो में इतना डूबा था की मैंने मामी के ऊपर भी ध्यान नहीं दिया , जिन्होंने जाने अनजाने में मुझे सेक्स करने की आजादी दे दी थी।  पर मैं इस समय उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था क्योंकि ये समय सिर्फ उन दोनों का था।  दोनों की यही इच्छा थी।  मैं कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहता था। 

खैर हम गोवा पहुँच ही गए। रिसोर्ट में हमारे लिए तीन कमरे बुक थे। मेरे लिए अलग से एक कमरा बुक था जो सुधा दी के कमरे से एकदम सटा हुआ था।  उस कमरे का एक दरवाजा दीदी के कमरे में ही खुलता था।

ट्रेन की यात्रा से सब थके थे।  दिन में फटाफट खाना खा कर आराम करने लगे।  मैंने अभी तक सुधा दी या सरला दी को नहीं देखा था।  मेरे कमरे में शलभ जीजा आये।  उन्होंने मुझे बधाइयाँ दी।  मेरे मन में सवाल था कि क्या ये सब देख उन्हें अजीब नहीं लग रहा है ? क्या उन्हें बुरा नहीं लग रहा है ? मैंने आखिर उनसे पूछ ही लिया – जीजाजी आपको अजीब नहीं लग रहा मेरा और सुधा दी का सम्बन्ध होने वाला है ?

शलभ – मुझे तो तब भी आश्चर्य नहीं हुआ जब तुम सरला को चोद रहे थे।

अब मेरे चौंकने कि बारी थी।  मैंने पुछा – आपको पता है ?

शलभ – हाँ।  मैं और सरला सिर्फ पति और पत्नी ही नहीं हैं एक दोस्त भी हैं।  बल्कि यूँ कहू कि सरला मुझे इतना प्यार करती है कि उसने लौट कर मुझे सब खुद ही बता दिया।

मैं – आप नाराज नहीं हुए ?

शलभ – नहीं।  हर घर का एक राज है।  मेरे घर का भी एक राज है।  वैसा ही जैसा तुम्हारे घर का।  बस मैं सही समय देख रहा था , सरला को सब बताने का।  पर उसके तुम्हारे से सम्बन्ध बना लेने पर सब आसान हो गया।

मैं सोच में डूबा ही था कि जीजा ने कहा – अभी ज्यादा टेंशन मत लो।  सब मालूम पड़ जायेगा।  अभी तुम जिस काम के लिए आये हो वो करो ।

वो फिर अपने कमरे में चले गए।  मैं सुधा दी से मिलना चाह रहा था पर समझ नहीं आ रहा था कि कैसे जाऊं।  बाकी भी कुछ नहीं बोल रहे थे।  सोचते सोचते मुझे नींद आ गई।

शाम को मेरे कमरे की बेल बजी तो मेर नींद खुली।  देखा तो मामी और सरला दी आई हुई थी।  उन्होंने एक पैकेट लिया हुआ था। मेरी हालत देख उन्होंने कहा – जल्दी से नहा ले तेरे लिए ड्रेस है।  पहन लेना और फिर दीदी के कमरे में जाना।  साथ वाले दरवाजे से। 

मैंने पुछा – जीजा ?

सरला दी – उनकी गांड मारनी है क्या ? वो बाहर गए हैं।  रात यहीं तेरे कमरे में आकर सो जायेंगे।  टू दीदी के कमरे में ही सोयेगा।  समझा। 

मैंने हां में सर हिलाया और बाथरूम में घुस गया।  मेरी हड़बड़ी देख दोनों हंसने लगी।  नहाकर मैं सिर्फ तौलिया लपेट कर आया। दोनों तब भी बैठी थी। 

मामी मुझे पहली बार सिर्फ तौलिये में देख रही थी।  मेरी बॉडी देख कर बोली – अब समझ आया सब क्यों दीवाने हैं इसके।  सरला इसका वो भी बड़ा है क्या ? जिज्जी कह रही थी बाउजी से भी बड़ा।

सरला दी आहें भर्ती हुई बोली – सबसे बड़ा।  खानदान का सबसे बड़ा और मोटा लंड मेरे भाई का है। 

उन्होंने झटके से मेरा तौलिया खींच लिया।  मेरा लंड सोया हुआ था।  पर उस स्थिति में भी लम्बाई पूरी ही थी।

मामी ने मुँह पर हाथ रख दिया।  बोली – हाय रे ये सोया है तब ये हाल है।  खड़ा होगा तो चूत फाड़ ही देगा।

दीदी – बोलो इरादा है फड़वाने का? कहो तो मामा के बच्चे का प्रोग्राम कैंसिल।

मैंतब तक अपने कपडे पहनने लगा।

मामी – अभी जो प्रोग्राम तय है वही रहेगा।  लल्ला का लंड सुधा दी को मुबारक।  वही संभालेंगी इस मुसल को।  मुझे तो आपके मामा का प्यारा लंड पसंद है।

मैं तब तक कपडे पहन चूका था।  मेरे लिए एक बढ़िया कुरता पैजामा लाया गया था जिसे मैंने पहन लिया था। 

मैंने उनसे कहा – अब आप लोगो का हो गया हो तो जाएँ। जाकर अपने पतियों से चुदवाएँ।  मुझे सुधा दी के पास जाना है।

दीदी – ओके जीजा जी।  समझ गई।  आपको जल्दी है।  जाइये।

दीदी के जीजा बोलने पर मैं शर्मा गया। 

मामी – देखो लल्ला कैसे शर्मा रहा है।  सच में दूल्हा ही है।  मैं तो वारि जाऊं।

थोड़ी चुहलबाजी के बाद दोनों मेरे कमरे से बाहर चली गई।

मैंने जेब में माँ का दिया गिफ्ट रख लिया था।  मैं अब घबराते , कांपते बीच के दरवाजे तक पहुंचा जो दीदी के कमरे में खुलता था।  घर में पहले ही अपनी माँ और सरला दी को चोद लिया था पर सुधा दी से न जाने क्यों डरता था।  बड़ी थी इस लिए।  वैसे भी शादी जल्दी हो जाने की वजह से उनके साथ जवानी वाले दिन काम ही बिताये थे।  खैर मैंने कांपते हाथों से दरवाजा खोला और अंदर का नजारा देख चौंक गया।  कमरा एकदम सुहागरात के कमरे जैसे सजा हुआ था।  मैंने सिर्फ फिल्मो में ही ऐसा देखा था।  बड़ा सा बेड , ऊपर से उसके चारों तरफ से फूलों की झालर सी लटक रही थी।  बेड पर एक तरफ दीदी एक लाल जोड़े में बैठी थी।  मैं घबराते घबराते उन तक पहुंचा।

मैंने धीरे से बोला – दीदी

सुधा दी बोली – दीदी मत कहो । 

मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या कहूँ।

तभी दीदी ने अपना हाथ मेरे आगे बढ़ाया उनकी हथेली पर एक डिब्बी थी।  दीदी ने हलके से सर उठाया और कहा – इसमें सिन्दूर है।  मेरी मांग में भर दो।  मुझे पूरी तरह से अपना बना लो।  मैं तुम्हारी पत्नी नहीं बन सकती पर उससे काम भी नहीं रहना चाहती।  विधि विधान से तुम जिससे शादी करना चाहो, कर लेना पर सिन्दूर डाल कर मुझे अपना बना लो। 

मैं निस्चल खड़ा रहा।  दीदी फिर बोली – मन नहीं है तो कोई जबरदस्ती नहीं है। 

उनकी बात सुनकर मुझे तुरंत होश आ गया।  मैंने तुरंत आगे बढ़कर उनके हाथ से डिब्बी ली और उसमे से एक चुटकी सिन्दूर निकाल लिया और उनका घूँघट उठा कर उनकी मांग में डाल दिया।  दीदी निचे उतरी और मेरे पैर छु लिए। उन्होंने कहा – आज से आप मुझे सुधा बुलाएँगे।  मैं आपकी पत्नी हुई।

मैंने उन्हें उठा कर अपनी बाँहों में भर लिया।  हम दोनों एक दुसरे के बाहों में थे।  मुझे समजह नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है।  बस जो हो रहा है मैं उसे होने दे रहा था।

मैंने फिर धीरे से उनके सर से चुनरी हटा दी और उनके चेहरे को गौर से देखने लगा।  सुधा दी बहुत सुन्दर थी।  उन्हें देख कर कोई कह ही नहीं सकता था की शादी सुदा है। गोल मटोल चेहरा फुले फुले गाल , लाल होंठ , कजरारे बड़े बड़े नैन।  लाल जोड़े में उनका हुस्न निखार कर आया था।  दोनों (सॉरी तीनो )  बहनो में सबसे गोरी थी। बचपन से ही हम उन्हें दूध की कटोरी कहते थे।

मै बस उन्हें देखे जा रहा था।  तभी दीदी ने गले से हूँ हूँ की आवाज निकाली।  ये मुझे वापस होश में लाने के लिए था।

मैं वापस होश में आया।  मुझे माँ का दिया हार याद आया।  मैंने जेब से उसे निकला और उन्हें पहनाने लगा। दीदी उस हार में और भी खूबसूरत लगने लगीं।

मैंने कहा – दीदी , तुम कितनी खूबसूरत हो।

सुधा दी – मैंने कहा न आप मुझे सुधा कहेंगे।

मैंने कहा – पर मै तो अपनी सुधा दी को प्यार करने आया हूँ।  मैं आपको नाम से नहीं बुलाऊंगा।  मुझे बड़ा अजीब लग रहा है।  और आप भी मुझे भाई या नाम लेकर ही बुलाएँ।

मैंने उनका हाथ पकड़ा और बेड पर बिठा दिया और खुद उनके बगल में बैठ गया । मैंने उनका हाथ पकडे पकडे ही उनके तरफ घूम कर उनसे कहा – आप नाराज मत होना पर मैं आपको आपके नाम से नहीं बुला सकता।  कोशिश करु तो भी नहीं।  काम से काम ऐसे वक़्त में तो नहीं।  मैं आपको सुधा दी मान कर ही प्यार करना चाहता हूँ। 

दीदी – जैसी तुम्हारी इच्छा।  जिसमे तुम खुश रहो। 

मैं – मैं तो बस आप सबको खुश रखना चाहता हूँ।

मैंने अपने होठ फिर उनके होठो की तरफ बढ़ा दिए।  दीदी ने भी मेरा साथ दिया।  दीदी के भरे भरे होठो को मैं पहली बार चूम रहा था।  एकदम रसभरे होठ थे।  हमारा किस लम्बा चला।  हम दोनों में से कोई भी एक दुसरे के होठो को छोड़ना नहीं चाह रहा था।  अंत में सांस फूल गई तो छोड़ा।  मैं एकदम अलग दुनिया में था। मैंने वही बेड पर दीदी को लिटा दिया।  दीदी का पैर निचे लटका हुआ था।  मैं उनके चेहरे को चूमने लगा।  मैंने उनके दोनों आंको को चूमा, फिर गालों को चूम।  उसके बाद मैंने उन्हें कान के लबो को चूम लिया।  उसे चूमते ही दीदी की सिसकारो निकल गई।  दीदी की साँसे भारी हो गई थी।

अब मेरा एक हाथ उनके चोली के ऊपर से ही उनके मुम्मे टटोल रहा था तो दूसरा उनके पेट पर था।  दीदी के मुम्मे एकदम गोल और बड़े थे।  जैसे की बच्चो के छोटे से फुटबॉल जैसे।  उनकी नाभि भी माँ की तरह ही बड़ी, गोल और गहरी थी।  मैं उनको चूम भी रहा था साथ ही उनके मुम्मे और पेट पर हाथ फेर रहा था।  दीदी ने मेरा सर पकड़ा और अपने सीने से लगा लिया।

बोली – इन्हे प्यार करो राज।  ये बहुत प्यासे हैं।  सालों से किसी मर्द ने इन पर ठीक से हाथ नहीं लगाया है।

मैंने अपने दोनों हाथ उनके मुम्मे पर रख दिया दबाने लगा। दीदी की सिसकियाँ तेज हो गई।  मैं अब उनके मुम्मे उनकी चोली से बाहर निकलना चाहता था पर शायद चोली का बटन पीछे था।  मुझे दिक्कत हो रही थी।  दीदी उठ कर बैठ गई और अपनी पीठ मेरी तरफ कर दी। मैंने उनकी चोली का हुक तो खोल दिया पर ब्रा मुझसे नहीं खुल रही थी।  दरअसल माँ घर में ब्रा पहनती नहीं थी तो मुझे वो खोलने की आदत नहीं थी। 

मुझसे न होता देख दीदी बोली – माँ ने तुझे कुछ नहीं सिखाया है।  कैसा चोदू है रे तु।  कहकर  उन्होंने खुद ही अपना ब्रा खोल दिया।

मैंने झट से हाथ आगे करके उनके मुम्मे पकड़ लिए और धीरे से उनके कान में कहा –  माँ ब्रा कहा पहनती है।

दीदी – आह।  तभी।  पर माँ ने दबाना अच्छा सिखाया है।

मैं – आगे आगे देखो दिखता हूँ माँ ने और क्या क्या सिखाया है।

दीदी – आह देखूंगी , सब देखूंगी।  पहले तु जरा मेरे मुम्मे ठीक से दबा।  लगता है सदियों से किसी ने हाथ नहीं लगाया है।

मैंने दबाते हुए कहा – वो तो लग रहा है।  इनपर किसी ने म्हणत नहीं की है।  चिंता मत करो मैं हूँ न। 

दीदी – आह।  माँ के सिर्फ दबाता है क्या ?

मैं इशारा समझ गया।  मैंने उन्हें अपनी तरफ किया और उनके गोद में सर रख दिया और कहा – नहीं , माँ तो मुझे प्यार से पिलाती है।  तुम भी तो माँ जैसी हो , पिलाओ।

दीदी ने बड़े प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरा और अपने एक मुम्मे मेरे मुँह में डाल दिया।  दीदी के निप्पल माँ जैसे बड़े तो नहीं थे।  पर मैं बहुत जल्दी ही उन्हें बड़ा करने वाला था।  थानों में दूध आते ही उनके निप्पल निकल आने थे।  पर इस साइज़ में भी उनके निप्पल मस्त चूसने लायक थे।  मै अब एक हाथ से उनके निप्पल चूस रहा था और दुसरे से दूसरा मुम्मा दबा रहा था।  दीदी पड़े प्यार से मुझे देखते हुए मेरे बालों को सहला रही थी।  उन्होंने कहा – तुम्हे पति तो मान लिया पर तेरा भोला चेहरा देख भाई और बेटा जैसा मान कर ही प्यार करने का जी कर रहा है।

मैंने भी कहा – सच में बहन छोड़ने में ही मुझे भी मजा आएगा।

दीदी ने एक थप्पड़ मेरे गाल पर लगाया और फिर उसी गाल को चूम लिया। 

मैं फिर से दीदी के मुम्मो पर भीड़ गया।  अबकी मेरा एक हाथ दीदी के कमर के पीछे उनके गांड पर पहुँच गया और एक उनकी नाभि पर।

मैंने उनकी गहरी नाभि में ऊँगली से ही चोदना शुरू कर दिया।  दीदी – सससससस क्या करता है।  मेरी चूत थोड़े ही है।  पेट फट जायेगा। आराम से कर।  मैंने फिर उनके पेट पर मुँह लगाकर हवा छोड़ी जिससे हवा छोड़ने जैसी आवाज आई। 

दीदी को गुदगुदी सी हुई वो छटपटाते हुए बोली – बचपन की आदत गई नहीं तेरी।

मैंने कहा – कहाँ , मैं तो अब भी माँ के साथ करता हूँ। 

इसी खेल में दीदी का लहंगा उनके कमर तक आ गया था और जब उनकी नंगी जांघो पर मेरा हाथ लगा तो मुझे ख्याल आया की कमर के नीचे भी तो माल होता है।  मैंने अब दीदी के पेट को चूमते हुए उनके जांघो पर हाथ फेरना शुरू कर दिय।  ऐसा करते करते मैं उनके लहंगे को कमर तक कर दिया। मेरी इस हरकत पर दीदी ने अपने दातो से जीभ को दबा लिया।  दीदी अब उत्तेजना के चरम की तरफ बढ़ रही थी।  पर मैं दीदी के साथ कोई जल्दी नहीं करना चाह रहा था। उन्हें मैं पूरा मजा देना चाहता था।

अब मैंने दीदी के दोनों पैर फैला दिए और उनकी टांगो के सहारे  खींचते हुए बेड के किनारे ले आया।  मैंने उनके दोनों पैर लटका दिए और खुद निचे बैठ गया। अब मैं निचे बैठ कर उनके पुरे पैर को तलवे से लेकर जांघो तक चाटने लगा।  दीदी एकदम बेताब हो गई थी।  उन्होंने अपने हाथो से अपना मुमे दबाने शुरू कर दिया थे।  मुझे पता था की मेरे खानदान में चाटने और चटवाने में बहुत मजा आता है।  लगता था दीदी को सदी के बाद किसी ने ऐसे प्यार नहीं किया था।  अब दीदी ने अपने एक हाथ अपनी चूत पर लगा दिया।  वो पैंटी के ऊपर से ही अपनी चूत मसलने लगी।  मुझे समझ आ गया कि अब दीदी चुदासी हो गई हैं।  पर मैं अभी उन्हें और प्यार करना चाहता था। 

मैंने कहा – मैं हूँ न दीदी, अपने हाथो को क्यों तकलीफ दे रही हो।

दीदी ने मेरे सर को पकड़ा और मेरा मुँह अपनी चूत पर रख दिया।  कहा – तकलीफ तो ये दे रही है।  देख पानी पानी हो चुकी है।

मैंने कहा – मैं हूँ न साफ़ करने के लिए। 

दीदी – ये रस तेरे लिए ही तो है।  पी जा राज।  पी जा।

मैंने अब पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत पर मुँह रख दिया।  उनकी चूत से क्या खुशबु आ रही थी।  मैंने जैसे ही अपना जीभ उनके चूत पर फिराया, दीदी के कमर ने एक जोरदार झटका दिया और उन्होंने मेरा सर अपने हाथ के बल से अपनी चूत पर जोर से दबा दिया।  मेरे मुँह लगाते ही उनकी चूत धराशाही हो चुकी थी।  दीदी के शरीर में कम्पन हो रहा था और वो धीरे धीरे स्खलित हो रही थी।

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