मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका – Update 6

मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका - Erotic Story
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दो मिनिट में शान्ताबाई बाहर आयीं. थोड़ी अपसेट लग रही थीं. “ये क्या चल रहा है भैयाजी? कौन है वो लड़का जो अंदर सोया है? मुए ने लीना बाई की बॉडी और चड्डी भी पहन रखी है लगता है”

मुझे हंसी आ गयी पर किसी तरह से मैंने उसे दबाते हुए कहा “कहां शान्ताबाई? लीना ही तो है. आपने चेहरा नहीं देखा?”

“इतना बड़ा तंबू बना है उसकी चड्डी में और तुम कहते हो लड़की है. मैं सब समझती हूं कि क्या चल रहा है.” शान्ताबाई ने कमर पर हाथ रखकर कहा. लीना से छिपाकर मैं कुछ लफ़ड़ा कर रहा हूं, और वो भी एक जवान लड़के के साथ, यह विचार उसे सहन नहीं हो रहा था.

“शांत हो जाओ मेरी प्यारी शान्ताबाई. वो लीना का भाई है, मेरे साथ बंबई घूमने आया है. लीना वहीं है अपने मायके. मेरे को लगा कि तुम अपने आप समझ जाओगी”

वे थोड़ा नरम पड़ीं, फ़िर बोलीं “ऐसे औरतों की अंगिया क्यों पहने है? अजीब लड़का है, वैसे लंड तो अच्छा खासा लगता है, कितनी जम के खड़ा था नींद में. मैंने हाथ लगाया तो जाग गया, फ़िर घबरा गया कि ये कौन औरत अंदर बेडरूम में है”

मैंने उन्हें ललित की फ़ेतिश के बारे में समझाया. वैसे वे होशियार हैं, एक मिनिट में सब समझ गयीं. हंसकर बोलीं “बस इतनी सी बात है ये कुछ हजम नहीं होता भैयाजी. माना उस छोकरे को ये पहनने की आदत है पर इधर आप दोनों अकेले घर में, वो छोकरा सोते वक्त भी वो सब पहने … ब्रा व्रा … मस्ती चल रही है लगता है बाई की पीठ पीछे. याने आप को भी लौंडेबाजी का शौक चढ़ ही गया”

“अब शान्ताबाई … क्या कहूं …. वो इतना सुन्दर छोकरा है और हूबहू लीना जैसा लगता है. ऊपर से उसका ये औरतों के कपड़े पहनने का शौक, अब अगर उसको लीना समझकर मेरा मन डोल जाता है तो बुरा क्या है? और भले लौंडेबाजी हो, अगर दिल आ गया तो बुरा क्या है? आप नहीं करतीं लीना के साथ लौंडीबाजी? साली नहीं है तो साले को साली समझा तो इसमें क्या गैर है?”

इस बात पर शान्ताबाई मुंह पर आंचल रखकर हंसने लगी. फ़िर बोली “भैयाजी, मैं चलती हूं, लगता है मैं फालतू ही आ गयी. आप की रंग रेलियां चलने दो, जब लीना बाई आ जायेगी तो मेरे को बता देना”

“अरे नहीं शान्ताबाई, मुझे आपकी जरूरत है, आपकी मदद के बिना ये काम नहीं होगा, बड़ी नाजुक जगह आकर मामला अटक गया है”

“आप दो जवान मर्द … आपको मेरी क्या जरूरत होगी भैयाजी”

मैंने धीरे धीरे सब समझाया कि कैसे पिछले चार दिनों में ललित -ललिता के साथ सब तो कर लिया मैंने पर अब तक चोद नहीं पाया उसके घबराने की वजह से. फ़िर बोला “याद है शान्ताबाई, एक दिन आपने कैसी मदद की थी? वेसेलीन नहीं था और लीना जरा ऐसे रूठे चिढ़े मूड में ही थी?”

उस दिन असल में ये हुआ था कि मेरा जम के मूड था लीना की गांड मारने का. शादी के बाद उसने बस एक बार मुझसे मरवाई थी. मैं वैसे हठ नहीं करता पर दो दिन से लीना जैसी टाइट जीन पहनकर घूम रही थी, उसके गोल मटोल चूतड़ एकदम लंड को पागल कर गये थे. अब संयोग ऐसा कि वेसेलीन की बॉटल नहीं मिल रही थी. लीना वैसे भी इस बात से दूर भागती थी, अब तो बहाना मिल गया था. इस बात पर मैं उसे मना रहा था, वो शान्ताबाई ने काम करते करते सुन लिया था. फ़िर उन्होंने मदद की, और उस दिन लीना को दुखा भी कम, और काफ़ी मजा भी आया.

“हां भैयाजी, अच्छी तरह याद है” मुंह चढ़ा कर शान्ताबाई बोली “मैंने ठंडा मख्खन लाकर दिया था फ़्रिज से और फ़िर बाई को अपने ऊपर लेकर सोई थी उसको दिलासा देने को. आप मर्द लोग भी कैसे गांड के पीछे पड़ जाते हैं ये देखकर मेरे को तो बड़ी हैरत होती है. इतनी गरम रसीली रेशमी चूत से क्या आप का मन नहीं भरता?”

“अब कैसे समझाऊं शान्ताबाई, बस समझ लो किसी वजह से दिल जुड़ गये हैं मेरे और ललित के. रही गांड की बात, लीना की मैं नहीं मारता क्या? उतनी ही खूबसूरत ललित की गांड है. आखिर मिठाई तो मिठाई है. और वह भी मिठाई चखाने को एकदम तैयार है, जरा घबरा रहा है बस.”

“ठीक है ठीक है भैयाजी, मैं समझ गयी, चलो मैं तैयार कर लूंगी उसको, अब जरा अंदर चलो और उसे समझाओ, मुझे देख कर नींद से जागते ही घबरा गया बेचारा” शान्ताबाई बोली.

मैं उनके साथ अंदर गया. जाते जाते बोली “बस एक घंटा लगेगा मुझे, उस छोकरे को भी फुसला लूंगी और आप के लिये तैयार रखूंगी”

मैं अंदर गया. ललित पलंग पर बैठा था. आधी नींद में था. पर अब अचानक शान्ताबाई के आने से जरा परेशान लग रहा था. मैंने उसके पास बैठ कर कहा “ललिता डार्लिंग – यह है शान्ताबाई, बस जैसे वहां राधाबाई हैं वैसे ही समझ लो.” सुनकर ललित जरा आश्वस्त सा होता दिखा.

“फिर ठीक है जीजाजी, नहीं तो क्या धक्का लगा मेरे को – नींद खुली और …. ये बैठी थीं यहां … मेरा पकड़कर …”

“अरे मैंने ही उन्हें अंदर भेजा था कि लीना सोई है अंदर. सोचा जरा मजाक कर लूं. वैसे शान्ताबाई बहुत लाड़ दुलार करती हैं लीना दीदी के” मैंने ललित को समझाया.

“तू मत टेन्सन ले बेटे.” ललित के बाजू में बैठ कर उसके गालों को सहलाती शान्ताबाई बोलीं. अब तक लगता है वे भी फिदा हो गयी थीं ललित पर. छोकरे की जवानी ही ऐसी थी. “ये तेरे जीजाजी जरा ऐसे ही मजाकिया हैं. अब उठो. दस बजने को आये, तुम लोगों ने नाश्ता भी नहीं किया होगा, मैं बनाती हूं. उसके बाद नहा धो लो. भैयाजी – आप जाकर अपना काम करो, मैं उपमा बनाती हूं. ललित बेटा, जरा मुंह धो लो और आकर मुझे थोड़ी मदद करो”

बीस मिनिट बाद शान्ताबाईने बुलाया. मैं डाइनिंग रूम में गया तो देखा कि शान्ताबाई चम्मच से ललित को उपमा खिला रही थीं. ललित भी आराम से खा रहा था. लगता है इतनी सी देर में ही शान्ताबाई का वशीकरण मंत्र चल चुका था.

“बहुत अच्छा उपमा है मौसी, एकदम सॉफ़्ट और टेस्टी. आप दोसे भी बनाती हो क्या?” ललित बोला. याने अब पहली बार मिली शान्ताबाई बीस मिनिट में मौसी बन गयी थी.

“खाओगे? वो भी बना दूंगी, चलो अब जल्दी जल्दी इतना और खा लो और नहाने चलो, मैं तुमको नहला देती हूं. भैयाजी, नाश्ता करके आप भी नहा वहा लो”

मैं खाने लगा. उधर ललित बोला “अब मैं बच्चा थोड़े ही हूं मौसी कि …”

“जानती हूं मेरे लाल” उसके अब भी आधे खड़े लंड को पकड़कर शान्ताबाई बोलीं “तभी तो कह रही हूं, अब बच्चों को नहलाने में मेरा क्या फायदा?”

“करवा ले करवा ले मौसी से नहाने का करम. ये मुझे और लीना को भी कभी कभी नहला देती हैं.” मैंने ललित को कहा.

शान्ताबाई ने ने बचा हुआ उपमा ललित को खिलाया और फ़िर हाथ पकड़कर खींच कर ले गयीं. ललित बेचारा अभी भी जरा परेशान था. शान्ताबाई के पीछे जाते वक्त मुड़ कर मेरी ओर देखा जैसे कह रहा हो कि बचा लो जीजाजी, पर मैंने बस उसे आंख मार दी.

नाश्ता खतम करके मैंने भी आराम से नहाया, बदन पोछा और थोड़ी देर तक ईमेल देखीं. आधे घंटे के बाद बेडरूम में दाखिल हुआ.

शान्ताबाई एकदम नंगी बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. उनके जरा गीले से बालों से लग रहा था कि उन्होंने भी नहा लिया था. उनकी मोटी मोटी टांगें फैली हुई थीं और उनके बीच ललित झुक कर मजे से उनकी चूत चाट रहा था. इतना मग्न था कि मेरे आने का पता भी उसको नहीं चला.

ललित को देखकर मैं दंग रह गया. शान्ताबाई ने एकदम खास सजाया था उसको. याने था वही ब्रा और पैंटी में पर क्या पैंटी थी! काली, छोटी सी और एकदम तंग. लीना ने शायद हनीमून पर पहनी वाली थी. ललित के आधे से ज्यादा गोरे गोरे चूतड़ नंगे थे. और ऊपर से उस पैंटी में पीछे से एक छेद था, बड़ा सावधानी से जैसे किसी ने ठीक गुदा के ऊपर एक दो इंच का छेद कर दिया था. उसमें से ललित का लाल गुलाबी गुदा दिख रहा था. पहले मैं अचंभे में पड़ गया कि ये क्या चक्कर है, फ़िर देखा तो शायद शान्ताबाई ने उसपर हल्की लिपस्टिक से चूत जैसी बना दी थी.

ब्रा गुलाबी रंग की थी. लगता है कहीं अंदर से ढूंढ कर निकाली थी. और विग वही था पर शोल्डर लेंग्थ बालों को पीछे से एक जरा सी चोटी में क्लिप से बांध दिया था जिससे ललित का रूप ही बदल गया था.

शान्ताबाई लेटे लेटे ललित के सिर को पकड़कर अपनी चूत पर दबाये हुए थीं और मस्ती में गुनगुना रही थीं. “बहुत अच्छे बेटे … बहुत अच्छे मेरे लाल … कितना प्यार से चाटता है राजा मेरी चूत को … तेरी दीदी की याद आ गयी … लीना बाई भी एक बार शुरू होती हैं तो घंटे घंटे सिर दिये रहती हैं मेरी टांगों में …”

मुझे देखकर बोलीं “भैयाजी, आपने ये नहीं बताया कि हमारा ललित बेटा चूत का कितना दीवाना है. बाथरूम में मेरी बुर देखी तो सीधे उसके पीछे ही पड़ गया. यहां भी देखो कैसे चूस रहा है. कहता है कि पूरा रस निचोड़ कर ही उठूंगा”

ललित उनकी बुर में से मुंह निकाल कर बोला “तुम्हारा रस तो खतम ही नहीं होता मौसी … अब चोदने दो ना, जैसा तुमने वायदा किया था.”

उसके सिर को कस के वापस अपनी जांघों के बीच खोंसते हुए शान्ताबाई बोलीं “पहले अपना काम तो पूरा कर, फ़िर वायदे की बात कर. तुमने कहा था ना कि एक एक बूंद निचोड़ लूंगा मौसी, तो पहले निचोड़. और आप भैयाजी, ऐसे क्यों खड़े हो? आओ ना यहां” अपने बाजू में बिस्तर को थपथपा कर वे बोलीं.

मैं जाकर उनके पास बैठ गया. उन्होंने मेरा सिर नीचे खींच कर कस के मेरा चुंबन लिया, दो तीन मिनिट शान्ताबाई से चूमा चाटी करने में गये, उनके चूमने के अंदाज से ही लगता था कि कितनी गरमा गयी थीं वे. मैंने उनकी मांसल चूंचियां एक दो मिनिट मसलीं और फ़िर उनके निपल एक एक करने चूसने लगा.

“आह … हाय … आज कितने दिनों के बाद दो मर्द मेरे से लगे हैं …. और चूसो भैयाजी … आह अरे कितने जोर से काटते हो … दुखता है ना” सिसककर वे बोलीं पर मैंने निपल चबाना चालू रखा. उन्होंने मेरा सिर अपनी छाती पर दबा लिया और बोलीं “वैसे ये लौंडा लाखों में एक है भैयाजी … इतना चिकना लौंडा नहीं देखा … ये इसके चूतड़ देखो, लीना बाई की बराबरी के हैं … और लंड भी कोई कम नहीं है भैयाजी … एकदम कड़क गाजर जैसा …”

मैं ललित के नितंबों पर हाथ फेरने लगा. अब मेरा लंड कस के तन्ना गया था. मुंह में पानी आ रहा था तंग काली पैंटी में से आधी दिखती उस गोरी गोरी गांड को देख कर, असल में लीना की गांड मारे भी तीन चार हफ़्ते हो गये थे और मेरा लंड बेचारा गांड को तरस गया था. मैंने ललित के पेट के नीचे हाथ डालकर टटोला तो उसका भी हाल बुरा था, लंड एकदम तना हुआ था. मैं ललित के चूतड़ मसलने लगा.

“शान्ताबाई … अब नहीं रहा जाता” मैंने उनकी ओर देख कर कहा. वे बोलीं “तो चख लो ना मिठाई, ऐसे दूर से क्या ललचा रहे हो”

मैंने झुक कर ललित के नितंबों को चूम लिया. कब से यह करने की इच्छा थी मेरी. उसके बदन में सिरहन सी दौड़ गयी. मैंने पैंटी के छेद में से उसके नरम नरम छेद को थोड़ा सहलाया और उंगली की टिप उसमें फंसा दी. उसका छेद कस सा गया. शान्ताबाई ने देख लिया और मुस्कराने लगीं “ललित … याने हमारी ललिता रानी अभी कुआरी है भैयाजी, ऐसे बिचके तो कोई नयी बात नहीं. पर अब चोद ही लो, क्यों ललिता … ललित बेटा … चुदवा ही ले अब अपने जीजाजी से”

“दुखेगा मौसी?” ललित थोड़े कपते स्वर में बोला.

“बिलकुल दुखेगा, आखिर तेरे जीजाजी का सोंटा है, कोई जरा सी लुल्ली थोड़े है. पर इतना मर्द का बच्चा तू, ऐसे क्या डरता है? इससे तो लड़कियां बहादुर होती हैं, एक बार दिल आये, तो जैसे कहो, जिस छेद में कहो, चुदवा लेती हैं. और मैं हूं ना बेटा. भैयाजी, आप जरा वो डिब्बा इधर करो”

पलंग के पास के स्टैंड पर एक स्टील का डिब्बा रखा था. मैंने उसे खोला तो देखा अंदर मख्खन है, घर में बना चिकना ठंडा मख्खन. शान्ताबाई मुस्करायीं, मुझे याद आ गया कि कैसे उन्होंने उस दिन मख्खन लगवाकर लीना की गांड मुझसे मरवाई थी.

“अब ऊपर आ जा मेरे राजा बेटा. ऐसा लेट मेरे पर” कहकर उन्होंने ललित को अपने ऊपर लिटा लिया. ललित उन्हें बेतहाशा चूमता हुआ उनकी चूत में लंड घुसेड़ने की कोशिश करने लगा. “अभी रुक राजा … जरा तेरे जीजाजी को भी तो तैयार होने दे … आप ऐसे इधर आओ भैयाजी”

शान्ताबाई ने हथेली पर मख्खन का एक लौंदा लिया और मेरे लंड पर चुपड़ने लगी. बोली “आप लोग क्यों वेसलीन के पीछे पड़ते हो मेरे पल्ले नहीं पड़ता. अरे मख्खन इतना चिकना है, वो भी घर का मख्खन, इससे अच्छी क्रीम नहीं मिलेगी दुनिया में चोदने के लिये, और चूमा चाटी के दौरान मुंह में चला जाये तो भी अच्छा लगता है, वो वेसलीन तो कड़वा कड़वा रहता है” अपनी मुठ्ठी ऊपर नीचे करके पूरे लंड को एकदम चिकना कर दिया. इतना मजा आ रहा था कि लगा कि ऐसे ही मुठ्ठ मरवा लूं उनसे. उन्होंने उंगली पर थोड़ा और मख्खन लेकर मेरे सुपाड़े पर लगाया और फ़िर हथेली चाटने लगीं “अब आप खुद ही लगा लो ललिता रानी के छेद में. जरा ठीक से लगाना, चिकना कर लेना”

मैंने उंगली पर मख्खन लिया और ललित के गुदा में चुपड़ने लगा. उसने फ़िर गुदा सिकोड़ लिया, लगता है अनजाने में वो अपने कौमार्य को – वर्जिनिटी को बचाने की कोशिश कर रहा था. मैंने शान्ताबाई की ओर देखा और आंखों आंखों में गुज़ारिश की कि आप मदद करो, ये तो गांड भी नहीं खोल रहा है. वे उंगली में मख्खन लेकर ललित की गांड में लगाने लगीं. बोलीं “अब छेद तो ढीला करो ललिता रानी – मेरी उंगली ही नहीं जा रही है तो जीजाजी का ये मूसल कैसे जायेगा! मरवाना है ना? चुदवाना है?” ललित के मुंडी हिला कर हां कहा. “फ़िर छेद ढीला कर अच्छे बच्चे — बच्ची जैसे” मुझे उन्होंने आंखों आंखों में इशारा किया और फ़िर हाथ मिला कर अलग किये. मैं समझ गया कि वे मेरे को ललित के चूतड़ पकड़कर चौड़े करने को कह रही हैं.

मैंने वो मुलायम चूतड़ फैलाये और शान्ताबाई उंगली उसके गुदा पर उंगली रखकर दबाने लगीं. अब उनकी उंगली अंदर धंसने लगी. कई बार उन्होंने मख्खन लेकर छेद में लगाया और उंगली अंदर तक आधी घुसाई. जिस तरह से ललित का गुलाबी छेद चौड़ा होकर उंगली को अंदर ले रहा था, मेरा पागलपन पढ़ रहा था. क्या टाइट कुआरा छेद था! मन में बस यही था कि आज पटक पटक कर चोदूंगा भले फट जाये.

उधर गांड में उंगली करवाने से ललित महाराज भी मस्ता रहे थे, बार बार धक्के मारकर शान्ताबाई की चूत छेदने की कोशिश कर रहे थे. शान्ताबाई ने भी उसको कस के पकड़ रखा था “ऐसे उतावले ना हो मेरे राजा … धक्के मत मार अभी … तेरे जीजाजी को चढ़ जाने दे एक बार … फ़िर तू भी मन भरके चोद लेना. मजा आयेगा. तू मेरे को चोदेगा और तेरे जीजाजी तेरे को चोदेंगे. चलिये, आ जाइये भैयाजी”

पर ललित से रुका नहीं जा रहा था, वह शान्ताबाई से चिपटा जा रहा था और उनकी बुर में लंड डालने की भरसक कोशिश कर रहा था. देख कर उसपर तरस खाकर शान्ताबाई ने अपनी चूत खोल ली और अगले ही पल ललितने अपना लंड पेल दिया. फ़िर चहक कर बोला “कितनी टाइट चूत है मौसी … आह .. ओह”

शान्ताबाई की बुर सच में इतनी टाइट है कि लगता है जैसे किसी एकदम जवान लड़की की हो. प्रकृति का यह चमत्कार ही है कि इतने मांसल खाये पिये बदन के साथ ऐसी सकरी चूत उनको मिली हो.

ललित अब तक सपासप चोदने लगा था. शान्ताबाई ने उसको अपने हाथों पैरों में कसकर उसके धक्के बंद किये और बोलीं “अब जरा रुक मेरे राजा … इतना उतावला ना हो … तेरे को अकेले अकेले ये मजा नहीं करने दूंगी मैं … अपने जीजाजी को भी अंदर डाल लेने दे, फ़िर तुम दोनों चोदना एक साथ. चलिये भैयाजी, अब देरी मत कीजिये”

उन्होंने मेरी मदद की. सिर्फ़ होंठ हिला कर बिना आवाज किये मूक स्वर में बोलीं “धी ऽ रे ऽ धी ऽ रे ऽ प्या ऽ र से ऽ” फ़िर ललित के चूतड़ पकड़कर चौड़े किये, पैंटी के छेद में से उसका सकरा गुलाबी छेद दिख रहा था, खुला हुआ. मैंने सुपाड़ा जमाया और धीरे धीरे पेलने लगा. लगता था कि सटक जायेगा, छेद इतना सकरा था पर मैंने सुपाड़ा जमाये रखा. उसकी टिप अंदर फंसने के बाद मैं थोड़ा रुका. ललित ने गुदा सिकोड़ लिया था इसलिये मैंने जबरदस्ती नहीं की. शान्ताबाई प्यार से उसके नितंबों को सहलाने लगीं. “अब जरा खोल ना बेटे … बेटी तेरे जीजाजी के लिये, बेचारे कैसे तरस रहे हैं देख जरा. बस जरा ढीला छोड़ …. “

उनके पुचकारने का असर हुआ, धीरे धीरे ललित का छेद ढीला होता सा लगा, मैंने तुरंत मौका देख कर पूरा सुपाड़ा ’पक्क’ से अंदर कर दिया. अब मेरा सुपाड़ा अच्छा खासा मोटा है, उसे दुखा होगा क्योंकि उसका बदन थोड़ा ऐंठा और मुंह से एक हल्की सी आवाज निकली, हल्की सी क्योंकि शान्ताबाई ने ललित के मुंह में अपनी एक नरम नरम चूंची ठूंस रखी थी. यहां ललित थोड़ा तड़पा, और वहां उन्होंने कस के उसका सिर अपनी छाती पर और भींच कर आधा मम्मा मुंह में भर दिया. फ़िर मुस्कराकर मुझे इशारा किया कि अब पेल दो. उनकी भी आंखें चमक रही थीं, ऐसे अपनी मालकिन के छोटे भाई की गांड मारी जाती देख कर शायद बड़ी एक्साइटेड हो गयी थीं. उधर मैं एकदम मस्त था, ऐसा लग रहा था कि किसी ने कस के मेरा सुपाड़ा मुठ्ठी में पकड़ा हो.

मैंने जोर लगाया और आधा लंड ललित के नितंबों के बीच उतार दिया. ललित का बदन एकदम कड़ा हो गया. शान्ताबाई ने इशारा किया कि बस अब रहने दो. ललित फ़िर जरा तड़पने सा लगा था पर मेरे लंड पेलना बंद करते ही फ़िर रिलैक्स होकर शान्ताबाई की बाहों में समा गया.

“बस हो गया राजा …. देखा फालतू घबराता था तू. अब चोद मेरे को, तब से लगा है कि मौसी चोदूंगा, अब कर ले अपने मन की”

ललित धीरे धीरे शान्ताबाई को चोदने लगा. मैं वैसे ही उसके ऊपर झुक कर बैठा रहा. उसके चोदने से अपने आप मेरा लंड इंच भर उसकी गांड के अंदर बाहर हो रहा था. ललित की गांड ऐसी टाइट थी जैसी शायद किसी लड़की की चूत नहीं होती होगी. अपार सुख का आनंद लेता हुआ मैं अब भी किसी तरह अपने आप पर संयम रख कर बैठा रहा.

कुछ देर के बाद अचानक ललित ने कस के धक्के मारने शुरू कर दिये, लगता है शान्ताबाई की टाइट योनि ने उसको गाय के थन की तरह दुहना शुरू कर दिया था जो उनकी स्पेशलिटी थी. बेचारा कामदेव के उस बाण को कैसे सहता.

अब अपने आप ललित की गांड चुद रही थी. एक दो मिनिट मैंने और सहन किया, फ़िर मुझसे ना रहा गया. मैंने झुक कर ललित के बदन को बाहों में लिया और उसके नकली स्तन पकड़कर दबाते हुए घचाघच चोदने लगा. ललित का सिर तो शान्ताबाई की छाती पर दबा हुआ था, वे उसके मुंह में अपनी चूंची ठूंसी हुई थीं, पर उनका वो मादकता से दमकता चेहरा मेरे सामने था. मैंने शान्ताबाई के रसीले होंठ अपने होंठों में पकड़े और उनके मुखरस का पान करते हुए लंड पेलने लगा. दो चार धक्कों में ही मेरा पूरा लंड जड़ तक ललित की सकरी नली में समा गया. मुझे लगा था कि ललित चिलायेगा या तड़पेगा पर शायद अब वह इतना गरमा गया था कि बिना रुके शान्ताबाई को चोदता रहा. मैंने अपने स्ट्रोक उससे मैच कर लिये याने जब वह अपना लंड शान्ताबाई की चूत में पेलता, तो मैं अपना लंड उसकी गांड से करीब करीब सुपाड़े तक बाहर निकालता और जब वह लंड बाहर की तरफ़ खींचता तो मैं जड़ तक उसके नितंबों के बीच अपना लंड गाड़ देता.

यह तीव्र चुदाई अधिक देर चलना संभव ही नहीं था. मैं ऐसा कस के झड़ा कि जैसे जान ही निकल गयी. हांफ़ते हांफ़ते मैं नंगे शरीरों के उस ढेर के ऊपर पड़ रहा. शान्ताबाई और ललित अब भी जोश में थे, ललित हचक हचक कर चोद रहा था और शान्ताबाई नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवा रही थीं. मैं झड़ जरूर गया था पर लंड अब भी तना हुआ था, एक दो मिनिट लगे लंड को जरा बैठने को, तब तक ललित की चुदाई चलती रही और मेरे चुदे लंड के ललित की नली के घर्षण से मेरे सुपाड़े में अजीब सी असहनयीय गुदगुदी होती रही. मुझसे और सहा नहीं जा रहा था पर फ़िर जल्दी ही ललित भी भलभला कर झड़ गया.

शान्ताबाई ने मुझे आंख मारी और आंखों आंखों में पूछा कि मजा आया, मन जैसा हुआ कि नहीं. मैंने पलक झपका कर हां कहा. फ़िर शान्ताबाई ने ललित के कान खींच कर कहा “बस इतना सा चोद के रह गया? अब मैं क्या करूं? मुझे लगा था कि जवान लड़का है, पंधरा बीस मिनिट तो कस के चोदेगा.

ललित बेचारा कुछ कहने की स्थिति में नहीं था. आंखें बंद करके हांफ़ता हुआ पड़ा था.

मैंने कहा “शान्ताबाई, आप को ऐसे नहीं टंगा हुआ छोड़ेंगे, ललिता डार्लिंग, जरा बाजू हट रानी” ललित को बाजू में करके मैं शान्तबाई की टांगों के बीच लेट गया और उनकी बुर को जीभ से चाटने लगा. हमेशा की तरह का मादक टेस्ट था, पर आज उसमें कुछ गाढ़ी सफ़ेद मलाई भी मिली हुई थी. झड़ा होने के बावजूद मेरा मस्ती गयी नहीं थी इसलिये उनकी चूत को निचोड़ता रहा जब तक वे भी एक सिसकी के साथ स्खलित नहीं हो गयीं.

थोड़ी देर से शान्ताबाई ने उठकर कपड़े पहने. “ये क्या शान्ताबाई, जा रही हो? अभी तो शुरुआत हुई है मीठी मीठी”

“अब ये आगे की प्यार मुहब्बत तुम दोनों में ही होने दो, मेरा काम हो गया, मैं तो लीना बाई आ गयी यह सोच कर आयी थी. तुम दोनों का मिलन करवाने को रुक गयी, अब जीजा साले के बीच मैं क्यों आऊं”

“रुक भी जाओ बाई, ये जीजा साला नहीं, जीजा साली का चक्कर है, ये मेरा साला साली से ज्यादा खूबसूरत है, अब ललित लड़का है इसमें मैं क्या करूं. आप रहेंगी तो ऐसे ही ठीक से इसको प्यार कर पाऊंगा”

“मैं आ जाऊंगी परसों.”

“परसों क्यों? कल क्यों नहीं?” मैंने पूछा.

शान्ताबाई उठ कर किचन में गयीं. उनके इशारे से मैं समझ गया कि कुछ बात करना चाहती हैं. मैंने ललित की ओर देखा, वो अब भी पड़ा पड़ा आराम कर रहा था. मैंने उसे किस किया और बोला “ललिता डार्लिंग, ज्यादा दुख रहा है क्या?”

उसने मुंडी हिला कर ना कहा. मैंने उसे पलटाकर उसकी गांड देखी कि सच में फाड़ तो नहीं दी मैंने. गांड ठीक ठाक थी, शान्ताबाई ने लगाये मख्खन ने उसकी तकलीफ़ काफ़ी कम कर दी थी. हां गांड का छेद जो हमेशा बंद रहता है, थोड़ा खुला था और उसमें से उसके गुदा के अंदर का गुलाबी भाग दिख रहा था. ऐसा ही लीना के साथ हुआ था इसलिये मैंने राहत की सांस ली नहीं तो लीना मुझे कच्चा चबा जाती. मैंने ललित को कहा “आराम करो रानी, मैं अभी आया”

ललित बोला “जीजाजी, मौसी को आज रोक लीजिये, बड़ा मजा आया उनके साथ”

“कोशिश करता हूं” कहकर जब मैं किचन में आया तो शान्ताबाई बादाम काट रही थीं. “बादाम का हलुआ बना रही हूं भैयाजी, अब जरा शक्ति चाहिये ना ये सब रंगरेलियां करने को?”

मैंने पूछा कि मुझे क्यों बुलाया था, कुछ कहना है क्या?

शान्ताबाई बोलीं “अब आज इस लड़के को और तंग मत करना भैयाजी”

मैंने कहा कि ललित तो ठीक लगता है, मजे में है, आपके मख्खन ने कमाल कर दिया तो बोलीं “अरे तुम नहीं जानते कि इतने हलब्बी लंड से चुदवाने पर गांड की क्या हालत होती है. उस दिन लीना बाई की भी गांड कैसी ठुक ठुक कर छिल सी गयी थी. वो तो रोने को आ गयी थी, मैंने संभाला था उसको इसलिये कहती हूं कि आज रहने दो, कल से करना फिर से, भले ललित कुछ ना कहे, उसे दुख जरूर रहा होगा, कल तुम दोनों ही जरा सबर से रहो, परसों मैं आ जाऊंगी”

मैं उनको पकड़कर उनके मम्मे दबाते हुए बोला “फ़िर तो आप अभी रुक ही जाओ मौसीजी, आप के भांजे के लिये. और जरा मुझे भी मौका दीजिये, आप आज ठीक से चुदी कहां हैं? आप को ऐसे सूखे सूखे वापस भेजना मुझे अच्छा नहीं लगता”

शान्ताबाई बोलीं “कुछ भी कहते हो भैयाजी, आते ही आपने नहीं चिद दिया था मेरे को?” पर मेरी बात से उनके चेहरे पर लाली सी आगयी थी.

“वो तो जल्दी जल्दी, आप जैसे जोबन वाली अप्सरा को तो फ़ुरसत में मन लगा कर चोदना चाहिये”

उन्होंने एक दो बार ना नुकुर की पर फ़िर तुरंत मान गयीं. वैसे इतना मस्त माहौल छोड़ कर जाने का उनका भी मन नहीं था.

जब तक वे खाना बना रही थीं, तब तक मैंने थोड़ा ऑफ़िस का काम कर लिया. ललित रसोई में उनकी सहायता कर रहा था और गप्पें मार रहा था.

एकाध घंटे बाद खाना खाकर मैं और ललित आकर बेडरूम में आकर शान्ताबाई की राह देखने लगे. मेरे साथ आते वक्त ललित ने शान्ताबाई की ओर देखा तो वे बोलीं “शाम को प्रैक्टिस करवा दूंगी ललिता रानी” और हंस कर उसे आंख मार दी. मुझे बड़ा कुतूहल था कि क्या बातें कर रहे हैं पर मैं कुछ बोला नहीं.

मैं ललित को पास लेकर बोला “तो ललिता रानी, अब बताओ कि बहुत दुखा तो नहीं?”

“बहुत दुखा जीजाजी, कितना बड़ा है आपका, मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे मेरी चौड़ी कर देगा. पर … मजा भी आया जीजाजी, बाद में आप चोद रहे थे तो … दुखता भी था और … मस्त गुदगुदी भी होती थी. … मुझे चोद कर आप को कैसा लगा जीजाजी …. याने दीदी को तो आपने इतनी बार चोदा है … उसके कंपेरिज़न में?”

“बहुत मजा आया मेरी जान … क्या मखमली गांड है तेरी जालिम … पर अपनी दीदी को मत बताना प्लीज़ नहीं तो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगी, कहेगी कि गांड मेरी मारते हो और तारीफ़ और किसी की गांड की करते हो, भले वो उसके छोटे भाई की गांड हो. पर यार ललित … मेरा मतलब है ललिता रानी, तेरी गांड की बात ही और है, कसी हुई, कोमल, मखमली, गरम गरम … एकदम हॉट. मैं तो गुलाम हो गया इस गांड का, अब चाहे तो तू मुझे ब्लैकमेल कर सकता है, मैं कुछ भी कर लूंगा तेरी ये गांड पाने को”

“मैं आप को क्यों ब्लैकमेल करूंगा जीजाजी! आप के साथ तो इतनी मौज मस्ती चल रही है मेरी” वो बोला.

थोड़ी देर से घर का काम निपटाकर शान्ताबाई अंदर आयीं. “क्यों ललित बेटे, ठीक ठाक है ना?”

“हां मौसी, आप ठीक कह रही थीं कि दुखेगा पर मजा आयेगा. वैसा ही हुआ”

“चलो, ये अच्छा हुआ. वैसे तेरी तारीफ़ करनी चाहिये कि तेरे जीजाजी का तूने ऐसे आसानी से ले लिया. तेरी दीदी भी करीब करीब रो दी थी उस दिन”

घर का काम करने के लिये उन्होंने लीना का एक ढीला गाउन पहन किया था. गाउन निकालकर वे बिस्तर पर बैठ गयीं. “चलिये भैयाजी, आप को जो करना है, कीजिये, बहुत देर हो गयी, अब मेरे को जाना है” कहने को वे जल्दबाजी कर रही थीं पर मुझे पता था कि रात भर रोक कर चोदता तो भी वे आसानी से मान जातीं.

“अब पहले आपकी जरा वो स्पेशल बैठक हो जाये शान्ताबाई. आज आपके इस मुलायम माल में घुस जाने का मन हो रहा है” कहकर मैं बिस्तर पर लेट गया और खिसक कर अपना सिर एक बाजू के किनारे पर कर लिया.

“अब ये क्या शौक चर्राया है आज आपको” शान्ताबाई मेरी ओर देख कर बोलीं “पिछली बार दम घुटने लगा था, लीना बाई ने क्या क्या नहीं कहा मेरे को तब”

“अब लीना कभी कभी उलटा सीधा करती है तो मैं क्या करूं बाई? उस दिन मेरा दम वम कुछ नहीं घुटा था, जरा मूड में आकर आपके इस मुलायम बदन की खुशबू ले रहा था मुंह और नाक से, तो वो न जाने क्या समझ बैठी”

“ठीक है, मैं बैठती हूं, मुझे भी अच्छा लगता है ऐसा किसी शौकीन के मुंह पर बैठना. पर एक बार बैठूंगी तो पंधरा बीस मिनिट नहीं उठूंगी ये पहले ही समझ लो. फ़िर मेरे को नहीं बोलना”

“घंटे भर बैठिये ना शान्ताबाई, मुझे ये जन्नत थोड़ी देर और मिलेगी. ललित राजा, तू भी देख, ये नया तरीका है मौसी जैसी मतवाली नार के जोबन को चखने का” ललित बड़े इन्टरेस्ट से ये नया करम देख रहा था.

शान्ताबाई बिस्तर के पास आ कर मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गयीं. मैंने उनके भारी भरकम चूतड़ हाथों में पकड़ लिये और दबाने लगा. एकदम तरबूज थे, रसीले तरबूज. फ़िर टांगों के बीच हाथ डालकर उनकी घुंघराले बालों में छिपी बुर में उंगली की, मस्त एकदम गीली चिकनी थी. वे पीछे देखकर बोलीं “चलो हाथ हटाओ, अब जो कुछ करना है वो मुंह से करो” और वे धप्प से मेरे चेहरे पर अपना पूरा वजन दे कर बैठ गयीं. उनकी मुलायम तपती गीली चूत और नरम नरम नितंबों ने मेरा पूरा चेहरा ढक लिया. मेरा मुंह और नाक दोनों उनके निचले अंगों में समा गये. होठ और ठुड्डी उनकी बुर के पपोटों में दब गये और नाक उनकी गांड के छेद में फंस गयी. मैं बुर के पपोटे चूसने लगा.

ललित की आवाज आयी, वो बेचारा थोड़ा परेशान लग रहा था “मौसी … अरे ये क्या कर रही हो! जीजाजी का तो पूरा चेहरा तुमने दबा लिया, उनको सांस लेने में तकलीफ़ हो रही होगी”

“हो तकलीफ़ तो हो मेरी बला से, मुझे तो मजा आ रहा है. और मैंने तो कहा नहीं था, ये उन्हींकी फ़रमाइश है” शान्ताबाई बोलीं. फ़िर एक मिनिट बाद हंसकर बोलीं “अरे ऐसा क्या परेशान हो रहा है, कुछ नहीं होगा तेरे जीजाजी को. उनको बहुत मजा आता है. पहले मैं भी सोचती थी कि यह क्या पागलपन करते हैं पर उनको अच्छा लगता है तो ठीक है ना. अब तू आ मेरे पास बैठ और मुझको जरा अपने इस प्यारे प्यारे मुखड़े के चुम्मे दे”

फ़िर चूमाचाटी की आवाज आने लगी. शान्ताबाई की ’अं .. उं … अं … चुम … चुम ..’ ज्यादा सुनाई दे रही थी, वे शायद अपनी चपेट में फंसे उस हसीन जवान लड़के के होंठ कस कस के चूस रही थीं. अब साथ साथ वे थोड़ा आगे पीछे होकर अपनी चूत और अपनी गांड मेरे मुंह और नाक पर घिस रही थीं. उस गीले मांस को मैं सन्तरे जैसा चूस कर चम्मच चम्मच उनकी बुर से रिसता शहद पी रहा था.

“अरे सिर्फ़ मेरी छतियां दबायेगा कि चूसेगा भी? चल अब मुंह में ले ले मेरा दुदू” शान्ताबाई की आवाज आयी. फ़िर स्तनपान कराने के स्वर सुनाई देने लगे.

“क्यों भैयाजी? मजा आ रहा है? स्वाद लग रहा है? फ़िर जरा जीभ भी चलाओ ना, मेरी बुर के अंदर डालो जरा और जीभ से चोदो, देखो कैसी टपक रही है मुई पर झड़ती नहीं”

मैंने जीभ डाली और अंदर बाहर करने लगा. बीच में मेरे होंठों पर जो कड़ा कड़ा चने जैसा दाना महसूस हो रहा था, उसको चूस लेता या हल्के से काट लेता. शान्ताबाई अब धीरे धीरे मेरे सिर पर ऊपर नीचे होने लगी थीं. अचानक बोलीं “ललित … आ जा मेरी गोद में … तेरे जीजाजी को जरा और मस्त करते हैं”

कुछ ही देर में उनका वजन एकदम बढ़ गया, ललित उनकी गोद में आ गया था. अब मेरा चेहरा उनकी तपती गीली चूती बुर में ढक गया था. मैंने जो मुंह में आया वो भर लिया. चूसने लगा, बीच में हल्के से काट भी खाया. “उई ऽ मां ऽ … ओह ऽ मां ऽ… करती शान्ताबाई झड़ गयीं और मेरा पूरा चेहरा गीला हो गया.

दो मिनिट सांस लेने के बाद शान्ताबाई ने ललित को गोद से उतारा और लेट गयीं. मेरी ओर बाहें पसार कर बोलीं “अब आ जाइये भैयाजी … बहुत देर से इंतजार कर रहे हैं … और मैं भी कर रही हूं”

“पर झड़ाया तो आपको शान्ताबाई अभी अभी मैंने, फ़िर आप कहां इन्तजार कर रही हैं, इन्तजार तो कर रहा है मेरा ये सोंटा जिसे अब तक आपकी बुर को कूटने का मौका नहीं मिला है” उनकी चूत में लंड पेलते पेलते मैं बोला.

“चुसवाना तो ठीक है भैयाजी पर जब तक बदन के अंदर बड़ा सा लंड न चले, चूत रानी का पेट नहीं भरता” कहकर उन्होंने मुझे खुद के ऊपर चढ़ा लिया. मैं उनपर चढ़ कर चोदने लगा. ये प्योर चुदाई थी, बस घचाघच घचाघच उनकी बुर को मैं कूट कूट कर चोद रहा था. ऐसी चुदाई लीना के सामने करने का ज्यादा मौका नहीं मिलता था इसलिये उन्होंने भी दिल खोल कर चुदवाया, नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर, कमर हिला हिला कर अपनी बुर में लंड पिलवाया. वे ललित को पास लेकर सोयी थीं और उसे बार बार चूम रही थीं. ललित आंखें फाड़ फाड़ कर ये चुदाई देख रहा था. शायद सोच रहा था कि जिस तरह से मैं शान्ताबाई को चोद रहा था, वैसा उसको चोदता तो उसकी गांड का क्या हाल होता!

ललित के चेहरे के भाव देखकर शान्ताबाई जोर से सांस लेते हुए बोलीं “लगता है … ललित राजा ने … जीजाजी के असली कारनामे देखे नहीं हैं … एक नंबर के खिलाड़ी हैं राजा वे … न जाने कहां से सीखे हैं … लीना बाई घर में ना हों तो आधे घंटे में मुझे ऐसे ठोक देते हैं कि दो तीन दिन के लिये मेरी ये बदमाश बुर ठंडी हो जाती है”

“अब लीना जैसी अप्सरा … बीवी हो तो … आदमी बहुत कुछ … सीख जाता है … ललित … पर जरा संभालना पड़ता है … पटाखा है पटाखा … कब फूट जाये पता भी नहीं चलता …” मैंने चोदते हुए कहा.

“हां ललित बेटा … तुम्हारी दीदी याने एकदम परी है … हुस्न की परी ….” शान्ताबाई चूतड़ उछालते हुए बोली “जब से वे यहां … रहने आयीं … तब से मैं देखती थी हमेशा … फ़िर मेरे यहां से सब्जी भाजी खरीदने लगीं … मैं तो बस टक लगाकर देखती रहती थी उनका रूप. और तू जानता है- उसको देखकर मेरी चूत गीली हो जाती थी जैसे किसी मर्द का लंड खड़ा हो जाता होगा. अब उसके सामने मैं क्या हूं , फ़िर भी मेरे पास थोड़ा बहुत माल तो है ना … ” अपने ही स्तनों को गर्व से देखती हुई शान्ताबाई बोली ” … सो मैं भी दिखाती थी उसको अपनी पुरानी टाइट चोली पहन पहन कर. उनकी आंखों को देखकर लगता था कि वे भी मुझे पसंद करती हैं इसलिये बड़ी तमन्ना से रोज राह देखती थी उनकी. और जब एक दिन लीना बाई खुद बोली कि शान्ताबाई, अब भाजी का ठेला छोड़ो और मेरे यहां काम करने को आ जाओ, मेरे को लगा जैसे मन्नत मिल गयी हो”

“वैसे आप भी कम खूबसूरत नहीं हैं शान्ताबाई, बस यह फरक है कि लीना जरा नाजुक और स्लिम है और आप के जलवे एकदम खाये पिये मांसल किस्म के हैं. ये पपीते जैसे स्तन … या ये कहो कि झूलते नारियल जैसी चूंचियां, ये जामुन या खजूर जैसे निपल, ये नरम नरम डनलोपिलो जैसा पेट, ये घने रेशमी घुंघराले बालों से भरी – घनी झांटों के बीच खिली हुई लाल लाल गीली चिपचिपी गरमागरम चूत … अब वो रंभा और उर्वशी के पास भी इससे ज्यादा क्या होगा बाई?” मैंने तारीफ़ की. हमेशा करता हूं, बाई ऐसे खिल जाती हैं कि रस का बहाव दुगना हो जाता है. अब भी ऐसा ही हुई, उनमें ऐसा जोर आया कि डबल स्पीड से नीचे से चोदने लगीं.

अब मस्ती में उन्होंने ललित को बैठने को कहा और फ़िर कमर में हाथ डालकर उसे पास खींचा और उसका लंड मुंह में ले लिया. जब तक ललित ने उनको अपनी क्रीम खिलाई तब तक वे एकदम सर्र से झड़ गयीं. ऐसी झड़ीं कि तीन चार हल्की हल्की चीखें उनके मुंह से निकल गयीं. झड़ने के बाद फ़िर उनको मेरे लंड के धक्के जरा भारी पड़ने लगे. “बस बाबूजी … भैयाजी अब रुक जाओ … हो गया मेरा … ” वे कहती रह गयीं पर मैंने उनके होंठ मुंह में लेकर उनकी बोलती बंद कर दी और ऐसा कूटा कि वे तड़प कर अपना सिर इधर उधर फ़ेकने लगीं.

जब वे पांच मिनिट में उठीं तो पूरी लस्त हो गयी थीं. कपड़े पहनते पहनते ललित से बोलीं “तेरे जीजाजी से चुदवा कर मैं एकदम ठंडी हो जाती हूं बेटा … क्या कूटते हैं … बड़ा जुलम करते हैं … मेरे और तुम्हारी दीदी जैसी गरम चूत को ऐसा ही लंड चाहिये नहीं तो जीवन नरक हो जाता है बेटा. खैर, अब मैं चलती हूं, तुम आराम करो”

“मौसी … तुमने प्रॉमिस किया था” ललित उठकर चिल्लाया.

“अरे भूल ही गयी, चलो बेटा, उस कमरे में चलते हैं” फ़िर मेरी ओर मुड़ कर बोलीं “अब ऐसे ना देखो, कुछ ऐसा वैसा नहीं करने वाली इस छोरे के साथ, करना हो तो सरे आम आप के सामने करूंगी. इतनी भयंकर चुदाई के बाद किसी में इतना हौसला नहीं है कि अंदर जाकर शुरू हो जायें. ललित को कुछ सिखाना है, आप बाहर बैठ कर अपना काम करो अब”

मैं बाहर जाकर बैठ गया. मन हो रहा था कि अंदर जाकर देखूं कि क्या चल रहा है पर फ़िर रुक गया.

करीब डेढ़ घंटे बाद शान्ताबाई बाहर आयीं. मुड़ कर बोलीं “आओ ना ललिता रानी, शरमाओ मत”

और अंदर से साड़ी पहनी, पूरी तरह से तैयार हुई एक खूबसूरत लड़की के भेस में ललित बाहर आया. क्या बला का हुस्न था. मैंने सोचा कि ललित बाकी कैसे भी कपड़े पहने, लीना की तरह की सुंदरता उसकी साड़ी में ही निखरती थी.

मेरी आंखों में के प्रशंसा के भाव देखकर शान्ताबाई गर्व से बोलीं “ये खुद पहनी है इसने, आखिर सीख ही गया, एक घंटे में चार पांच बार प्रैक्टिस करवाई मैंने, वैसे सच में शौकीन लड़का है भैयाजी हमारा ललित, नहीं तो लड़कियों को भी आसानी से नहीं आता साड़ी बांधना.”

ललित को सीने से लगाकर वे बोलीं “ललित राजा … अरे अब तुझे ललिता कहने की आदत डालना पड़ेगी, अब मैं परसों आऊंगी, तब तक जो इश्क विश करना है, कर ले जीजाजी के साथ.” ललित वहां आइने में खुद को निहारने में जुट गया था, बड़ा खुश नजर आ रहा था.

बाहर जाते जाते मेरे पास आकर शान्ताबाई बोलीं “भैयाजी, जरा बुरा मत मानना, आप को कह कर गयी थी कि कुछ नहीं करूंगी पर अभी मैंने अंदर साड़ी पहनाते पहनाते फ़िर से ललित का लंड चूस लिया, आप को बुरा तो नहीं लगेगा भैयाजी?”

“मुझे क्यों बुरा लगेगा बाई? आप को मौसी कहता है आखिर. पर अभी फिर से याने … अभी एक घंटा पहले ही तो चोदते वक्त आपने चूसा था फ़िर … “

“अरे साड़ी पहनाते पहनाते मुझसे नहीं रहा गया, और लड़के का शौक तो देखो, साड़ी पहनने के शौक में फ़िर लंड खड़ा हो गया उसका. ऊपर से कहता है कि गोटियां दुखती हैं. असल का रसिक लौंडा है लगता है. मुझसे नहीं रहा गया. याने आज रात को ज्यादा मस्ती नहीं कर पायेगा बेचारा, तीन चार बार तो मेरे साथ ही झड़ा है छोकरा. आप ऐसा करो कि आज सच में आप दोनों आराम कर लो भैयाजी, कल नये दम खम से अपनी प्यार मुहब्बत होने दो”

“ठीक है बाई, मैं आज ललित को तकलीफ़ नहीं दूंगा”

“और मैंने बादमा का हलुआ बहुत सारा बनाया है रात को भी खा लेना, अच्छा होता है सेहत के लिये, खास कर नौजवान मर्दों के लिये. और भैयाजी …. बुरा मत मानना … एक बात कहनी है …” वे बोलीं. अब तक हम बाहर ड्राइंग रूम में आ गये थे, ललित अंदर ही था.

“अब मैं क्यों बुरा मानूंगा?” मैंने पूछा.

“अरे आप भरे पूरे मर्द हो, और अधिकतर मर्दों को मैं जो कहने जा रही हूं, वो बात ठीक नहीं लगेगी, पर आप उसको इतना प्यार करते हो इसलिये कह रही हूं. ललित को आप बहुत अच्छे लगते हैं, याने जैसा आपने आज उसके साथ किया, शायद उसको भी आपके साथ वैसा ही करना है. आज उसे साड़ी पहनना सिखाते वक्त मैं जब उसके इस लड़कियों के कपड़े के शौक के बारे में बातें कर रही थी तो वो बोला कि जीजाजी भी अगर ऐसे … बन जायें तो बला के सेक्सी लगेंगे.”

“याने ऐसे लड़कियों के कपड़े पहनकर? …” मैं अचंभे में आ गया.

“… और भैयाजी …”

“क्या शान्ताबाई?”

आंख मार कर वे बोलीं “ऐसा मत समझो आप कि उसको बस आपका लंड ही अच्छा लगता है, पूरे बदन पर फिदा है आपके, शरमा कर कह नहीं पाता पर …’ मेरे चूतड़ को दबा कर शान्ताबाई बोली “इसमें भी बड़ा इन्टरेस्ट लगता है छोरे का”

“ऐसा?” मैंने चकराकर कहा “बड़ा छुपा रुस्तम निकला. ठीक है, मैं देख लूंगा उसको”

“डांटना मत. वो आपका दीवाना है” कहकर वे दरवाजा खोल रही थीं तो मैंने कहा “परसों जरूर आइये शान्ताबाई. मैं अब रोज रोज तो छुट्टी नहीं ले सकता, आप आयेंगी तो मन बहला रहगा उसका”

कमर पर हाथ रखकर शान्ताबाई बड़ी शोखी से बोलीं “सिर्फ़ मन ही नहीं, तन भी बहला रहेगा मेरे साथ. अब देखो भैयाजी, सिर्फ़ गपशप करने को तो मैं आऊंगी नहीं, इतना हसीन जवान है, खेले निचोड़े बिना नहीं रहा जायेगा मेरे को”

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