मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका – Update 5

मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका - Erotic Story
Reading Mode

काफ़ी देर ये खेल चलता रहा. आखिर अखिर में बेचारी की बुरी हालत हो गयी, लंड सूज कर लाल हो गया, मैंने खुद को मन ही मन शाबाशी दी कि उसकी ऐसी हालत करने में मैं कामयाब हुआ था. आखिर में उसने मेरा सिर पकड़ा, कस के अपने पेट पर दबाया और मेरे मुंह में लंड पूरा पेल कर धक्के मारने लगा. मैं चुपचाप पड़ा रहा कि देखें क्या करता है. आखिर आखिर में तो मुझे नीचे करके उसने मेरे मुंह को चोद ही डाला. जब झड़ा तब भी मैं चुपचाप पड़ा रहा, बिना झिझके उसका वीर्य निगल गया. उसकी बात सच थी, खारा कसैला सा स्वाद था पर मुझे खराब नहीं लगा, शायद इसलिये कि अब मेरा लंड भी फ़िर से पूरा तन कर खड़ा हो गया था.

आखिर जब ललित मुझपर से हट कर लस्त होकर लेट गया तो मैंने उसकी छाती सहलाकर कहा “रूल तोड़ दिया तूने ललित, ये अच्छा नहीं किया. इसकी पेनाल्टी पड़ेगी तेरे को”

“सॉरी जीजाजी” ललित बोला. पर उसकी आंखों में चमक थी “आप ने सब पी लिया जीजाजी?”

मैंने कहा “हां, वो तो चखना ही था. जवानी की क्रीम है आखिर, कौन छोड़ेगा! मजा आया तेरे को?”

“हां जीजाजी, बहुत मस्त, इतना मजा तो मां और दीदी के चूसने में भी नहीं आता” ललित मुझसे चिपक कर बोला.

“ठीक है, तो उसकी कीमत दे दे अब मेरे को. बोल, इसको कैसे खुश करेगा?” अपना तन्नाया लंड उसे दिखा कर मैंने पूछा.

वो चुप रहा. सोच रहा था कि क्या करूं. वैसे शायद खुशी खुशी वो मुझे एक बार और चूस डालता, पर उसके कुछ कहने के पहले की मैंने कहा “अब तो चोद ही डालता हूं तेरे को, उसके बिना ये दिल की आग नहीं ठंडी नहीं होगी मेरी”

बेचारा घबरा गया. मेरे उछलते लंड को देखकर उसकी हालत ये सोच कर ही खराब हो गयी होगी कि ये गांड में गया तो फाड़ ही देगा. पर बेचारा बोला कुछ नहीं, शायद मैं सच में मारता तो वो चुपचाप गांड मरवा लेता.

पर अपने उस चिकने लाड़ले साले को ऐसे दुखाने की मेरी इच्छा नहीं थी, वो भी पहली रात में.

“घबरा गया ना? डरपोक कहीं का, चल ये टांगें जरा फैला और करवट पर लेट जा” उसकी जांघों के बीच मैंने पीछे से लंड घुसेड़ा और कहा “अब चिपका ले टांगें और पकड़ मेरे लंड को उनके बीच. तुझे क्या लगा कि मैं तेरी गांड मारने वाला हूं. ऐसी ड्राइ फ़किंग नहीं देखी कभी? लीना भी करवाती है कई बार”

उसे पीछे से कस के भींच कर मैं अपना लंड उसकी जांघों के बीच पेलने लगा. उसकी जान में जान आयी. “थैन्क यू जीजाजी … वैसे आप जो कहेंगे वो मैं करूंगा जीजाजी” मुड़ कर मेरी ओर देखते हुए ललित बोला. अपनी जांघों के बीच से निकले लंड के सुपाड़े को उसने अब अपनी हथेली में पकड़ लिया था और जिस लय में मैं उसकी जांघें चोद रहा था, उसी लय में वह मेरी मुठ्ठ भी मार रहा था.

उसका सिर अपनी ओर मोड़ कर उसके चुम्मे लेते हुए मैंने उसकी जांघें चोद दीं. एक मिनिट में मेरे वीर्य की फुहार ने उसकी जांघें भिगो दीं. बड़ा सुकून मिला, आने वाले स्वर्ग सुख का थोड़ा टेस्ट भी मिल गया.

बाद में टॉवेल से उनको पोछता हुआ ललित बोला “जीजाजी … ये वेस्ट हो गया”

“याने?” मैंने पूछा.

“याने आप कहते तो मैं आप को फ़िर से एक बार चूस लेता” ललित बोला.

“आह हा … याने स्वाद अब पसंद आ गया है मेरी ललिता रानी को. अब मुझे क्या मालूम था, पिछली बार तो ऐसा मुंह बनाया था तूने … खैर आगे याद रखूंगा. और ये मत समझ कि आज छूट गयी वैसे हमेशा बचती रहेगी. तुझे चोदे बिना वापस नहीं भेजूंगा ललिता डार्लिंग. चल लाइट ऑफ़ कर और सो जा अब”

पांच मिनिट बाद मुझे महसूस हुआ कि ललित सरककर मेरे पास आया और पीछे से मुझे चिपक गया.

“क्या हुआ ललित?” मैंने पूछा.

“कुछ नहीं जीजाजी, आज बहुत मजा आया, इतना कभी नहीं आया था. थैंक यू जीजाजी … और .. और .. आइ लव यू जीजाजी”

मैं मन ही मन मुस्कराया और आंखें बंद कर लीं. आज एक से एक मीठी बातें हुई थीं, खूबसूरत कमसिन लड़की जैसे जवान साले के साथ सेक्स किया, उसे खुश किया और खास कर अपनी बीवी के छोटे भाई को इतना आनंद दिया, इसका मुझे काफ़ी संतोष था.

जब नींद खुली तो ललित मुझे पीछे से चिपका हुआ था. गहरी नींद में था पर उसका एक पैर मेरे बदन पर था. लंड भी खड़ा था, और मेरी पीठ अर उसका दबाव महसूस हो रहा था. मेरा लंड भी टनटनाया हुआ था जैसा सुबह अधिकतर होता है. लीना के साथ जब होता हूं तो ऐसे में उसे चोद कर ही उठता हूं पर इस वक्त आठ बज गये थे, ऑफ़िस भी जाना था.

मैं तैयार हुआ और फिर जाते वक्त चाय बनाकर ललित को जगाया. लगता है कल के सेक्स से काफ़ी रिलैक्स होकर गहरी नींद आयी थी उसे. बेचारा उठ ही नहीं रहा था. आखिर जब उसके लंड को पकड़कर जोर से हिलाया तब उठा.

चाय पीते पीते मैंने अपना दिन का प्लान उसको बताया “ललित, अब फ़िर से ललिता बन जा. जल्दी. मैं नही हूं फ़िर भी घर में ललिता बनकर ही रहना, ठीक है ना? अपनी शर्त याद है ना?”

उसने सिर हिलाया, मैंने आगे कहा “आज मैं हाफ़ डे की ट्राइ करता हूं. तुम तैयार रहना, घूमने चलेंगे. क्या पहनोगे?”

ललित थोड़ा घबराकर बोला “बाहर जाना है घूमने, वो भी दिन में? फ़िर मैं शर्ट पैंट ही पहनता हूं जीजाजी”

“नथिंग डूइंग, अपनी शर्त लगी है तो लगी है. साड़ी में तू बहुत अच्छा लगता है, आज साड़ी पहन”

“पर मुझे साड़ी पहनना नहीं आता जीजाजी. उस दिन तो मीनल भाभी ने पहना दी थी”

“चलो, ठीक है, फिर तू लीना की कोई जीन्स और टॉप ही पहन ले. हां, हाइ हील सैंडल भी पहनना पड़ेगी”

“मुझे चलने में तकलीफ़ होगी जीजाजी, अब घूमना है तो … ” ललित सकुचाकर बोला.

“तकलीफ़ होगी तो सहन करो उसे. शर्त शर्त है. दिन में प्रैक्टिस कर लेना. और वैसे भी अधिकतर कार से ही जायेंगे, इतना नहीं चलना पड़ेगा”

दोपहर को मैं जब वापस आया तो ललित एकदम मीठी कटारी बना था. किसी मॉडर्न कॉलेज गोइंग दुबली पतली लड़की जैसा मोहक लग रहा था. और उसने लीना की सफ़ेद हाई हील पहनी हुई थी. जब चलता तो थोड़ा संभल संभल कर, पर उस सधी चाल में भी वह सेक्सी लगता था जैसे वो रैंप पर मॉडल्स चलती हैं. मैंने मन ही मन कहा कि ललिता रानी, तुम्हारा रूप इसी लायक है कि अभी तुम्हें बेडरूम में ले जाऊं और कस के – हचक हचक के – पटक पटक के चोद मारूं पर तुमको वायदा किया है तो अभी तो बंबई घुमाऊंगा, वापस आकर आगे की देखूंगा.

मैंने उसे काफ़ी जगहों पर ले गया. गेटवे, नरिमन पॉइन्ट, मरीन ड्राइव. आखिर में अंधेरा होने पर हम मलाबार हिल गये. उसे ज्यादा चलना नहीं पड़ा था, हां जब चलता तो बीच में थोड़ा बैलेंस जाता था. लीना की वो हाई हील पहनना आसान नहीं है. फ़िर भी बेचारे ने मेरे कहने पर पहनीं ये देखकर मुझे उसपर बड़ा प्यार सा आ रहा था. मैं बीच बीच में उसका हाथ पकड़ लेता जब ऐसा लगता कि चलने में तकलीफ़ हो रही है. एक दो बार तो मैंने कमर में हाथ डालकर सहारा दिया. आजू बाजू के लोगों को कोई परवाह नहीं थी, बंबई के लिये ये आम बात थी. हां कुछ मनचले बड़ी आशिकी नजर से ललित की ओर देख लेते थे, फ़िर मुझे देखते जैसे मन ही मन कह रहे हों कि बड़ा लकी है यार जो ऐसी गर्ल फ़्रेंड मिली है.

फ़िर हम गार्डन के एक कोने में कुछ देर बैठे. मैंने अचानक उसे पास खींच कर किस कर लिया. आस पास एक दो जोड़े और थे, वे भी बस यही सब कर रहे थे. ललित कुछ बोल नहीं, बस बदन सिकोड कर चुपचाप बैठा रहा.

मैंने पूछा “अच्छा नहीं लगा डार्लिंग मेरा किस करना? अब सच में तू बहुत सुंदर लग रही है ललिता डार्लिंग”

“बहुत अच्छा लगा जीजाजी, और आप के साथ ऐसे लड़की बनकर हाई हील पहनकर … लचक लचक लचक कर चलने में … भी मजा आया. जीजाजी … मैं गे हूं क्या?”

बेचारा जरा कन्फ़्यूज़्ड लग रहा था. मैंने दिलासा दिया “अरे इस तरह से क्यों सोचता है? अगर हो भी तो कोई गुनाह थोड़े है. पर मेरी ठीक से सुन, परेशान न हो, तू गे नहीं है, पूरा गे होता तो ऐसे अपनी मां, दीदी को मस्ती में चोदता? हां बाइसेक्सुअल जरूर है. तेरे साथ दो दिन बिता कर मुझे भी लगा है कि शायद मैं भी हूं थोड़ा बहुत, शायद सभी मर्द और औरत थोड़े बहुत बाइसेक्सुअल होते हैं, तू जरा ज्यादा है, और ऊपर से तुझे क्रॉसड्रेसिंग करना भी अच्छा लगता है, बस इतनी सी बात है.

मेरी बात से उसे थोड़ा दिलासा मिला क्योंकि जब हम वापस आये तो उसका चेहरा काफ़ी प्रसन्न था, टेन्शन खतम हो गया था.

हम खाना खाकर ही घर वापस लौटे. ललित ने बड़े सलीके से होटल में बिहेव किया. बैठना, उठना, खाना – कहीं ऐसा नहीं लगा कि वह लड़की के भेस में लड़का है. वापस आते समय मैंने सोसायटी के गेट पर कार रोकी और ललित को कहा कि जाकर कुछ फल वगैरह ले आये. उसे लड़की बनके कॉन्फ़िडेन्ट्ली अकेले घूमने का मौका मैं देना चाहता था.

वापस आने के दस मिनिट बाद बेल बजी. ललित अंदर आया. खुश नजर आ रहा था. कोई परेशानी नहीं हुई थी. बस एक घटना हुई थी जिसे वह समझ नहीं पाया था. “जीजाजी, मैं वापस आ रहा था तो मेन रोड के उस ओर एक औरत खड़ी होकर मेरी ओर देख रही थी. मुझे देखकर हंसी और कुछ इशारा किया, मैं समझा नहीं, इसलिये बस मुस्करा दिया और खिसक लिया.”

मैं सोचने लगा कि कौन होगी. “यार अपनी सोसायटी की तो नहीं होगी. नहीं तो रोड के उस पार से इशारे करने का मतलब ही नहीं है. दिखने में कैसी थी? याने अच्छी अपने नेबर्स जैसी थी या नौकरानी वगैरह थी?”

“यहां रहने वाली तो नहीं लग रही थी. उसे देखकर मुझे थोड़ा राधाबाई की याद आयी, वैसे वो औरत राधाबाई से कम उमर की थी”

मेरे दिमाग में अचानक बिजली कौंधी “साड़ी पहने थी?”

“हां जीजाजी, हाथ में खूब सारी चूड़ियां थीं, शायद बड़ी बिन्दी भी लगायी थी. थोड़ी भरे भरे खाते पीते बदन की थी. चेहरा ठीक से नहीं दिखा. कौन थी?”

मैं अपने माथे पर हाथ मारने वाला था पर किसी तरह खुद को रोका, बेचारे ललित को टेंशन हो जाता. इसलिये मैंने उसे कहा “क्या पता! तू मत चिन्ता कर. कोई कल आयेगा तो मैं देख लूंगा. तू जाकर फ़्रेश हो, मैं भी नहा लेता हूं”

जाते जाते ललित ने मुड़ कर बड़ी नजाकत से बिलकुल लड़की के अंदाज में पूछा “जीजू डार्लिंग, आप भी आ जाओ ना नहाने मेरे साथ! मुझे पता है कि आप लीना दीदी के साथ हमेशा बाथ लेते हैं “

मैंने उसे पीछे से पकड़कर कहा “चुदवाना पड़ेगा नहाते वक्त. आऊं?”

ललित मेरी ओर देखने लगा. मैंने जरा छेड़ा “लीना दीदी ने ये नहीं बताया कि नहाते वक्त उसको खड़े खड़े शॉवर के नीचे जब तक चोद नहीं लेता तब तक हमारा नहाना खतम नहीं होता”

थोड़ा संभल कर ललित बोला “पर जीजू … “

“डर मत मेरी जान, इसीलिये तेरे साथ नहाना बाद में होगा … अभी तू जा और नहा ले, मुझे कुछ काम है”

ललित के जाने के बाद मैंने लीना को फोन लगाया. आने के बाद उससे बात ही नहीं हुई थी. उसने भी फोन नहीं किया था. वैसे कोई अचरज की बात नहीं थी, तीनों गरम गरम नारियों में – मां, बेटी और बहू – अकेले में जम के इश्क चल रहा होगा – ये तय था.

लीना को फोन लगाया. पहले पांच मिनिट डांट फटकार और ताने सुने कि कैसे मैं उसको भूल गया, इतना भी वक्त नहीं है जनाब को कि पांच मिनिट फोन कर लेते. फ़िर दस मिनिट उसने बड़े इन्टरेस्ट से ललित के कारनामे सुने कि कैसे वह अब तक लड़की जैसा ही रह रहा है, घर में भी ब्रा पैंटी पहनता है, कैसे मेरे साथ पूरा दिन लड़की के भेस में हाई हील पहनकर घूमा इत्यादि इत्यादि.

“असल बात तो बताओ. बस जीजा साले की तरह रह रहे हो कि कुछ साली और जीजा जैसा भी हुआ है? तुमने उसे परेशान तो नहीं किया अकेले में? “

“अरे ललित एकदम खुश है. कल मेरे साथ सोया भी था हमारे बेड में”

“सिर्फ़ सोया? ” लीना ने पूछा.

“अब मिलने पर बताऊंगा रानी, जरा सस्पेंस तो रहने दो, अगर जीजा साली का चक्कर चल सकता है तो जीजा साले का क्यों नहीं? वैसे तुम्हारे छोटे भाई को बिलकुल फूल – या कली जैसा संभाल कर रख रहा हूं.”

“हां वैसे ही रहो. जबरदस्ती मत करना मेरे नाजुक भैया के साथ. तुम्हारा कोई ठिकाना नहीं, तुम्हारा एक बार खड़ा हो जाये तो तुमको जरा होश नहीं रहता … फ़िर उस बेचारे को अकेले में … उसपर सांड जैसे चढ़ मत जाना”

“अरे डार्लिंग – सारी दुनिया एक तरफ़ और जोरू का भाई एक तरफ़ – और वो तो साले से ज्यादा मेरी प्यारी नाजुक साली है. अब जरा मेरी सुनो, जरा सीरियस बात है. आज शांताबाई ने लगता है ललित को देख लिया दूर से. वैसे वो तुम्हारी ड्रेस में था और दूर से उसने उसे लीना समझ लिया होगा – यही बात मेरे को जरा खटक रही है. अब देखना, वो कल पक्का आकर बेल बजायेगी यह समझ कर कि तुम वापस आ गयी हो”

लीना हंसने लगी “अरे वा… मुझे नहीं लगा था कि ललित इतने अच्छे तरीके से मेरी ड्रेसेज़ पहनने लगेगा, जो शांताबाई भी दूर से धोखा खा जाये. पर इसमें परेशानी की क्या बात है? आती है तो आने दो. तुम्हारा उपवास भी खतम हो जायेगा” अब ये उपवास से ऐसा न समझें कि वह पेट वाले उपवास की बात कर रही थी. वैसे शांताबाई खाना भी बहुत अच्छा बनाती है.

“मुझे ये उपवास मेरे प्यारे साले … सॉरी साली के साथ ही छोड़ना है. अब तो कहीं जरा घुला मिला है मुझसे, इश्क विश्क भी करने लगा है, अब जब असली बात के करीब आ गये हैं तो ये शांताबाई आ टपकी. बेवजह का लफ़ड़ा शुरू हो गया”

“कोई लफ़ड़ा नहीं होगा. तुम शांताबाई को सब बता दो, तुमको मालूम है कि वो मेरे पर तुम्हारे ऊपर भी कितनी जान छिड़कती है, मदद ही करेगी तुम्हारी, जैसी उस दिन की थी” लीना का स्वर थोड़ा शैतानी भरा था.

“मुझे उनकी मदद नहीं चाहिये, जो करना है मैं खुद कर लूंगा. और ऐसी क्या मदद की थी शांताबाई ने?” मैंने पूछा.

“भूल गये? उस दिन दोपहर को … तुम्हारा जम के मूड था पर मैं तैयार नहीं थी क्योंकि वेसेलीन खतम हो गयी थी … नयी बोतल लाना भूल गये थे तुम”

मुझे याद आया. याद आने के साथ ही लंड में गुदगुदी होने लगी, तुरंत खड़ा होने लगा. मैंने दाद दी “याद आया रानी साहिबा, बस, यही ठीक रहेगा, शांताबाई जिंदाबाद.”

“और देखो, मुझे एक दो दिन और देरी हो सकती है आने में. अब मां नहीं आने देगी जल्दी. इसलिये ललित को भी बता देना कि वो भी वापस आने की जल्दी ना करे. वैसे भी उसके कॉलेज की छुट्टी एक हफ़्ते के लिये बढ़ गयी है. चलो, शांताबाई आ गयी ये सुन कर मुझे दिलासा मिला. कल वो रहेगी तो तुम पर कंट्रोल रहेगा. नहीं तो तुम ललित की हालत कर देते”

“इतना क्यों बदनाम कर रही हो डार्लिंग? ललित को एकदम लाड़ प्यार से संभाल रहा हूं मैं. कल सोते वक्त तो ’आइ लव यू जीजाजी’ भी बोला.

“अरे वाह. याने तुमपर अच्छा खासा मरने लगा है ललित. चलो अच्छा है, साले और जीजा के मधुर संबंध हों तो और क्या चाहिये. अब कितने मधुर ये तो उन दोनों पर ही छोड़ देना चाहिये है ना” कहकर लीना हंसने लगी. फ़िर बोली “और अब शांताबाई आ ही रही है तो दोनों काम रोज करने दो अब उसको”

“दोनों काम याने?”

“अब भोले मत बनो. घर का काम और वो … दूसरा वाला काम. समझे?”

“समझ गया मेरी मां. वैसे काम करने में शांताबाई होशियार है. देखें ललित को उनका काम कितना अच्छा लगता है. वैसे तुम बताओ, हमारी सासू मां कैसी हैं? और भाभी जी? उन्होंने जो मुंह मीठा कराया था निकलते वक्त, उसका स्वाद अब भी मुंह में है”

“मां बहुत खुश है, एकदम मस्ती में है, हां जरा परेशान है बेचारी” लीना बोली

“क्यों डार्लिंग?”

“हम दोनों मिलकर जो उसके पीछे लगे हैं कल से. असल में बाजी जरा पलट गयी है. मां ने मीनल भाभी के साथ प्लान बनाया था कि जब लीना आयेगी और हमारे साथ अकेली रहेगी तो उसके साथ ऐसा करेंगे, वैसे करेंगे. पर मीनल भाभी गद्दारी कर बैठी. भाभी को सीधा करना मेरे को आता है. उसके बाद हम दोनों मिलकर मां पर टूट पड़े हैं. मीनल भाभी को भी मौका मिला है अपनी सास के साथ जो मन चाहे करने का. अकेले में तो शायद करने की हिम्मत नहीं होती. कल से मां बेचारी को बेडरूम में ही कैद रखा है, निकलने ही नहीं दिया. उसको बचाने को अब राधाबाई भी नहीं है, गांव गयी है.”

“अरे अरे … ऐसा मत करो … कैसी दुष्ट हो … वो भी मां के साथ …”

“हां हां रहने दो अपनी सिम्पैथी, तुम होते तो ऐसा ही करते … सच अनिल … मां का इतना मीठा रस निकाला है हम दोनों ने मिलके … और अपना रस निकलवाने में उसे भी मजा आता है … वैसे मां तुमको भी याद करती है … दिल जीत लिया है तुमने उसका”

दो तीन मिनिट और नोक झोंक करके मैंने फोन रख दिया. लीना से बात करके हमेशा अच्छा लगता है मुझे.

इसके बाद मैंने थोड़ी वर्जिश की, उठक बैठक लगाईं. वैसे मैं सोसायटीके जिम में जाता हूं रोज पर अभी जरा अज्ञातवास चल रहा था इसलिये अवॉइड कर रहा था. व्यायाम करने के बाद मैं नहाया. बदन पोछकर वैसे ही बाहर आ गया, बिना कपड़े पहने. पहले सोचा देखूं ललित तैयार हुआ या नहीं, फ़िर सोचा इस तरह से उसके पीछे लगना ठीक नहीं है. ईमेल देखने बैठ गया और काम में जुट गया.

जब दो बाहें मेरे गले में पीछे से पड़ीं तब मैंने लैपटॉप से ऊपर देखा. क्षण भर लगा लीना ही है, वो हमेशा बड़े प्यार से ऐसे ही पीछे से मेरी गर्दन में बाहें डालती है. पर ललित था, या ये कहना ज्यादा ठीक होगा कि ललिता थी. अब वहां जो लड़की खड़ी थी उसमें से जैसे ललित का नामोनिशान गुम हो गया था. बदन से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, काली ब्रा और पैंटी में बला की हसीन लग रही थी. मैंने उसे गोद में खींच लिया. देखा तो पैरों में लीना की सिल्वर कलर वाली चार इंची हाई हील थी. याने मुझपर डोरे डालने की पूरी तैयारी करके आई थी ललिता — या ललित? मैंने उसका धीरे से चुंबन लिया. आज उसने हल्की गुलाबी लिपस्टिक भी लगाई थी, स्ट्राबेरी के टेस्ट वाली. मैं उस स्ट्राबेरी को खाने में जुट गया. उस मीठी स्ट्राबेरी को – उन गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों का स्वाद लेते लेते इस बार मेरे हाथ ललित के पूरे बदन पर घूम रहे थे. आज मैं उसके बदन को ठीक से जान लेना चाहता था. कभी उसकी पीठ सहलाता, उसकी ब्रा के स्ट्रैप को खींचता और ट्रेस करता, कभी उसकी कमर हाथ से टटोलता, कभी उसकी छरहरी जांघों की पुष्टता को महसूस करता और कभी उसके नितंबों को पकड़कर दबाता. और अब आखिर में एक हाथ मैंने उसकी पैंटी में डालकर उन मुलायम नितंबों को दबा कर, मसलकर, रगड़कर उनकी नरमी और चिकनाई को पूरा महसूस किया.

उस रात भी मैंने ललिता को नहीं चोदा. याने नहीं चोदना चाहता था ऐसी बात नहीं है, उन खूबसूरत नितंबों के बीच अपना सोंटा गाड़ने को मैं मरा जा रहा था पर जैसे मैं और ललित में टेलीपैथी से ऐसे जुड़ गये थे कि एक दूसरे के मन की बातें बिनकहे समझ रहे थे. ललित ने मेरी तीव्र वासना को पहचान लिया था. मुझे भी यह समझ में आ रहा था कि इस समय ललित पूरा लड़की के माइन्डसेट में आ चुका था और मेरे आगे पूरा समर्पण करना चाहता था, मुझसे हर तरह का सेक्स करना चाहता था पर अब भी मेरी तना हुआ मूसल अपनी गांड में लेने से डर रहा था.

इसलिये वह रात थी बड़ी मादक पर उसमें चुदाई नहीं हुई. आधे घंटे की बेहिसाब चूमाचाटी के बाद जब मैं और रुकने की हालत में नहीं था, तब ललित ने मुझे कुरसी में बिठा कर मेरे सामने नीचे बैठ कर मुझे वह ब्लो जॉब दिया जैसा शायद लीना ने भी कम ही दिया होगा. बहुत देर तक मेरे लंड को कर तरह से चूस कर आखिर जब मुझे झड़ाया तो मुझे ऐसा लगा कि मेरी वासना की शांति के साथ साथ मेरी जान भी निकल गयी हो. इस बार पूरा वीर्य उसने आंखें बंद करके चाव से निगला और बाद में भी निचोड़ता रहा.

इस सुख के बदले में मैंने जब उसे वही सुख देने को पास खींचा तो वह अलग हो गया, जबकि उसका लंड इतना कस के खड़ा था कि पैंटी के अंदर सीधा उसके पेट से सट गया था. मैंने उसके कान में प्यार से कहा “घबराओ मत ललिता डार्लिंग, तुम्हें आज मैं नहीं चोदूंगा. असल में तुम्हारे इस मुलायम बदन में अपना लंड घुसेड़ने को मैं मरा जा रहा हूं, कोई भी कीमत दे सकता हूं फ़िर भी आज नहीं चोदूंगा क्योंकि मुझे इस बात का एहसास है कि तुम अभी तैयार नहीं हो. पर मेरी जान, अब अपने आप को तैयार कर लो, किसी भी हालत में कल तो तुमको मुझसे चुदाना ही होगा. पर आज तुमको मैं इस मस्ताई हालत में सूखा सूखा छोड़ दूं तो पाप लगेगा, अब तू बैठ और मैं तेरे को प्यार करता हूं”

ललित नजर झुका कर बोला “जीजाजी … आज रहने दीजिये, मुझे ऐसा ही चलेगा. मस्ती कल के लिये संभाल कर रखता – रखती हूं, ये ऐसी हालत रहेगी तो कल आपसे चुदाने में आसानी होगी”

मैं समझ गया. बेचारा अपने लंड की मस्ती ऐसे ही बचा कर रखना चाहता था, याने इस मस्ती में मेरे लंड को अपनी गांड में लेने में उसको आसानी होगी ऐसा उसको लग रहा था. बात सच थी, मैंने उसे चूमा और कहा “ठीक है ललिता रानी, जो तुम कहो वैसा ही होगा. अब फ़िर ऐसा करो, कि आज वहां लीना के कमरे में सो जाओ, मैं अपने बेडरूम में सोता हूं. और देखो, सो जाना, इसको …” उसके लंड को पैंटी के ऊपर से दबाकर मैं बोला “हाथ भी मत लगाना”

“ठीक है जीजाजी” ललित बोला.

“नींद आयेगी?”

ललित जरा शर्मिंदगी में मुस्करा दिया, उसका लंड जिस हालत में था उसमें सोना असंभव था. मैंने कहा “चल, स्लीपिंग पिल देता हूं, सिर्फ़ आज के लिये, कल से इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी, नींद नहीं आयेगी तो रात भर चुदाई किया करेंगे”

रात को मुझे भी स्लीपिंग पिल लेना पड़ी क्योंकि के ने दो बार मुझे चूसने के बावजूद मेरा फिर खड़ा हो गया था. अब कल का इंतजार था, और कल की उस मादक घड़ी के पहले शांताबाई आकर क्या गुल खिलायेगी, आयेगी भी या नहीं, इसका भी मुझे अंदाजा नहीं था.

रात को सोने के पहले मैंने ललित से कहा था कि कल मैं छुट्टी ले लेता हूं “और घूमेंगे. एलीफैंटा चलते हैं”

वो पहले खुश हुआ “सुपर जीजाजी. मजा आयेगा” फ़िर नीचे देख कर बोला “वैसे आप छुट्टी ले रहे हैं तो … हम घर में भी रह सकते हैं”

मैं समझ गया कि वो क्या कह रहा है. मेरे साथ और मौज मस्ती करना चाहता था, यह मालूम होते हुए भी कि आज तो उसकी गांड की खैर नहीं है. मुझे उसकी यह अदा बहुत प्यारी लगी. मैंने कहा कि कल सोचेंगे क्या करना है.

इसलिये सुबह मैंने उसे देर तक सोने दिया. मैं लैपटॉप लेकर बैठा काम कर रहा था. बेल बंद कर दी थी कि ललित को डिस्टर्ब ना हो. थोड़ी देर से मुझे बेल स्विच दबाने की आवाज आयी. मैंने पीप होल से देखा तो शान्ताबाई ही थीं. मैंने दरवाजा खोला और उसे अंदर आने दिया. दरवाजा बंद किया और शान्ताबाई की ओर देखा.

शान्ताबाई आज एकदम सज धज कर – साज सिन्गार करके आई थीं. लीना ने उनको दीवाली पर अपनी एक शादी की सिल्क की साड़ी दी थी, वही पहनी थीं. ब्लाउज़ उन्होंने नया सिलाया था क्योंकि लीना का ब्लाउज़ तो शान्ताबाई को हो ही नहीं सकता था, ब्लाउज़ की छाती को ही डेढ़ गुना कपड़ा लगता.

“कल लीना बाई को देखा तो हैरान रह गयी मैं भैयाजी” वो बोलीं. “जाते बखत तो यही बोली थी कि एक दो हफ़्ते बाद आऊंगी. अब कल देखा तो यकीन ही नहीं हुआ. मैं तो रोड के पार आकर बात करने वाली थी पर बाई रुकी ही नहीं. बस मुस्करा कर चली गयी. मैंने भी सोचा कि ऐसा क्या जल्दी थी मोड़ी को कि मेरे से बात किये बिना चली गयी नहीं तो हमेशा तो मेरे बिना एक दिन नहीं जाता उसका. वैसे है कहां लीना दीदी? अंदर ही होगी.”

मैंने हां कहा. शान्ताबाई अंदर जाने लगी तो मैंने हाथ पकड़ किया. “अब लीना से मिलने की ऐसी भी क्या जल्दी है शान्ताबाई? हम भी तो हैं ना यहां, आप के चाहने वाले. जरा हमसे मीठी मीठी बातें कीजिये, हमारा मुंह मीठा कराइये, फ़िर अंदर जाइये अपनी प्यारी छोरी से मिलने, वैसे भी वो सो रही है अभी” कहकर मैंने खींचकर शान्ताबाई को अपने से चिपटा लिया. फ़िर उनको गोद में ले कर सोफ़े में बैठ गया.

“ये क्या भैयाजी! छोड़ो मेरे को. ऐसे खुले में बैठक के कमरे में अच्छा लगता है क्या?” शान्ताबाई थोड़ा शर्मा कर बोलीं. वे हमेशा शुरू में थोड़ा शरमाती हैं और मुझे उनकी ये अदा बड़ी लुभावनी लगती है. मैंने उनकी एक ना सुनी और उनको कस के भींच कर उनका एक चुंबन ले लिया. वे मेरी गिरफ़्त से छूटने की बेमन की कोशिश करते हुए बोलीं. “अब भैयाजी, जरा सबर करो, सबर ना हो रहा हो तो कम से कम अंदर तो चलो. ऐसे खुले आम क्या करम करवाते हो मेरे से. पहले मेरे को देखने दो कि हमारी बिटिया कैसी है, उसको कुछ चाहिये क्या? फ़िर घर का भी तो काम पड़ा है, वो तो जरा कर लेने दो”

“घर का काम बाद में बाई, पहले यह वाला काम करना जरूरी है. और इस वाली दीवाली की मिठाई तो अब तक मैंने चखी ही नहीं” मैंने उनके जरा से मोटे मोटे पर एकदम नरम मुलायम पान से लाल होंठों को कस के चूमते हुए कहा. फ़िर उनकी वो एक विशाल चूंची पकड़ कर बोला “और ये माल तो और मालदार हो गया लगता है बाई सिर्फ़ एक हफ़्ते में. जरा देखें तो ऐसा क्या हो गया इस खोये के गोले को?”

“कुछ भी कहते हो आप भैयाजी” गर्दन को एक खूबसूरत झटका देकर शांताबाई बोलीं. “वजन बढ़ गया है मेरा, अब जाते वक्त लीना बिटिया इतनी सारी मिठाई मेवा मेरे को दे कर गयी, घर में और कोई खानेवाला है नहीं, फ़िर मैंने ही सारी खा डालीं. अब बदन फूलेगा नहीं तो क्या होगा. अब छोड़ो भी, ये क्या कर रहे हो” उन्होंने उठने की एक झूट मूट की कोशिश की पर मैंने पकड़कर नीचे खींचा तो धप से मेरी गोद में वापस बैठ गयीं. फ़िर खुद ही मेरे चुंबन लेने लगीं. विरोध प्रकट करने का नाटक कहिये या लज्जाशील औरतों की तरह पहले नहीं नहीं कहने का एक औपचारिक प्रोटोकॉल कहिये – वो उन्होंने पूरा कर लिया था. अब वे भी अपनी प्यारी दुलारी लीना बिटिया के पति के लाड़ दुलार करने में लग गयीं.

मैंने मौके का फायदा उठाया. मुझे ऐसा एकांत उनके साथ बहुत कम मिलता है, करीब करीब नहीं के बराबर क्योंकि लीना साथ में होती है. इसलिये आज मिले एकांत का मैंने पूरा उपयोग कर लिया. पहले उनके उन भरे भरे होंठों के खूब चुंबन लिये, ऐसे चुंबन शान्ताबाई को बड़े अच्छे लगते हैं, जब मस्त गरम हो गयीं तो उनका ब्लाउज़ सामने से खोला और चुम्मे लेते लेते उनके मोटे मोटे स्तनों को हाथेली में भरके खेलने लगा. वे ब्रा पैंटी वगैरह नहीं पहनती हैं इसलिये सीधे असली काम पर आने को वक्त नहीं लगता. जब मेरी हथेली में उनके निपल खड़े होकर चुभने लगे तो उनको थोड़ी देर तक बारी बारी से चूसा. जब वे मेरी गोद में बैठे बैठे मेरी टांग को अपनी जांघों में लेने की कोशिश करने लगीं तब मैं समझ गया कि भट्टी गरम हो गयी है और रस की फ़ैक्टरी ने अपना काम शुरू कर दिया है.

इसलिये मैंने उन्हें वहीं सोफ़े पर लिटा कर उनकी साड़ी ऊपर की और उनकी घने काले बालों वाली बुर में मुंह डाल दिया. गजब का रस है उनका, अगर लीना का रस किसी महंगी वाइन जैसा है तो शान्ताबाई का खालिस देसी ठर्रा है जो सीधा दिमाग में चढ़ता है. मन भरके रस पीकर मैं उनपर चढ़ गया और लंड उनकी तपती चूत में घुसेड़कर चोद डाला. कहने को शान्ताबाई नाक सिकोड़ कर “ये क्या भैयाजी … ऐसे यहीं … लीना बिटिया आ गयी तो क्या कहेगी … बोलेगी कि मुझसे मिली भी नहीं और सीधे मेरे मर्द को अपने ऊपर ले लिया …” पर ये सब कहते कहते वे खुद मुझसे चिपक कर, मुझे बाहों और टांगों में जकड़कर चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवा रही थीं. ये हमेशा होता है, लीना से उनको भले मुहब्बत हो, मुझसे चुदवाने को वे हमेशा तैयार रहती हैं, आखिर जवान लंड से चुदवाना उन जैसी रसिक गरम औरत कैसे छोड़ेगी!

मैंने झुक कर उनका वो काले जामुन जैसा निपल मुंह में लिया और चूसते चूसते जम के धक्के लगाने शुरू कर दिये. चोद कर बड़ी शांति मिली, ऐसे बस लंड चुसवा चुसवाकर आदमी फ़्रस्ट्रेट हो जाता है, घचाघच चोदे बिना सुकून नहीं मिलता.

मैं पड़ा पड़ा हांफ़ रहा था. दो मिनिट बाद जब जरा शांत हुआ तो मुझे हटाकर शान्ताबाई उठ बैठीं और कपड़े और बाल ठीक ठाक करके बोलीं “चलो … हो गया ना आपके मन जैसा? … अब जरा अंदर जाने दो मेरे को नहीं तो लीना बाई चिल्लाएगी”

“वो सो रही है शान्ताबाई. नहीं तो मुझमें इतनी हिम्मत कहां कि बिना उसकी इजाजत के आपको हाथ तक लगाऊं!”

उठकर साड़ी ठीक करके शान्ताबाई बोलीं “आज क्या छुट्टी पर हो भैयाजी?”

मैंने हां कहा. वे बोलीं “फिर फालतू में इतनी जल्दबाजी की. लीना बिटिया हमेशा आप की छुट्टी के दिन आप को भी अंदर बुला लेती है, किसी बात को ना नहीं कहती. आराम से जरा मस्ती ले लेकर करते तो मुझे भी जरा तसल्ली होती”

मैंने उनकी कमर में हाथ डालकर कहा “दिल छोटा ना करो शांताबाई. इस जवान लंड को तो तुम जानती हो, जब कहोगी तब फ़िर से चोद दूंगा, आपकी इच्छा नुसार”

अपनी नाक सिकोड़ कर आंख मटकाकर उन्होंने मुझे अपना झटका दिखा दिया और अंदर चली गयीं. लगता है लीना से मिलने को बहुत उत्सुक थीं. मैं सोफ़े पर लेट कर राह देखने लगा कि अब क्या कहकर बाहर आयेंगी. शान्ताबाई हमारे यहां कैसे काम करने लगीं वह भी मेरे दिमाग में चलने लगा.

शान्ताबाई को ढूंढकर लाने का श्रेय लीना को ही जाता है. लीना लाखों में एक है और उसकी कामवासना भी लाखों में एक है. जैसे दिन रात धधकते रहने वाली आग. शादी के बार जैसे लाइसेन्स मिल गया है तो और तीव्र हो गयी है. पहले वह सर्विस करती थी, अब छोड़ दी है, घर में अकेले रह कर जैसे उसका टॉर्चर होता है. अच्छा वह ऐसी स्लट नहीं है कि कहीं भी किसी से सेक्स कर ले, उस मामले में बिना परखे या बिना जान पहचान के, बिना उस व्यक्ति के लिये मन में थोड़ी मृदुल भावना आये कुछ नहीं करती. अब मेरा एक मित्र अरुण और लीना की एक सहेली सोनल ने भी शादी कर ली है और उनसे हमारी अच्छी जमती है, हर बात में! दो तीन दिन का वीकेन्ड हो तो साथ रहते हैं, हर चीज शेयर करते हैं, बेड तक. तब लीना को अपनी आग थोड़ी धीमी कर लेने का मौका मिलता है. पर उनके साथ वीकेन्ड बिताने का मौका बस महने में एकाध बार ही आ पाता है.

लीना को मैं बहुत प्यार करता हूं, इतना कि उसकी यह तड़प मुझसे नहीं देखी जाती. मैं तो इतनी हद तक सोचने लगा था कि कोई हैंडसम नौकर रख लूं जो दोपहर में उसे खुश रखे.

पर लीना ने दन से यह आइडिया ठुकरा दिया. “मुझे नहीं चाहिये. वो अरुण और सोनल हैं ना, उतना ठीक है. और मेरे राजा, मुझे तुम समझते क्या हो? आखिर तुम मेरे पति हो. ऐसे किसी ऐरे गैरे के साथ मुझे बिलकुल नहीं चलेगा. वो भी नौकर. हां नौकरानी की बात और है”

तब मुझे याद आया कि उमर में बड़ी औरतों के प्रति भी लीना को बड़ी आसक्ति है, बाद में कारण समझ में आया जब उसकी मां और राधाबाई को मिला. अब ऐसी नौकरानी ढूंढना जो लीना के दिल में उतर जाये, मेरे लिये मुमकिन नहीं था, पर लीना खुद ही ढूंढ लेगी इसका मुझे विश्वास था.

हुआ भी ऐसा ही. तब शान्ताबाई पास के मार्केट में सब्जी का ठेला लगाती थी. लीना अक्सर उसीके यहां से सब्जी खरीदती थी. एक दिन मुझे बोली “वो सब्जी वाली बाई देखी डार्लिंग?”

“कौन सी सब्जी वाली” मैंने अनजान बनकर कहा. वैसे मैं जानता था. शान्ताबाई के यहां से जो भी सब्जी खरीदता था, वह उनके एकदम देसी जोबन से अछूता नहीं रह सकता था.

“अब बनो मत, सब्जी तौलते वक्त कैसे उसकी छाती की ओर टुकुर टुकुर देखते रहते हो, मुझे क्या मालूम नहीं है?”

“अब वो … याने डार्लिंग” मैंने लीपा पोती की कोशिश की तो लीना और भड़क गयी. “देखो मुझे गुस्सा ना दिलाओ अब …” फ़िर अचानक शांत हो गयी “मैं नाराज नहीं हो रही हूं, तुम ये जो बिना बात झूट बोलते हो वो मुझे नहीं सहा जाता. शान्ताबाई … याने वो सब्जी वाली … तुम देखो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है, है ही वह देखने लायक. उसके वे मम्मे देखे? पपीते जैसे हैं. है थोड़ी सांवली पर एकदम चिकनी है”

“जरा उमर में बड़ी है. पैंतीस छत्तीस के ऊपर की तो होगी.”

“तुमको इतने साल की लगी याने चालीस या पैंतालीस की भी होगी. पर मुझे चलेगा.” लीना पलक झपका कर बोली.

“चलेगा याने …” मैंने पूछा तो तुनक कर बोली “किस काम के लिये ये सब मुझे चलेगा ये अब समझाने की जरूरत नहीं है. इस उमर की औरतें अक्सर बड़े मीठे स्वभाव की होती हैं, खुद भी मीठी होती हैं, इस शान्ताबाई की मिठास चखने का मूड हो रहा है. और उसका इन्टरेस्ट भी है मुझमें.”

“अब ये तुमको कैसे मालूम डार्लिंग” मैंने सवाल किया तो लीना बोली “वो बताने की बात नहीं है, समझने की बात है. मैं सब्जी लेने जाती हूं तो बस मुझसे गप्पें लड़ाने लगाती है, मेरी आंखों में बेझिझक देखती है. दूसरे ग्राहक रहें या चले जायें, उससे उसको फरक नहीं पड़ता. मुझे सबसे अच्छी और ज्यादा सब्जी देती है. सब्जी चुनते वक्त जरूरत से ज्यादा झुकती है और अपनी चोली में से मोटे मोटे स्तनों का दर्शन कराती है. मुझे बहुत सेक्सी लगी डार्लिंग वो औरत. ये अपने यहां काम करने को राजी हो जाये तो … उफ़्फ़ … मजा आ जायेगा …. और तुम जो परेशान रहते हो मेरी परेशानी देख कर, वो भी खतम हो जायेगी.”

मुझे भरोसा नहीं था. “देख लो डार्लिंग, वो है तो सेक्सी और जैसा तुम कहती हो, वैसे तुमपर मरती भी होगी पर आखिर उसका सब्जी बेचने का पुराना व्यवसाय है, वो छोड़कर घर का काम करने को राजी हो जायेगी ये मुझे नहीं लगता”

“तुम बस देखो, और ये सब फ़्री में थोड़े कराऊंगी उससे, अच्छी सैलरी दूंगी.”

लीना का कहना सच निकला, शान्ताबाई तो जैसे बस राह देख रहे थी कि लीना कुछ कहे. लीना के बात छेड़ते ही तुरंत तैयार हो गयी, न पैसे की बात की, न क्या काम करना होगा इसकी बात. वो तो लीना पर ऐसी फिदा थी कि तुरंत ठेला बंद करके दूसरे ही दिन हाजिर हो गयी. लगता है लीना पर मर मिटी थी, वैसे लीना है ही इतनी सुंदर और उतनी ही चुदैल. और शान्ताबाई ने उसकी चुदासी पहचान ली थी.

शान्ताबाई हमारे यहां काम करने लगी उस दिन से लीना के चेहरे पर जो सुकून मुझे दिखने लगा, उससे मैंने भी मन ही मन शान्ताबाई को धन्यवाद दिया. लीना वैसे उसे बहुत खुश रझती थी. अच्छे खासे पैसे, खाना पीना, साड़ी कपड़े. और शान्ताबाई भी ऐसी हो गयी थी जैसे स्वर्ग में आ गयी हो. और उसे भले मालूम हो कि उसका असली काम क्या है, घर का काम भी बड़ी मेहनत से करती थी, लीना को कुछ भी नहीं करना पड़ता था.

और शान्ताबाई को बस एक हफ़्ता ट्राइ करके लीना ने छुट्टी के दिन शान्ताबाई के साथ चलते अपने इश्क में मुझे भी शामिल कर लिया. हां वह खुद उस समय रहती थी. शान्ताबाई को भी ऐसा हो गया कि अंधा मांगे एक आंख, और मिल जायें दो. भले लीना के साथ उसका जम के प्यार दुलार चलता था पर मर्द से चुदाने में उसे उतना ही आनंद आता था.

ये सब याद करते करते मेरा खड़ा हो गया और फ़िर अचानक मैं यह सोचने कगा कि अंदर क्या चल रहा होगा.

Please complete the required fields.




Comments

Leave a Reply