मैंने दाद दी मीनल और लीना की कि कितने अच्छे से सिंगार किया था. बाकी सब तो ठीक है, आसानी से किया जा सकता है पर सिर में जो विग लगाया होगा वो बड़ा खूबसूरत था, बड़े खूबसूरत नरम सिलन शोल्डर लेंग्थ बाल थे. और ललित को भी मैं मान गया, साड़ी पहनकर सबके लिये चलना आसान नहीं है पर वह इस तरह से चल कर आया था जैसे जिंदगी भर साड़ी पहन रहा हो.
उधर लीना सिर पर हाथ मारकर हंस रही थी और ललित पर चिढ़ रही थी “सत्यानाश कर दिया उल्लू कहीं के. मैंने कहा था मत बोलना, अब बोल के सब भांडा फोड़ दिया. अभी तो अनिल को हम वो घुमाते कि … “
ललित झेंप रहा था, लीना की डांट से और मेरा क्या रियेक्शन होगा इसके डर से.
मैंने तारीफ़ की “अरे उसको क्यों बोल रही हो, उसने ए-वन काम किया है … मुझे जरा भी पता नहीं चला. यार ललित मान गये … हैट्स ऑफ़. वैसे लता के बजाय ललिता नाम रख लो.” फ़िर लीना की ओर मुड़ कर बोला “तुम्हारा और मीनल का भी जवाब नहीं, अब बॉलीवुड में ड्रेसिंग का काम देख लो. पर ये सब किसलिये? ललित कितना सुंदर है ये दिखाने को? मैंने तो पहले ही देख लिया है, बड़ा हैंडसम क्यूट लड़का है”
“लो, ललित आखिर जीजाजी तेरे फ़ैन हो ही गये, अब तो आराम से जा तू उनके साथ, तुझे जरूर बहुत इंटरेस्ट से ये बंबई घुमायेंगे” लीना बोली. फ़िर मेरे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली “वो क्या है कि ललित का बहुत मन है बंबई घूमने का. अपने साथ आने की जिद कर रहा था. अब इतनी जल्दी रिज़र्वेशन तो मिलेगा नहीं, ये कह रहा था कि दीदी, मैं नीचे फर्श पर सो लूंगा ट्रेन में पर वो एकाध खड़ूस टीसी फंस गया तो. अब कल से मीनल और मां ये भी कह रहे हैं कि लीना, रुक जा और हफ़्ते दो हफ़्ते के लिये तो मेरे दिमाग में एक खयाल आया कि मैं रुक जाती हूं और ललित मेरी जगह पर जा सकता है. हां उसे मेरे नाम पर सफ़र करना पड़ेगा, और वो भी स्त्री वेश में. ये तैयार हो गया, वैसे भी इसे बचपन से बड़ा शौक है लड़कियों के कपड़े पहनने का. मैंने कहा कि पहन कर दिखा और अनिल के सामने जा और वो भी पहचान ना पाये तो जरूर जा बंबई”
मीनल हंस कर बोली “मैदान मार लिया ललित ने आज, क्या खूबसूरत लड़की बना है”
लीना मुझे बोली “अनिल डार्लिंग, ललित शर्मायेगा बताने में पर अब तुमसे क्या छिपाना, ये ललित बचपन में ही नहीं, अभी भी लड़कियों के कपड़े पहनने का बहुत शौकीन है. सिर्फ़ हमारे ड्रेस, सलवार कमीज़ साड़ी ही नहीं, ब्रा और पैंटी भी पहनने का बड़ा शौक है इसको. मेरी ओर लीना की जब मौका मिलता है, पहन लेता है. ये तो मां की भी ब्रेसियर पहन ले पर वो उसको थोड़ी ढीली होती है.”
इतने में सासूमां कमरे में आयीं. ललित को देखा और फ़िर लीना को बोलीं “तो तुम दोनों मानी नहीं, लड़की बना ही दिया बेचारे ललित को. अब ऐसे ट्रेन में भेजने के पहले अनिल को तो पूछ लिया होता, पर तुम दोनों कहां मेरा कहा मानती हो. और देखो कैसा शर्मा रहा है मेरा बच्चा. ललित बेटे, तेरे को ऐसे नहीं जाना हो तो साफ़ कह दे, इन दोनों छोरियों के कहने में ना आ, ये तो महा शैतान हैं दोनों”
लीना ने चिढ़ कर अपनी मां को कहा “अब तू चुप रह मां. इन बातों में अपना सिर मत खपा. देखो अनिल डार्लिंग, ललित तुम्हारे साथ जायेगा, बेचारे का बहुत मन है, घुमा देना उसको बंबई. और ये इसी स्त्री रूप में जायेगा मेरी जगह, टीसी को भी कोई शक नहीं होगा, और ट्रेन सुबह तड़के दादर पहुंचती है, ठीक से सुबह होने के पहले तुम लोग घर भी पहुंच जाओगे.”
ललित मेरी ओर देख रहा था, बेचारा टेंशन में था कि मैं क्या कहता हूं.
मैंने सोचा कि बेचारे को और टंगाकर रखना ठीक नहीं है. उसकी पीठ थपथपा कर मैंने कहा “जाने दो ललित, जैसा ये कहती है वैसा ही करते हैं. इनको तो ऐसे टेढ़े आइडिया ही आते हैं और हम कर भी क्या सकते हैं! सुंदर कन्याओं की हर बात मानना ही पड़ती है. चल, तू लीना बनकर ही चल, आगे मैं संभाल लूंगा” उसकी पीठ पर हाथ फेरते वक्त उसके महीन ब्लाउज़ के नीचे से ललित ने पहनी हुई टाइट ब्रा के स्ट्रैप मेरी उंगलियों को महसूस हुए, न जाने क्यों एक मादक सी टीस मेरे सीने में दौड़ गयी.
ललित की बांछें खिल गयीं. मीनल बोली “देख, तू फालतू टेंशन कर रहा था कि जीजाजी क्या कहेंगे. अरे तू उनका लाड़ला साला है, जो मांगेगा वो मिलेगा”
सासूमां बोलीं “दामादजी, तुमको जमेगा ना? तुम्हारा ऑफ़िस होगा रोज, उसमें कहां इस घुमाओगे फिराओगे?”
“आप चिंता ना करें, मैं देख लूंगा, ऑफ़िस से जल्दी आ जाया करूंगा, दो दिन छुट्टी ले लूंगा पर ललित को खुश कर दूंगा, उसे जो चाहिये, वो उसको मिलेगा”
लीना ने ललित को हाथ पकड़कर मेरे साथ सोफ़े पर बिठाते हुए कहा “अब चुपचाप बैठो यहां, मैं फोटो निकालती हूं”
हम दोनों के काफ़ी फोटो लिये लीना ने, हर तरह के ऐंगल से. फ़िर लीना रानी जरा अपनी हमेशा की शैतानी पर उतर आयी. “अब कमर में हाथ डालो अनिल … और पास खींचो ना उसको … अब उसे उठाकर जरा गोद में बिठा लो … अब कस के उसको भींच लो … अब जरा किस करो …” बेचारा ललित ये सब करते वक्त जरा परेशान था, एक बार बोला भी “अब दीदी … ये सब क्या कर रही हो …” पर लीना ने डांट कर उसे चुप कर दिया. “एकदम चुप … एक भी लफ़्ज़ कहा तो तेरी ट्रिप कैंसल … हां चलो अनिल … अरे हाथ जरा उसके सीने पर रखो ना … ऐसे”
अब ये सब हो रहा था तब अनजाने में मेरा लंड सिर उठाने लगा. याने भले ही वो ललित रहा हो पर उसका कमनीय रूप, उसने लगाया सेंट … और अपनी बांहों में महसूस हो रहा उसका जवान छरहरा चिकना बदन जो काफ़ी कुछ हद तक एक कन्या के बदन से कम नहीं था … अब इस सब का मेरे ऊपर असर होना ही था. किसी तरह मैंने कंट्रोल किया, पता नहीं ललित ने मेरी गोद में बैठे वक्त मेरे लंड का कड़ा होना महसूस किया कि नहीं पर बोला कुछ नहीं.
फोटो सेशन खतम होने पर लीना ललित से प्यार से बोली “अब मुंह ना लटकाओ, ये सब फोटो अपने प्राइवेट हैं, घर के बाहर किसी को नहीं दिखाऊंगी”
ललित पल्लू संभाल रहा था. मैंने लीना से कहा “डार्लिंग, ललित को जरा टॉप जीन्स वगैरह पहना दो, ऐसे साड़ी संभालने में बेचारे को ट्रेन में परेशानी होगी.”
लीना को बात जच गयी. “हां ललित ऐसा ही करते हैं, मैंने तो ये सोचा ही नहीं. जा, वो मेरी जीन्स और टॉप पहन ले”
ललित टॉक टॉक टॉक करते हुए मीनल के कमरे में जाने लगा. उसके सैंडल एकदम मस्त आवाज कर रझे थे जैसे लड़कियों के हाइ हील करते हैं. मेरे मन में आया कि हाइ हील पहनकर चलते हुए उसे कंफ़र्टेबल लग रहा है, जरूर जनाब घर में बहुत बार पहन कर घूमते होंगे.
मीनल बोली “अरे यहीं बदल ले ना, शरमाता क्यों है? सब एक साथ नंगे एक दूसरे से लिपटे हुए थे तब तो नहीं शरमाया तू, अब क्यों शरमा रहा है. और अंदर ब्रा और पैंटी तो है ना, एकदम नंगी भी नहीं होगा तू”
मैं समझ गया कि ललित इसी लिये शरमा रहा होगा कि उसके जीजाजी उसको ब्रा और पैंटी में देख कर क्या कहेंगे. तब तक मीनल जाकर लीना की जीन्स और टॉप ले आयी थी. ललित वहीं मीनल के कमरे के दरवाजे पर खड़ा होकर कपड़े बदलने लगा. साड़ी और ब्लाउज़, पेटीकोट निकालने के बाद ललित जीन्स पहनने लगा. उसने अभी भी विग पहना हुआ था इसलिये एकदम एक कमसिन अर्धनग्न सुंदरी जैसा लग रहा था. उसके गोरे बदन पर काली ब्रा और पैंटी निखर आयी थी. बस एक फरक था कि उसकी पैंटी में उभार था, जितना आम तौर पर मर्दों का उभार दिखता है उससे ज्यादा था. मैं मन ही मन मुस्कराया, सोचा – बेटा ललित … मजा आ रहा है … मस्ती चढ़ रही है औरतों के कपड़े पहनकर. फ़िर खुद की ओर ध्यान गया तो मेरा भी हाल कोई अलग नहीं था, ललित के उस चिकने बदन को ब्रा और पैंटी में देखकर आधा खड़ा हो गया था.
ललितने जीन्स और टॉप पहने. अब वह कॉलेज की छोरी जैसा कमनीय लग रहा था. मैंने भी निकलने की तैयारी करना शुरू कर दी. मीनलने जल्दी से ललित का एक बैग पैक किया. बीच में सासूमां उनसे कुछ बोल रही थीं. शायद बता रही हों कि वहां ज्यादा तकलीफ़ ना देना अनिल को. फ़िर उन्होंने ललित को सीने से लगाकर पटापट चूम डाला. आखिर लाड़ला छोटा बेटा था उनका.
हम खाने बैठे. पिज़्ज़ा मंगाया गया था. खाते खाते सबको मस्ती चढ़ी थी. मीनल और लीना तो हाथ धोकर ललित के पीछे लगी थीं, ताने कस रही थीं, उल्टा सीधा कुछ कुछ सिखा भी रही थीं उसके कान में कुछ बोलकर. वह बेचारा बस झेंप कर पिज़्ज़ा खाता हुआ हंस रहा था.
निकलने के आधा घंटा पहले मीनल ने मुझे अंदर बुलाया. उसके कमरे में गया तो उसने मुझे अपने बिस्तर पर बिठाया और फ़िर गाउन के आगे के बटन खोलकर अपने भारी भारी भरे हुए मम्मे बाहर निकाले. “भूल गये क्या अनिल? आज दोपहर को ही बोले थे ना कि रात को मुझे पूरा पिला देना?”
“ऐसी बात मैं कैसे भूलूंगा मीनल, अब इतनी भागम भाग में तुमको और तंग नहीं करना चाहता था. पर जाते जाते ये अमरित मिल रहा है, एकाध दो दिन का दिलासा तो मिल जायेगा पर फ़िर ये प्यास कौन बुझायेगा मीनल?”
“अब खुद अपनी बीवी का दूध पी सको ऐसा कुछ करो.” मीनल बोली और मुझे बिस्तर पर लिटाकर मेरे मुंह में अपना स्तनाग्र देकर लेट गयी. पूरा दोनों स्तनों का दूध मुझे पिलाया. दूध पीते पीते मेरा ऐसा तन्नाया कि क्या कहूं. मीनल ने उसे पैंट के ऊपर से ही पकड़कर कहा “आज रात ये तकलीफ़ देगा दामादजी. वैसे लता … मेरा मतलब ललिता है साथ में पर अब वो पहले ट्रेन में फ़र्स्ट क्लास रहते थे वैसे कूपे भी नहीं है नहीं तो ललिता इस बेचारे को कुछ आराम जरूर देती, है ना अनिल” उसने मुझे आंख मारकर कहा.
“क्या मीनल, ऐसा मजाक मत करो. अरे आखिर मेरा साला है, भले ही लड़की के भेस में हो और लड़कियं से सुंदर दिखता हो. उसे तो मैं एकदम वी आइ पी ट्रीटमेंट देने वाला हूं”
स्टेशन जाने के लिये जब हम निकले तो लीना मुझे बाजू में ले गयी “अच्छा डार्लिंग, जरा खयाल रखना मेरे भैया का. मैं स्टेशन नहीं आ रही, फालतू हम दोनों को साथ देखकर कोई जान पहचान वाला बातें करने के लिये आ जाये तो लफ़ड़ा हो जायेगा. सिर्फ़ तुम दोनों होगे तो यही समझेंगे कि लीना अपने पति के साथ वापस जा रही है. वैसे ललित कैसा लगा ये बताओ, मेरा मतलब है ललिता कैसी लगी? अब सच बताना”
मैंने उस किस करते हुए कहा “एकदम हॉट और सेक्सी. पर तुमको आगाह करके रख रहा हूं जानेमन, तुमने शायद खुद अपनी सौत बना कर मेरे साथ भेज रही हो. अब कभी बहक कर याद ना रहे कि ये ललित है, ललिता नहीं, उसके साथ कुछ कर बैठूं तो मुझे दोष मत देना. और जरा उसको भी बता दो, नहीं तो घबरा कर चीखने चिल्लाने लगेगा”
“मैं बीच में नहीं पड़ती, दोनों एडल्ट हो, जो करना है वो करो. वैसे एक बात समझ लो कि ललित तुमसे ज्यादा बोलता नहीं इसका मतलब ये नहीं कि वो तुम्हारे साथ अनकंफ़र्टेबल है, वो बस जरा शर्मीला है. मां तो कह रही थी कि कल से कई बार तुम्हारी तारीफ़ कर चुका है मां के सामने”
फ़िर बाहर आते आते धीरे से बोली “एक बात और, उसके कपड़ों के साथ मैंने कुछ अपने खास कपड़े …” एक आंख बंद करके हंसकर आगे बोली ” … रख दिये हैं. और घर में तो ढेरों हैं मेरे हर तरह के कपड़े. कभी उसे ललिता बनाकर डिनर को ले जा कर भी देखो, मैं बेट लगाती हूं कि कोई पहचान नहीं पायेगा. अगर मेरी बहुत याद आये कभी तो ललित को कहना कि यार ललिता बन जा और फ़िर उसके साथ गप्पें मारते बैठना.”
“और अगर मन चाहे तो उसे ये भी कहूं कि ललिता बनकर मेरे बेडरूम में मेरे बिस्तर पर साथ सोने चल, लीना की बहुत याद आ रही है?”
“मुझे चलेगा, तुम लोग देखो” लीना बोली “ट्राइ करने में हर्ज नहीं है. बस उसका खयाल रखना जरा, मेरा प्यारा सा नाजुक सा भाई है”
“बिलकुल वैसा ही खयाल रखूंगा जैसा तुम्हारा रखता हूं डार्लिंग” मैंने कहा. टैक्सी में बैठते मैंने कहा.
हमने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ. ललित को किसी ने नहीं पहचाना कि वह लड़का है. टी सी ने भी टिकट चेक करके वापस कर दिया. रात के दस बज ही गये थे और अधिकतर लोग अपनी अपनी बर्थ पर सो गये थे. ललित पर किसी की नजर नहीं गयी. याने एक दो लोगों ने और एक दो स्त्रियों ने देखा पर बिलकुल नॉर्मल तरीके से जैसा हम किसी सुन्दर लड़की की ओर देखते हैं.
हम दोनों की बर्थ ऊपर की थी. मैं उसे चढ़ने में मदद करने लगा तो वो रुक कर मेरी ओर देखने लगा कि क्या कर रहे हो जीजाजी, मुझे मदद की जरूरत नहीं है. बोला नहीं यह गनीमत है क्योंकि उसे सख्त ताकीद दी थी कि बोलना नहीं, दिखने में वो भले लड़की जैसा नाजुक हो, उसकी आवाज अच्छी खासी नौजवान लड़के थी. मुझे उसके कान में हौले से कहना पड़ा कि यार लड़की है, ऐसा बिहेव कर ना, ऊपर चढ़ने में सहारा लगता है काफ़ी लड़कियों को. तब उसकी ट्यूब लाइट जली.
सुबह तड़के हम दादर पहुंचे. टैक्सी करके सीधे घर आये. गेट बंद था इसलिये बाहर ही उतर गये. बैग भी हल्के थे. अंदर आते आते गेट पर सुब्बू अंकल मिले. हमारी बाजू की बिल्डिंग में रहते हैं, ज्यादा जान पहचान या आना जाना नहीं है, पर हाय हेलो होता है हमेशा. सुबह सुबह घूमने जाते हैं. हमें देख कर उन्होंने ’गुड मॉर्निंग अनिल, गुड मॉर्निंग लीना’ किया और आगे बढ़ गये. ललित थोड़ा सकपका गया. ऊपर आते वक्त लिफ़्ट में मैंने उसकी पीठ पर हाथ मार कर कहा “कॉंग्रेच्युलेशन्स, सुब्बू अंकल को भी तुम लीना ही हो ऐसा लगा. याने जिसकी रोज की जान पहचान या मुलाकात नहीं है, उसे तुम्हारे और लीना के चेहरे में फ़रक नहीं लगेगा, कम से कम अंधेरे में.”
फ़्लैट में आने पर हमने बैग अंदर रखे. मैंने चाय बनाई, तब तक ललित इधर उधर घूम कर फ़्लैट देख रहा था. हमारा फ़्लैट वैसे पॉश है, चार बेडरूम हैं.
“क्या ए-वन फ़्लैट है जीजाजी!” ललित बोला.
“अरे तभी तो कब से बुला रहे हैं तुम सब लोगों कि बंबई आओ पर कोई आया ही नहीं. चलो तुमसे शुरुआत तो हुई. अब मांजी, मीनल भी आयेंगी ये भरोसा है मेरे को. राधाबाई ने तो प्रॉमिस किया मुझे नाश्ता खिलाते वक्त कि वे दो महने बाद आने वाली हैं”
“हां जीजाजी, वे क्यों ना आयें, आप ने उन सब को क्लीन बोल्ड कर दिया दो दिन में” ललित बड़े उत्साह से बोला. अब वह मुझसे धीरे धीरे खुल कर बात करने लगा था. “मां तो कब से आप के ही बारे में बोल रही है”
“अच्छा? और तुम क्लीन बोल्ड हुए क्या?” मैंने मजाक में पूछा. ललित कुछ बोला नहीं, बस बड़ी मीठी मुस्कान दे दी मेरे को जैसे कह रहा हो कि अब लड़की के भेस में आपके साथ आया हूं तो और क्या चाहते हो मुझसे.
चाय पीकर मैं नहाने चला गया. ललित ने अपना सूटकेस गेस्ट बेडरूम में रखा और कपड़े जमाने लगा. मैंने नहा कर कपड़े पहने और ऑफ़िस जाने की तैयारी करने लगा. टाई बांधते बांधते ललित के कमरे में आया तो ललित चौंक गया. थोड़ा टेन्शन में था “आप कहीं जा रहे हैं जीजाजी?”
“हां ललित, मुझे ऑफ़िस जाना जरूरी है, मैंने आज जॉइन करूंगा ये प्रॉमिस किया था, नहीं तो वहीं नहीं रुक जाता सबके साथ? इसलिये आज तो जाना ही पड़ेगा. कल से देखूंगा, थोड़ा ऑफ़ या हाफ़ डे वगैरह मिलता है क्या. हो सके तो जल्दी आ जाऊंगा. फ़िर देखेंगे आगे का प्लान, घूमने वूमने चलेंगे”
ललित ने अपना विग निकाला और बाल सहला कर बोला “ठीक है जीजाजी, मैं भी कपड़े बदल लेता हूं”
मेरे मन में अब एक प्लान सा आने लगा था. वैसे वो कल से ही था जबसे अपने खूबसूरत साले को लड़की के भेस में देखा था. रात को ट्रेन में उसे मेरे बाजू वाली ऊपर की बर्थ पर सोते देखकर मेरा लंड अच्छा खासा खड़ा हो गया था जैसे भूल ही गया हो कि ये लीना नहीं, ललित है. मैंने सोचा कि इसे लड़की समझ कर वैसे ही थोड़ा फंसाने की कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है, देखें इस के मन में क्या है. “पर क्यों बदल रहा है? मुझे तो लगा था कि तेरे को ऐसे कपड़े पहनना अच्छा लगता है”
“बहुत अच्छा लगता है जीजाजी” ललित बड़ी उत्सुकता से बोला “पर कोई आ जाये तो … अब आप भी नहीं हैं घर में”
“अरे मेरी जान, कोई नहीं आने वाला. अगर भूले भटके आया भी और बेल बजी तो दरवाजा मत खोलना. मैं तो कहता हूं कि अब ऐसा ही रह, मजा कर, अपने मन की इच्छा पूरी करने का ऐसा मौका बार बार नहीं मिलता”
“नहीं जीजाजी …” ललित बोला. ” … कहीं कोई गड़बड़ ना हो जाये” लगता है थोड़ा शरमा रहा था. पर बात जच गयी थी, सारे दिन वैसे ही लड़की बनके रहने की बात से लौंडा मस्त हो गया था.
“अरे कर ना अपने मन की. यहां वैसे भी कौन तुझे पहचानता है? लीना मुझे बता रही थी कि तेरे को यह बचपन से कितना अच्छा लगता है. और ये शरमाना बंद कर, साले ….” मैंने प्यार से कहा “मेरे सामने बिना शरमाये अपनी दीदी की – मेरी बीवी की – चूत चूस रहा था … मुझे तेरी मां और भाभी पर चढ़ा हुआ बड़े आराम से बिना शरमाये देख रहा था और अब सिर्फ़ अपना शौक पूरा करने में शरमा रहा है? लानत है यार! अरे यही तो टाइम है अपने मन की सब मस्ती कर लेने का. बस तू है और मैं हूं, और कोई नहीं है यहां”
ललित को बात जच गयी थी पर अभी भी उसका मन डांवाडोल हो रहा था. मैंने सोचा कि थोड़ा ललचाया जाये इन जनाब को “ललित डार्लिंग …” मैंने बिलकुल उस लहजे में कहा जैसा मैं लीना को बुलाता था. “तेरे को एक इन्सेन्टिव देता हूं. एक हफ़्ते बाद लीना आने वाली है. तब तक तू अगर ऐसा ही लीना बन के रहेगा … याने बाहर वाले लोगों के लिये लीना … मैं तुझे ललिता ही कहूंगा … तो जो कहेगा वह ले कर दूंगा”
“पर लोग मुझे पहचान लेंगे. घर आये लोगों से मैं क्या बोलूंगा?” ललित ने शंका प्रकट की. लड़का तैयार था पर अभी भी थोड़ा घबरा सा रहा था. “और अपने बाजू वाले फ़्लैट में जो हैं वो? वो तो जरूर बेल बजायेंगे जब पता चलेगा कि आप आ गये हैं”
“अरे वह मेहता फ़ैमिली भी अभी यहां नहीं है, एक माह को वे बाहर गये हैं. उनसे भी हमारा बस हेलो तक का ही संबंध है. वे भी सहसा बेल बजाकर नहीं आते. अरे ये बंबई है, यहां इतना आना जाना नहीं होता लोगों का. यहां लोग होटल जैसे रहते हैं. तू चिंता ना कर. मजा कर. और मैं सच कह रहा हूं. बेट लगा ले, अगर तू हफ़्ता भर लड़की बन के रहा तो जो चाहे वो ले दूंगा”
“जो चाहे याने जीजाजी …?” लड़का स्मार्ट था, देख रहा था कि जीजाजी को कितनी पड़ी है उसे लड़की बना कर रखने की.
“स्मार्ट फोन .. टैब्लेट … लैपटॉप … ऐसी कोई चीज” मैंने जाल फैलाया. “बोल … है तैयार?”
लैपटॉप वगैरह सुनकर ललित की बांछें खिल गयीं. “ठीक है जीजाजी … पर बाहर जाते वक्त?”
“वो भी लड़की जैसा जाना पड़ेगा, ललिता बनकर, ऐसे ही सस्ते में नहीं मिलेगा तुझे स्मार्ट फोन. और यही तो मजा है कि लोगों के सामने लड़की बनकर जाओ, जैसे कल ट्रेन में आये थे. और एक बार बाहर जाने के बाद इतनी बड़ी बंबई में कौन तुझे पहचानेगा? और वैसे भी बेट यही है ना डार्लिंग कि तू सबको एक सुंदर नाजुक कन्या ही लगे. जरा देखें तो तेरे में कितनी हिम्मत है. अपने मन की पूरी करने को किस हद तक तैयार है तू? तो पक्का? मिलाओ हाथ”
साले का हाथ भी एकदम कोमल था. मैं सोचने लगा कि हाथ ऐसा नरम है तो … फ़िर बोला “ललित, एक बार और ठीक से सब समझ ले. घर में भी लड़की जैसे रहना पड़ेगा. ऐसा नहीं कि कोई देख नहीं रहा है तो लड़के जैसे हो लिये. याने लिंगरी … ब्रा … पैंटी … सब पहनना पड़ेगी”
“पर वो क्यों जीजाजी?” ललित बेचारा फिर थोड़ा सकपका सा गया.
“अरे तेरे को पहनने में मजा आता है और मुझे देखने में. इतना नहीं करेगा मेरे लिये? अरे अब लीना, मेरी वो चुदैल बीवी, तेरी वो शैतान दीदी यहां नहीं है तो उसकी कमी कम से कम मेरी आंखों को तो ना खलने दे, वो घर में बहुत बार सिर्फ़ ब्रा और पैंटी पहन कर घूमती है, तू भी करेगा तो मुझे यही लगेगा कि लीना घर में है”
ललित सोच रहा था कि क्या करूं. मैंने कहा “एक रास्ता है, ब्रा और पैंटी ना पहनना हो तो नंगा रहना पड़ेगा घर में. नहीं तो बेट इज़ ऑफ़. वैसे भी हम सब अधिकतर नंगे ही थे पिछले दो दिन तेरे घर में. तू काफ़ी चिकना लौंडा है, ब्रा पैंटी ना सही, वैसे ही देखकर शायद मेरी प्यास बुझ जायेगी. पर हां … तेरे को नंगा देखकर बाद में मैं कुछ कर बैठूं तो उसकी जिम्मेदारी तेरी”
“नहीं जीजाजी …” शरमा कर ललित बोला “मैं पहनूंगा ब्रा और पैंटी” उसने विग फ़िर से सिर पर चढ़ा लिया.
“शाबास. अब मैं नीचे से ब्रेड बटर अंडे बिस्किट वगैरह ले आता हूं. आज काम चला लेना. कल से देखेंगे खाने का. और तब तक तू जा और नहा ले. मैं लैच लगाकर निकल जाऊंगा. बेल बंद कर देता हूं, किसी को पता भी नहीं लगेगा कि हम वापस आ गये हैं”
सामान लाकर मैंने डाइनिंग टेबल पर रखा. गेस्ट रूम में देखा तो बाथरूम से शावर की आवाज आ रही थी. मन में आया कि अंदर जाकर उस चिकने शर्मीले लड़के को थोड़ा तंग किया जाये, पर फ़िर सोचा जाने दो, बिचक ना जाये, जरा और घुल मिल जाये तो आगे बढ़ा जाये, आखिर लीना का लाड़ला भाई था. और किसी लड़के के साथ, खूबसूरत ही सही, इश्क लड़ाने की कोशिश मेरे लिये भी पहली ही बार थी. इसलिये वैसे ही ऑफ़िस निकल गया.
मैं ऑफ़िस छूटने के पहले ही ही आ गया. करीब पांच बजे थे. लैच की से दरवाजा खोला. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. अंदर आकर देखा तो ललित अपने बेड पर सोया हुआ था. विग पहना था और लीना की एक नाइटी भी पहन ली थी. नायलान की नाइटी में से उसकी ब्रा और पैंटी दिख रही थी. याने मैंने जो बेट लगायी थी उसकी शर्त बचारा बिलकुल सही सही पूरा कर रहा था.
और उसका एक हाथ अपनी नाइटी के अंदर और फ़िर पैंटी के अंदर था. अपना लंड पकड़कर सोया था. मुझे लगा कि मुठ्ठ मार ली होगी पर पास से देखा तो ऐसा कुछ नहीं था. हां नींद में भी उसका लंड आधा खड़ा था, एकदम रसिक मिजाज का साला था मेरा.
उसका वह रूप बड़ा रसीला था. क्षण भरको उसकी पैंटी के उभार को नजरंदाज करें तो एकदम मस्त चुदाई के लिये तैयार लड़की जैसा लग रहा था. स्किन का काम्प्लेक्शन किसी कोमल कन्या से कम नहीं था, होंठ भी मुलायम और गुलाबी थे. मेरा लंड खड़ा होने लगा. मैंने सोचा कि सच में लीना की बहन, मेरी साली होती तो कब का चख चुका होता. अब यह जानकर भी वह एक लड़का है, उसकी खूबसूरती मुझे कोई कम नहीं लग रही थी बल्कि अब उसकी वजह से मेरी चाहत में एक अजीब तरह की तीख आने लगी थी, शायद टाबू करम का अपना अलग स्वाद होता है. मुझे खुद की इस चाहत पर भी थोड़ा अचरज हुआ. अब तक काफ़ी तरह की मस्ती कर चुका था, अधिकतर लीना के साथ और कुछ उसे बिना बताये. पर अब तक उसमें दूसरे पुरुष के साथ रति का समावेश नहीं था. शायद ललित की बात ही निराली थी, लीना का छोटा लाड़ला भाई होना, मेरी कोई साली ना होना, ललित का चिकना रूप और लीना से मिलता जुलता चेहरा, ये सब बातें मिल जुलकर गरम मसाला बन गयी थीं.
किसी तरह मैंने अपने आप पर काबू किया और अपने कमरे में आकर लेट गया. ट्रेन में ठीक से सोया नहीं था इसलिये नींद आ गयी. दो घंटे बाद खुली. फ़िर मैंने भी थोड़ा सामान जमाया, घर को ठीक ठाक किया. ललित और देर से उठा. किशोरावस्था की जवानी में खूब नींद आती है. किसी का बाहर जाने का मूड नहीं था इसलिये मैंने घर पर पिज़्ज़ा मंगवा लिया.
डिनर खतम होते होते साढ़े नौ बज गये. आधे घंटे बाद लैपटॉप पर ईमेल वगैरह देखहर मैं सब कपड़े निकाल कर सिर्फ़ शॉर्ट्स में ड्राइंग रूम में बैठ गया. ये मेरी रोज की आदत है. ललित वहीं था, टी वी लगाकर प्रोग्राम सर्फ़ कर रहा था. बेचारा थोड़ा बोर हुआ सा लग रहा था. मुझे देखकर थोड़ा संभल कर बैठ गया. शायद मेरे ब्रीफ़ में आधे उठे लंड का उभार देखकर थोड़ा कतरा गया होगा. अब रात को मेरी ये हालत होती ही है. और सामने वो सुंदर सी छोकरी – छोकरा भी था. टी वी देखते देखते एक दो बार उसकी नजर अपने आप मेरे ब्रीफ़्स पर गयी.
“ललित डार्लिंग, चलेगा ना अगर मैं ऐसे बैठूं? वो क्या है कि लीना और मैं रहते हैं और ऐसे ही फ़्री स्टाइल रहते हैं … बल्कि इससे भी ज्यादा” वैसे कहने की जरूरत नहीं थी, उसने मेरा लंड कई बार देखा था, वो भी अपनी मां और भाभी की चूत में चलते हुए.
ललित बस थोड़े शर्मीले अंदाज से मुस्करा दिया. मैंने कहा “तू भी चाहे तो फ़्री हो जा. वो नाइटी पहनने की जरूरत नहीं है. हां विग लगाये रखो मेरे राजा, क्या करूं, बड़ी प्यारी छोकरी जैसा लगता है तू विग पहन कर”
“ब्रा और पैंटी रहने दूं जीजाजी?” उसने नाइटी निकालते हुए पूछा.
“तेरी मर्जी. जैसे में मजा आता है वैसा कर. वैसे ब्रा और पैंटी पहनकर तू बिलकुल लीना जैसा लगता है. वो तो रात को हमेशा ऐसे ही बैठती है. और शादी के बाद पहली बार मैं ऐसा अकेला हूं घर में, तू है तो लीना ही यहां है ऐसा लगता है”
ललित ने नाइटी निकाली और जाकर अंदर रख आया. फ़िर मेरे सामने वाले सोफ़े पर बैठ गया. मैंने उससे कहा “ललित, कुछ भी कहो, तुम्हारे यहां सब एक से एक हैं. याने इतनी सारी सुंदर और सेक्सी औरतें एक ही फ़ैमिली में होना ये कितने लक की बात है. और ऊपर से उन सब से ये सुख मिलना याने इससे बड़ा सुख और क्या होगा. बड़ा तगड़ा भाग्य लेकर पैदा हुआ है तू. और राधाबाई भी हैं, उनके बारे में जो कहा जाये वो कम है”
ललित अब थोड़ा फ़्री हो गया था “हां जीजाजी. पर राधाबाई बड़ी मतवाली भले ही हों, मुझे तो उनसे डर लगता था पहले”
“मैं अक्सर अकेला पकड़ा जाता था घर में. मेरा स्कूल सुबह का था. लीना दीदी कॉलेज जाती थी और हेमन्त भैया और मीनल भाभी सर्विस पर. मां रहती थी पर अक्सर दोपहर को महिला मंडल चली जाती थी. बस राधाबाई मेरे को पकड़कर … “
“क्यों? तेरे को मजा नहीं आता था? जवानी की दहलीज पर तो और मजा आता होगा.”
“हां जीजाजी पर मुझे जिसमें मजा आता था उसके बजाय उनको जिसमें मजा आता था, वही मुझसे जबरदस्ती करवाती थीं”
“तुमने शिकायत की क्या उनकी कभी?”
ललित मुस्करा दिया “अब किससे शिकायत करूं, राधाबाई तो सबकी प्यारी थीं. घर की मालकिन जैसी ही थीं करीब करीब, जो वे कहतीं, उसे कोई टालता नहीं था. आपने उनकी वो स्पेशल गुझिया खाई ना?”
मैंने हां कहा “मानना पड़ेगा, दाद देनी पड़ेगी उनकी इस तरह की सोच की”
“मुझे तो हमेशा देती हैं. आजकल कॉलेज से आता हूं तो अक्सर तैयार रखती हैं. पर खिलाने के बाद आधा घंटा वसूली करती हैं.”
“एक बात बताओ ललित” मैंने बड़े इंटरेस्ट से पूछा “इस सब का तुम्हाई पढ़ाई पर असर नहीं पड़ा? याने ऐसा मेरे साथ होता मेरी टीन एज में तो मैं शायद फ़ेल हो जाता हर साल.”
“वो जीजाजी असल में … याने मां बहुत स्ट्रिक्ट है इस मामले में, वैसे इतनी प्यारी और सीधी साधी है पर अगर मार्क्स कम हो जायें तो बिथर जाती है. एक बार बारहवीं में प्रीलिम में फ़ेल हो गया था तो एक हफ़्ते तक मेरा उपवास करा दिया”
“उपवास याने …?”
“मुझे कट ऑफ़ कर दिया, न खुद पास आती थी न किसी को आने देती थी. मीनल भाभी को भी नहीं, राधाबाई को भी नहीं. एक रात को तो हाथ पैर भी बांध दिये थे मेरे. बड़ी बुरी हालत हुई मेरी, पागल होते होते बचा. तब से पढ़ाई को निग्लेक्ट करना ही भूल गया मैं”
ललित अब सोफ़े पर अपने पैर ऊपर करके घुटने मोड़ कर बड़ी नजाकत से बैठा था, लड़कियों के फ़ेवरेट पोज़ में. उसकी चिकनी गोरी छरहरी जांघें कमाल कर रही थीं. अब वह जान बूझकर कर रहा था तो बड़ी स्टडी की थी उसने लड़कियों के हाव भाव की. यदि अनजाने में कर रहा था तो शायद अब तक वह लड़की के रूप से काफ़ी घुल मिल गया था. एक क्षण को मुझे भ्रम हुआ कि यह सच में बड़ी तीखी छुरी मेरे सामने बैठी है. लंड कस के खड़ा हो गया और ब्रीफ़ के सामने का फ़ोल्ड हटा कर बाहर आ गया.
ललित का ध्यान उसपर गया तो उसके गाल लाल हो गये. पर उसने नजर नहीं हटाई. मैंने नीचे अपने तन्नाये लंड को देखा और बोला “देखो ललिता डार्लिंग, देखो, अपने रूप का कमाल देखो, एकदम बेचैन हो गया ये साला तुमको देख कर”
ललित अब लड़की के रूप में और भिनता जा रहा था. उसकी नजर नहीं हट रही थी मेरे लंड से, अगर सच में कोई गरम कन्या बैठी होती तो उसकी नजर जैसी भूखी होती वैसी ही भूख ललित की नजर में थी. मैंने अपने पास सोफ़े को थपथपा कर कहा “अब ललिता डार्लिंग, जरा यहां आ जाओ ना, ऐसे दूर कब तक बैठोगी. जरा तुमसे जान पहचान बढ़ाने का मौका तो दो”
ललित मेरे पास आ कर बैठ गया. उसकी पैंटी में अब अच्छा खासा तंबू सा बन गया था. मैंने उसकी कमर में हाथ डाला और पास खींच लिया. क्षण भर को उसका बदन कड़ा हो गया जैसे प्रतिकार करना चाहता हो, पर फ़िर उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैंने उसके गाल चूम कर कहा “ललिता डार्लिंग … अब मैं तुमको ललिता ही कहा करूंगा … मेरे लिये तू अब एक बहुत खूबसूरत लड़की है … मेरी प्यारी साली है … बीवी से बढ़कर मीठी है … ठीक है ना?”
उसने गर्दन डुला कर हां कहा. मैंने उसे पूछा “ललिता … तुम्हारे हेमन्त भैया ने तुम्हारा ये रूप नहीं देखा अब तक? कभी किस किया तेरे को … याने ऐसे?” उसकी ठुड्डी पकड़कर मैंने उसका चेहरा अपनी ओर किया और उसके मुलायम होंठों का चुंबन लिया. ललित एकदम शांत बैठा रहा. न मेरा विरोध किया न मुझे साथ दिया. किस खतम होने पर बोला “मैं सिर्फ़ भाभी या दीदी के सामने ही ब्रा पैंटी पहनता … पहनती हूं जीजाजी”
“याने जैसे मां भाभी लीना आपस में प्यार मुहब्बत कर लेते हैं , वैसे तेरे में और तेरे भैया में कभी नहीं हुई?”
“नहीं जीजाजी. भैया को मेरे इस शौक के बारे में याने ये लिंगरी पहनना वगैरह – मालूम नहीं है. वैसे हम जब सब साथ होते हैं और चुदाई … याने आपस में कर रहे होते हैं तब हेमन्त भैया कभी मेरी कमर पकड़कर जोर से धक्के मारना सिखाता है … खास कर जब मैं मीनल भाभी पर चढ़ा होता हूं तो कभी मेरे गाल चूम कर और कभी पीठ पर हाथ फ़िराकर मुझे उकसाता है कि कचूमर बना दे तेरी भाभी का … पर और कुछ नहीं करता”
मैंने फ़िर से उसका चुंबन लिया “बड़ा नीरस है तेरा भैया … इतनी मीठी मिठाई और चखी नहीं अब तक” इस बार ललित ने भी मेरे चुंबन के उत्तर में मेरे होंठ थोड़ी देर के लिये अपने होंठों में पकड़ लिये.
फ़िर मैंने उसे उठाकर गोद में ही बिठा लिया. उसने थोड़ा प्रतिकार किया तो मैं बोला “अब मत तरसाओ ललित राजा … मेरा मतलब है ललिता रानी. इस भंवरे को इस फूल का जरा ठीक से रसपान तो करने दो”
उसके बाद मैं काफ़ी देर उससे चूमा चाटी करता रहा. मजे की बात यह कि काफ़ी देर तक मैंने उसे कहीं और हाथ नहीं लगाया. अपने आप को मानों मैंने हिप्नोटाइज़ कर लिया था कि यह एक नाजुक लड़की है जो मेरे आगोश में है. फ़िर उसकी ब्रा पर हाथ रखा. कप अच्छे भरे भरे से थे, ठोस और स्पंज जैसे गुदाज, करीब करीब असली स्तनों जैसे. लगता है लीना और मीनल ने ब्रा और अंदर की फ़ाल्सी बड़े प्यार से समय देकर चुनी थी. मैं स्तनमर्दन करने लगा. ललित ने मेरी ओर देखा जैसे सच में उसके मम्मे मसले जा रहे हों. बड़ी प्यास थी उसकी निगाहों में, जैसे उन नकली स्तनों को दबवाकर उसे असली मम्मे दबवाने का मजा आ रहा हो.
“एकदम मस्त ललिता रानी … एकदम रसीले फ़ल हैं तेरे … खा जाने का मन होता है” कहकर मैंने झुक कर ब्रा की नोकों को चूम भी लिया.
ललित ने हुमककर मेरी जीभ अपने होंठों में ले ली और चूसने लगा. अब वह लंबी लंबी सांसें ले रहा था. लगता है एकदम गरमा गया था. अब भी मैंने उसकी कमर के नीचे कहीं हाथ नहीं लगाया था. आखिर शुरुआत उसी ने की. धीरे धीरे उसका हाथ सरककर मेरे लंड पर पहुंच गया. लंड को मुठ्ठी में भरके वो बस एक मिनिट बैठा ही रहा, जैसे मनचाही मुराद मिल गयी हो, मुझे जरूर पटापट चूमता रहा.
फ़िर धीरे से बोला “क्या मस्त है आपका जीजाजी … इतना सख्त और तना हुआ”
मैंने उसके कान के नीचे चूम कर कहा “तुझे पसंद आया मेरी जान. मैं तो परसों ही समझ गया था जब तेरी नजर उसपर जमी हुई थी”
“उस दिन मां को आप चोद रहे थे तब कितना सूज गया था, ये सुपाड़ा भी लाल लाल हो गया था. और आप चोद रहे थे तो मां की चूत से कैसी पुच पुच आवाज आ रही थी … मुझे … मुझे एकदम से … याने मैं तो फिदा हो गया इसपर जीजाजी” ललित धीमी आवाज में रुक रुक कर बोला. बेचारा शरमा भी रहा था और मस्ती में भी था.
“तुम्हारी मां भी तो एकदम गरम गरम रसीली चीज है मेरे राजा … मेरा मतलब है मेरी रानी … वो भी इस उमर में … और ऐसी कि जवान लड़कियों को भी मात कर दे … इतनी गीली तपती बुर हो तो फच फच आवाज होगी ही.”
“जीजाजी … मुझे तो मां पर बहुत जलन हो रही थी कि आप का लंड उसको मिल रहा है … जीजाजी मैं इसे ठीक से देखूं?” अचानक मेरी गोद से उतरकर मेरे बाजू में बैठते हुए ललित ने पूछा. उसकी आंखों में तीव्र चाहत उतर आई थी.
जवाब में मैं हाथ उठाकर सिर के पीछे लेकर टिक कर बैठ गया “कर ले मेरी जान जो करना है … तुझे आज जो करना है वो कर ले, जैसे खेलना है इससे वैसे खेल ले”
ललित मेरे सामने सोफ़े पर बैठ गया और मेरा लंड अपनी दो मुठ्ठियों में पकड़ लिया. “कितना लंबा है जीजाजी, दो मुठ्ठियों में भी पूरा नहीं आता, सुपाड़ा ऊपर से झांक रहा है. मेरा तो बस एक मुठ्ठी में ही …”
मैंने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया. “ललिता रानी …. अब भूल मत कि तू लड़की है … क्यों बार बार ललित के माइंडसेट में आ जाती है? जैसी भी है, तू बड़ी प्यारी है”
ललित ने एक दो बार लंड को ऊपर नीचे करके मुठियाया और फ़िर उसके सुपाड़े पर उंगली फिराने लगा. “कितना सिल्किश है जीजाजी … एकदम चिकना …और इतना फूला हुआ”
“तभी तो तेरी दीदी मेरे जैसे इन्सान को भी अपने साथ बहुत कुछ करने देती है नहीं तो मेरी क्या बिसात है तेरी दीदी के आगे!”
“नहीं जीजाजी, आप कितने हैंडसम हैं, नहीं तो दीदी शादी के छह महने के बाद घर आती? वो भी बार बार बुलाने पर? ये नसें कितनी फूल गयी हैं जीजाजी!” सुपाड़े के साथ साथ अब ललित उंगली से मेरे लंड के डंडे पर उभर आयी नसें ट्रेस कर रहा था.
मेरे लंड से खेलते खेलते उसने जब अनजाने में अपनी जीभ अपने गुलाबी होंठों पर फ़िरायी तो मैं समझ गया कि साला चूसने के मूड में था, चूसने को मरा जा रहा था पर हिम्मत नहीं हो रही थी. उसके वो नरम होंठ देखकर मैं भी कल्पना कर रहा था कि वे होंठ अगर मेरे लंड के इर्द गिर्द जमे हों तो? लंड और तन गया.
“कितना सख्त है जीजाजी … जैसे कच्चा गाजर …” उसकी हथेली अब फ़िर से मेरे सुपाड़े पर फ़िर रही थी.
मुझे भी अब लगने लगा था कि मस्ती ज्यादा देर मैं नहीं सह पाऊंगा. ललित के विग के बालों में से उंगलियां चलाते मैं बोला “तूने खाया है क्या कभी कच्चा गाजर?”
वो शरमा कर नहीं बोला. फ़िर मुझे पूछा “दीदी इसको कैसे चूसती है जीजाजी? याने जैसा मेरे को कर रही थी मुझे लिटा कर या …”
“अरे उसके पास बहुत तरीके हैं. कभी लिटा कर, कभी मेरे बाजू में लेटकर, कभी मेरे सामने नीचे जमीन पर बैठकर … पर बहुत देर इस डंडे से खेल खेलने का मजा लेना हो तो वो मेरी गोद में सिर रखकर लेट जाती है और घंटे घंटे खेलती है” कहते ही मुझे लगा कि गलती कर दी, यह नहीं बताना था. अब अगर ये सेक्सी छोकरा … छोकरी वैसे कर बैठे तो? मैं घंटे भर रुकने के बिलकुल मूड में नहीं था.
पर अब पछताना बेकार था क्योंकि ललित ने मेरी बात मान ली थी. बिना और कुछ कहे वह मेरी जांघ पर सिर रखकर सो गया. फ़िर उसने लंड पकड़कर अपने गाल पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसके नरम नरम गोरे गालों पर सुपाड़े के घिसे जाने से मुझे ऐसा हो गया कि पकड़कर उसके मुंह में पेल दूं. पर मैंने किसी तरह सब्र बनाये रखा.
अब ललित के भी सब्र का बांध टूट गया था, शर्म वगैरह भी पूरी खतम हो गयी थी. उसने लंड को पकड़कर जीभ से उसकी नोक पर थोड़ा गुदगुदाया. जैसे टेस्ट देख रहा हो. फ़िर चाटने लगा. उसकी जीभ मेरे सुपाड़े की तनी चमड़ी पर चलनी थी कि मेरी सिर घूमने लगा. सहन नहीं हो रहा था, लीना भी ऐसा करती है और मुझे आदत हो गयी है पर यहां ये चिकना लड़का था, लड़की नहीं और सिर्फ़ इस बात में निहित निषिद्ध यौन संबंध एक ऐसी शराब थी जो दिमाग में चढ़नी ही थी.
“ओह लीना रानी … मेरी लीना …. मेरा मतलब है ललिता डार्लिंग … मुझे अब मार ही डालोगी …” फ़िर झुक कर ललित का गाल चूम कर मैंने कहा “एक पल को भूल ही गया था कि तू है … वैसे अब जरा देख ललिता … लंड थरथरा रहा है ना?”
“हां जीजाजी”
“याने अब ज्यादा देर नहीं है … लंड को इस तरह से मस्ताने के बाद या तो उसे चूस लेना चाहिये या चुदवा लेना चाहिये” मैंने उसकी ब्रा मसलते हुए कहा.
“दीदी क्या करती है जीजाजी?”
“इस हद तक आकर तो वो चूस लेती है क्योंकि इसके बाद ज्यादा देर चुदवाना पॉसिबल नहीं है. आखिर मैं भी इन्सान हूं मेरी रानी, कोई साधु वाधु नहीं हूं कि सहता रहूं. अब तू क्या करेगी ललिता जान … तू ही डिसाइड कर”
ललित शायद पहले ही डिसाइड कर चुका था, क्योंकि चुदवाने का ऑप्शन तो था नहीं, याने मेरे लिये था पर वो बेचारा क्या चुदवाये, कैसे चुदवाये, चूत तो थी नहीं, उसके पास बस एक ही चीज थी चुदवाने के लिये, और ये पक्का था कि वह खुद उसको ऑफ़र नहीं करेगा.
उसने मुंह बाया और मेरा सुपाड़ा मुंह में भर लिया. थोड़ा चूसा और फ़िर मुंह से निकाल दिया. उसके मुंह में सुपाड़ा जाना था कि मेरी नस नस में खुमार सा भर गया. इसलिये सुपाड़ा जब उसने निकाला तो बड़ी झल्लाहट हुई. पर मैंने प्यार से पूछा “क्या हुआ रानी? अच्छा नहीं लगा?”
“बहुत रसीला है जीजाजी, बड़ी चेरी जैसा पर … कहीं आप को मेरे दांत ना लग जायें?” मेरी ओर देख कर ललित बोला.
“अरे तू क्यों चिंता करती है ललिता जान? नहीं लगेंगे, दुनिया में तू पहला … पहली नहीं है जिसने लंड चूसा है. मुझे आदत है, लीना तो क्या क्या करती है इसके साथ चूसते वक्त!”
“जीजाजी … दीदी … मां … भाभी जब मेरा चूसती हैं तो पूरा निगल लेती हैं, कभी थूकती नहीं … वो अच्छा लगता होगा उनको? … ” उसको वीर्य निगलने का थोड़ा टेन्शन था. मैंने सोचा कि अभी तो समझाना जरूरी है नहीं तो बिचक गया तो मेरी के.एल.डी हो जायेगी, इतना सब करने के बाद मुठ्ठ मारनी पड़ेगी. अब तो मुझे ऐसा लग रहा था कि सीधे जबरदस्ती अपना लौड़ा उसके हलक में उतार दूं और पटक पटक कर उसका प्यारा सा मुंह चोद डालूं.
“अब ये मैं क्या बताऊं डार्लिंग … हां ये सब मस्त चूसती हैं जैसे चासनी पी रही हों, अब अच्छा ही लगता होगा. पर तू चिंता मत कर डार्लिंग, मैं तेरे को बता दूंगा, तू तुरंत मुंह से बाहर निकाल लेना”
उसे दूसरी बार नहीं कहना पड़ा. झट से उसने मुंह खोला और मेरा पूरा सुपाड़ा मुंह में लेकर चूसने लगा.
मैंने उसके गाल सहलाये और हौले हौले आगे पीछे होने लगा, उसके मुंह में लंड पेलने लगा. फ़िर ललित का हाथ मेरे लंड की डंडे पर रखकर उसकी मुठ्ठी बंद की और उसका हाथ आगे पीछे किया. वह समझ गया कि मैं क्या चाहता हूं. सुपाड़ा चूसते चूसते वह मेरी मुठ्ठ मारने लगा.
अब रुकना मेरे लिये मुश्किल था, मैं रुकना भी नहीं चाहता था, ललित का गीला कोमल मुंह और उसकी लपलपाती जीभ – इस कॉम्बिनेशन को झेलना अब मुश्किल था. मैं जल्दी ही झड़ने की कगार पर आ गया, पर मैंने उससे कुछ नहीं कहा, बल्कि जैसे ही मैं झड़ा और मेरे मुंह से एक सिसकी निकली, मैंने कस के उसका सिर अपने पेट पर दबा लिया और लंड उसके मुंह में और अंदर पेलकर सीधा उसके मुंह में अपनी फ़ुहारें छोड़ने लगा.
बेचारा ललित एकदम हड़बड़ा सा गया. मेरे झड़ने का पता उसे तब चला जब उसके मुंह में गरम चिपचिपी फ़ुहार छूटने लगी. उसने अपना सिर हटाने की कोशिश की पर मैं कस के पकड़ा हुआ था. आखिर उसने हार कर अपनी कोशिश छोड़ दे और चुपचाप निगलने लगा. मैं बस ’आह’ ’आह’ ’आह मेरी डार्लिंग ललिता’ ’आह’ कहता हुआ ऐसे दिखा रहा था जैसे मुझे इस नशे में पता ही ना हो कि क्या हो रहा है.
ललित को पूरी मलाई खिलाने के बाद ही मैंने उसका सिर छोड़ा. आंखें खोल कर उसकी ओर देखा और फ़िर बोला “सॉरी ललित … मेरा मतलब है ललिता … क्या चूसा है तूने … लीना भी इतना मस्त नहीं चूसती, मेरा कंट्रोल ही नहीं रहा”
ललित बेचारा उठकर बैठ गया. अब भी कुछ वीर्य उसके मुंह में था पर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि निगल जाये या थूक दे. जिस तरह से वह मेरी मेरी ओर देख रहा था, मैं समझ गया कि सोच रहा है कि थूक डालूंगा तो जीजाजी माइंड कर लेंगे. इसलिये चुपचाप निगल गया.
“सॉरी मेरी जान … सॉरी … तुझे शायद अच्छा नहीं लग रहा टेस्ट. वो लीना का क्या है कि झड़ने के बाद भी चूसती रहती है, बूंद बूंद निचोड़ लेती है, तेरी मां और भाभी भी वही करती है, इसलिये मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि तेरी पहली बार है. अब नहीं करूंगा”
“नहीं जीजाजी, कोई बात नहीं, चूसने में बहुत मजा आ रहा था मेरे को. वैसे टेस्ट बुरा नहीं है, खारा खारा सा है” ललित ने जीभ मुंह में घुमाते हुए कहा. “कितना चिपचिपा है, लेई जैसा, तालू पर चिपक सा गया है.
“तू ऐसा कर, जा कुल्ला कर आ, तेरी पहली बार है”
ललित जाकर कुल्ला कर आया. जब मेरे पास बैठा तो मैंने उसे फ़िर से बांहों में ले लिया. बांहों में भरके उसे कस के भींचा और पटापट उसके चुंबन लेने लगा. बेचारा फ़िर थोड़ा शरमा सा गया. वैसे चूमा चाटी जनाब को अच्छी लग रही थी और जब मैं थोड़ा रुकता. तो ललित मेरे चुम्मे लेने लगता.
“अगर तू सोच रही है ललिता कि इतना लाड़ क्यों आ रहा है मुझे, तो मुझे लीना पर भी आता है जब वह मुझे ऐसा सुख देती है. अब ललिता … नहीं थोड़ी देर को अब ललित कहूंगा तेरे को, यार न जाने क्या हो गया है मुझे … मालूम है कि तू लड़का है फ़िर भी तेरे पर मरने सा लगा हूं. शायद तुझमें दोनों की, मर्दों और औरतों की, सबसे मीठी, सबसे मतवाली खूबियां हैं. अब ये बता कि मेरे साथ सोयेगा या अकेले? मेरे बेडरूम में मेरे बेड पर सोने में अटपटा लगेगा तेरे को तो रहने दे. वैसे इतने दिनों में पहली बार लीना नहीं है और अकेले सोने की मेरी आदत ही खतम हो गयी है.”
ललित ने तुरंत हां कह दिया. उसे बांहों में भींचते वक्त अब मुझे उसके सख्त लंड का आभास हो रहा था जो पैंटी के अंदर ही खड़ा होकर मेरे पेट पर चुभ रहा था. मुझे ललित पर थोड़ा तरस भी आया, वो बेचारा कितनी देर से मस्ताया हुआ था पर मैंने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया था.
“ऐसा करो ललित कि अब ये ब्रा और पैंटी निकाल दो. सोते समय कोई शर्त नहीं, अपने नेचरल अंदाज में आराम से सो.” वह मेरे बेडरूम में गया और मैंने घर में एक बार सब चेक करके लाइट ऑफ़ किये, दरवाजा ठीक से लगाया और अपना ब्रीफ़ निकालकर वहीं सोफ़े पर डाल दिया. जब पूरा नंगा होकर मैं अपने बेडरूम में आया, तो ऊपर की लाइट ऑफ़ थी. टेबल लैंप की धीमी रोशनी ललित के नंगे बदन पर पड़ रही थी. वह थोड़ा दुबक कर बेड पर एक तरफ़ लेटा हुआ था, लंड एकदम तन कर खड़ा था. मुझे देख कर थोड़ा और सरक गया. सरकते वक्त मुझे उसकी गोरी सपाट पीठ और थोड़े छोटे पर भरे हुए कसे कसे गोरे चिकने नितंब दिखे.
अब यह बताने की जरूरत नहीं कि मैं गांड का कितना दीवाना हूं. लीना की गांड पर तो मरता हूं, इतने गुदाज मांसल और फूले हुए एकदम गोल नितंब हैं उसके कि मेरा बस चले तो चौबीस घंटे उनसे चिपका रहूं. लीना को यह मालूम है इसलिये रेशन कर रखा है. मुझे महने में दो तीन बार से ज्यादा गांड नहीं मारने देती. अब गांड की इतनी प्यास होने पर जब मैंने अपनी ससुराल में सासू मां और मीनल के भरे भरे चूतड़ देखे थे तो दिल बाग बाग हो गया था, कि कुछ तो मौका मिलेगा. वहां मेरी सच में के.एल.डी हुई जब लीना ने वीटो लगा दिया. तब सामूहिक चुदाई के दौरान ललित के गोरे कसे चूतड़ देख कर भी मेरे मन में आया था कि यार यही मिल जायें मारने को. अब जब ललित मेरे सामने असहाय अकेला था, तो इससे अच्छा मौका नहीं था. पर मैंने सोचा कि जल्दबाजी करूंगा तो कहीं सब किये कराये पर पानी ना फिर जाये. आखिर मुझे अपने इस चिकने खूबसूरत साले को फांसना था तो वो लंबे समय के लिये, एक रात के लिये नहीं. इसलिये आज की रात इस चिड़िया को और फंसाने में ज्यादा फायदा था.
यही सब सोच कर मैं उसपर झपटने के बजाय धीरे से पलंग पर बैठ गया “ललित राजा, ये अच्छा हुआ कि तू यहां सो रहा है नहीं तो सच में अकेले सोने में मुझे बड़ा अजीब सा लगता. वैसे वहां घर में किस के साथ सोता है तू” मैंने उसके बाजू में लेटते हुए पूछा.
’अक्सर तो हम सब एक साथ ही सोते हैं जीजाजी, मां के बेडरूम में उस बड़े वाले पलंग पर. कभी कभी जब हेमन्त भैया मीनल भाभी के साथ उनके बेडरूम में सोते हैं तो मैं मां के साथ सोता हूं. कभी कभी मां हेमन्त भैया को बुला लेती है अपने कमरे में सोने को, तब मैं भाभी के कमरे में सो जाता हूं. और जब भैया बाहर होते हैं टूर पर तो मैं, मां और भाभी साथ सोते हैं”
“वो राधाबाई नहीं सोतीं वहां?” उसे पास खींचकर चिपटाते हुए मैंने पूछा.
“नहीं जीजाजी, वे बस दिन में आती हैं. वो तो अच्छा है, अगर रात को रहें तो हम सब से अपने मन का करा लेंगी, हम लोगों को कोई मौका ही नहीं मिलेगा अपने मन की करने का”
उसका चेहरा अब बिलकुल मेरे सामने था. उसने विग निकाल दिया था फ़िर भी उसके चेहरे पर एक गजब की मिठास थी जैसी लीना के चेहरे में है. मैंने उसके होंठ अपने होंठों में दबाये और चुंबन लेने लगा. जल्द ही ये चुंबन प्रखर हो गये. दांतों में दबा दबा कर मैंने उसके वे कोमल होंठ चूसे. उसकी जीभ चूसी और खुद अपनी जीभ उसके मुंह में घुसेड़ी. अब ललित मेरी जीभ चूसते चूसते धक्के मार रहा था, उसका लंड मेरे पेट को कस के दबा रहा था. मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं है, उस बेचारे ने मुझे इतने सुखद स्खलन का आनंद दिया है तो उसको भी सुख देना मेरी ड्यूटी है.
मैंने चुंबन तोड़ा तो तो जोर से सांसें लेता हुआ वह बोला “आप सॉलिड किसिंग करते हैं जीजाजी”
“क्यों, और कोई नहीं किस करता तेरे को ऐसे? इतना क्यूट लड़का है तू”
“भाभी करती है ऐसे कई बार. कभी कभी मां करती है”
मैंने उसे पलट कर दूसरी करवट पर लेटने को कहा. “अब जरा ऐसे चिपक मेरे को, मुझे सहूलियत होगी” मैंने उसे पीछे से आगोश में ले लिया. मेरा लंड अब फ़िर से खड़ा होकर उसके नितंबों के बीच की लकीर में आड़ा धंसा हुआ था. उसका छरहरा बदन बांहों में लेकर ऐसे ही लग रहा था जैसे किसी कमसिन कन्या को भींचे हुए हूं. एक हाथ से मैंने उसका लंड पकड़ा और सहलाने लगा. जरा छोटा था पर एकदम रसीले गन्ने जैसा था. मैंने उसका सुपाड़ा मुठ्ठी में भरकर दबाया और फ़िर अपने खास तरीके से उसकी मुठ्ठ मारने लगा, जैसा मुझे खुद पसंद है.
“आह … ओह … क्या मस्त करते हैं आप जीजाजी!” ललित ने सिहरकर कहा. जवाब में मैंने उसकी गर्दन पीछे से चूमना शुरू कर दी. लीना के बाल उठाकर मैं जब उसकी गर्दन ऐसे चूमता हूं तो कितनी भी थकी हो या मूड में न हो, फ़िर भी पांच मिनिट में गरमा जाती है. ललित का लंड भी अब मेरी मुठ्ठी में उछल कूद कर रहा था. दिख भी एकदम रसीला रहा था. गोरा डंडा और लाल लाल चेरी. मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं ये करूंगा पर एक तो ललित का रूप और दूसरे उसने मुझे जो सुख दिया था उसके उत्तर में उसे सुख देने की चाह!
“ललित राजा, अब मेरी सुनो. इसके बाद का रूल यह है कि मैं कुछ भी करूं, तुम बस पड़े रहोगे ऐसे ही सीधे. न हाथ लगाओगे, न धक्के मारोगे. ठीक है?” उसके लंड को सहलाते हुए मैंने कहा. उसने हां कहा, अब तो वो ऐसी हालत में था कि मैं कुछ भी कहता तो मान लेता.
उसे सीधा लिटा कर मैं उसके लंड पर टूट पड़ा. उसको चूमा, सुपाड़ा थोड़ी देर चूसा, फ़िर जीभ से चारों और से चाटा. ललित गर्दन दायें बायें करने लगा, साले को सहन नहीं हो रहा था. “जीजाजी प्लीज़ … कैसा तो भी होता है”
“अब कैसा भी तो होता है इसका मतलब मैं क्या समझूं यार? तू तो ऐसे तड़प रहा है जैसे आज तक किसीने तेरा लंड नहीं चूसा हो. घर में तो सब जुटे रहते हैं ना इसपर, तेरी दीदी, भाभी, मां, राधाबाई … फ़िर?”
“पर आप करते हैं तो सच में रहा नहीं जाता जीजाजी … ओह .. आह … जीजाजी प्लीज़”
पर मैं तंग करता रहा. अब मेरा भी मूड बन गया था, एक तो पहली बार लंड चूस रहा था, और किस्मत से वह भी ऐसा रसीला खूबसूरत लंड. मन आया वैसे किया, कुछ एक्सपेरिमेंट भी किये. हां ललित को बहुत देर झड़ने नहीं दिया. ललित आखिर कराहने लगा “जीजाजी … प्लीज़ … दिस इज़ नॉट फ़ेयर … इतना क्यों तंग कर रहे हैं?”
“तेरी दीदी मुझे सताती है उसका बदला ले रहा हूं, ऐसा ही समझ ले. मालूम है कि कभी जब तेरी दीदी दुष्ट मूड में होती है तो मेरा क्या हालत करती है? मेरे हाथ पैर बांध कर मुझे कैसे कैसे सताती है? अब उससे तो मैं झगड़ नहीं सकता, पर उसका बदला तुझपर निकालने का मौका मिला है तो क्यों न निकालूं? बहन का बदला भाई से! यही गनीमत समझ ले कि मैंने तेरी मुश्क नहीं बांधी”

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