मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका – Update 3

मेरी ससुराल यानि बीवी का मायका - Erotic Story
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मैंने शरणागति मान ली. हाथ जोड़कर अपनी रानी से कहा “जैसा तुम कहो डार्लिंग, और कोई आज्ञा हो तो बताओ”

“वो कल बताऊंगी आने के बाद. चलो अब मुंह लटका के न बैठो” मुझे चूम के प्यार से बोली “ये रिश्ते तो निभाने ही पड़ते हैं. आज बड़े घर जाना ही है, कल पूरा दिन है फ़िर से, तब खातिरदारी करवा लेना. अब एक घंटे में तैयार हो जाओ सब फटाफट, मां तो एक घंटे पहले ही गयी भी, बोल कर गयी थी कि सब जल्दी आना”

मैं और ललित पांच मिनिट पड़े रहे, स्खलन का आनंद लेते हुए. फ़िर उठे और तैयार होने लगे.

बड़े घर में ये हड़कंप मचा था. बहुत से रिश्तेदार आये थे. मैंने कितने बड़े बूढ़ों और बूढ़ियों के पैर छुए, उसकी गिनती ही नहीं है, सब नया जमाई करके इधर उधर मुझे मिलवाने ले जा रहे थे. लीना, मीनल और ताईजी तो मुझे बहुत कम दिखीं, हां ललित दिखा जो लीना को ढूंढ रहा था, बेचारा अपनी दीदी का मारा था. हां, बाद में जब औरतों का गाना बजाना खतम हुआ तो वे तीनों दिखीं. सब इतनी सुंदर लग रही थीं. याने वे सुंदर तो थीं ही, मैंने सबकी सुंदरता इतने पास से देखी थी पर उस दिन सिल्क की साड़ियां, गहने, मेकप इन सब के कारण वे एकदम रानियां लग रही थीं. लीना तो लग ही रही थी राजकुमारी जैसी, मीनल भी कोई कम नहीं थी और सासूमां, उफ़्फ़ उनका क्या कहना, गहरी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी में उनका रूप खिल आया था. लीना ने शायद जिद करके उनको हल्की लिपस्टिक भी लगा दी थी, उनके होंठ गुलाब की कलियों जैसे मोहक लग रहे थे और जब मैंने उनके सुबह के चुंबनों के स्वाद के बारे में सोचा तो कुरता पहने होने के बावजूद मेरा हल्का सा तंबू दिखने लगा, बड़ी मुश्किल से मैंने लंड को शांत किया नहीं तो भरी सभा में बेइज्जती हो जाती. एक बात थी, मैं कितना भाग्यवान हूं कि ऐसी सुंदर तीन तीन औरतों का प्यार मुझे मिल रहा है, ये बात मेरे मन में उतर गयी थी. पर उस समय कोई मुझे कहता कि फटाफट चुदाई याने क्विकी के लिये तीनों में से एक चुनो, तो मुश्किल होती. शायद मैं मांजी को चुन लेता!! क्या पता!!

रात को पूजा देर तक चली. फ़िर खाना हुआ. दो बज गये थे और सब वही सोय गये, वैसे सब की व्यवस्था अच्छी की गयी थी, इतना ही था कि मर्द और औरतें अलग अलग कमरों में थे. अब इतने लोगों में सबको जोड़े बनाकर कमरे देना भी मुश्किल था. सुबह उठकर बस चाय पीकर सब निकलनी लगे. हम भी निकले और नौ बजे तक घर आ गये. आते ही थोड़ा आराम किया, अब भी थकान थी. एक दो घंटे आराम के बाद नहाना धोना वगैरह हुआ. अब राधाबाई भी नहीं थी इसलिये हमने बाहर से ही खाना मंगवा लिया. दोपहर के खाने के बाद मीनल से सोनू को बोतल से दूध पिलाया. सोनू जल्द ही सो गयी. मीनल लीना की ओर देखकर मुस्करा कर बोली “अब सोयेगी चार पांच घंटे आराम से, कल भीड़ भाड़ की वजह से चिड़चिड़ा रही थी, सोयी भी नहीं ठीक से”

मैं सोच रहा था कि कल से मीनल के स्तन खाली नहीं हुए, भर गये होंगे. उसके ब्लाउज़ में से वे अब अच्छे खासे उभरे उभरे से लग रहे थे. मीनल ने मेरी नजर कहां लगी है वो देखा और मुझे आंख मार दी. फ़िर पलक जल्दी जल्दी झपका कर प्यार से सांत्वना दी कि फ़िकर मत करो, सब मिलेगा. अपना आंचल ठीक करके मीनल लीना से बोली “लीना दीदी … आज रात को तुम दोनों जाने वाले हो? बहुत कम समय के लिये आये हो तुम लोग, देखो ना, कल का आधा दिन और पूरी रात और आज का आधा दिन ऐसे ही बेकार गया”

लीना बोली “भाभी, पूरी दोपहर और शाम है, ट्रेन तो रात की है ना, मुहब्बत करने वाले तो पांच मिनिट में भी जन्नत की सैर कर आते हैं. वैसे तुम ठीक कहती हो. ललित … जा बाहर से ताला लगा दे और पीछे के दरवाजे से अंदर आ जा. और सब पर्दे खिड़कियां बंद कर दे. कोई आये भी तो वापस चला जायेगा सोच के कि हम वापस नहीं आये अब तक. शाम को ताला खोलेंगे.”

मांजी जो अब तक चुपचाप बैठी थीं, बोलीं “तब से कह रही हूं, अब ज्यादा टाइम नहीं बचा है, कोई सुनता ही नहीं मेरी. अब देर मत करो और. लीना, तू जल्दी दामादजी को लेकर आ जा मेरे कमरे में”

मीनल हंसने लगी “मां जी को सबसे ज्यादा जल्दी हो रही है अपने दामाद के और लाड़ प्यार करने की”

सासूमां शरमा गयीं. बोलीं “चल बदमाश कहीं की. अरे अनिल का तो खयाल करो, बेचारे की पूरी रात वेस्ट कर दी हमने, चलो जल्दी करो”

मीनल बड़े नाटकीय अंदाज में बोली “और मैं और ललित क्या करें ममी? चल ललित, अपन पिक्चर चलते हैं, वो जय संतोषी मां लगी है”

ताईजी चिढ़ कर बोलीं “अब तो बहू तू मार ही खायेगी, कोई कहीं नहीं जायेगा, सब लोग जल्दी मेरे कमरे में आओ, और कैसे तैयार होकर आना है ये बताने की जरूरत नहीं है. मेरा कमरा बड़ा है, इसलिये वहां सब को आराम से … याने … मैं जा रही हूं, तुम लोग भी आ जाओ” फ़िर वे उठकर अपने कमरे में चली गयीं.

लीना बोली “अब सब समझे या नहीं? मां ने तैयार होकर आने को कहा है. याने और अच्छे कपड़े पहनकर बनाव सिंगार करके नहीं, कपड़े निकाल कर जाना है, एकदम तैयार होकर हमारी कामदेव की पूजा जल्द से जल्द शुरू करने के लिये. चल ललित, जा और ताला लगाकर जल्दी आ, मैं अनिल को लाती हूं”

मुझे वह अपने कमरे में ले गयी. हमने फटाफट कपड़े निकाले. लीना जब साड़ी फ़ोल्ड करके रख रही थी तब उसके गोल मटोल गोरे नितंब देखकर मैंने झुक कर उनको चूम लिया. फ़िर उनको दबाता हुआ पीछे से चिपक गया. अपना लंड उन तरबूजों के बीच की लकीर में सटा कर लीना की ज़ुल्फ़ों में मुंह छुपा कर बोला “अब डार्लिंग, इन मेरे प्यारों को मैं इतना मिस कर रहा हूं, जरा एक राउंड हो जाये फटाफट? पीछे से?”

“बिलकुल नहीं ये फटाफट होने वाली चीज नहीं है. मुझे मालूम है, मेरी गांड के पीछे पड़े कि रात भर की छुट्टी.”

लीना के नितंबों को दबाता हुआ मैं बोला “बड़ी आई रात भर वाली. महने में एक बार कभी इनका आसरा मेरे लंड को मिलता है, अब आज मरा भी लो रानी प्लीज़”

“बिलकुल नहीं, अब चलो, मीनल और ललित तो आ भी गये होंगे ममी के कमरे में”

“रानी, चलो तुम ना मराओ, तुमको मैं क्या कहूं, तुम्हारा तो गुलाम हूं पर वो … याने नाराज मत हो पर ताईजी की क्या मस्त गांड है, डनलोपिलो जैसी, अब तक ठीक से हाथ भी नहीं लगा पाया. हाथ खोले ही नहीं किसी ने कल दिन भर मेरे. और मीनल की ठीक से देखी नहीं पर मस्त कसी हुई लगती है. अगर आज अब मैं जरा ….”

लीना मेरी बात काट कर गुस्से से बोली “खबरदार. मां की गांड को बुरी नजर से मत देखना. अनर्थ हो जायेगा. डेढ़ दिन को आये हो, जरा अपनी साख मनाये रहो. मां को सच में आदत नहीं है, मीनल की मैं नहीं जानती पर आज अब टाइम भी नहीं है”

मेरे सूरत देख कर फिर वो तरस खा गयी. मेरे गाल को सहला कर बोली “आज मां और मीनल को अपने तरीके से तुम्हारी खातिरदारी करने दो, बाद में मौके बहुत मिलेंगे. अगली दीवाली भी है ना! अब चलो. ऐसे मुंह मत लटकाओ” वो जानती थी कि उसकी गांड मारने का मुझे कितना शौक था जो बस महने में एकाध बार ही मैं पूरा कर पाता था.

हम ममी के कमरे में आये. वहां बड़ा सुहाना दृश्य था. तीन नग्न बदन आपस में लिपटे हुए थे. ललित को बीच में लेकर उसकी मां और भाभी उसके लाड़ कर रहे थे. ताईजी अपने बेटे को बड़े प्यार से चूम रही थीं. उसका गोरा चिकना लंड उनकी मुठ्ठी में था. मीनल बस उसे बाहों में भरके उसका सिर अपनी ब्रा में कसे स्तनों पर टिकाये थी. वह बीच बीच में ताईजी के चुम्मे ले लेती. ललित का लाड़ प्यार जिस तरीके से हो रहा था, उसमें कोई अचरज की बात नहीं थी. वह घर का सबसे छोटा सदस्य था और जाहिर है कि सबका और खास कर अपनी मां का लाड़ला था. इस बार उसे ठीक से देखा तो मैंने गौर किया कि सच में बड़ा चिकना लौंडा था, एकदम खूबसूरत. अभी तो मां के प्यार का आनंद ले रहा था और मीनल की ब्रा खोलने की कोशिश कर रहा था.

“अरे ये क्या कर रहा है बार बार” मीनल झुंझलाई.

“पिला दो ना भाभी, कल से तरस गया हूं”

“अरे मेरे राजा, तू समझता क्यों नहीं है, रोज पीता है ना, अब एक दिन नहीं पिया तो क्या हुआ, आज ये दावत सिर्फ़ अनिल के लिये है, ठीक से पिला नहीं पायी कल से, बस थोड़ा जल्दी जल्दी में चखाया था. अब आज जरा तेरे जीजाजी को मन भरके इसका भोग लगाने दे”

ललित शर्मा गया, जैसे गलती करते पकड़ा गया हो. “सॉरी भाभी, भूल गया था.” फ़िर कनखियों से मेरी ओर देखा जैसे माफ़ी मांग रहा हो.

मैंने कहा “मीनल, मेरी मानो तो सबको थोड़ा थोड़ा दे दो, मेरे हिस्से का रात को निकलने के पहले पिला देना, पर तब मैं सब पियूंगा”

लीना बोली “चल, खुश हो गया अब तो? चलो भाभी, अब जल्दी करो”

“अभे नहीं लीना, जरा भरने दे ना और. फ़िर सबको दो दो घूंट तो मिलेंगे, पहले ब्रेक के बाद मुंह मीठा कराती हूं सब का. चल ललित सो जा ठीक से” ललित को नीचे चित लिटाकर मीनल उसपर चढ़ने की तैयारी करने लगी. ताईजी भी संभल कर अपने बेटे का सिर अपनी जांघ पर लेकर बैठ गयीं.

“ये क्या हो रहा है?” लीना ने उनको फटकार लगायी. “ललित को भेजो इधर और तुम दोनों सास बहू अनिल पर ध्यान दो”

ताईजी बोलीं “अरे क्या कर रही है लीना, ललित को कब से पकड़कर बैठी है. और अनिल को भी कल से तेरे साथ … याने मौका ही नहीं मिला. हमने सोचा कि अब तुम दोनों जरा प्यार से …”

“वहां बंबई में ये मेरा पति मुझे जोंक जैसा चिपका रहता है चौबीस घंटे, छोड़ता ही नहीं, अब दो दिन मेरे बदन को नहीं मसलेगा तो मर नहीं जायेगा. तुम दोनों खबर लो उसकी. मुझे भी जायका बदलना है. चल ललित …” कहकर उसने ललित को हाथ पकड़कर जल्दी उठाया और पलंग के बाजू में रखी कुरसी पर बैठ गयी. ललित को सामने बैठा कर टांगें फैलाकर बोली “चल ललित, मुंह लगा दे जल्दी, तू आज भुनभुना रहा था ना कि दीदी ने मुंह भी नहीं लगाने दिया, अब पूरा रस चूस ले अपनी दीदी का. और जरा ठीक से प्यार से स्वाद ले, दीदी को भी मजे दे देकर, तेरे इस मुसटंडे …” ललित के खड़े लंड को पैर से रगड़कर लीना बोली ” … को बहुत मजे दिये हैं मैंने कल से, अब इस कह कि जरा सब्र करे. चल शुरू हो जा फटाफट”

ललित लीना की टांगों के बाच बैठता हुआ बोला “दीदी … प्लीज़ चोदने भी दो ना …”

“कल तो चोदा था अनिल के सामने, बड़े घर जाने के पहले” लीना उसे आंखें दिखाकर बोली.

“वो तो दीदी तुमने मुझे चोदा था. मैंने तुमपर चढ़ कर कहां चोदा है पिछले दो दिनों में?” ललित ने कहा तो लीना चिढ़ गयी

“तुझे नहीं चूसनी मेरी चूत तो सीधा बोल दे कि दीदी, अब मुझको तुम्हारा रस नहीं भाता. यहां बहुत हैं उसके कदरदान. मां या मीनल भाभी तो बेचारी कब से राह देख रही हैं, वो तो मैं ही प्यार से लाड़ से तेरे लिये अपनी बुर संजोये बैठी हूं कि मेरा लाड़ला छोटा भैया है, उसको मन भर के पिलाऊंगी. और अनिल को कहूं तो अभी सब छोड़ छाड़ कर आ जायेगा मुंह लगाने. तू फूट … चल भाग …”

ललित ने घुटने टेक दिये. याने सच में घुटने टेक कर लीना की माफ़ी मांगते हुए उसके पांव चूमने लगा. वैसे उसमें कोई बड़ा तकलीफ़ वाली बात नहीं थी, लीना के पैर हैं बहुत खूबसूरत “दीदी … सॉरी … माफ़ कर दो … मेरा वो मतलब नहीं था … तुम्हारे रस के लिये तो मैं कुछ भी कर लूं …. बस दीदी …. तुमको देखते ही ये बदमाश …” अपने लंड को पकड़कर वह बोला “बहुत तंगाता है दीदी”

“उसको कह कि सबर करेगा तो बहुत मीठा फल मिलेगा. अब चल फटाफट” लीना आराम से कुरसी में टिकते हुए बोली. अपनी टांगें उसने ललित के स्वागत में फैला दीं. ललित ने बैठ कर मुंह लगा दिया और मन लगाकर चूसने लगा. जिस प्यास से वो अपनी बड़ी बहन की चूत चूस रहा था उससे मैं समझ गया कि बुरी तरह मरता है लीना पर. दो मिनिट बाद उसने लीना की जांघें बाहों में भर लीं और चेहरा पूरा लीना की बुर में छिपा दिया. लीना सिहरकर बोली “हं … आह … अब कैसा अच्छे भाई जैसा दीदी की सेवा कर रहा है … हं …. हं … हं …”

मुझे भाई बहन का यह प्यार बड़ा ही मादक लगा. मैं यह भी सोच रहा था कि आखिर लीना कल से सिर्फ़ अपने छोटे भाई के पीछे क्यों पड़ी है. मुझे लगा था कि दो ही दिन को आये हैं तो मां और भाभी से भी ठीक से इश्क विश्क करने का मन होता होगा. पर मैं कुछ बोला नहीं, मैं जरा घबराता हूं उससे, पूरा जोरू का गुलाम जो ठहरा. सोचा करने दो मन की.

इसलिये मैं जाकर पलंग पर बैठ गया, अपनी सास और सल्हज के प्रति अपना भक्तिभाव जताने! पहले मांजी के गाल को चूमा, फ़िर कमर में हाथ डालकर मीनल को पास खींचा. पांच मिनिट बस दोनों को बारी बारी से चुंबन लिये, अब क्या बताऊं क्या मिठास थी उन चुंबनों में, जैसे एक ही प्लेट में दो मिठाइयां लेकर बारी बारी से खा रहा होऊं. जब ताईजी का एक चुंबन जरा लंबा हो गया, याने उनके वे नरम गुलाबी होंठ इतने रसीले लग रहे थे कि मैं बस चूसे जा रहा था, तब मीनल मुझसे चिपट कर मेरे कान के लोब को दांत से काटने लगी. मैंने हाथ बढ़ाकर उसकी ब्रा के बकल खोलने की कोशिश की तो बोली “रहने दो जीजाजी, अभी वक्त नहीं है, तुम फ़िर दबाने लगोगे और सब दूध बह जायेगा, ब्रा बाद में निकालूंगी.”

“फ़िर क्या आज्ञा है इस दास के लिये?” मैंने हाथ जोड़ कर कहा. “बड़ी तपस्या की होगी मैंने पिछले जनम में जो दो दो अप्सराओं की सेवा करने का मौका मिला है आज”

मांजी मुंह छुपा कर हंसने लगीं. मीनल ने बड़ी शोखी से मेरी ओर देखा जैसे मेरी बात की दाद दे रही हो. फ़िर बोली “अभी तो हमें स्टैंडर्ड सेवा चाहिये अनिल, खेल बहुत हो गये. अब हम तीनों औरतों को बेचारा ललित अकेला क्या करे, और वो राधाबाई भी थोड़े छोड़ती है उसको! अभी नया नया जवान है. अब जरा इस सोंटे का …” मेरा लंड पकड़कर हिलाते हुए बोली ” … ठीक से यूज़ करना है. कल से तुम तो बस पड़े हो, सब मेहनत हमने की, अब हम लेटेंगे और तुम मेहनत करोगे. ताईजी अब पहले आप …”

सासूमां शरमा कर बुदबुदाईं “अरे बहू … मैं कहां कुछ … याने तू ही पहले …”

मीनल ने एक ना सुनी. एक बड़ा तकिया रखकर मांजी की कमर के नीचे रखकर उनको जबरदस्ती चित सुला दिया और उनके पास लेटकर उन्हें चूमने लगी. मुझे बोली “चढ़ जाओ जमाईराजा, अब टाइम वेस्ट मत करो, अब तुम्हारे ना तो हाथ बंधे हैं ना पांव, जैसा मन चाहे, जितनी जोर से चाहे, करो, हमारी ममीजी बेचारी सीधी हैं इसलिये खुद कुछ नहीं कहतीं पर उनका हाल मैं समझती हूं”

मैंने फिर भी संयम रखा, अच्छा थोड़े ही लगता है कि वहशी जैसा चढ़ जाऊं! मांजी की गीली तपती चूत में मैंने जब लंड पेला जो वो ऐसे अंदर गया जैसा पके अमरूद में छुरी. फ़िर थोड़ा झुककर बैठे बैठे ही हौले हौले लंड सासू मां की बुर में अंदर बाहर करने लगा.

सासूमां कितनी भी शरमा रही हों पर अब उन्होंने जो सांस छोड़ी उसमें पूरी तृप्ति का भाव था. मीनल को बोलीं “बहुत अच्छा लगा बेटी, आखिर ठीक से सलीके से मेरे दामाद से मेरा मिलन हो ही गया. कल मेरी कमर दुखने लगी थी ऊपर से धक्के लगा लगा कर. पर क्या करूं, तू जतला के गयी थी ना कि अनिल को आज बस लिटाकर रखो … ओह … ओह … उई मां …. बहुत अच्छा लग रहा है अनिल बेटे … कितना प्यारा है तू … अं … अं … और पास आ ना मेरे बच्चे … ऐसा दूर ना रह ….” कहकर उन्होंने मुझे बाहों में भींच कर अपने ऊपर खींच लिया और अपनी टांगें मेरी कमर के इर्द गिर्द लपेट लीं. मैंने भी उनको ज्यादा तंग ना करके घचाघच चोदना शुरू कर दिया, जैसा लीना को चोदता हूं. सोचा लीना को चुदवाने की जो स्टाइल पसंद है वो इन दोनों को भी जच जायेगी.

ज्यादा डीटेल में वर्णन क्या करूं, आप बोर हो जायेंगे पर अगले घंटे भर में मैंने सास बहू को अलट पलट कर मस्त चोदा. बिलकुल उनकी इच्छा पूर्ति होने तक. पहले मां जी को दस पंद्रह मिनिट चोदा, दो बार झड़ाया, खुद बिना झड़े. वे तो मस्ती से ऐसे सीत्कार रही थीं जैसे बहुत दिनों में ठीक से चुदी ना हों. दो बार लगातार झड़ीं. फ़िर मुझे ध्यान में आया कि उनका बेटा हेमन्त याने लीना का भाई दो माह से परदेस में था, ललित के बस की थी नहीं इतनी चुदाई, बेचारी चुदें तो आखिर कैसे!

चोदते चोदते मैंने मन भरके उनके मीठे गुलाबी मुंह का रस पान किया. बीच बीच में वे मेरा सिर नीचे दबाती थीं, पहले तो मुझे लगा कि क्या कर रही हैं पर फ़िर समझ में आया कि उनको मम्मे चुसवाना था. अब उनकी उंचाई मुझसे इतनी कम थी कि सिर्फ़ होंठों का चुंबन लेने के लिये ही मुझे गर्दन बहुत झुकानी पड़ती थी. फ़िर जब उनकी मंशा समझ में आयी तो भरसक मैंने गर्दन और नीची करके उनके निपल भी चूसे. गर्दन दुखने लगती थी पर उनको जैसा आनंद मिलता था, उससे उस पीड़ा को भी मैं सहता गया. लगता है उनके निपल बहुत सेन्सिटिव थे और चुसवाकर उनकी वासना और भड़कती थी. और क्यों ना हो, किसी भी ममतामयी मां के निपल तो सेन्सिटिव होंगे ही!

आखिर जब वे आंखें बंद करके लस्त हो गयीं और बुदबुदाने लगीं कि बस … बेटा बस … तब मैंने लंड बाहर खींचा. मीनल अब तक एकदम गरमा गयी थी. जब तक मैं ताईजी को चोद रहा था, वह बस हमसे लिपट कर जो बन पड़े कर रही थी, कभी मुझे चूमती, कभी मांजी को, कभी उनके स्तन दबाती.

अब मांजी धराशायी होते ही मीनल तैयार हो गयी. मैडम को पीछे से करवाना शायद अच्छा लगता था, डॉगी स्टाइल में. मांजी पर मैं कुछ देर पड़ा रहा, उनकी झड़ी बुर में लंड जरा सा अंदर बाहर करता रहा. उन्होंने जब आंखें खोलीं तो उनमें जो भाव थे वो देख कर ही मन प्रसन्न हो गया कि उनको मैंने इतना सुख दिया. तब तक मैं मीनल भाभी के मांसल बदन पर हाथ फिरा कर उनको और गरमा रहा था. उनकी बुर को पकड़ा तो पता चला कि एकदम तपती गीली भट्टी बन चुकी थी.

मांजी के सम्भलते ही मीनल खुद झुक कर कोहनियों और घुटनों पर जम गयी. ताईजी उठ कर बैठ गयीं और फ़िर सरककर मीनल के सामने आ गयीं. बड़े प्यार से मीनल के चुम्मे लेने लगीं “बहू … अब ठीक से मन भरके जो कराना है करा ले अनिल से. मेरा इतना खयाल रखती है मेरी रानी, अब मेरी फिकर छोड़ और खुद आनंद लूट ले. अनिल बेटे … बहुत अच्छी है मेरी बहू … ये मेरा भाग्य है जो ऐसी बहू मिली है … बेटी जैसी … अब इसे भी खूब सुख दे मेरे लाल जैसा मेरे को दिया”

“मीनल भाभी के लिये जान हाजिर है ताईजी, आप चिंता ना करें” कहके मैं मीनल के पीछे घुटने टेक कर बैठ गया और अपना तना मस्ताया लंड हाथ में ले लिया. अब क्या कहूं, आंखों के सामने जो सीन था वो … याने …. स्वर्ग के दो दो दरवाजे एक साथ दिख रहे थे. फूली गोरी गोरी पाव रोटी जैसी बुर, काले बालों से भरी और उनमें वो लाल छेद, रिसता हुआ और उसके जरा ऊपर दो भरे गुदाज मांसल नितंबों के बीच जरा भूरा सा गुदा का छेद जो अभी एकदम बंद था. एक बार मन में आया कि डाल ही दूं सट से अंदर, बाद में जो होगा देखी जायेगी पर फ़िर लीना के गुस्से की याद आयी तो मन को काबू में किया. ऊपर वाले उस सकरे भूरे छेद लो बस एक बार हल्का सा उंगली से सहलाया और फ़िर लौड़े को बुर पर रखकर अंदर तक पेल दिया. फ़िर मीनल भाभी की कमर पकड़कर सटा सट चोदने लगा.

मीनल ने मन भर के मुझसे चुदवाया. “और जोर से अनिल … और जोर से अनिल” ऐसा बार बार कहती. मैंने भी हचक हचक के वार करना शुरू कर दिया, ऐसी कोई चुदवाने वाली मिले तो चैलेंज लेने में मजा आता है. उसका बदन मेरे धक्कों से हिचकोले लेने लगा. अब वो मस्ती में “ममी … ममी … देखिये ना …. कैसा कर रहा है आपका दामाद … ममी ममी …” बड़बड़ाने लगी. ताईजी उसके सामने बैठ कर लगातार उसके चुंबन ले रही थीं. जब मीनल हल्के हल्के चीखने लगी तो उन्होंने अपना एक स्तन उसके मुंह में ठूंस कर उसकी बोलती बंद कर दी. मीनल अब कस कस के पीछे की ओर अपनी कमर ठेल ठेल कर मेरा लंड गहरे से गहरा लेने की कोशिश कर रही थी. आखिर आखिर में तो मैं भी इतना उत्तेजित हो गया कि करीब करीब मीनल पर पीछे से चढ़ ही गया. मीनल का भी जवाब नहीं, सुंदरता के साथ साथ अच्छा खासा मजबूत बदन था उसका, मेरे वजन को आराम से सहते हुए चुदवाती रही. आखिर जब झड़ी तो मुझे भी साथ लेकर. और रुकना मेरे लिये मुमकिन नहीं था. मीनल लस्त होकर पलंग पर लेट गयी और मैं उसकी पीठ के ऊपर.

उधर लीना ने बेचारे ललित की हवा टाइट कर रखी थी. मन भरके अपने छोटे भाई से चूत चुसवा रही थी. सनसनाते लंड से तंग होकर जब जब वो बेचारा उठने की कोशिश करता तो उसके कान पकड़कर फ़िर वो उसका मुंह अपनी बुर पर भींच लेती थी. एक दो बार ऐसा होने पर उसने अपनी जांघें ललित के सिर के इर्द गिर्द जकड़ लीं और तभी ढीली कीं जब ललित फ़िर चुपचाप उसकी चूत चूसने लगा.

मीनल को चोदते वक्त एक बात मैंने गौर की थी कि ललित बार बार नजर चुराके हमारी ओर देख रहा था. खास कर जब मीनल की चुदाई शुरू करने के पहले मैं लंड हाथ में लेकर उसके दोनों छेद देख रहा था तब उसकी नजर मेरे लंड पर जमी थी. शायद खुद के लंड से मेरे लंड की तुलना कर रहा हो. तब मैंने उसको एक स्माइल देकर फ़्रेंडली वे में आंख मारी थी कि जमे रहो. लीनाने तब उसको चपत मार कर फ़िर उसका सिर अपनी जांघों में दबोच लिया था और मेरी ओर देख कर शैतानी से हंस दी थी. उसकी हंसी के पीछे क्या सोच थी वो मैं नहीं समझ पा रहा था.

एक बात और मेरे मन में आयी. मांजी को चोदते वक्त मैं इतना मग्न था कि ललित की ओर ध्यान ही नहीं गया था. अगर देखता तो ललित के चेहरे पर क्या भाव होता? आखिर उसीके सामने मैं उसकी मां को चोद रहा था. अब भले ही ललित इस चुदैल परिवार का ही सदस्य था और खुद भी अक्सर अपनी मां को चोदता होगा पर अपने जीजाजी को अपनी मां को चोदते वक्त वह क्या सोच रहा होगा. विचार बड़ा लुभावना था और इसके बारे में सोच सोच कर मेरा लंड फ़िर से जागने लगा.

फ़िर ब्रेक हुआ. मीनलने आखिर ब्रा निकाली और सब को स्तनपान कराया. पहले मांजी और मुझे एक साथ और फ़िर लीना और ललित को. उसके स्तन खाली होते ही मैंने मीनल को बाहों में भर लिया और उसके मांसल मम्मे हथेली में लेकर दबाने लगा. कल से मेरा मन हो रहा था, पर अब मौका मिला था.

“लगता है चूंचियां मसलने का बड़ा शौक है जीजाजी को” मीनल ने लीना की ओर देखकर चुटकी ली.

“अरी तू नहीं जानती, एकदम पागल है ये आदमी उनके पीछे, मेरी तो बहुत हालत खराब करता है” लीना ने मेरी शिकायत की.

“अब मेरा क्या कसूर है, तुम लोगों ने इतनी मस्त चूंचियां उगाई ही क्यों? और मीनल रानी, तुम्हारे मम्मों को मसलने को तो कल से मरा जा रहा हूं, तुमने ही रोक लगा दी थी कि दूध बह जायेगा नहीं तो अब तक तो …”

“कचूमर निकाल देते यही ना? तुम्हारे जैसा जालिम आदमी मैंने आज तक नहीं देखा” लीना बोली. “ललित चल लेट पलंग पर”

मांजी बड़े गर्व से बोलीं “पर ये बात सच है अनिल बेटा कि मीनल के स्तन लाखों में एक हैं, यह सुंदर तो है पर मुझे लगता है हेमन्त ने इसे पसंद सिर्फ़ इसकी छाती देखकर किया था. जिस दिन इसको हम देखने गये थे, तब क्या लो कट ब्लाउज़ पहना था इसने! वैसे हम सब को मीनल बहुत पसंद आयी थी.

मीनल शैतानी भरी आवाज में बोली “हां, मांजी सच कह रही हैं. हेमन्त को तो मैं पसंद आयी ही, ममी को भी इतनी पसंद आयी कि हमारे हनीमून पर भी ममी साथ थीं”

“चल बदमाश कहीं की” सासूमां लाल चेहरे से बोलीं “अरे अब हेमन्त ने ही मुझे कहा कि मां, तू भी साथ चल, मुझसे अकेले संभलेगी नहीं, बहुत गरम और तेज लगती है, तो मैं क्या करती?” ताईजी ने सफ़ाई दी.

मीनल मांजी के पास गयी और उनको चूम कर बोली “अरे ममी, नाराज मत होइये, मैं कंप्लेन्ट थोड़े कर रही हूं. आप साथ थीं तो मुझे भी बहुत अच्छा लगा, वो कहने को दो रूम लिये थे पर ममी हमारे साथ ही रहीं. वे दिन रात तो भुलाये नहीं भूलते, लगातार लाड़ प्यार हुआ मेरा, हेमन्त अलग होता था तो मांजी आगोश में ले लेती थीं.”

इस प्यार भरी नोक झोंक से सभी फ़िर मूड में आ गये थे इसलिये अपने आप दूसरा राउंड शुरू हो गया था. ललित को नीचे लिटाकर लीना उसपर उलटी तरफ से चढ़ बैठी थी और लेट कर उसका लंड चूस रही थी. ललित ने शायद फ़िर से कहने की कोशिश की कि दीदी, अब तो चुदवा ले पर उसके पहले ही लीना ने उसके मुम्ह पर अपनी बुर सटाकर उसकी आवाज बंद कर दी थी.

उनका यह सिक्सटी नाइन देखकर मुझे भी फ़िर से मांजी का स्वाद लेने की इच्छा होने लगी. मीनल का भी ले सकता था पर उसे चोदा था और उसकी बुर में मेरा वीर्य भर गया था इसलिये खालिस स्वाद नहीं आता. और इस बार मुझे सासूमां की बुर जरा ठीक से पूरी निचोड़नी थी, अपने खास अंदाज में.

मैं पलंग के सिरहाने से टिक कर बैठ गया और ताईजी को मेरी ओर पैर करके सुला दिया. उनके पैर पकड़कर एक एक अपने दोनों कंधों पर रख लिये. उनकी महकती योनि अब मेरे मुंह के सामने थी. मैंने मुंह डाल दिया और चूसने लगा. ये आसन योनिरसपान के लिये बड़ा अच्छा है, आप चाहें तो अपनी प्रेमिका की बुर इस आसन में पूरी खा सकते हैं. मांजी दो मिनिट में असह्य आनंद में डूब गयीं. पांच मिनिट में उन्होंने दो बार झड़कर उन्होंने अपना तीन चार चम्मच अमरित भी मुझे पिला दिया. पर मैंने चूसना चालू रखा, अभी निचोड़ने की क्रिया तो बस शुरू हुई थी.

ताईजी पांच मिनिट में तड़पने सी लगीं. उनकी झड़ी बुर को मेरी जीभ का स्पर्ष सहन नहीं हो रहा था. “अनिल अब रुका ना बेटे … आह … उई मां … अरे बस … क्या कर रहे हो दामदजी …” कहती हुई वे छूटने के लिये उठने की कोशिश करने लगीं. मैंने मीनल को आंख मारी, वो समझ गयी थी कि मैं क्या कर रहा हूं. उठकर उसके दोनों घुटने मांजी के सिर के आजू बाजू टेके और उनके मुंह पर अपनी चूत देकर बैठ ही गयी. मांजी की आवाज ही बंद हो गयी. वे हाथ मारने लगीं तो मीनल ने उनके हाथ पकड़ लिये और ऊपर नीचे होकर उनके मुंह को चोदती हुई खुद भी मजा लेने लगी. मैंने ताईजी के पैर पकड़े कि फटकार कर अलग होने की कोशिश ना करें और जीभ अंदर डाल डाल कर, उनकी पूरी बुर को मुंह में लेकर चूसता रहा. तभी छोड़ा जब अचानक उनका बदन ढीला पड़ गया, शायद सुख के अतिरेक को वे सहन न कर पाई थीं और बेहोश सी हो गयी थीं.

अब तक लीना ने भी ललित को चूस कर झड़ा डाला था और उठ कर बैठ गयी थी और मेरी करतूत देख रही थी. ललित बेचारा भी चुपचाप पड़ा था. थोड़ा फ़्रस्ट्रेटेड दिख रहा था, और क्यों ना हो, दो दिन से बेचारे को झड़ाया तो गया था पर मन भरके चोदने नहीं दिया था. मेरे भी मन में आया कि लीना उस बेचारे के पीछे क्यों ऐसी पड़ी है.

लीना मेरे पास आयी और धीरे से बोली “मेरे पर ऐसा जुल्म करते हो उससे पेट नहीं भरा क्या जो मेरी मां के पीछे पड़ गये?” फ़िर मेरा कान काट लिया. ये प्यार का उलाहना था. उसे मेरा ऐसा चूसना कितना अच्छा लगता था ये मैं जानता हूं.

“अब क्या करूं रानी, जब आम मीठा होता है तो सब रस निकल जाने पर भी कैसे हम छिलका और गुठली चूसते रहते हैं, बस वैसा ही करने का दिल हुआ ममी के साथ”

अब तक मीनल मेरे लंड को अपनी चूत में लेकर बैठ गयी थी. मैंने उसे पटक कर चोद डाला.

सब इतने मीठे थक गये कि शायद सब वैसे ही कब सो गये पता भी नहीं चला. कम से कम मुझे तो नहीं चला क्योंकि जब उठा तो शाम के सात बजने को थे. वैसे ही पड़ा रहा, बड़ा सुकून लग रहा था, मन और शरीर दोनों तृप्त हो गये थे.

मैं पड़ा पड़ा सोच ही रहा था कि अब उठा जाये, पैकिंग वगैरह की जाये. तभी सासूमां कमरे में आयीं. उन्होंने शायद नहा लिया था और कपड़े बदल लिये थे. फूलों के प्रिंट वाली एक सफ़ेद साड़ी और सादा सफ़ेद ब्लाउज़ पहना हुआ था. आकर उन्होंने इधर उधर कुछ सामान ठीक ठाक किया पर मुझे लगता है कि वे आयी थीं सिर्फ़ ये देखने को कि मैं सोया हुआ हूं या जाग गया हूं.

मुझे जगा देखकर उन्होंने पहले तो आंखें चुराईं, फ़िर न जाने क्या सोच कर मेरे पास मेरे सिरहाने आकर बैठ गयीं. मेरे बालों में उंगलियां चलाते हुए बड़े प्यार से बोलीं “अनिल बेटा, आराम हुआ कि नहीं? मुझे लगता है कि हम सब ने मिल कर तुमको जरा ज्यादा ही तकलीफ़ दी है”

मैं बोला “ममीजी, अगर आप वचन दें कि ऐसी तकलीफ़ देती रहेंगी तो मैं अपना सब काम धाम छोड़ कर यहीं आकर पड़ा रहूंगा आप के कदमों में”

वे बस मुस्करायीं. उनकी मुस्कान में एक शांति का भाव था जैसे मन की सब इच्छायें तृप्त हो गयी हों. मैं सरक कर उनके करीब आया और उनकी गोद में सिर दे कर लेट गया. मैंने पूछा “और मांजी, ज्यादा तकलीफ़ तो नहीं हुई ना? याने मैंने जो दोपहर को किया? मुझे अच्छा लगता है, कभी कभी रसीले फलों को ऐसे ही चूस चूस कर खाने का जी होता है. लीना के साथ मैं कई बार करता हूं, हफ़्ते में एकाध बार तो करता ही हूं. आज तो मीनल थी मेरी मदद को, वहां अकेले में तो लीना के हाथ पैर बांध कर करता हूं, बहुत तड़पती है बेचारी पर मजा भी बहुत आता है उसको”

“मैंने पहले ही कहा है कि बड़ी भाग्यवान है मेरी बेटी. इतना तेज न सहनेवाला सुख पहले नहीं चखा मैंने कभी अनिल … सच में पागल हो जाऊंगी लगता था. बाद में जब नींद से उठी तो बहुत आनंद सा भरा था नस नस में … अब जल्दी जल्दी आया करो बेटे, ऐसे साल में एकाध बार आना हमें गवारा नहीं होगा” ताईजी बोलीं.

“अब आप ही आइये ताईजी हमारे यहां, सब को लेकर आइये”

“अब कैसा क्या जमता है दामादजी, वो देखती हूं. वैसे आई तो शायद अकेली ही आ जाऊंगी, वैसे भी हेमन्त और मीनल को कहां छुट्टी मिलती है. लीना को कहीं जाना हो तो आ जाऊंगी, कहूंगी कि हो आ, तेरे पति की देख रेख के लिये मैं हूं ना!” मैं उनकी ओर देख रहा था इसलिये यह कहते ही वे शर्मा सी गयीं. उनकी मेरे साथ अकेले रहने की इच्छा थी याने! मैंने भी सोचा कि यार अनिल, तेरी सास तो तेरे पर बड़ी खुश है.

“ताईजी, ये बहुत अच्छा सोचा आप ने, लीना का कुछ प्लान है अगले महने में एक हफ़्ते का, तब आप आ जाइये. बस मैं और आप रहेंगे. ना जमे तो लीना रहेगी तब भी आइये ना. आप को अष्टविनायक की यात्रा करवा दूंगा, लीना तो आयेगी नहीं, हम दोनों ही चलेंगे, आराम से चलेंगे, दो तीन दिन होटल में रहना पड़ेगा” मैंने उनकी आंखों में आंखें डाल कर कहा.

ताईजी फिर से नयी नवेली दुल्हन जैसी शरमा गयीं. मैं उनके खूबसूरत चेहरे को देख रहा था जिसको गालों की लाली ने और सुंदर बना दिया था. अचानक मेरे दिल में आया कि शायद मुझे उनसे इश्क हो गया है, याने चुदाई वाला इश्क तो पहले से ही था, परसों से था जब लीना के मायकेवालों का असली रूप मैंने देखा था. पर अब सच में वे मुझे बड़ी प्यारी सी लगने लगी थीं. लीना को भी शायद मेरे दिल का उस समय का हाल पता चलता तो एक पल को वो डिस्टर्ब हो जाती कि कहीं उसकी मां ही उसकी सौत तो नहीं बन रही है. अब जब मैंने हंसी हंसी में उनको अष्टविनायक के टूर पर ले जाने की बात की तो मैं कल्पना करने लगा कि वे और मैं रात का खाना खाने के बाद अपने कमरे में जाते हैं और फ़िर …? मुरादों की रातें …? बेझिझक अकेले में उनसे जो मन आये वो करने का लाइसेंस?

इस वक्त मेरे मन में दो तरह की वासनायें उमड़ रही थीं. एक खालिस औरत मर्द सेक्स वाली … बस पटककर चोद डालूं, मसल मसल कर उनके मुलायम गोरे बदन को चबा डालूं, जहां मन चाहे वहां मुंह लगा कर उनका रस पी जाऊं ये वासना …. दुसरी ये चाहत कि उनको बाहों में भर लूं, उनके सुंदर मुखड़े को चूम लूं, उनके गुलाबी पंखुड़ी जैसे होंठों के अमरित को चखूं …

इनमें से कौनसी वासना जीतती ये कहना मुश्किल है. पर मेरा काम आसन करने को लीना अचानक अंदर आ गयी. मैं चौंका नहीं, वैसा ही मांजी की गोद में सिर रखे पड़ा रहा. लीना भी तैयार होकर आयी थी, एक अच्छा ड्रेस पहना था. लगता था बाहर जाने की तैयारी करके आई थी. हमें उस ममतामयी पोज़ में देख कर बोली “वाह … जमाई के लाड़ प्यार चल रहे हैं लगता है मां”

“क्यों ना करूं?” मांजी सिर ऊंचा करके बोलीं “है ही मेरा जमाई लाखों में एक. अब ये बता तू कहां चली? आज घर में ही रहेंगे, कहीं जाकर टाइम वेस्ट होगा ऐसा कह रही थी ना तू? आखिर आज रात की ट्रेन है तुम लोगों की”

“ठहरा था पर काम है जरा …. मैं और भाभी मार्केट हो कर आते हैं”

ताईजी ने लीना की ओर देखा जैसे पूछ रही हों कि ऐसा क्या लेना है मार्केट से? लीना झुंझलाकर बोली “अब मां … भूल गयी सुबह मैं और मीनल क्या बातें कर रहे थे?”

“हां … वो … सच में तुम दोनों निकली हो उसके लिये? मुझे लगा था मजाक चल रहा है. ठीक है, करो जो तुम्हारे मन आये” ताईजी पलकें झपका कर बोलीं

“तू बैठ ऐसे ही और अपने जमाईसे गप्पें कर. पर अब अच्छी बच्ची जैसे रहना, कुछ और नहीं करना शैतान बच्चों जैसे” लीना आंख मार कर बोली “और ललित अपने कमरे में है, उसको डिस्टर्ब मत करना, सो रहा है” लीना जाते जाते ताईजी के गाल पर प्यार से चूंटी काट कर गयी.

मुझे लगा कि दाल में कुछ काला है. “लगता है कुछ गड़बड़ चल रहा है, लीना का दिमाग हमेशा आगे रहता है उल्टी सीधी बातों में” मैंने कमेंट किया. सोचा शायद मांजी कुछ बतायें. पर वे बस बोलीं “अब करने दो ना उनको जो करना है, मन बहलता है उनका. मैं तो पड़ती ही नहीं उन लड़कियों के बीच में”

मांजी की गोद में सिर रखे रखे अब मुझपर फिर से मस्ती छाने लगी थी. उनके बदन की हल्की सी मादक खुशबू मुझे बेचैन करने लगी थी. मैंने अपना चेहरा उनकी जांघों के बीच और दबा दिया और उस नारी सुगंध का जायजा लेने लगा. वे कुछ नहीं बोलीं, बस मेरे बालों में उंगलियां चलाती रहीं. अनजाने में मेरा एक हाथ में उनकी साड़ी पकड़कर उसको ऊपर करने की कोशिश करने लगा तो मांजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं समझ गया कि शायद अभी मूड ना हो या वे कुछ देर का आराम चाहती हों.

पर मुझे इस समय उनके प्रति जो आकर्षण लग रहा था वह बहुत तीव्र था. मैं उठ कर बैठ गया और उनको आगोश में ले लिया. “ममी … आप मुझे पागल करके ही छोड़ेंगी लगता है, इतनी सुंदर हैं आप” कहकर फ़िर चुंबन लेते हुए साड़ी के पल्लू के ऊपर से ही मैंने उनका एक मुलायम स्तन पकड़ लिया. इस बार उन्होंने विरोध नहीं किया.

अगले आधा घंटे बस हमारे प्यार भरे चुंबन चलते रहे. बीच बीच में एकाध बातें भी करते थे पर अधिकतर बस खामोशी से तो प्रेमियों जैसी हमारी चूमा चाटी जारी थी. उस उत्तेजना में मैंने किसी तरह उनके ब्लाउज़ के बटन खोल लिये थे और अब उनके सफ़ेद ब्रा में बंधे मांसल स्तन मेरी आंखों के सामने थे. कहने में अजीब लगता है कि ब्रा में लिपटे वे उरोज मुझे इतना आकर्षित कर रहे थे क्योंकि पिछले दो दिनों में मैंने उनको पूरा नग्न भी देखा था और तरह तरह से उनके नग्न बदन का भोग भी लगाया था, याने उनके बदन का कोई भी अंग मेरे लिये नया नहीं था फ़िर भी ब्रा के कपों में कसे हुए उन आधे खुले स्तनों की सुंदरता का जो खुमार था वो उनके नग्न उरोजों में भी नहीं आया था. मैंने बार बार उनको ब्रा के ऊपर से चूमा, ब्रा के नुकीले छोर में फंसे उनके निपलों को कपड़े के ऊपर से ही चूसा, हल्के से चबाया भी.

ताईजी भी शायद मेरे दिल का हाल समझ गयी थीं क्योंकि बिना कुछ कहे वे भी अब भरसक मेरे चुंबनों का जवाब दे रही थीं. जब मैं बार बार उनकी ब्रा को चूमता या ब्रा के कपड़े पर से ही उनके निपल चूसता तो वे मेरा चेहरा अपने सीने पर छुपा लेतीं.

“बहुत अच्छे लगे ना मेरे स्तन बेटा तुम्हे?” बीच में वे भाव विभोर होकर बोलीं. मैंने बस सिर हिलाया. उन्होंने मुझे सीने से चिपटा लिया. बुदबुदाईं “बीस साल पहले देखते तो …. “

मैं उनके स्तनों में चेहरा दबा कर बोला “मुझे तो अभी मस्त लग रहे हैं मांजी … इनके साथ क्या क्या करने का मन होता है मेरा …”

मेरा लंड अब कस के खड़ा हो गया था. लगातार संभोग के बाद अब गोटियां थोड़ी दुख रही थीं पर फ़िर भी लंड एकदम मस्ती में आ गया था. मेरी सासूमां का जलवा ही कुछ ऐसा था. लगता है और कुछ देर हो जाती तो हमारी चुदाई फ़िर शुरू हो जाती. वैसे लीना कुछ कहती नहीं पर जिस तरह से वह हमें जतला कर गयी थी कि अब कुछ मत करना, उससे लगता था कि थोड़ा चिढ़ जरूर जाती.

फ़िर लीना की आवाज सुनाई दी. वह मीनल से कुछ बोल रही थी. शायद जान बूझकर जोर से बोल रही थी कि हम आगाह हो जायें. मैं मांजी से अलग होकर बैठ गया. ताईजी ने फटाफट अपने कपड़े ठीक किये और उठ कर एक अलमारी खोल कर उसमें कुछ जमाने लगीं.

लीना अंदर आयी. हम दोनों को ऐसा अलग अलग देख कर उसे शायद आश्चर्य हुआ पर वो खुश भी हुई. “अरे वा, दोनों कैसे आराम से बात चीत कर रहे हैं. मुझे तो लगा था कि जिस तरह से सास दामाद की आपस में मुहब्बत हो गयी है, वे न जाने किस हाल में मिलेंगे”

“चल बदमाश, तेरे को तो बस यही सूझता है” मांजी बोलीं. वैसे लीना की बात सच थी.

लीना मेरी ओर मुड़कर बोली “चलो अनिल, पैकिंग कर लें.”

“तुमको जो खरीदना था वो सब मिल गया लीना बेटी?” मांजी ने पूछा.

“हां मां, बस एक दो ही चीजें चाहिये थीं, बाकी तो सब है घर में. अब जल्दी चलो अनिल”

मैं लीना के पीछे हो लिया. जाते जाते जब मुड़ कर देखा तो सासूमां मेरी ओर देख रही थीं. उनकी नजरों में इतने मीठे वायदे थे कि वो नजर एकदम दिल को छू गयी.

हमारे रूम में आकर मैंने अपना सूटकेस ऊपर पलंग पर रखा. लीना कपड़े रखने लगी. दो मिनिट बाद मुझे अचानक समझ में आया कि वो बस मेरे ही कपड़े रख रही है, खुद के नहीं. हम दोनों मिलकर बस एक बड़ी सूटकेस लाये थे.

“अपने कपड़े रखो ना डार्लिंग, या दूसरी बैग लेने वाली हो?” मैंने कहा.

लीना मेरे पास आयी और मेरे गले में बाहें डाल कर शोखी से बोली “डार्लिंग … तुम नाराज तो नहीं होगे? … वो क्या है कि मैं नहीं आ रही तुम्हारे साथ … मीनल और मां दोनों चाहती हैं कि हम रुक जायें … अब तुम्हारा तो ऑफ़िस है पर मैं सोच रही हूं कि मैं एकाध दो हफ़्ते को रुक जाती हूं”

मेरा चेहरा देख कर मुझे चूम कर बोली “सॉरी मेरे राजा … मैं जानती हूं कि तुम्हारा एक मिनिट नहीं चलेगा मेरे बिना पर प्लीज़ … ट्राइ करूंगी कि एक हफ़्ते में लौट आऊं. अब मां का भी तो खयाल करना है, उसके साथ मुझे टाइम ही नहीं मिला”

मैंने बेमन से कहा “ठीक है लीना रानी, अब तुम कह रही हो तो मैं कैसे मना कर सकता हूं? तुम्हारी कोई बात मैंने टाली है कभी”

लीना मुझे लिपटकर बोली “वैसे तुमको बिलकुल सूखे सूखे अकेले नहीं जाने दूंगी बंबई. लता को भेज रही हूं तुम्हारे साथ”

“लता कौन?” मैंने अचरज से पूछा?

“अरे भूल गये? कल नहीं देखा था मेरी मौसेरी बहन, बहुत कुछ मेरे जैसी दिखती है. लगता है भूल गये. खैर जाने दो, अब मिल लेना, आती ही होगी. पैकिंग हो गया तो अब चलो बाहर” हाथ पकड़कर मुझे लीना बाहर ले गयी. जाते जाते बोली “अब उसके साथ कुछ ऊल जलूल नहीं करना, सीधी है बेचारी.”

“नहीं करूंगा, उतनी समझ है मेरे को. पर ऐसे क्यों भेज रही हो लता को इस वक्त मेरे साथ, वो क्या करेगी वहां, मैं तो ऑफ़िस में रहूंगा, वो बोर हो जायेगी”

“बोर क्यों? घुमाना बंबई रोज. ऑफ़िस से जल्दी आ जाया करना” वो ऐसे कह रही थी जैसे ये सब बड़ा आसान हो. मैं जरा धर्मसंकट में था. बीच में ये भी लगता कि ये फ़िर से लीना का कोई खेल तो नहीं है.

हम बाहर आये. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. लीना ने आवाज लगाई “भाभी कहां हो?”

मीनल के कमरे से आवाज आयी “यहां हूं ननद रानी, लता आई है, उससे जरा गप्पें लड़ा रही थी”

“अरे बाहर आओ ना. अनिल भी है यहां”

“दो मिनिट लीना. ये लता शरमा रही है अनिल के सामने आने को.” मीनल की आवाज आयी.

लीना बोली “अब आ भी जाओ, अनिल कोई दूसरे थोड़े हैं. शरमाने की जरूरत नहीं है” फ़िर मुझसे बोली “फ़िर से मेकप कर रही होगी, सुंदर है ना, जरा सेन्सिटिव है, मेकप ठीक ठाक करके ही आयेगी देखना”

“अच्छा रानी पर ये तो बताओ, कि बंबई आने का ये प्लान अचानक कैसे बना? याने लता ने कहा कि मैं जाना चाहती हूं कि तुम दोनों ननद भौजी ने मिलके उसको उकसाया है?” मैंने धीमे स्वर में पूछा. लीना पर मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है, ऐसे नटखट खेल वो अक्सर खेलती है और फ़िर मेरी परेशानी देखकर खुश होती है.

“अब क्या फरक पड़ता है? तुम बस ये देखो कि एक सुंदर कमसिन अठारह बरस की कन्या तुम्हारे साथ, अपने जीजाजी के साथ बंबई जा रही है, हफ़्ते भर अकेली रहेगी उनके साथ, अब और कोई होता तो अपनी किस्मत पर फूला नहीं समाता और तुम हो कि शंका कुशंका कर रहे हो”

मैं चुप हो गया. मन ही मन कहा कि रानी, तेरी नस नस पहचानता हूं इसलिये शंका कर रहा हूं. वैसे एक बात जरूर है, लीना ने जब जब मुझे ऐसा फंसाया है, उसका नतीजा मेरे लिये बड़ा मीठा ही निकला है हमेशा.

पांच मिनिट हो गये तो मैंने भी आवाज दी. आखिर अपना जीजापन दिखाकर उस कन्या की झेंप मिटाना भी जरूरी था. “अब आ भी जाओ भई लता, कहो तो मैं आंखें बंद कर लेता हूं”

मीनल की आवाज आयी “अनिल, मैं ले आती हूं उसको, बहुत शरमा रही है”

मीनल मुस्कराते हुए बाहर आयी. उसने एक लड़की का हाथ पकड़ रखा था और उसे खींचती हुई अपने पीछे ला रही थी. मुझे तो ऐसा कुछ दिखा नहीं कि वह ज्यादा शरमा रही हो, हां मंद मंद हंस रही थी.

लड़की सच में सुंदर थी. छरहरा नाजुक बदन था, डार्क ब्राउन कलर की साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज़ पहने थी. हाथों में एक एक फ़ैशन वाला कॉपर का कंगन था और एक स्लिम गोल्ड वाच थी. गोरे पैरों में ऊंची ऐड़ी के सैंडल थे. छरहरा बदन था, एकदम स्लिम, ऊंचाई लीना से तीन चार इंच कम थी. चेहरा काफ़ी कुछ लीना जैसा था, काफ़ी कुछ क्या, बहुत कुछ. बस बदन लीना के मुकाबले एकदम स्लिम था, लीना अच्छी खासी मांसल है, मोटी नहीं पर जहां मांस होना चाहिये वहां उसका एवरेज से ज्यादा ही मांस है. वजन थोड़ा ज्यादा होता और ऊंची होती तो एकदम लीना की जुड़वां लगती. हल्का मेकप किया था और होंठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक थी. आंचल में से छोटे छोटे पर तन कर खड़े उरोजों का उभार दिख रहा था.

“याद आया? कल ही तो मिलवाया था बड़े घर में” लीना ने कमर पर हाथ रखकर मुझसे पूछा. मैं अचरज में पड़ गया. ऐसी सुंदर कमसिन कन्या, लीना से मिलते जुलते चेहरे की और मुझे याद ना रहे! अब क्या बोलूं ये भी नहीं समझ पा रहा था.

मेरी परेशानी देखकर मीनल आंचल मुंह में दबा कर हंसने लगी. मैंने सोचा कि कुछ तो बोलना पड़ेगा. बोला “हेलो लता. सॉरी कल जल्दी जल्दी में इतने लोगों से मिला कि … पर चलो, अब बंबई आ रही हो तो जान पहचान हो ही जायेगी. वैसे सच में तुम चल रही हो या ये इन दोनों ने मिलकर कुछ शरारत की है” लीना और मीनल की ओर इशारा करके मैं बोला.

“पहले ये बताइये दामादजी कि हमारी लता कैसी है? बंबई की लड़कियों के मुकाबले जच रही है या नहीं?” मीनल बोली. लीना ने भी उसकी हां में हां जोड़ी. लता खड़ी खड़ी बस जरा सा शरमाते हुए सब को देख देख कर मुस्करा रही थी.

मैंने कहा “ऐसे किसी का कंपेरिज़न करने की बहुत बुरी आदत है तुमको लीना. वैसे मैं सच कहूं तो इस प्रश्न में कोई दम नहीं है. लता इज़ वेरी प्रेटी, बहुत फोटोजेनिक है”

मीनल और लीना ने पट से एक दूसरे से हाथ पर हाथ मारा जैसा आज कल का फ़ैशन है ये बताने को कि कैसे बाजी मार ली.

“सिर्फ़ सुंदर कहकर नहीं बचोगे दामादजी. अंग अंग का निरीक्षण करके डिस्क्राइब करो लता की सुंदरता. लता, जरा घूम ना, एक चक्कर तो लगा, अनिल को भी देखने दे तेरा जलवा”

अब अपने ही बड़े घर की, जहां एक अलग डिसिप्लिन चलता है, एक लड़की को ये लोग इस तरह से बोल रही थीं यह देखकर मेरा माथा ठनका कि कुछ गड़बड़ न हो जाये. लता क्या सोच रही होगी. मैंने उसकी ओर देखा तो वो भी मेरी ओर देख रही थी. कुछ शरमा कर बोली “अब ये बहुत हो गया भाभी, इस सब की क्या जरूरत है?”

बोल लता रही थी पर आवाज ललित की थी. एल पल को मैं हक्का बक्का रह गया पर फ़िर एकदम से दिमाग में रोशनी हुई. ये ललित ही था लड़की के रूप में.

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