ना जाने कितनी देर तक जीजू ने मेरी गांड का अविरत मर्दन किया। ना जाने कितनी बार मैं वासना के आनंद से कांपती हांफती झड़ गयी। पर जब घण्टे बाद जीजू ने मेरी जलती गांड को अपनी अपनी मर्दानी उर्वर मलाई से सींचआ तो मैं लगभग होश खो बैठी थी।
जीजू ने मुझे बिस्तर पे ढुलक जाने दिया और अपना वीर्य और मेरी गांड के रस से लिसे लण्ड को इन्तिज़ार करती शानू के मुंह में ठूंस दिया। शानू ने जी भर कर जीजू का लण्ड चूस चाट कर साफ़ कर दिया। लेकिन शानू रुकी नहीं और जीजू की भारी मोटी उर्वर जननक्षम वीर्य पैदा करने वाले बड़े बड़े अण्डों को सहलाते हुए उनके मुश्किल लण्ड को फिर से तनतना दिया।
जीजू किसी किताबी कभीना संतुष्ट होने वाले आदिमानव की तरह शानू के ऊपर टूट पड़े। उन्होंने उसके होंठों को चूसा , उसके उगते चूचियों को मसला और चूचुकों को चूस चूस कर लाल कर दिया। उसकी पहले से ही गीली चूत को चाट कर तैयार कर के उसे मेरी खुली जांघों के बीच में झुका दिया।
शानू घोड़ी बनी मेरी चूत में अपना मुंह दबा कर जीजू के लण्ड के सगत के लिए तैयार थी।
जीजू ने उसके दोनों चूचियों को मुट्ठी में भर कर अपना घोड़े जैसा लण्ड के सुपाड़े को शानू की नन्ही चूत के द्वार पे टिकाया और एक भीषण झटके से सुपाड़ा शानू की चूत में ठूंस दिया। मैंने शानू का मुंह अपनी चूत में दबा लिया। शानू बिलबिला तो उठी पर थोड़ी देर पहले की लम्बी चुदाई से उसकी चूत खुल गयी थी। तीन चार धक्कों में जीजू का वृहत भीमकाय शानू की कमसिन नाबालिग चूत में जड़ तक समा गया। शानू जीजू के पहले पांच छह धक्के सबक सिसक कर स्वीकार किये फिर चुदाई की मस्ती में खो गयी।
उसने लपक कर मेरी चूत चाटनी शुरू कर दी। जीजू का लण्ड अब अश्लील फचक फचक फचक की आवाज़ करता शानू की चूत में लपक हचक कर अंदर बाहर आ जा रहा था। कमरे में मेरी और शानू की सिसकारियाँ गूँज उठी। शानू ने अपने बढ़ते तजुर्बे को दिखते हुए एक हाथ से मेरा डायन स्तन दबोच हाथ की दो उँगलियाँ मेरी ताज़ी ताज़ी चूड़ी गांड में घुसेड़ दीं।
उसके कभी होंठ और कभी दांत मेरे तन्नाए भग-शिश्न को चूमते खींचते तो मैं भी बिलबिला उठती।
जब मैं या शानू चरम-आनंद के पटाखों की तरह फुट जातीं तो हमारी हलकी सी सिसकी भरी चीख जीजू के लिए हमारे झड़ने का बिगुल बजा देतीं।
जीजू की मांसल जांघें शानू के गोल मुलायम चूतड़ों पे थप्पड़ सा मार रहीं थीं। उनका लण्ड अब बीएस एक को चोद रहा था। ज़ोरदार, धमकदर, सुपाड़े से जड़ तक भयंकर धक्कों से। शानू पूरी हिल जाती पर उसने मेरी चूत को एक क्षण भी अकेला नहीं छोड़ा।
जीजू के दिल भर कर शानू की चूत को अपने विकराल लण्ड से रौंदा। और जब वो झड़ें तो हम दोनों इतनी बार झड़ चुकीं थीं की थक कर चूर हो गईं। पर सम्भोग की थकन में भी मीठा आनंद होता है और शीघ्र ताज़ी उगने वाली कामवासना का पैगाम भी। और वो ही हुआ।

