नेहा का परिवार – Update 141 | Erotic Family Saga

नेहा का परिवार - Pariwarik Chudai Ki Kahani
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मैं सुबक सुबक सबक कर कराह रही थी पर एक क्षण के लए भी मेरी गांड जीजू के महाकाय लण्ड के आक्रमण से दूर नहीं भागी। मेरे आंसुओं में शीघ्र आने वाले आनंद के बरसात की बूँदें भी तो शामिल थीं।
जीजू के भीषण धक्कों से मैं सिर से चूतड़ों तक हिल जाती। मेरी घुटी घुटी चीखों ने अपने चरम आनंद के मदहोशी से बाहर आती शानू को और भी जगा दिया।
शानू के आंखें चमक गईं जब उसने मेरी गांड का शैतानी लत-मर्दन देखा। शानू अपने जीजू के भीमकाय लण्ड की मर्दानगी को तो खुद भुगत चुकी थी पर अब वो मेरी गांड की तौबा बुलवाने के लिए तैयार ही गई।
शानू ने मेरे उछलते मचलते उरोजों को कस कर मसलते हुए जीजू को न्यौता दिया, “जीजू और ज़ोर से मारिये नेहा की गांड। बड़ी खुजली मच रही थी इसकी गांड में। आपको कसम है मेरी की इसकी चीखे बिलुल बंदना हों। ”
शानू ने मेरे फड़कती नासिका को मुंह में ले कर चुभलाते हुए मेरे दोनों चूचुकों को बेदर्दी से दबा कर मरोड़ दिया। में तो वैसे ही चीख रही थी दर्द से।
जीजू ने गुर्राते हुए और भी हचक कर धक्का मारा। एक ही जानलेवा धक्के से पूरा का पूरा घोड़े जैसा लण्ड मेरी गांड के छल्ले से जड़ तक समा गया।
मेरी गांड से रस से जीजू का लण्ड पूरा का पूरा नहा उठा था।मेरी गांड की मोहक सुगंध कमरे की हवा में मिल कर हम तीनो को मदहोश कर रही थी। शानू ने अपनी जीभ की नोक बारी बारी से मेरे दोनों नथुनों में घुसा कर उनको चोदने लगी। अब मेरे खुले मुंह से दर्द के साथ साथ वासनामयी सिसकारियाँ भी उबलने लगीं। शानू के हाथ मेरे दोनों उरोजों और चुचकों को कभी मसलते, कभी मरोड़ते, कभी मेरी छाती से उन्हें दूर तक खींचते और कभी प्यार से सहला रहे थे। मेरी गांड में से अब दर्द की जलन के साथ एक अनोखा आनंद भी उपज रहा था। जीजू का लण्ड अब मेरे गांड के रस से लिस कर चिकना हो चला था। जीजू का लण्ड अब रेल के इंजन के पिस्टन की रफ़्तार और ताकत से मेरी गांड के अंदर बाहर आ जा रहा था। मेरी गांड में से लण्ड के आवागमन से अश्लील फचक फचक की आवाज़ें निकल रहीं थीं।
“जी. .. ई … ई …… ई ……. ई ……. ई जू ….. ऊ ….. ऊ …… ऊ …… ऊ ……. ऊ ……. ऊ ….. आं ….. आँ ….. उन्न ….. ऊँनन …. ऊँ …. ऊँ …..ऊँ ……माँ ….. आ ….. आ …… आ …… ,”में वासना और गांड से उपजी पीड़ा से मिलीजुली आनंद की बौछार से बिलबिला उठी।
चाहे कितनी बार भी सम्भोग का खेल ले लो पर जब नए खेल में वासना के ज्वर की आग बदन में जल उठती है तो उसके तपन का आनंद उतना ही मीठा होता है। और षोडशी के कमसिन शरीर भी प्रज्जवलित होती है। मैं अब गान्ड-मर्दन के अतिरेक से अनर्गल बुदबुदा रही थी। शानू मेरे गीले चेहरे को चूम चाट कर साफ करने लेगी थी। जीजू ने मेरी कमर जकड़ कर अपने लण्ड मेरी गांड में
दनादन पल रहे थे। मेरे सिसकारियाँ कमरे में गूंजने लगीं। मैं रतिरस से औरभर उठी। मेरी चूत से रति रस की बाद बह चली थी। में अचानक भरभरा कर झड़ गई। वासनामयी आनंद के अतिरेक से मैं सबक उठती। शानू और जीजू मिल कर मेरे चरम-आनंद की कड़ी को टूटने ही नहीं दे रहे थे। मैं यदि एक बार झड़ी तो सौ बार झड़ी। मेरा शरीर कमोंमंद के आवेश से सिहर उठ।मैं हर चरम आनंद की पराकाष्ठा से कांप उठती। जीजू का लण्ड बिना थके रुके धीमे हुए निरंतर मेरी गांड में अंदर बाहर अनोखी रफ़्तार से आ जा रहा था।

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