शाम होते ही हमने तैयार होना शुरू कर दिया। मैंने और शानू ने रज्जो चाची के सावधानी से बचा कर संजोये कपड़ों में से हल्की सरसों के रंग की बसंती चोली और हलके नीले लहंगे को चुना। नसीम आपा के बहुत ना ना करते हुए उनको जबरन मना लिया। चोली के नीचे कोई भी ब्रा या शमीज नहीं थी। ना ही लहंगे के नीचे कोइ कच्छी पहनने दी हमने नसीम आपा को। नसीम आपा के बड़े-बड़े भारी उरोज चोली को फाड़ते से लग रहे थे। उनकी हर सांस और हर क्रिया से उनके विशाल उरोज मादक मनमोहक अंदाज़ से हिल पड़ते। शानू और मैं नसीम आपा के अप्सरा जैसे रूप को देख कर खुद भी उत्तेजित हो गए। नसीम आपा के बदन से चन्दन से साबुन मोहक सुगंध आ रही थी। अब्बू और जीजू के ऊपर हमें तरस आने लगा। अब्बू जब अपनी बड़ी बेटी का रूप उसकी अम्मी के वस्त्रों में देखेंगे तो उनकी हर झिझक और हिचक एक लम्हे में मिट जाएंगीं।
शानू को मैंने उसकी बचपने की फूलों वाली फ्रॉक पहनायी बिना कच्छी के। उसकी फ्रॉक जरा सी भी ऊँची उठेगी तो उसके गोल गोल चूतड़ों हो जायेंगे। और जब वो थोड़ी सी भी टाँगे चौड़ा कर बैठेगी तो उसकी गोल गोल जांघों के बीच छुपे गुलाबी ख़ज़ाने की गुफा की कमसिन द्वार के दरवाज़ों का दर्शन जो भी उसकी तरफ देख रहा होगा उसे बहुत आसानी से हो जायेगा।
मैंने भी नसीम आपा की पुरानी स्कूल की हलके आसमानी रंग की फ्रॉक पहन ली। मैंने भी कोइ कच्छी पहनने की कोशिश नहीं की।
आदिल भैया अकबर चाचू से आधा घंटे पहले ही आ गए। उनकी आँखे नसीम आपा के नैसर्गिक सौंदर्य को देख कर खुली की खुली रह गयीं।
” जीजू, आज रात तो नसीम आपा अब्बू की दुल्हन हैं। आपको आज रात तो अपनी सलियों से ही संतुष्टि करनी होगी ,” मैंने मटक कर आदिल भैया को झंझोड़ा।
” हाँ जीजू नेहा सही कह रही है ,” शानू ने भी मेरी ताल में ताल मिला दी।
” अरे हम सिर्फ अपनी जोरू के हुस्न से अपनी आँखें ही तो सेक रहे थे। हमें अपनी दोनों सालियों को एक साथ रोंदने का मौका मिले तो भला हम क्यों सवाल-जवाब करेंगें ,” आदिल भैया वाकई राजनैतिक चातुर्य से भरे थे।
आदिल भैया ने अपनी बात को साबित करते हुए शानू को दबोच लिया अपने शक्तिशाली भजन में। उनके फावड़े जैसे विशाल हाथों ने बेचारी कमसिन शानू के उगते उरोजों को कास क्र मसलते हुए उसके सिसकारी मारते अधखुले मुंह के ऊपर अपने होंठों को दबा दिया।
” अरे जीजू जरा शानू की फ्रॉक के नीचे की तो जांच-पड़ताल कर लीजिए। पता नहीं इस पुरानी फ्रॉक के अंदर कोइ चींटी या कीड़ा ना छुपा हो ?” मैंने आदिल भैया को बढ़ावा दिया।
आदिल भैया ने तुरंत एक हाथ खली कर शानू के जांघों के बीच में फांस दिया। शानू चिहुंक कर अपने पंजों पर उचक गयी। उसके खुले पर जीजू के मुंह में दबे, मुंह से एक लम्बी सिसकारी उबल गयी। जीजू की उँगलियों ने ज़रूर शानू के किशोर ख़ज़ाने की पंखुड़ियों के बीच में छुपी सुरंग के दरवाज़े को ढूँढ लिया था।
शानू ज़ोर से बुदबुदाई , ” जीजू इतनी ज़ोर से क्यों दबा रहे हैं। ” आदिल भैया का दूसरा हाथ बेदर्दी से शानू के कच्चे उरोज को मसल रहा था।
” अरे रांड कहीं की। किसी बाहर वाले से दबवा रही होती अपनी चूचियाँ तो कुछ नहीं बोलती। पर अपने जीजू से कितनी शिकायत कर रही है ?” नसीम आपा ने भी जीजू-साली के मज़े में टांग अड़ा दी, ” देख नेहा आज रात इस साली के चुदाई खूब हचक कर करवाना इसके जीजा से। चाहो तो इसकी गांड भी खलवा देना आज रात। ”
सिसकारी मारती हुई शानू से चुप ना रहा गया , “नहीं आपा गांड तो मैं अब्बू के लिए बचा कर रखूंगीं। जीजू ने मेरी कुंवारी चूत तो खोल दी है। जीजू को मैंने नेहा की गांड तो पहले से ही सौंप रखी है। ”
यह सुन कर नसीम आपा को आने वाली रात के ख्याल से दिमाग गरम हो गया। उनके पहले से ही लाज की लालिमा से सजे सुंदर चेहरा और भी लाल हो गया।
शुक्र है कि तभी अकबर चाचू हाल में दाखिल हो गए।

