मैंने अपनी बाहें में कस कर मीनू को जकड लिया। हम दोनों के होंठ मानों गोंद से चिपक गए थे। मैं अब तड़प गयी थी। अब तक बड़े मामा, सुरेश चाचा और गंगा बाबा मेरी चूत की धज्जियां उड़ा रहे होते। संजू किसी जालिम की तरह मेरी चूत को अपने चिकने मोटे लंड से धीरे धीरे मेरी चूत को मार रहा था।
मेरी चूत झड़ने के लिए तैयार थी पर उसे संजू के मोटे लंड की मदद की ज़रुरत थी।
मैं कामाग्नि से जल रही थी। मुझे पता भी नहीं चला कि कब किसी ने मीनू को बिस्तर के किनारे पर खींच लिया।
मैंने मीनू की ऊंची कर उसकी तरफ देखा। सुरेश चाचा ने अपनी कमसिन अविकसित बेटी की चूत में अपना दैत्याकार लंड एक बेदर्द धक्के से जड़ तक ठूंस दिया था।
“पापा, आअह आप कितने बेदर्द हैं। अपनी छोटी बेटी की कोमल चूत में अपना दानवीय लंड कैसी निर्ममता से ठूंस दिया है आपने। मिझे इतना दर्द करने में आपको क्या आनंद आता है?” मीनू दर्द से बिलबिला उठी थी।
“मेरी नाजुक बिटिया इस लंड को तो तुम तीन सालों से लपक कर ले रही हो। अब क्यों इतने नखरे करने का प्रयास कर रही हो। मेरी बेटी की चूत तो वैसे भी मेरी है। मैं जैसे चाहूँ वैसे ही तुम्हारी चूत मारूंगा,” सुरेश चाचा ने तीन चार बार बेदर्दी से अपना लंड सुपाड़े तक निकल कर मीनू की तंग संकरी कमसिन अविकसित चूत में वहशीपने से ठूंस दिया।
“पापा, आप सही हैं। आपकी छोटी बेटी की चूत तो आपकी ही है। आप जैसे चाहें उसे चोद सकते हैं,” मीनू दर्द सी बिलबिला उठी थी अपर अपने पिताजी के प्यार को व्यक्त करने की उसकी इच्छा उसके दर्द से भी तीव्र थी।
“संजू, भैया, देखो चाचू कैसे मीनू की चूत मार रहें हैं। प्लीज़ अब मुझे ज़ोर से चोदो,” मैंने मौके का फायदा उठा कर संजू को उकसाया।
शीघ्र दो मोटे लम्बे लंड दो नाजुक संकरी चूतों का मर्दन निर्मम धक्कों से करने लगे। कमरे में मेरी और मीनू की सिस्कारियां गूंजने लगीं।
संजू मेरे दोनों उरोज़ों का मर्दन उतनी ही बेदर्दी से करने लगा जितनी निर्ममता से उसका लंड मेरी चूत-मर्दन में व्यस्त था। सुरेश चाचा और संजू के लंड के मर्दाने आक्रमण से मीनू और मेरी चूत चरमरा उठीं। उनके मूसल जैसे लंड बिजली की तीव्रता से हमारी चूतों के अंदर बाहर रेल के पिस्टन की तरह अविरत चल रहे थे। सपक-सपक की आवाज़ें कमरे में गूँज उठीं।
मेरी सिस्कारियां मेरे कानों में गूँज रहीं थीं। मीनू की सिस्कारियों में वासनामय दर्द की चीखें भी शामिल थीं। सुरेश चाचा का दानवीय लंडना जाने कैसे कैसे मीनू सम्भाल पा रही थी? सुरेश चाचा का दानवीय लंडना जाने कैसे कैसे मीनू सम्भाल पा रही थी? चाचू के विशाल भरी-भरकम शरीर के नीचे हाथों में फांसी नन्ही बेटी किसी चिड़िया जैसी थी.
चाचू मीनू को दनादन जान लेवा धक्कों से चोदते हुए उसके सूजे चूचुकों को बेदर्दी से मसल रहे थे। अभी मीनू के उरोज़ों का विकास नहीं हुआ था।
“पापा,चोदिये अपनी लाड़ली बेटी को। फाड़ डालिये अपनी नन्ही बेटी की चूत अपने हाथी जैसे लंड से,” मीनू कामवासना के अतिरेक से अनाप-शनाप बोलने लगी।
मेरी चूत को संजू का मोहक चिकना लंड रेल के इंजन के पिस्टन की तरह बिजली के तेजी से चोद रहा था, ‘आअह्ह संजू ऊ.…… ऊ…….. ऊ.…… उउन्न्न ……. मैं आने वाली हूँ ,भैया प्लीज़ और ज़ोर से मेरी चूत चोदो |”
संजू ने मेरे दोनों चूचियों भी निर्मम शुरू कर दिया।मेरी साँसे भरी हो चली। मेरी सिस्कारियां और भी उत्तेजक हो उठीं और उनमे मीनू की आनंदमय दर्द से उपजी घुटी घुटी चीखें मिल कर कमरे में सम्भोग का संगीत बजा थीं।
हम चारों विलासमय अगम्यगमनी समाज के नियमों के विपरीत कामवासना में लिप्त बेसब्री से रति-निष्पति की और प्रगतिशील हो रहे थे।
अचानक मेरे शरीर में बिजली कौंध गयी। मेरा गरम कामाग्नि से जलता बदन धनुषाकार होने लगा। पर संजू ने मुझे अपने नीचे परिपक्व पुरुष की तरह अच्छे से दबा रखा था। उसका लंड सपक-सपक की आवाज़ें पैदा करता हुआ मेरी फड़कती चूत का अविरत मर्दन में सलग्न था।
कुछ हे देर में मीनू और मैं हल्की सी कर झड़ने लगीं। पर हमारे दोनों सम्भोगी अभी कौटुम्बिक व्यभिचार से संतुष्ट नहीं हुए थे।
मीनू और मैं दोनों हांफ रहे थे। सुरेश चाचा ने अपनी अपरिपक्व बेटी को बेसब्री से पीठ पे लिटा कर बिस्तर के किनारे पे खींच लिया और खुद फर्श पर खड़े हो गए।

