Update 107
शाकीना कहीं दिखाई नही दे रही थी, जब मैने पुछा तो रेहाना ने बताया कि वो उसी दिन से गुम-सूम सी रहने लगी है,
ना किसी से बात करती है, और ना ही कुछ खा-पी रही है. बस पड़ी रहती है, पुछने पर कोई जबाब भी नही देती.
उसकी इस हालत से पूरा घर परेशान था, अमीना बी अपनी बेटी के इस तरह गुम-सूम होने से परेशान थी.
रेहाना ने पूरी बात अपनी अम्मी को भी बता दी थी, कि वो क्या चाहती है, लेकिन इस मामले में वो बेचारी भी क्या बोलती.
मे सीधा उसके कमरे में गया, वो आँखें बंद किए बिस्तर पर पड़ी थी.
जैसे ही मैने उसके सर पर हाथ रख कर सहलाया उसने अपनी आँखें खोली और मेरी ओर देख कर फिर से बंद करली.
मैने उसको कहा – शक्कु ये क्या बात हुई ? मेरे से नाराज़गी है, लेकिन इन सबको किस बात की सज़ा दे रही हो तुम ?
तुम्हें पता भी है ये लोग तुम्हारे लिए कितने परेशान हैं..?
वो आँखों में आँसू भरकर बोली- मे अब जीना नही चाहती, आप मुझे अकेला छोड़ दो..!
मे – तो आओ चलो मेरे साथ, मे बताता हूँ, कैसे मरना है..? मैने उसका हाथ पकड़ा और उसको उठा कर बिस्तर पर बिठा दिया.
वो – कहाँ ले जाना चाहते हैं आप..?
मे – चलो मरना ही है तो दो-चार को मार कर मरो, ऐसे बिस्तर पर पड़े-2 तो बुजदिल मौत का इंतजार करते हैं, और जहाँ तक मुझे पता है अब तुम बुजदिल तो नही रही.
वो – छोड़िए मेरा हाथ, आपको जहाँ जाना है जाइए, मरिये और मारिए, जो मर्ज़ी हो करिए. मुझे कहीं नही जाना है.
मे – इसका मतलब मौत से डर भी रही हो और मरना भी चाहती हो. ये क्या बात हुई..?
वो – आप होते कॉन हैं ये सवाल करने वाले..? किस हक़ से कह रहे हैं ये सब..?
मे – हक़ ! ये वाकी सब लोग किस हक़ से मेरी बात सुनते हैं..? और क्यों..? क्या हक़ है मेरा इन सब पर..?
और फिर मे यहाँ किस हक़ से रह रहा हूँ..? मुझे अभी के अभी चले जाना चाहिए इस घर से ..! ये कहकर मे उसके पास से उठ खड़ा हुआ…!
उसने झट से मेरा हाथ पकड़ लिया, और बोली- प्लीज़ अशफ़ाक़ साब ऐसा ना कहो, खुदा के लिए आप हम सब को छोड़ कर ना जाओ..!
मे – क्यों जब मेरा कोई हक़ ही नही है तो मेरा यहाँ रहने का क्या मतलब..?
वो सुबक्ते हुए बोली – मे क्या करूँ..? आपको भूल भी नही सकती, जितना भूलने की कोशिश करती हूँ, आपके साथ बिताए पल मुझे और सोचने पर मजबूर कर देते हैं..! आप ही बताइए मे क्या करूँ..?
मे – क्या निकाह ही एक मात्र रास्ता है ? उसके अलावा और कोई संबंध नही हो सकते दो इंसानो के बीच ?
तुम निकाह की ज़िद पकड़ के बैठी हो जो मेरे लिए मुमकिन नही है, इसके अलावा जो तुम चाहो वो मे करने के लिए तैयार हूँ.
वो – तो फिर मे भी जिंदगी भर शादी नही करूँगी, चाहे जिस रूप में ही सही आपकी बन कर ही रहूंगी, बोलिए मंजूर है.
मे – ये कैसी ज़िद है तुम्हारी शक्कु..? फिर मैने उसकी डब-दबाती हुई आँखों से आँसू पोन्छते हुए कहा – चलो! ठीक है ऐसा है तो यही सही..
लेकिन कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर तुम्हें लगे कि किसी और के साथ तुम्हें शादी करके अपना घर बसाना है तो उसके लिए तुम आज़ाद हो.
वो मेरे सीने में लग कर सुबकने लगी और बोली- मे आपको छोड़ कर कहीं नही जाउन्गि, चाहे आप मुझे अपने से दूर ही क्यों ना करना चाहें.
अब आइन्दा मे कभी आपको निकाह की बात करके परेशान नही करूँगी.
मे – तो चलो खाना खाओ, और हसी ख़ुसी सबके साथ रहो, मेरे इतना कहते ही वो उठ खड़ी हुई,
लेकिन भूखे रहने की वजह से बहुत कमजोर हो गयी थी, सो चक्कर खा कर फिर से बिस्तर पर गिर पड़ी.

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