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Update 90

इधर अल्पमत की केंद्र सरकार, ढाई साल में ही धराशाई हो गयी, दुबारा चुनाव हुए वो भी कोई एकमत नही दे पाए.

देश के वरिष्ठतम और सुलझे हुए राजनेता ने कुछ पार्टियों को लेकर सरकार चलाने की कोशिश की.

इसी बीच हमारे दुश्मन मुल्क जो कि जग जाहिर है, ने अपनी सेना को घुस्पेठ करने की कोशिश की, जिसका हमारी अल्पमत की सरकार ने अपनी बिल पॉवर दिखाते हुए सेना को उचित कार्यवाही करने का आदेश दिया.

हमारे मुल्क में जँवाज़ो की तो कभी भी कमी नही रही है, सो कुछ ही दिनो में हमारी सेना के जँवाज़ो ने दुश्मन को उसकी औकात दिखा दी, और उन्हें मुँह की खानी पड़ी.

इसका एक फ़ायदा हुआ, अल्पमत की सरकार तो गिर गयी लेकिन दुबारा एलेक्षन में उन्होने बहमत के साथ स्थाई सरकार बना ली.

देश को एक अच्छा और संवेदनशील नेता मिल गया था.

सरकार तो स्थाई बन गयी थी, साथ ही साथ दुश्मन भी स्थाई मिला, जो हर संभव हमें नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता रहता.

हमारी ओर से अनगिनत प्रयास हुए कि किसी तरह महाद्वीप में शांति की स्थापना हो सके,

लेकिन शायद वो हमारे शांति संदेश को हमारी दुर्बलता ही समझता रहा, और उसके अशांति फैलाने वाले प्रयास बदस्तूर जारी रहे, जो हमें ना चाहते हुए भी समय समय पर झेलने पड़ रहे थे.

चाहे वो अक्षर धाम पर हमला हो, फिर चाहे मुंबई रेल धमाके. चाहे गोधरा कांड हो या फिर सीमा पर हमला.

ना जाने कितने ही जान माल का नुकसान हर वर्ष झेल रहा था हमारा देश.

समय आ गया था, कि अब हमें भी उसी की भाषा में जबाब देना चाहिए..

वो अगर हमारे देश में आतंकवादियों की घुस्पेठ करा सकते हैं, तो क्या हम उनके घर से निकलने पर पाबंदी नही लगा सकते…? उनकी मनमानियों पर नकेल नही कस सकते..?

उसी कड़ी के तहत एक दिन मुझे अपने एनएसएसआइ ऑफीस, जो नयी सरकार के बनते ही पुनः गठित हो गयी थी से कॉल आई,

मुझे घर की ज़िम्मेदारियाँ ट्रिशा के कंधों पर डालकर अर्जेंट देल्ही निकलना पड़ा.

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मुज़फ़्फ़राबाद के उत्तर का पहाड़ी और जंगली इल्लाका, जहाँ की अधिकतर अवादी छोटे-2 कबीले टाइप टुकड़ों में बस्ती है,

परिवारों के ज़्यादातर मर्द काम की तलाश में या तो दूर दराज शहर की ओर चले जाते हैं,

या फिर कहीं रोड साइड कोई छोटा-मोटा धंधा रख कर अपनी रोज़ी-रोटी कमाने की कोशिश में लगे रहते हैं.

औरतें घर परिवार, बच्चों की परवरिश के साथ-2 जंगली पहाड़ों में जाकर आमदनी का कोई ज़रिया या फिर रेहड़ और दूसरे जानवरों को पाल कर काम चलाती हैं.

ऐसे ही एक कबीले से हटकर पहाड़ी के आँचल में बने एक इकलौते घर में, एक विधवा औरत अपनी दो जवान बेटियों के साथ रहती है,

उसका इकलौता बेटा असलम शहर में रहकर चार पैसे कमाता है किसी रेस्टौरेंट में वेटर का काम करके.

अधेड़ उम्र अमीना बेगम और उसकी 24 साल की बड़ी बेटी रेहाना जो शुदा सुदा होने के बावजूद विधवाओं जैसा जीवन जीने पर मजबूर है, और अपनी अम्मी के साथ ही रहती है.

उसका शौहर पाकिस्तानी फौज में था, लेकिन कारगिल वॉर के बाद जान बचा कर भागने के जुर्म में पाकिस्तानी हुकूमत ने उसे गद्दार घोषित करके जैल में सड़ने के लिए डाल दिया था.

उससे दो साल छोटा असलम, जो शहर चला गया, अमीना की तीसरी औलाद उसकी छोटी बेटी शाकीना जो इस समय 19 साल की कमसिन कली निहायत ही खूबसूरत किसी खिलती कली जैसी.

अमीना का शौहर पीओके में आए दिन होने वली दहशत गर्दि का शिकार हो चुका था.

कुल मिला कर ये परिवार, पाकिस्तानी हुकूमत और उसके पाले हुए दहशत गर्दो का शिकार था.

ऐसा नही था कि ये इकलौता परिवार ही इन जुल्मों का शिकार हुआ हो, ऐसे ना जाने कितने ही परिवार इस तरह के हादसों के शिकार होकर ग़रीबी और कुरबत की जिंदगी बसर करने पर मजबूर थे.

इन लोगों में हुकूमत और दहशत गर्दि के खिलाफ रोष तो था, लेकिन मजबूर थे, क्योंकि खिलाफत करने का मतलब था मौत.

ज़्यादातर बेसहारा परिवार अपने सिसकते जीवन को जीने पर मजबूर थे, कहीं कोई गोली चलने की आवाज़ ही इनकी रूह को कंपा देती थी.

हर संभव यही कोशिश करते, कि कभी किसी सरकारी नुमाइंदे या फ़ौजी या फिर किसी दहशत गर्द की नज़र इन पर ना पड़े.

ऐसे ही एक दिन शाकीना अपने घर से थोड़ा दूर अपने रेहड़ और पालतू जानवरों को पास के ही एक मैदान में चरा रही थी,

पास से ही एक पतली सी ख़स्ता हाल सड़क गुजरती थी, जिस पर बमुश्किल कभी कोई वहाँ गुज़रता था.

शाम होने को थी, धूप अपने अंतिम पड़ाव पर थी कि तभी उस सड़क से होकर एक पोलीस की जीप गुज़री, उसमें 4 पोलीस के सिपाही दारोगा के साथ गस्त पर निकले होंगे शायद.

उनकी मनहूस नज़र शाकीना पर पड़ी और उन्होने जीप रोक ली.

पोलीस जीप को रुकता हुआ देखकर उसके शरीर में डर की लहर दौड़ गयी,

उसने उन पोलीस वालों को अनदेखा करके अपने जानवरों को घर की ओर ले जाने के लिए हांकना शुरू कर दिया.
जीप में बैठे दारोगा ने उसको आवाज़ देकर अपने पास आने का इशारा किया, वो बेचारी उसकी बात टाल भी तो नही सकती थी.

सो नज़रें झुकाए काँपते कदमों से वो उन लोगों के पास पहुँची.

उन पोलीस वालों की हवस भरी नज़रें उसके शरीर का एक्स्रे कर रही थी, और वो बेचारी दूर खड़ी थर-2 काँप रही थी.

दारोगा – आए लड़की ! कहाँ रहती है तू, और क्या नाम है तेरा ?

उसने उंगली से अपने घर की तरफ इशारा किया, और धीरे से अपना नाम बताया.

अब वो दारोगा और दो सिपाही जीप से उतर गये और उससे बोला- दूर क्यों खड़ी है यहाँ पास आकर बोल, सुनाई नही दे रहा.

वो बेचारी काँपते कदमों से और थोड़ा नज़दीक आई और बोली- जी मेरा नाम शाकीना है,

अभी वो अपना नाम ठीक से बता भी नही सकी थी कि उस दारोगा ने एक सिपाही को इशारा किया और उसने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला-

चल हमारे साथ जीप में बैठ, तुझे थाने ले जाना है, बिना इज़ाज़त कहीं भी जानवरों को चराते हो तुम लोग.

वो बेचारी अपनी नाज़ुक कलाई को छुड़ाने की जद्दोजहद करने लगी, लेकिन कहाँ वो नाज़ुक कलाई और कहाँ उस पोलीस वाले का शख्त कठोर हाथ.

उसकी आँखों से जार-2 आँसू बहने लगे, वो उनसे खुद को छोड़ देने की गुहार कर रही थी लेकिन उन ज़ालिमों पर उसके बेबस आँसुओं का कोई असर नही हुआ.

वो नर-पिशाच भेड़िया उस लाचार मजबूर नाज़ुक सी कली को हाथ पकड़ कर घसीटते हुए जीप की तरफ ले जाने लगा…

वो बेचारी सिवाय रोने बिल्खने के और कुच्छ भी कर पाने में असमर्थ थी…जब कोई चारा नही बचा तो वो वहीं ज़मीन पर बैठ गयी…

उस सिपाही ने उसकी कलाई छोड़ दी, और उसके पीछे जाकर उसे अपनी गिरफ़्त में ले लिया..

पहले तो वो उसके नाज़ुक मुलायम अधखिले वक्षों से खेलता रहा, और फिर उसने ज़बरदस्ती उसे अपनी गोद में उठा लिया.

वो किसी छोटी बच्ची की तरह उसकी गोद में तड़पति हुई उसकी मजबूत गिरफ़्त से निकलने की नाकाम कोशिश करती रही..लेकिन निकल ना सकी..

वो सिपाही उसे उठाए हुए जीप की तरफ बढ़ने लगा. वो चीख-2 कर अपनी आममी और अप्पा को आवाज़ देने लगी.

अभी वो सिपाही शाकीना को लेकर जीप तक पहुँचा ही था कि एक बड़ा सा पत्थर भनभनाता हुआ उसकी कनपटी पर पड़ा.

अप्रत्याशित पत्थर की चोट इतनी ज़ोर्से पड़ी, कि वो शाकीना को वही छोड़कर दर्द से बिलबिलाता हुआ अपनी कनपटी पर हाथ रख कर ज़मीन पर बैठता चला गया……!
जैसे ही वो सिपाही दर्द से बिलबिलाता हुआ ज़मीन पर बैठा, झट से दारोगा और उसके वाकी साथियों की नज़र, पत्थर मारने वाले की तरफ घूम गयी….

उनसे कोई 50-60 मीटर की दूरी पर एक 6 फूटा युवक पठानी सूट में, चेहरे पर घनी लेकिन छोटी सी दाढ़ी थी, उमर कोई 28 साल होती, अपनी कमर पर हाथ रखे खड़ा था.

फ़ौरन उन चारों की गने उसकी ओर तन गयी.

दारोगा ने उसे अपनी ओर आने का इशारा किया,

वो जवान, अपने संतुलित कदमों से उनकी तरफ बढ़ा…जब वो उनसे कोई 10 कदम पर आकर रुक गया तो गुर्राते हुए दारोगा उससे बोला- आए ! कॉन है तू..? इसको पत्थर तूने मारा..?

जी जनाब ! मैने ही मारा है. मुझे लगा ये आदमी इस लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर रहा था इसलिए.

दारोगा उसकी साफ़गोई से और भड़क उठा और उसको गाली देते हुए चिल्लाया- कफर की औलाद जानता नही पोलीस के कामों में दखलंदाजी करने का अंजाम क्या होता है..? मे तुझे बताता हूँ.

और उसने एक सिपाही की ओर इशारा करके बोला- मार साले को, इसकी हीरो गिरी निकाल.

वो सिपाही उस युवक की ओर बढ़ा, और उसके कंधे पर राइफ़ल के हत्थे से एक ज़ोर दार प्रहार किया. वो जवान अपने कंधे को पकड़ के बिलबिला उठा.

बोल हरम्जादे..! हीरो बनेगा..? और एक और प्रहार उसके पेट पर कर दिया.

दर्द से वो युवक पेट पकड़ कर दोहरा हो गया और गिडगिडाते हुए बोला- मुआफी माई-बाप, अब आइन्दा ऐसा नही करूँगा.

तब तक वो सिपाही उसके पीछे पहुँच गया था, और राइफल के हत्थे की एक और भरपूर चोट उसकी पीठ पर पड़ी.

चोट काफ़ी जोरदार थी, जिसकी वजह से वो जवान 5-6 कदम आगे तक गिरता हुआ बढ़ गया, जैसे तैसे उसने अपने को आगे की तरफ गिरने से बचाया…

अभी वो सीधा खड़ा भी नही हो पाया था कि एक और प्रहार उसकी पीठ को झेलना पड़ा.

नतीजा वो अब उस दारोगा के उपर ही गिरने को हुआ, तभी एक साथ तीन काम हुए.

उस युवक ने ये भाँप लिया था कि दारोगा समेत उनकी गने उसकी ओर तनी ज़रूर थी, लेकिन वो अभी तक अनलॉक नही कर पाए थे.

एक जैसे ही वो युवक उस दारोगा के उपर गिरने को हुआ, उसने उस युवक का गिरहवान थाम कर उसे अपने उपर गिरने से रोका.

दूसरा युवक का बाँया हाथ दारोगा के हाथ में पकड़ी हुई गन वाली कलाई पर गया, और तीसरा झुकने का नाटक करते हुए उसने ना जाने कब अपना खंजर अपनी कमर से निकाला और दारोगा के पेट में मूठ तक घुसा दिया.

दारोगा दर्द से अभी ठीक से चीख भी नही पाया था, कि उसकी गन उस युवक के हाथ में आ गई, खंजर को एक राउंड उसके पेट में घुमा कर उसने बाहर खींचा.

भलभलाकार खून की एक तेज धार दारोगा के पेट से उबल पड़ी, उसके छोड़ते ही, वो त्योराकर ज़मीन पर गिरकर तड़पने लगा…
जब तक वो पोलीस वाले अपने दारोगा की हालत देख कर बौखलाए से खड़े अपनी-2 गन को अनलॉक करके चलाने की स्थिति में आते,

कि एक साथ चार फाइयर हुए और वो चारों भी ज़मीन पर पड़े तड़प्ते नज़र आने लगे.

अभी ये वाकीया हो ही रहा था कि शाकीना की चीख सुन कर उसकी अम्मी और बड़ी बेहन दौड़ती हुई वहाँ पर आ पहुँची.

शाकीना ने ये मंज़र अपनी आँखों से देखा था, डर के मारे उसकी चीखें लगातार निकल रही थी, वो खड़ी-2 सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी.

जैसे ही उसकी अम्मी और अप्पा वहाँ पहुँची, वो भागती हुई अपनी अम्मी के गले से लग कर रोने लगी.

वहाँ का खूनी मंज़र देख कर उन तीनों की हालत जुड़ी के मरीज़ जैसी हो रही थी. जब उस युवक ने शाकीना से पुछा- तुम ठीक तो हो..?

शाकीना ने अपनी गर्दन हां में हिला दी, उसके मुँह से कोई बोल ना निकल सका.

थोड़ा होश में आकर उसकी अम्मी ने उस युवक से कहा- तुम्हारा बहुत-2 शुक्रिया बेटा, जो तुमने मेरी बेटी को बचा लिया इन दरिंदों से, वरना ना जाने ये इसका क्या हश्र करते.

युवक – इसमें शुक्रिया की कोई बात नही है बीबी, ये तो मैने इंसानियत के नाते किया है, जब मैने इनका विरोध किया तो इन्होने मुझे ही मारना शुरू कर दिया,

तो अपनी जान बचाने के लिए मुझे मजबूरन इन हैवानो को मारना ही पड़ा, वरना ये लोग मुझे मार डालते.

वो तीनों ही उसे किसी फरिस्ते की तरह देख रही थी, फिर कुछ देर बाद अमीना ने पुछा- बेटा तुम्हारा नाम क्या है और कहाँ के रहने वाले हो.

युवक- बीबी ! मेरा नाम अशफ़ाक़ है, मेरा घर यहाँ से दूर गिलगित के पास एक छोटे से गाँव सांप्ला में है, मेरा भरा पूरा परिवार था,

अम्मी, अब्बू, 3 भाई और 2 बहनें, जिनमें मे सबसे बड़ा था. सभी खुश हाल जिंदगी जी रहे थे.

अब आगे की कहानी अशफ़ाक़ की ज़ुबानी……

मेरे अब्बू और कुछ लोगों ने मिलकर हुकूमत की नाइंसाफी और दहशतगर्दी के खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश की,

इसके एवज में हमें आए दिन धमकियाँ मिलती रहती,
एक दिन मे घर पर नही था तो कुछ फ़ौजी जवानों ने गाँव पर हमला कर दिया और मेरे पूरे खानदान को हलाक़ करके घर को आग के हवाले कर दिया.

उस घटना के बाद से ही अब मे भी इन नकारा हुकूमत के नुमाइन्दो से और फौज से छिप्ता फिर रहा हूँ, ना अब कोई मेरा घर है, और ना कोई ठिकाना.

जहाँ रात हो जाती है, सो जाता हूँ, जब भूख लगती है, तो जो भी मिलता है खाकर पेट की आग को शांत कर लेता हूँ.

लेकिन अब वक़्त की बेरहम मार ने मुझे ऐसा बना दिया है, कि जब भी कोई ज़ुल्म मेरी आँखों के सामने होता दिखता है, मेरे पूरे बदन में आग सुलगने लगती है, और मे उन दरिंदों को उनके अंजाम तक पहुँचा कर ही दम लेता हूँ.

हो सकता है, किसी दिन कोई गोली मेरा भी ख़ात्मा कर दे, लेकिन तब तक मे इन दरिंदों से लड़ता ही रहूँगा.

वो तीनों उस युवक की आप बीती सुनकर इतनी भावुक हो गयी की उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े, और वो अपने गमो को छोटा महसूस करने लगी.

तभी अमीना की बड़ी बेटी रेहाना बोली- लेकिन अब क्या होगा, जैसे ही हुकूमत को पता चलेगा कि उनके पोलीस के जवानों को किसी ने हलाक़ कर दिया है, तो वो इस सारे इलाक़े में तबाही मचा देंगे.

मे – आप लोग इनकी फिकर ना करो, मे इन सब को जीप में डालकर यहाँ से 3-4 किमी दूर एक घाटी है, जिसकी पहाड़ी पर एक मोड़ है, मे इन्हें जीप समेत उस पहाड़ी से सेकड़ों फीट गहरी घाटी में फेंक दूँगा,

पोलीस यही समझेगी, कि नशे और अंधेरे के कारण जीप स्पीड में कंट्रोल नही हुई और मोड़ से घाटी में गिर गयी. आप लोग आराम से अपने घर जाओ.

अमीना – नही बेटा ! अब तुम भी हमारे साथ ही रहोगे, कब तक अकेले यूँही भटकते रहोगे..?

मे – नही बीबी ! मेरी वजह से खंखाँ आप लोगों पर कोई मुशिबत आ बने ये मे नही चाहता.

रहना – वैसे भी हम लोग क्या कम मुशिबत झेलते हैं..! आए दिन ऐसे हादसे लोगों के साथ होते ही रहते हैं, आप हमारे साथ रहोगे तो मूषिबतों का मिल जुल कर सामना कर लेनेगे.

मे – लेकिन मे आप लोगों……!

अमीना – बस बेटा अब और आगे कुछ नही सुनना, तुम्हें हमारे साथ ही रहना है तो रहना है बस… !

मे – तो ठीक है बीबी ! आप लोगों की यही ज़िद है तो मे इन लोगों को ठिकाने लगा कर लौटता हूँ.

अमीना – लेकिन बेटा इतनी दूर से लौट कर आओगे कैसे, पैदल तो बहुत समय लग जाएगा, फिर कुछ सोच कर बोली-

रेहाना तू एक काम कर, अपनी बाइसिकल ले आ, इधर से जीप में डाल कर ले जाना और उधर से तुम दोनो उससे लौट आना.

ये ठीक रहेगा अम्मी, कहकर रहना दौड़ गयी घर की तरफ और कुछ ही देर में साइकल लेकर आ गयी,

तब तक मैने उन पाँचों को जीप में डाला, और हम तीनों ने मिलकर खून के निशान मिटा दिए.

अंधेरा हो चुका था, साइकल को भी पीछे डालकर, रेहाना को बगल की सीट पर बिठाया और मे चल दिया उन कुत्तों को ठिकाने लगाने,

शाकीना और उसकी अम्मी अपने घर की तरफ बढ़ गयी….!

रेहाना को मैने मोड़ से पहले ही उतार दिया, साइकल नीचे रख के वो वहीं खड़ी हो गयी, मैने जीप स्टार्ट की और उसको स्पीड देकर मोड़ से हल्का सा टर्न दिया और सीधी खाई की तरफ दौड़ा दी.

जैसे ही जीप खाई के पास पहुँची, मैने जीप से जंप लगा दी, और उसको खाई में कुदा दिया,

किसी पत्थर से टकरा कर जीप में आग लग गयी और जलती हुई जीप उन हरामजादो की लाशों के साथ सेकड़ों फीट गहरी खाई में जा गिरी.

अंधेरे के कारण मेरा शरीर एक पत्थर से जा टकराया, मेरा बाँया कंधा पत्थर की रगड़ से छिल गया था, मेरी कमीज़ भी उस जगह से फट गयी और उसमें से खून रिसने लगा.

चोट थोड़ी ज़्यादा लगी थी, जिसकी वजह से मे कुछ देर यूँही पड़ा रह गया, फिर थोड़ा हाथ से सहारा लेकर उठा और धीरे-2 रेहाना के नज़दीक पहुँचा, वो साइकल का हॅंडल पकड़े खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी.

मुझे कंधे पर हाथ रखे और धीमे कदमों से आते देख उसने साइकल वहीं छोड़ी और दौड़ते हुए मेरे नज़दीक आई,

मेरा बाजू थाम कर सहारा देते हुए बोली- आप ठीक तो हैं..? हाथ हटाइए ज़रा, और फिर जब उसने मेरे कंधे से खून रिस्ता देखा तो घबरा कर बोली-

अरे आपको तो चोट लगी है..! आप बैठो मे कुछ बाँध देती हूँ इस पर, वरना खून बहता रहेगा, और फिर उसने अपने दुपट्टे से मेरे कंधे के जख्म को बाँध दिया और बोली-

आपको दर्द हो रहा होगा, आप साइकल पर बैठो मे चलाकर ले चलती हूँ.

मे उसकी मासूमियत पर मुस्करा उठा और बोला- अरे ऐसी चोटें तो आए दिन लगती ही रहती हैं, इसकी मुझे आदत सी हो गयी है तुम चिंता मत करो मे साइकल चला लूँगा,

फिर साइकल ज़मीन से उठा कर उसकी सीट पर बैठ गया और उसको पीछे कॅरियर पर बैठने को बोला.

जब वो बैठ गयी तो मैने साइकल पर पैदल मार कर आगे बढ़ाया.

उसका कॅरियर कमजोर सा था, रेहाना के वजन की वजह से वो इधर-उधर लचक्ने लगा, जिसकी वजह से साइकल भी इधर-उधर लहराने लगी.

मुझे साइकल को संभालने में दिक्कत हो रही थी, जिसकी वजह से पैडल पर ज़ोर नही दे पा रहा था.

मैने साइकल खड़ी कर दी, और बोला- ये ऐसे तो नही चल पाएगी, कॅरियर कमजोर है, तुम्हारे वजन से ही कहीं टूट ना जाए, और साइकल भी लहरा रही है, अब तो पैदल ही चलना पड़ेगा.

और मे एक हाथ से उसका हॅंडल पकड़ कर चलने लगा, रेहाना मेरे बगल में चल रही थी.

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