#32
मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ये मंदिर इतना तो साधारण नहीं था जितना दुनिया इसे समझती थी , मेरे लिए दो दो मुसीबते थी एक यहाँ की कहानी और दूसरी हवेली की कहानी . मैं हवेली जाना चाहता था पर तबियत ख़राब लग रही थी तो मैं वापिस से घर आ गया . निर्मला से चाय का कह कर मैं एक बार फिर से ठाकुर इंद्र के कमरे में पहुंच गया .
एक बार फिर मैं छानबीन के मूड में था पर तभी मेरे मन में वो ख्याल आया जिसने मुझे दुसरे तरीके से सोचने पर मजबूर कर दिया, कोई भी आदमी अपने राज वहां कभी नहीं छिपाएगा जहाँ वो सबके सामने आने की सम्भावना हो . मैं अपने ख्यालो में खोया था की निर्मला आ गयी .
“कभी कभी तुम्हे समझना बहुत मुश्किल है अजित को सब कुछ दे दिया अपने लिए कुछ भी नहीं रखा तुमने और लिफाफा भेजा भी तो किसके हाथ ” निर्मला ने कहा
मैं- जो उसका था उसे दे दिया मेरा क्या है और फिर भला मेरी कितनी ही जरूरते है रहने को ये घर है ही मेरे पास
निर्मला- पर क्या इस कदम से ये दुश्मनी रुक जाएगी
मैं- दुश्मनी की बात नहीं, बात हक़ की है जो उसका था उसे लौटा दिया. वैसे भी मेरी प्राथमिकता अजित नहीं बल्कि वो हवेली है जिसकी दीवारों में मेरा अस्तित्व छिपा है .
निर्मला- क्या मालूम हुआ तुम्हे नया वहां पर
मैं- कुछ खास नहीं अभी तक तो पर जल्दी ही मैं पता कर लूँगा.
तभी मेरे हाथ से वो तस्वीर वाला कागज गिर गया निर्मला उसे उठाने को झुकी और एक बार फिर से उसके गदराये यौवन के मुझे दर्शन हो गए, न जाने क्यों वो इतना गहरे गले का ब्लाउज पहनती थी . निर्मला ने वो तस्वीर वाला कागज मुझे दिया और बोली- बातो के चक्कर में चाय ठंडी कर दी तुमने , दुबारा बना कर लाती हूँ
मैं- नहीं रहने दो
निर्मला- क्या तुम सच में चांदनी से प्रेम करते हो
मैं- पता नहीं वैसे भी अजित से सगाई हुई है उसकी
निर्मला- अगर वो तुमसे प्रेम करती है तो फिर अजित की क्या परवाह करनी
मैं- तुम प्रेम को समझती हो
निर्मला- देखा जाये तो प्रेम जैसा कुछ नहीं होता सब जिस्मो को पाने के चोंचले है. यहाँ हर आदमी हर दूसरी औरत को पाना चाहता है . ये ही जीवन का वो सत्य है जिसे जानते सब है मानता कोई नहीं .
मैं- ये बात असत्य है प्रेम में स्वार्थ नहीं होता
निर्मला- जब तुमने प्रेम किया ही नहीं तो कैसे कह सकते हो ये बात जबकि मैं जब चाहू अपनी बात को प्रमाणित कर सकती हूँ , तुम ही बताओ क्या तुम्हे मेरे जिस्म की चाहत नहीं
निर्मला ने अत्याप्र्त्याषित रूप से सीधे सीधे ही ऐसा प्रशन पूछ लिया था जिसका जवाब देने में मेरे पसीने छूटने लगे .
मैं- ये कैसी बात कर रही हो तुम
निर्मला- बात को बदलो मत , अगर मैं अभी तुम्हारे सामने नंगी हो जाऊ तो क्या तुम लोगे मेरी , वैसे अजीब स्तिथि होगी तुम्हारी ले ली तो तुम्हारी बात झूठी साबित हो जाएगी और ना ली तो तुम्हारी मर्दानगी बुरा मान जाएगी .
सच कहूँ तो मेरे पास निर्मला की बात का कोई जवाब नहीं था , वो मेरे पास आई और अपने होंठ मेरे होंठो से लगा बैठी .
“दिल में नेकी होना अच्छी बात है पर सांप को दूध पिलाना ये जानते हुए भी की वो तुमको ही काटेगा चुतियापा है . ” उसने कहा और मुड गयी पर आगे न बढ़ सकी मैंने उसका हाथ पकड़ लिया . हमारी नजरे मिली और एक बार फिर से हमारे होंठो एक दुसरे से जुड़ गए. निर्मला की ठोस छातिया मेरे सीने पर दबाव डालने लगी थी और जैसे ही मेरे हाथो से उसके मादक नितम्बो को सहलाया वो मुझसे दूर हो गयी .
सुबह जब मैं नहा कर आया तो आईने में खुद को देखा सीने पर वो निशाँ अभी भी देखे जा सकते थे , मैंने गाडी निकाली और लाल मंदिर की तरफ हो लिया. किस्मत से रस्ते में ही मुझे पद्मिनी मिल गयी जो अपना झोला उठा कर कहीं जा रही थी .
मैं- तुमसे मिलना बेहद जरुरी था
पद्मिनी- क्यों
मैं- क्या तुम इसके बारे में कुछ बता सकती हो
मैंने शर्ट उतार कर वो निशान उस को दिखाया .
“ये कैसे हुआ ” उसने कहा
मैं- तुम मुझे बता सकती हो ये क्या है
पद्मिनी ने मेरी छाती पर अपना हाथ फेरा और बोली- नहीं , मैं नहीं जानती
मैं- जानती नहीं हो या बताना नहीं चाहती
पद्मिनी ने घूरा मुझे और बोली- अर्जुन, मेरा साथ मत कर . हम दोनों अच्छे से जानते है की हमारे सफ़र अलग है
मैं- सफ़र अलग हुए तो क्या मंजिल तो एक ही है न . इस निशान के बारे में जानती है तो बता दे वर्ना मैं खुद मालूम कर ही लूँगा .
मैंने गाड़ी स्टार्ट की और आगे बढ़ गया , शीशे में मैंने पद्मिनी को दूसरी तरफ जाते हुए देखा . एक बार फिर मैं तालाब में गोते लगा रहा था पर इस से पहले की मेरे साथ पहले जैसी घटना होती मेरी आँखों ने वो देख लिया जो वहां पर था और दिल ने कहा की हो न हो इसका ठाकुर शौर्य सिंह और डाकू मंगल से सम्बन्ध रहा होगा. जब मैं बाहर आकर गिरा तो देखा की पद्मिनी सीढियों पर ही खड़ी थी .
मैं- मुझे मिल गयी दुश्मनी की वजह , मैं गलत नहीं हूँ तो तेरे बाबा और ठाकुर के बीच दुश्मनी तालाब में पड़े सोने की वजह से हुई थी .
पद्मिनी कुछ नहीं बोली बस आँखे फाड़े मुझे देखती रही .
“तू इस सच को नहीं झुठला सकती की हम दोनों की किस्मत कहीं न कहीं एक दुसरे से जुडी है , मान चाहे मत मान इस मंजिल को पाने के लिए हमें साथ साथ चलना होगा “ मैंने कहा
पद्मिनी- मैं तेरी दुश्मन हूँ समझता क्यों नहीं तू
मैं- तेरे दिल से कहलवा दे ये बात मान लूँगा.
मैंने आगे बढ़ कर पद्मिनी को बाँहों में भर लिया और अपने होंठ उसके लबो से जोड़ लिए.
“नफ़रत और मोहब्बत एक ही तो होते है पद्मिनी दोनों दिल से किये जाते है , तू थोड़ी नफरत कर ले मैं थोड़ी मोहब्बत कर लूँगा. ” मैंने कहा
वो- मोहब्बत और मुझसे , फिर उस से क्या कहेगा जिसके साथ जीने के सपने देखता फिर रहा है .
मेरे पास कोई जवाब नहीं था
“तेरी मेरी राहे अलग है अर्जुन, मैं डेरे की बेटी हूँ टोने और सिद्धिया मेरा कर्म है . मेरी सिर्फ एक मंजिल है ठाकुर के अंतिम वारिस को मिटा देना मैं इंतज़ार कर रही हूँ की कब ठाकुर अपनी आँखे खोले और मैं उसे मार पाऊ . ” उसने कहा और चली गयी न जाने क्यों मैं उसे रोक नहीं पाया.

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