#31
कटे हुए पेड़ के जैसे सरपंच का शरीर धरती पर आ गिरा. वहां मोजूद हर एक सक्श जानता था की मामला बिगड़ चुका था. मैं भी समझ तो गया था की जो हुआ वो बेहद गलत हुआ है और भविष्य में इसके परिणाम भी ठीक नहीं होंगे लड़ाई झगडा दुश्मनी अपनी जगह पर मौत किसी की भी हो ठीक नहीं होती. निर्मला ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- अर्जुन चलो यहाँ से .
हम घर तो आ गए थे पर रात भयावह लगने लगी थी , ऐसा नहीं था की मुझे अजित या उसके परिवार से डर था पर सरपंच की मौत का अफ़सोस भी था . बहुत देर तक मैं बैठा रहा फिर निर्मला ने चुप्पी तोड़ी.
“जो हुआ उसमे तुम्हारा दोष नहीं है ” उसने कहा
मैं- जानता हूँ
निर्मला- तो फिर ये मातम जैसा मुह क्यों बनाया है
मैं- एक आदमी की जान गयी है
निर्मला- कभी कभी जान की कोई कीमत नहीं होती ठाकुर इंद्र सिंह की भी जान गयी थी आज तक उसके कातिल को तुम नहीं पकड पाए तो उस जान की भी क्या ही कीमत बची . जो हुआ उसे भूलो और कल पर ध्यान दो .
मैं- पर मेरी समझ में ये नहीं आता की अजित ने इस दुश्मनी को इतना क्यों गले से लगाया हुआ है , जबकि परिवारों में सिवाय चुनाव के कभी कोई बहस बाजी तक भी नहीं हुई .
निर्मला- नफरतो का तंदूर वहीं पर दहकता है जहाँ सुलगते कोयलों पर पानी ना डाला गया हो.
मैं- क्या कहना चाहती हो .
निर्मला- अजित की नफरत एक तरह से सही भी हैअर्जुन
मैं- कैसे
निर्मला- ठाकुर इंद्र की वजह से अजित की माँ को अपनी जान देनी पड़ी थी
निर्मला की बात ने मुझे हैरत में डाल दिया .
मैं- क्यों किसलिए
निर्मला- बात करीब सत्रह- अठारह साल पुराणी है , तब इंद्र पुरुषोत्तम और उसके भाइयो की संगत में पड़ कर उनकी तरह ही आवारागर्दी करने लगा था , ऊपर से वो ठाकुर शौर्य सिंह का रिश्तेदार था तो इसका गलत फायदा उठाने लगा था . मद में चूर इंद्र ने एक दिन लाल मंदिर में पूजा करती अजित की माँ पर अपना ईमान डिगा दिया और वहीँ पर उसके साथ जोर जबरदस्ती करने की कोशिश की , अपनी लाज बचाने को उस बेचारी ने अपनी जान दे दी . अजित तब छोटा था पर नफरत की आग में इतना जला की आज तक जल रहा है और अब उसका बाप भी मारा गया . जिन जमीनों को बार बार वो कब्ज़ा करने की कोशिश करता है वो जमीनों को इन्दर सिंह ने ही छीनी थी उनसे.
मैं- जुबान पर लगाम रखो निर्मला, बापू के बारे में मैं ऐसा वैअसा कुछ कुछ नहीं सुनूंगा.
निर्मला- क्योंकि वो तुम्हारा बापू था , इसलिए वो सही नहीं हो जाता. अर्जुन सच की तख्ती को गले में लटका कर घूमोगे तो सच सुनने की हिम्मत भी रखनी चाहिए. आइना हमें चेहरे का वो रूप दिखता है जो हम देखना चाहते है . अपने ऊपर लेकर देखो अगर तुम अजित की जगह होते तो क्या तुम्हारे कलेजे में आग नहीं जलती.
निर्मला की बाते कडवी थी पर सच थी बेशक मैं इस सच को मानने को तैयार नहीं था और झुठला भी नहीं सकता था
निर्मला ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोली- जरुरी नहीं की हमेशा हम ही सच के साथ हो कभी कभी सच चाह कर भी हमारे साथ नहीं होता, ये दुनिया वैसी नहीं जैसी उसे तुम समझते हो .
मैं- क्या उस रात लखन ने जब तुम्हे देखा था तुम्हारे साथ बापू थे
निर्मला – नहीं , पर अगर होते तो भी क्या फर्क पड़ना था .
निर्मला अपने कमरे में चली गयी . पर मुझे नींद नहीं आई. पर उस रात मैंने वो करने का निर्णय लिया जिसके लिए निर्मला कभी नहीं मानती. दोपहर को मैं चांदनी से मिला
चांदनी- अर्जुन, जो भी हुआ बहुत गलत हुआ है
मैं- जानता हूँ
चांदनी- दुश्मनी से कभी किसी का भला नहीं हुआ और अब जो आग भड़की है उसमे मुझे भी जलना पड़ेगा
मैं- ठीक समय आने पर मैं अजित से मिलूँगा जो हुआ है मैं उसे वापिस तो नहीं कर सकता पर तुम ये उस तक पहुंचा देना
मैंने एक लिफाफा चांदनी को दिया
चांदनी ने उसे खोल कर देखा और बोली- अर्जुन, ये क्या कर रहे हो तुम . जानते भी हो इसके बाद ……
“जानता हूँ ” मैंने चांदनी की बात काटी और उसके हाथ में वो लिफाफा दे दिया. वो कुछ नहीं बोली बस मेरे काँधे पर अपना सर रख दिया उसने और कस कर मेरे हाथ को थाम लिया . वहां से मैं सीधा लाल मंदिर गया जो हमेशा के जैसे उपेक्षित था . तभी मुझे कुछ खटका और मैं तुरंत सीढियों के पास गया . उस दिन जब मैं पानी में गिरा तो मेरे सर पर कुछ तो लगा था . मैंने कपडे उतारे और पानी में गोता मार दिया . दो तीन बार गोते मारे अंदाजे लगाते हुए और जब मैं गहराई में उतरा पर मैं क्या जानता था की ये गहराई मुझे न जाने क्या दिखाने वाली थी .
पानी की गहराई में मेरे सामने वो अचरज था जिसे आँखों ने देखने से मना कर दिया था .पानी का दरिया लाल हो चूका था इतना लाल की जैसे खून बह रहा हो और जैसे ही मैंने उस दमकती आभा को हाथ आगे बढ़ा कर छुआ , मुझे इतने जोर से झटका लगा की मेरे साथ साथ पानी भी जल उठा.
“जो तुम्हारा नहीं है उसे पाने की चेष्टा न करो ” पानी में होने के बावजूद भी मैंने उन शब्दों को स्पष्ट रूप से सुना. जब होश आया तो मैं सीढियों पर पड़ा था और मेरे सीने पर खुरो के निशाँ पड़े थे.

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