#23
रात को एक बार फिर से मैं लाल मंदिर के प्रांगन में खड़ा हुआ था , कुछ तो बात रही होगी यहाँ पर मैंने दिन में ही सोच लिया था की सोलह सत्रह साल पहले जब ये मंदिर आबाद रहा होगा तो पुजारी भी रहा ही होगा बस उसे तलाशने की जरुरत थी . कुछ आवाजो ने मेरा ध्यान खींचा तो मैं सीढियों की तरफ गया और एक बार फिर से वो ही लड़की मुझे वहां बैठी मिली.
“क्या तुम्हे भी ये खामोशिया पसंद है जो बार बार यहाँ लौट आते हो ” उसने बिना मुझे देखे कहा न जाने कैसे उसे मेरी उपस्तिथि का भान था .
“तुम खामोशियो की बात करती हो , मेरे मन में ज्वार उठा हुआ है ” मैंने कदम आगे बढ़ा कर उसके पास बैठते हुए कहा .
“अक्सर मन के कच्चे लोग उलझ जाते है अपनी कथनी में ” उसने कहा
मैं- तुम किस्मे उलझी हो
वो- ये सामने क्या दीखता है तुमको
मैं- एक बर्बाद पानी का सोता
वो- मुझे ये रक्त दीखता है , मेरे कुल का रक्त
उसने बेशक हलके लहजे में वो बात कही थी पर उसके शब्दों का वजन बहुत जायदा था .
“”तुमने मेरा नाम पुछा था न , डेरे की वारिस हूँ मैं पद्मिनी डाकू मंगल की पोती “ उसने कहा
मैं- तो तुम भी मेरे जैसी ही हो अपने वजूद की तलाश करती हुई
पद्मिनी- मुझे रक्त की तलाश है
मैं- किसका रक्त
पद्मिनी- ये प्यास भी बड़ी अजीब होती है ये प्यास कहाँ देखती है कहाँ फर्क करती है इसे तो बस अपनी पूर्ति से मतलब होता है
मैं- पर तुम्हारी तलब की कहानी कुछ खास जरुर रही होगी . बेशक बताना न बताना तुम्हारी अपनी मर्जी है पर मैंने सुना है की मन की बात कह देने से थोडा बोझ हल्का जरुर हो जाता है
पहली बार मुझे ऐसा लगा की पद्मिनी ने मुझे जी भर कर देखा हो
“क्या तुम मान्यताओ में विश्वास करते हो ” उसने पूछा
“मेरा विस्वास मान्यताओ को तोड़ने में रहा है ” मैंने कहा
पद्मिनी- ये जो पानी का सोता है न , कहते है की ये इसे कोई पूरा नहीं कर पायेगा न जाने किसकी बद्दुआ है बहुत लोगो ने कोशिश की पर कोई भी इसे तालाब नहीं बना पाया.
मैं- तुम क्यों कोशिश नहीं करती क्या पता तुम ये अधुरा काम पूरा कर सको वैसे भी इतनी शिद्दत से तुम्हारी आँखे देखती है इस को तुम्हारा मन बहुत गहरे से जुड़ा है लगता है
पद्मिनी ने एक गहरी साँस ली और बोली- सोलह साल पहले मेरे कुल का रक्त इसी सोते के पानी में मिला दिया गया था .
मैं- मंदिर में रक्त बहाने वाला को शैतान ही रहा होगा.
पद्मिनी- रक्त , रक्त की तलब सदा ही रही है उस देवी को , उसके दर से कभी किसी को आश्रीवाद नहीं मिला. मिला बस दुःख, दुनिया अपने दुःख अपनी तकलीफ इश्वर को बताती है , कहते है की माँ का कलेजा अपनी औलादों के लिए तडपता है पर इस माँ का कलेजा भी इसकी तरह पत्थर का ही है , कभी पसीजा ही नहीं अपनी औलादों के लिए.
मैं- तेरी कहानी भी मुझ सी ही है पद्मिनी तू भी अकेली मैं भी अकेला कहने को हमारे पास सब कुछ पर देखे तो कुछ भी नहीं .
उसने कनखियों से अपनी आँखों का पानी पोंचा और जाने को उठ खड़ी हुई .
मैं- फिर मिलोगी क्या
वो- किसलिए
मैं- अच्छा लगता है तुमसे बाते करना
वो- मैं जरुरी नहीं समझती
मैं- डेरे में आऊंगा मैं फिर
उसने कोई जवाब नहीं दिया और अपने रस्ते पर बढ़ गयी . मेरी नजरे रह रह कर उस पानी के सोते की तरफ जा रही थी पास में एक कुदाली पड़ी थी पद्मिनी के शब्द मेरे कानो में गूँज रहे थे .मैंने पतलून को घुटनों तक मोड़ा और कुदाली लेकर सोते में उतर गया. बहकती रात में ठन्डे पानी ने बदन को चूम कर जो अहसास दिया लगा की रेत पर बरसो बाद कोई बूँद से गिर गयी हो . मैंने कुदाली उठाई और पानी में दे मारी कुछ देर मैं कीचड को बाहर फेंकता रहा और फेंकता रहा .
आँख खुली तो मैंने देखा आस पास लोगो का हुजूम इकठ्ठा था
मैं- क्या हुआ इतनी भीड़ क्यों है
“हमी से कारन पूछते हो बेटा ” एक बुजुर्ग ने कहा
मैं- समझा नहीं बाबा
बुजुर्ग- जरा अपने पीछे देखो तो जरा
मैंने मुड कर देखा तो मेरी आँखे फटी की फटी रह गयी पानी का सोता गायब हो चूका था और उसकी जगह तालाब हिलोरे मार रहा था .
बुजुर्ग- एक रात में तालाब खोदने वाले कौन हो तुम
मैं- मेरा नाम अर्जुन है बाबा . और मेरा नाम ही मेरी पहचान हैं मैं इस मंदिर को आबाद करने आया हूँ
मेरी बात सुन कर वहां मोजूद लोगो में खुसर पुसर शुरू हो गयी .
“ये मंदिर हमारी जमीन पर बना हुआ है , हमने तुझसे पहले भी कहा था की हमारे इलाके से निकल जा और दुबारा इस तरफ दिखना मत पर तूने चेतावनी को हलके में लिया ” जय सिंह की आवाज सुनते ही गाँव वाले तितर बितर हो गए वो अकड से चलते हुए मेरे पास आया .
मैं- मंदिर में मेरा या तेरा नहीं होता मंदिर सबका होता है और किस जमीं की बात करता है तू जय सिंह , शौर्य सिंह के बाद जमीनों का कोई असली मालिक है तो वो रुपाली ठकुराइन है , सब जानते है तेरे बाप ने धोखे से सब कुछ हथिया लिया . ये मेरी इच्छा है की मंदिर दुबारा से आबाद हो तो होगा . किसी माई के लाल में इतना दम नहीं की वो अर्जुन को रोक सके
“मंदिर का इतिहास रक्तरंजित रहा है बेटा , बरसो पहले गाँव में यहाँ इतना रक्तपात देखा था की आज तक पुश्ते कांपती है तुम ठाकुरों से दुश्मनी मत लो ” उसी बुजुर्ग ने मुझसे कहा
मैं-गाँव बसाने वाले उसे उजाड़ा नहीं करते बाबा, बरसो पहले क्या हुआ क्या नहीं उसकी क्या परवाह करनी पर आज कोई कहे की गाँव उसकी मल्कियत है तो थूकता हु मैं . लोगो पर राज नहीं किया जा सकता लोगो को साथ लेकर चला जाता है . वो दौर बीत गया बाबा जब गुलामी लोगो की तक़दीर हुआ करती थी गाँव तेरा भी उतना ही है जितना जय सिंघ का जितना किसी और का जितना हर एक गाँव वाले का .
जय सिंह- अपनी औकात से बहुत ज्यादा बोल गया तू, तुझे तेरी मौत हमारे इलाके में घसीट लायी है
मैं- इलाके कुत्तो के होते है जय सिंह क्योंकि उनको अपनी हदे मालूम होती है अर्जुन शेर है और शेरो के जंगल होते है
“ तो फिर ठीक है हम भी देखते है तेरे खून में कितनी गर्मी है जब ये धरा तेरे रक्त को पीयेगी तो सकूं बहुत मिलेगा. तूने राजाओ को चुनोती दी है तो ये गाँव भी देखेगा की हमारा जोर न पहले कभी कम था न आज कम है ” जय सिंह ने मेरे सीने पर अपनी बन्दूक लगा दी.

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